डॉ. नामवर के महत्वपूर्ण कथन

डॉ. नामवर सिंह का जन्म- 28 जुलाई 1927 को बनारस से तीस मिल दूर एक छोटे से गाँव जीवनपुर में हुआ था। इनका परिवार गहरवार राजपूत परिवार था।

‘छायावाद’ 1954 ई. में सरस्वती प्रेस से छपी थी। यह नामवर सिंह की पहली समीक्षात्मक पुस्तक है। इसमें बारह अध्याय है। नामवर सिंह ने इसकी भूमिका में लिखा है- “यह निबंध छायावाद की काव्यगत विशेषताओं को स्पष्ट करते हुए छाया चित्रों में निहित सामाजिक सत्य का उद्घाटन करने के लिए लिख गया है।… सामाजिक सत्य कविता के खोज निकालने की चीज है, ऊपर से आरोपित करने की नहीं।’   

छायावादी स्वानुभूत संत भक्तों के आत्म निवेदन से किस बात में भिन्न है; छायावादी कल्पना में प्राचीन कवियों की अप्रस्तुत विधायनी कल्पना से क्या विशेषता है; प्रकृति का मानवीकारण करने में छायावाद ने संस्कृत कवियों से कितनी अधिक स्वच्छन्दता दिखलाई है; छायावाद, रहस्यवाद और संत भक्तों के अध्यात्मवाद में क्या अंतर है; छायावाद मूर्तिमत्ता में प्राचीन कवियों के दृश्य चित्रण से क्या नवीनता है और छायावाद की ऐतिहासिकता में ऐसा क्या है जो संस्कृत काव्यशास्त्र की सीमा में नहीं आ सकता। इन प्रश्नों का स्पष्ट उत्तर दिये बिना छायावाद के काव्य सौंदर्य का विवेचन पूर्ण नहीं कहा जा सकता। (‘छायावाद’ की भूमिका से लिया गया है)

‘आरम्भ में सामाजिक पृष्ठभूमि देकर फिर किसी काव्य प्रवृति पर विचार करने से कोई बात नहीं बनती…सामाजिक सत्य कविता से खोज निकालने की चीज है, ऊपर से आरोपित करने की नहीं…।’ 

‘रहस्यवाद अज्ञात की जिज्ञासा है, तो छायावाद चित्रण की सूक्ष्मता और स्वच्छन्दतावाद प्राचीन रूढ़ियों से मुक्ति की आकांक्षा…।’

छायावाद उस राष्ट्रीय जागरण की अभिव्यक्ति है, जो एक ओर पुरानी रूढ़ियों से मुक्ति चाहता था और दूसरी ओर विदेशी पराधीनता से।

‘छायावादी कल्पना केवल अलंकारों और प्रतीकों की योजना करने वाली सामान्य प्रवृति नहीं है; वह सत्यान्वेषी दृष्टि है।’

‘कविता के नये प्रतिमान’: नामवर सिंह की यह बहुचर्चित कृति 1968 में राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली से छपी। इसी पुस्तक पर नामवर सिंह को 1969 में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। यह पुस्तक दो खण्डों में है।

प्रथम खंड में समकालीन कृतियों और परस्पर टकराने वाले काव्य मूल्यों पर विचार किया गया है।

द्वितीय खंड में नई कविता के संदर्भ में काव्य मूल्यों, काव्य की भाषा, सृजनशीलता, बिंब, सपाटबयानी, काव्य संरचना, अनुभूति, परिवेश और मूल्य आदि तत्त्वों का प्रश्न उठाया गया है।

‘कविता के नये प्रतिमान’ के केंद्र में मुक्तिबोध हैं…। इस पुस्तक का आधार यह धारणा है कि नयी कविता में मुक्तिबोध की स्थिति वही है जो छायावाद में निराला की थी। निराला के समान ही मुक्तिबोध ने भी अपने युग के सामान्य काव्य-मूल्यों को प्रतिफलित करने के साथ ही उनकी सीमा को चुनौती देकर उस सर्जनात्मक विशिष्टता को चरितार्थ किया जिससे समकालीन काव्य का सही मूल्यांकन संभव हो सका।” (कविता के नए प्रतिमान, भूमिका)

