कर्म कारक- शब्द के जिस रूप पर क्रिया का फल पड़ता है उसे ‘कर्म कारक’ कहते हैं। ‘कर्म कारक’ की विभक्ति ‘को’ है। कभी-कभी ‘को’ विभक्ति का प्रयोग नहीं भी होता है। जैसे-
1. मोहन पत्र लिखता है।
2. मैंने पत्र लिखा।
3. सोहन ने मोहन को समझाया।
विभक्ति रहित कर्म को पहचानने के लिए वाक्य में ‘क्या’, ‘किसको’ तथा ‘कहाँ’ लगाकर प्रश्नवाचक बना लेना चाहिए। इसका जो उत्तर आएगा वही कर्म होगा। जैसे-
1. राधा ने नृत्य दिखाया।
2. राधा ने क्या दिखाया? नृत्य (कर्म)
3. सीता घर चली गई।
4. सीता कहाँ चली गई? घर (कर्म)
कर्म कारक में ‘का’ विभक्ति का प्रयोग प्रायः प्राणिवाचक संज्ञा पदों में होता है जैसे-
1. डॉक्टर ने मरीज को देखा
2. आते मोहन! तुम कहाँ चले गए।
कुछ अन्य उदहारण देखते हैं-
1. राम ने रावण को मारा।
2. मोहन ने नौकर को निकाल दिया।
3. माताजी बालक को समझती है।
4. मोहन दूध पी रहा है।
5. मोहन पुस्तक पढ़ रहा है।
6. श्याम गेंद खेल रहा है।
7. मैंने फल खाया।
8. कमला ने दर्पण में मुँह देखा।
9. उसने कविता सुनाई।
10 छोटू ने खेल दिखाए।
विशेष जानकारी-
कभी-कभी ‘कर्म कारक’ को सूचित करने के लिए ‘को’ विभक्ति चिह्न के स्थान पर ‘से’ का प्रयोग भी कर दिया जाता है। जैसे-
1. मैंने सारी बात राम से कह दी।
2. गुरु जी ने बालक से कहा।
किसी किसी वाक्य में दो कर्म कारक भी पाए जाते हैं। उस अवस्था में एक कर्म को ‘प्रधान’ अथवा ‘मुख्य’ तथा दूसरे को ‘अप्रधान’ अथवा ‘गौण’ कहा जाता है। जैसे-
1. माँ ने मोहन को कपड़े पहनाए।
2. मोहन ने सोहन को भोजन दिया।
कर्म कारक- सकर्मक तथा अकर्मक क्रिया के विषय में क्रिया के अध्याय में विस्तार से बताया जाएगा लेकिन सकर्मक क्रिया की एक अपनी पहचान यह है कि यदि क्रिया पर ‘क्या’ से प्रश्न किया जाए और उत्तर में कोई वस्तु (संज्ञा) प्राप्त हो तो वह वस्तु उस क्रिया की ‘कर्म’ होती है तथा वह क्रिया जो कर्म की अपेक्षा कर रखती है वह सकर्मक क्रिया कहलाती है। अकर्मक क्रिया पर ‘क्या’ के प्रश्न के उत्तर में कोई संज्ञा नहीं मिलती है। जैसे-
‘लड़का पत्र लिख रहा है’। इस वाक्य में क्या से प्रश्न करने पर (क्या लिख रहा है?)
उत्तर होगा ‘पत्र’ संज्ञा मिलती है। अतः यहाँ ‘पत्र’ लिखना सकर्मक क्रिया का कर्म हुई।
वाक्य में कर्म वह संज्ञा है जिस पर क्रिया का फल पड़ता है। सकर्मक क्रिया हमेशा कर्म की अपेक्षा रखती है। कर्म के बिना क्रिया संपन्न नहीं हो पाती है। जैसे-
‘वह खा रहा है’ यह वाक्य अधूरा लगता है लेकिन यदि यह कहा जाए ‘वह आम खा रहा है’ तो यहाँ ‘आम’ संज्ञा है। यहाँ आम ‘कर्म’ का कार्य कर रही है।
यहाँ कुछ और उदाहरण देखते हैं। जैसे-
1. बच्चे पतंग उड़ा रहे हैं।
प्रश्न- क्या उड़ा रहे हैं?
