(Pronunciation effort and its Classification: Part-1) उच्चारण स्थान- किसी वर्ण का उच्चारण करते समय अन्दर से आने वाला श्वास वायु जिस स्थान पर आकर रूकती है या जहाँ पर बिना रोके उसके निकलने का मार्ग बनाया जाता है। वही उस वर्ण का उच्चरण स्थान कहलाता है। लक्षण- किसी भी वर्ण को बोलते समय वायु तथा जिह्वा मुख के… Continue reading वर्णों का उच्चारण स्थान और प्रयत्न (भाग–1: उच्चारण स्थान)
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हिंदी व्याकरण
अविकारी शब्द ‘अव्यय’
अविकारी शब्द या अव्यय: ऐसे शब्द जिनके स्वरुप में लिंग, वचन, काल, पुरुष एवं कारक आदि के प्रभाव से कोई विकार नहीं होता अथार्त परिवर्तन नहीं होता है। वे अविकारी शब्द कहलाते हैं। अविकारी को ही ‘अव्यय’ कहते हैं। ‘अव्यय’ दो शब्दों के मिलने से बना है- अ + व्यय = अव्यय। ‘अ’ का अर्थ… Continue reading अविकारी शब्द ‘अव्यय’
कर्म के आधार पर क्रिया के भेद:
क्रिया की परिभाषा- जिस शब्द से किसी कार्य का करने या होने का बोध होता है, उसे ‘क्रिया’ कहते हैं। जैसे- खाना, पढ़ना, लिखना, चलना, सोना आदि। क्रिया एक विकारी शब्द है, जिसका रूप लिंग, वचन और पुरुष के अनुसार बदलते रहता है। क्रिया के मूल रूप को ‘धातु’ कहते हैं, अर्थात जिन मूल अक्षरों से क्रियाएँ… Continue reading कर्म के आधार पर क्रिया के भेद:
शब्द-भेद (Parts Of Speech)
विकार की दृष्टि से शब्दों के दो भेद होते हैं– (1) विकारी शब्द और (2) अविकारी शब्द (1) विकारी शब्द के चार प्रकार होते हैं- 1. संज्ञा, 2. सर्वनाम, 3. विशेषण और 4. क्रिया। (2) अविकारी शब्द के चार प्रकार होते हैं- 1. क्रिया विशेषण, 2. सम्बन्ध बोधक, 3. समुच्चय बोधक और 4. विस्मयादि बोधक… Continue reading शब्द-भेद (Parts Of Speech)
वाच्य (Voice)
‘वाच्य’ का शब्दिक अर्थ है- ‘बोलने का विषय’। क्रिया से जिस रूपांतरण से यह जाना जाए कि क्रिया द्वारा किये गए विधान (कही गई बात) का विषय कर्ता है, कर्म है या भाव है उसे ‘वाच्य’ कहते हैं। हिंदी में वाच्य तीन प्रकार के होते हैं- 1. कर्तृवाच्य (Active Voice) 2. कर्मवाच्य (Passive Voice) 3.… Continue reading वाच्य (Voice)
वृत्ति/क्रियार्थ (Mood)
सहायक क्रिया के वे अंश जिनसे उस क्रिया व्यापार के प्रति वक्ता की मानसिक अभिवृत्ति या ‘मूड’ (Mood) का पता चले वे ‘वृत्ति’ कहलाते हैं। वृत्ति का ‘क्रिया (प्रयोजन) /क्रियार्थ’ भी कहते हैं। क्रिया के जिस रूप से वक्ता अथवा लेखक के मन की स्थिति का ज्ञान होता है,, उसे ‘वृत्ति’ कहते हैं। जैसे- आज्ञा,… Continue reading वृत्ति/क्रियार्थ (Mood)
पक्ष (Aspect)
सहायक क्रिया के वे अंश जो क्रिया की अपूर्णता, पूर्णता किसी वस्तु या व्यक्ति की अवस्था या स्थिति आदि की सूचना देते हैं वे ‘पक्ष’ (Aspect)सूचक अंश (चिह्न) कहे जाते हैं। प्रत्येक कार्य किसी कालावधि के बीच होता है जो प्रारंभ से अंत तक फैला रहता है। इस फैली हुई कालावधि में कार्य व्यापार को… Continue reading पक्ष (Aspect)
काल (Tense)
सहायक क्रिया क्रियापद पदबंध में ‘मुख्य क्रिया’ (सरल, संयुक्त, नामिक, मिश्र व्युत्पन्न आदि) को छोड़कर जो भी अंश शेष रह जाता है वह ‘सहायक क्रिया’ (Auxiliary verv) का होता है। जहाँ मुख्य क्रिया ‘क्रिया पदबंध’ को मुख्य अर्थ या कोशगत अर्थ देती है वहाँ सहायक क्रिया से व्याकरणिक अर्थ को सूचना मिलती है। काल, पक्ष,… Continue reading काल (Tense)
सार्वनामिक विशेषण के भेद
सार्वनामिक विशेषण के भेद: (मानक हिंदी व्याकरण तथा रचना के अनुसार) कुछ सर्वनाम जब किसी संज्ञा की विशेषता बताने के लिए विशेषण के रूप में प्रयुक्त होते हैं तब उन्हें ‘सार्वनामिक विशेषण’ कहा जाता है। जैसे- 1. मेरी किताब 2. अपना बेटा 3. किसी का मकान 4. कौन-सी कमीज 5. कोई लड़का आदि। यहाँ, मेरी,… Continue reading सार्वनामिक विशेषण के भेद
कर्म कारक और संप्रदान कारक में अन्तर
कर्म कारक- शब्द के जिस रूप पर क्रिया का फल पड़ता है उसे ‘कर्म कारक’ कहते हैं। ‘कर्म कारक’ की विभक्ति ‘को’ है। कभी-कभी ‘को’ विभक्ति का प्रयोग नहीं भी होता है। जैसे- 1. मोहन पत्र लिखता है। 2. मैंने पत्र लिखा। 3. सोहन ने मोहन को समझाया। विभक्ति रहित कर्म को पहचानने के लिए… Continue reading कर्म कारक और संप्रदान कारक में अन्तर