“श्रेष्ठ साहित्य मन का लड्डू नहीं है जब जी चाहा बना लिया। श्रेष्ठ तो श्रेष्ठ, साहित्य मात्र किसी की स्वेच्छा पर निर्भर नहीं है। जब जैसा जी हुआ वैसा साहित्य कोई नहीं रच सकता। वह एक निश्चित परिस्थिति में और एक निश्चित परिस्थिति से पैदा होता है और यह परिस्थिति उसकी स्वेच्छा को मर्यादित करती है। यहाँ तक कि उसके विद्रोह को भी परिस्थिति के विरुद्ध लेखक का विद्रोह भी उस परिस्थिति के द्वारा निर्धारित होता है। यह लेखक की ऐतिहासिक सीमा है। मन के लड्डू खाने की अपेक्षा अपनी ऐतिहासिक सीमा को समझने और समझकर बदलने की कोशिश करने में कहीं अधिक स्वाद है। (इतिहास और आलोचना: पृष्ठ सं. 36)

“साहित्य में इतिहास मेरी मुख्य चिंता थी। साहित्य का इतिहास लिखना इतना महत्वपूर्ण नहीं था जितना साहित्य का इतिहास समझना और यह वीरगाथा काल, और भक्ति काल, रीतिकाल और भारतेंदु मंडल काल और जिस तरह से विभाजन कर दिया गया था और फिर मुसलामानों का हमला हुआ तो इतिहास बदल गया। इसका जबाब मुझे रामचंद्र शुक्ल नहीं देते कि क्यों एक हजार ईसवी के आसपास संस्कृत और प्राकृत का वर्चस्व हुआ और क्यों लोकभाषाएँ साहित्य का दर्जा प्राप्त कर सकी। इसका जबाब रामचंद्र शुक्ल के पास नहीं है। इसका जबाब किसी के पास नहीं है। क्यों हिंदी ही नहीं बल्कि समूचे भारतीय इतिहास में लोक भाषाएँ पहली बार साहित्यिक गौरव के साथ आयीं और इसको गौरव दिलाने में आधे से ज्यादा लोग वे हैं जो बेपढ़े-लिखे है, छोटी जातियों के लोग हैं। उनका लोक-साहित्य कभी साहित्य क्यों नहीं माना गया? ये सवाल मुझे परेशान करते थे। तब मुझे लगा कि मार्क्सवाद में शायद इसका हल हो क्योंकि मार्क्सवाद इतिहास दर्शन है। वो दुनिया के इतिहास जो राजाओं की कहानी मालूम होनी चाहिए उस साहित्य का एक पैटर्न दिखता है। उसकी प्रगति, परिवर्तन, विकास की व्याख्या कर सकता है।” (बात बात में बात: पृष्ठ सं. 108)

सबसे खराब तो हिंदी साहित्य के इतिहास का संदर्भ है। हमने मध्यकाल को पूर्व मध्यकाल और उत्तर मध्यकाल में बांट लिया। ऐसा हमने अपनी सुविधा के लिए किया कि भक्ति काव्य अलग हो जाए तो रीतिकाल को ही हम ख़ास तौर पर पतन का काव्य कह सके, दिखा सके। जबकि हम भूल जाते हैं कि इसी काल में (जिसे पूर्व मध्यकाल कहा जाता है) विद्यापति और अमीर खुसरो जैसे कवि हुए हैं। फ़ारसी की परंपरा की दृष्टि से यह दौर अत्यंत गौरवशाली हैं। संगीत को ले तो खुसरो के साथ ख्याल गायकी शुरू होती है। स्थापत्य को ले तो इस काल में स्थापत्य कितनी ऊचाईयों पर पहुंचता है। दक्षिण के मदुरै का मीनाक्षी मंदिर, उड़ीसा का कोणार्क मंदिर विशाल स्थापत्य की निशानी है। इस समय मूर्तिकला पूरी समृद्धि पर रही है। अतः जिसे हम तथाकथित मध्यकाल कहते हैं और जिसके प्रति हमारी दृष्टि ‘ओरिएंटल’ दृष्टि है, वह बदलनी चाहिए। इतिहासकार इसे बदलें  या न बदलें, वे जाने, पर साहित्य व संस्कृति का इतिहास लिखते समय हम यूरोप के उस मॉडल को छोड़ दें और रीतिकाव्य को भारतीय दृष्टि से मध्यकाल का हिस्सा मानकर अपनी दृष्टि बदलें। (साहित्य की पहचान: पृष्ठ सं. 40)

जिसे हमारे इतिहासकारों ने उत्तर मध्यकाल कहा है, गदर के पहले तक का काल, वो उर्दू शायरी में नजीर अकबराबादी, मीर और ग़ालिब का काल है, गोल्डेन पीरियड है। ठीक उसके समानांतर हिंदी में जो कविता लिखी जा रही है, उसे कायदे से स्वर्ण युग कहने के बजाय पतन का काव्य कहा जाता है। (साहित्य की पहचान: पृष्ठ सं. 44)

“यह अजीब बात है कि हम ‘फ्यूडल आर्ट’ को फ्यूडलिज्म को खराब समझते हैं और आधुनिक बुर्जुआजी को अच्छा मानकर चलते हैं।

यह भूल जाते हैं कि कभी-कभी इस पूरी लड़ाई में मामला उलट भी सकता है। हम लोगों ने साहित्य, कला और काव्य को जांचने-परखने के जो आधार विकसित कर लिए हैं, वे नितांत गैर- साहित्यिक और कूड सोशल व पॉलिटिकल समझ पर आधारित है।” (साहित्य की पहचान: पृष्ठ सं. 45)

इतनी मोटी-सी बात भी लोगों के दिमाग में नहीं आती कि संपूर्ण साहित्यकारों तथा साहित्यिक कृति का समुचित मूल्यांकन भी इतिहास हो सकता है, क्योंकि मुख्य प्रश्न ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य का है। वास्तविक आलोचना किसी एक कृति का मूल्यांकन करते समय परोक्ष रूप से साहित्य की समस्त कृतियों का मूल्यांकन करता है, यदि वह ऐसा नहीं करता तो वह मूल्यांकन ही नहीं है और उसके अन्तर्निहित प्रतिमान में कहीं न कहीं असंगति है। (इतिहास और आलोचना: पृष्ठ सं. 177)

हजारीप्रसाद द्विवेदी के कबीर संबंधी चिंतन की चर्चा करते हुए अपनी इस मान्यता को और पुष्ट किया है। उनका कहना है कि इस चिंतन के क्रम में द्विवेदी जी जहां परंपरा से प्राप्त हिंदी साहित्य के इतिहास के मानचित्र को बदलकर एक दूसरा मानचित्र प्रस्तुत करते हैं, वहीं साहित्य संबंधी एक नयी मान्यता भी सामने आती है। इस प्रकार एक नये इतिहास के साथ आलोचना का एक नया मान भी दृष्टिगोचर होता है। ‘कबीर के साथ इतिहास की एक भिन्न परंपरा ही नहीं आती, साहित्य को जाँचने-परखने का एक प्रतिमान भी प्रस्तुत होता है।’ (दूसरी परंपरा की खोज: पृष्ठ सं. 17)

“इतिहास वही लिखता है और लिख सकता है, सार्थक इतिहास जो इतिहास बनाने में योग दे। यदि आप स्वयं इतिहास से तटस्थ हों, आज जो साहित्य लिखा जा रहा है, उससे तटस्थ हो, तो आप साहित्य का इतिहास नहीं लिख सकते। अपने सामाजिक जीवन का इतिहास बनाने में यदि आप भूमिका अदा करेंगे और इस सामाजिक जीवन को बदलने में आज का साहित्य जो भूमिका अदा कर रहा है, उससे आप संलग्न होंगे, प्रतिबद्ध होंगे, तभी आप सार्थक इतिहास लेखन का कार्य कर सकेंगे, वरना आप ‘एंटीक्वेरियन’ की तरह से काम करेंगे। आप एक अतीतवादी यानी मुर्दे उखाड़नेवाले होंगे। (आलोचना के मुख से पृष्ठ सं. 85)

इस प्रकार पृथ्वीराज रासो संत भक्ति की भांति सामान्य जन-जागरण की उत्थानशीलता भावना का प्रतिबिंब न होते हुए भी हासोन्मुखी सामंती शक्तियों के अंतर्विरोध का चित्रण करने वाला महाकाव्य है। निश्चित ही इसकी वीर भावना में न तो महाभारत-सा उदात्त शौर्य और पराक्रम है और न इसकी शृंगार भावना में कालिदास की सी मुग्ध तन्मय भावाकुलता ह्रासयुग का प्रभाव रासो की वीरता और शृंगार दोनों भावनाओं पर पड़ा है। इसलिए रासो की महिमा वीरता और शृंगार के उदात्त तथा उज्जवल चित्रण में उतनी नहीं जितनी अपने युग की वास्तविक वीरता तथा प्रेम भावना को प्रतिबिंबित करने में हैं। कहना न होगा कि इस कार्य में चन्द ने जितने व्यापक क्षेत्र को समेटा है वह संत-भक्ति काव्य को छोड़कर अन्यत्र कहीं नहीं मिलता। रासो मानव जीवन की विविध परिस्थितियों और भावदशाओं का महासागर है। यही वह विशेषता है जिससे ह्रासयुग के सभी काव्यों में रासो को सर्वोपरि स्थान दिया गया है। निश्चिय ही यह उस युग की सांस्कृतिक परिस्थितियों तथा पूर्व परंपराओं का वृहद् कोष और मध्ययुगीन भारतीय समाज का एक काव्यात्म इतिहास है। (पृथ्वीराज रासो: भाषा और साहित्य पृष्ठ सं. 263)

“कविता के नये प्रतिमान का महत्व इसमें है कि इस पुस्तक ने उन मूल्यों को वास दिलाने का प्रयत्न किया जो उस समय शासक काव्य मूल्य नहीं थे। मुक्तिबोध के काव्य मूल्यों की स्थापना की दिशा में यह पुस्तक अविस्मरणीय है। लेकिन उससे भी बड़ा अवदान इस पुस्तक का संभवतः यह है कि इसने विस्तार से प्रमाणित किया कि हर युग में नयी कविता को नये प्रतिमानों की आवश्यकता होती है। जिन्हें हम अभेध्य प्रतिमान मानते हैं। वे वास्तव में हमारे संस्कार हैं, ‘जड़ीभूत सौंदर्याभिरुचि है।’ इस प्रकार जीवन की परिवर्तनशीलता यह आग्रह हर काल की नयी कविता, नयी रचनाशीलता के पक्ष में जाता है। (कविता और समय: पृष्ठ सं. 168)

‘इतिहास और आलोचना’ के लेखों में रुपवाद या कलावाद का विरोध ज्यादा है, क्योंकि उस दौर की ऐतिहासिक आवश्यकता यही थी। आगे चलकर यदि उसकी उपेक्षा की गयी और अति वामपंथी की आलोचना की और विशेष ध्यान दिया गया तो स्पष्ट है कि मेरी नजर में साहित्यिक वातावरण बदल चूका था। (कहना न होगा: पृष्ठ सं. 17)

‘नई कविता के अन्दर मुझे अज्ञेय और उनके मंडल के कवियों से भिन्न एक दूसरी परंपरा का अहसास तो 1956-57 से ही था और मैं यह महसूस करता था कि उस दूसरी परंपरा की सबसे समर्थ प्रतिभा मुक्तिबोध हैं। इस आशय के दो छोटे-छोटे लेख मैंने तभी लिखे थे। लेकिन उसे व्यवस्थित रूप दिया 1968 में प्रकाशित ‘कविता के नये प्रतिमान’ में जिसके केंद्र में अँधेरे में जैसी फंत्तासी वाली लम्बी कविताओं के रचयिता मुक्तिबोध थे। (बात बात में बात: पृष्ठ सं. 193)

यदि किसी युग में बहुसंख्यक समाज में परंपरा का जीवित बोध हो तो संभवतः साहित्य के इतिहास की कोई आवश्यकता ही न रहे। जिस जाति के लिए संपूर्ण परंपरा एक जीता-जागता वर्तमान सत्य हो उसे अलग से इतिहास पढ़ने की आवश्यकता ही क्यों पड़े? ऐसा प्रतीत होता है कि संस्कृत काव्य-शास्त्र में जो अलग से इतिहास लिखने की प्रणाली नहीं थी उसका एक कारण संभवतः यह भी था। उस युग के अधिकांश लोगों के लिए सारा अतीत साहित्य बहुत कुछ समसामयिक जैसा रहा होगा और बहुत संभव है कि वे संपूर्ण साहित्यिक परंपरा को समसामयिक सा ग्रहण करके रसास्वादन करने में समर्थ रहे होंगे। (इतिहास और आलोचना पृष्ठ सं. 161)

“कायदे से परंपरा का कोई भी मूल्यांकन किसी समय तथाकथित वस्तुगत, वास्तविक ज्यों का त्यों, परंपरा जैसी थी वैसे ही, न किसी ने रखा है, न कोई रख सकता है। व्याख्या मात्र किसी न किसी पक्ष, किसी न किसी दृष्टि की हुआ करती है, और यह पक्ष या दृष्टि किसी न किसी वर्ग हित की ही हुआ करती है।” (आलोचना और विचारधारा: पृ.सं. 52)

प्रत्येक युग में साहित्य रूढ़ भाषा के समानांतर कोई न कोई देशी भाषा अवश्य रही है और यही देशी भाषा उस साहित्यिक भाषा को नया जीवन प्रदान कर सदैव विकसित करती चलती है। छन्दस की भाषा ने तत्कालीन देशी भाषा से शक्ति अर्जित करके संस्कृत का रूप ग्रहण किया और फिर संस्कृत अपने समय की देशी भाषा के सहयोग से प्राकृत के रुप में ढली। अवसर आने पर प्राकृत को भी अपनी रूढ़ि दूर करने के लिए लोक भाषा की सहायता लेनी पढ़ी। फलतः भारतीय भाषा की अपभ्रंश अवस्था उत्पन्न हुई जिसने आगे चलकर सिन्धी, गुजराती, राजस्थानी, पजाबी, ब्रज, अवधी आदि आधुनिक देशी भाषाओँ को जन्म दिया। (हिंदी के विकाश में अपभ्रंश का योग: पृष्ठ सं. 23)

दूरी बनाए रखना है प्राचीन कृतियों से हम अभिभूत न हो जाएँ डूब ना जाएँ। किसी के प्रति सम्मान व्यक्ति करने का यह तरीका नहीं है कि अप उसके हो जाएँ और हाँ में हाँ मिलाये जाएँ। मेरी दृष्टि में किसी के प्रति सम्मान व्यक्त करने का ज्यादा अच्छा तरीका ये है कि हम उसमें और अपने में बराबर अंतर समझे…कालिदास को किसी तरह खींचतान करके सामंत विरोधी साबित करना कालिदास का सम्मान नहीं है। कालिदास के अर्तार्विरोधों को साफ़ उद्घाटित करना कि कालिदास उस दौर के संस्कार से स्त्री-पुरुष के संबंध में राजाओं के व्यवहार से भली-भांति परिचित थे प्रभाव में थे, इसलिए उससे मुक्त होना उनके लिए संभव नहीं था। यह ज्यादा उचित है। (आलोचना और विचारधारा पृष्ठ सं. 41)

“सृजन से ग्रहण तक संप्रेषण की समग्र प्रक्रिया में काव्यकृति निरंतर उपजती और उपजाई जाति है। यह उपज ही उसका जीवन है। इसी का दूसरा चालू नाम प्रासंगिकता भी है। किसी कृति को उसके जड़ पाठ से मुक्त करना ही उसकी प्रासंगिकता है। ‘जड़ पाठ’ शब्द से एतराज हो तो ‘नित्य पाठ’ कह लीजिए। नित्य अथार्त समय सिद्ध मुक्ति पाठ से ही नहीं, सन्दर्भ से भी सन्दर्भ वह इतिहास है, जिसमें कोई कृति जन्म लेती है और उस इतिहास के साथ आगे भी विकसित होती। यह विकास ही उसकी मुक्ति है। (वाद विवाद संवाद पृष्ठ सं. 71)

“कहानी छोटे मुँह बड़ी बात करती है” (कहानी नई कहानी) कहानी की महत्ता प्रतिपादित करते हुए नामवर सिंह जी कहते है- “लोगों की यह धारणा गलत है कि कहानी जीवन के एक टुकड़े को लेकर चलती है, इसलिए उसमे बड़ी बात कही ही नहीं जा सकती। कहानी जीवन के टुकड़े में निहित ‘अंतर्विरोध’, द्वंद्व, संक्रांति अथवा क्राइसिस को पकड़ने की कोशिश करती है और ठीक ढंग से पकड़ में आ जाने पर यह खंडगत अंतर्विरोध भी वृहद् अंतर्विरोध के किसी न किसी पहलू का आभास दे जाता है।” (कहानी: नई कहानी, पृष्ठ सं. 25)

‘नई कहानी’ में बिंबों और सांकेतिकता का अपना अलग अलग महत्व है। नये कहानीकारों ने बिंबविधान का सहारा लिया है बिंब आधुनिक युग में कलात्मक अभिव्यक्ति का माध्यम बन गया है। आँचलिक  कहानियाँ बिबों द्वारा निर्मित वातावरण से जीवंत बनी हैं। सांकेतिकता के संबंध में नामवर सिंह का कथन है- “नयी कहानी का समूचा रूप गठन (स्ट्रक्चर) और शब्द गठन (टेक्सचर) ही सांकेतिक है।” (कहानी: नई कहानी, पृष्ठ सं. 32)

आगे वे कहते हैं- “नयी कहानी संकेत करती नहीं, बल्कि स्वयं संकेत है।” (कहानी: नई कहानी, पृष्ठ सं. 33)

नामवर सिंह- ‘आधुनिक काव्य की प्रवृत्तियों का मूल्यांकन अर्थ विश्लेषण के आधार पर करते हैं। ‘कविता के नये प्रतिमान’ में प्रतिमान की तलाश करते हैं। जिस तरह वैयाकरण भाषा के शब्द नहीं बनाता, उसी तरह आलोचक भी काव्य में मूल्यों का निर्माण नहीं करता। शब्दानुशासन के सामान ही काव्यानुशासन भी अनुशासन है, शासन नहीं। इस अनुशासन के आधार पर नये काव्य सृजन में निहित मूल्यों का प्रतिभिज्ञान या पहचान है।’ (कविता के नये प्रतिमान, भूमिका से)

‘दूसरी परंपरा की खोज’ परंपरा के सामान ही खोज भी एक गतिशील प्रक्रिया है। इसमें प्रयास परंपरा की खोज का ही है संप्रदाय निर्माण का नहीं। यह न तो पंडित जी की कृतियों का आलोचना है, न मूल्यांकन।’ (‘दूसरी परंपरा की खोज’ की भूमिका से)

                        जय हिन्द

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