उत्तर- पतंग। (कर्म)
2. वह चिट्ठी लिख रही है।
प्रश्न- क्या लिख रही है?
उत्तर- चिट्ठी। (कर्म)
3. मदन ढोलक बज रहा है
प्रश्न- क्या बज रहा है
उत्तर- ढोलक। (कर्म)
उपर्युक्त वाक्यों में ‘कर्म’ के साथ परसर्ग नहीं लग रहा है। प्राय: कर्म की संज्ञा के साथ हिंदी में परसर्ग नहीं लगता है। वैसे ‘कर्म कारक’ का परसर्ग ‘को’ है और विशेष स्थितियों में ‘को’ प्रयुक्त हो भी सकता है। जैसे-
1. शीला ने कुत्ते को मारा।
2. मैंने उस मकान को बेच दिया।
3. आप उस लड़के को बुलाए।
इस प्रकार कर्म कारक में परसर्ग शून्य तथा ‘को’ है।
संप्रदान कारक- संप्रदान का अर्थ होता है ‘देना’। जिसे कोई वस्तु प्रदान की जाए या जिसके लिए कुछ किया जाए अथवा क्रिया की जाए, उसे संप्रदान कारक कहते हैं। जैसे-
1. राम स्नान के लिए नदी पर गया।
2. विद्यार्थी पढ़ने के लिए कुर्सियों पर बैठा है।
3. मोहन रोगी के लिए दवा लाता है।
4. वह नौकरी के वास्ते दर-दर भटकता है।
साधारणतः संप्रदान कारक का सूचक विभक्ति चिह्न ‘के लिए’ होता है, परंतु कभी-कभी इसी भाव को स्पष्ट करने के लिए ‘को’ भी प्रयुक्त होता है। जैसे-
1. लोग सूर्य को अर्घ्य देते हैं।
2. मैं नहाने को अभी नहीं जाऊँगा।
3. अपनी कलम दूसरों को मत दो
4. राजा गरीबों को दान देता है।
5. यह फल ब्राह्मणों को दे दो।
टिपण्णी- जब किसी उद्देश्य के लिए कोई क्रिया की जाए, तो वह संप्रदान कारक होगा, भले ही उसका विभक्ति चिह्न ‘के लिए हो’ या ‘को’ हो।
अपवाद- ‘के लिए’ के लिए के अतिरिक्त अन्य परसर्गों का प्रयोग इस प्रकार है। जैसे-
पर – चार पैसों पर ईमान खो दिया
का – राम का भोजन कहाँ हैं?
(मोहन के लिए भोजन कहाँ है?)
को – लोग मंदिर में दर्शन को जाते हैं।
को – भिखारी को दो पैसे दो।
अब मुझको पढ़ने जाना है।
कर्म कारक तथा संप्रदान कारक में अंतर:
कर्म कारक और संप्रदान कारक दोनों में ‘को’ विभक्ति का प्रयोग होता है। कर्म कारक में जिस शब्द के साथ ‘को’ जुड़ा होता है, उस पर क्रिया का फल पड़ता है। जैसे-
सुरेंद्र ने महेंद्र को पढ़ाया। (‘पढ़ाया’ क्रिया का कर्म है)
संप्रदान कारक के चिह्न ‘को’ का अर्थ ‘के लिए’ या ‘के वास्ते’ होता है। संप्रदान कारक में किसी को कुछ देने या किसी के लिए कुछ काम करने का बोध होता है। जैसे-
गरीबों को भोजन और वस्त्र दे दो। (गरीबों के लिए/ के वास्ते)
यहाँ पढ़ने को पुस्तकें नहीं मिलतीं। (पढ़ने के लिए/के वास्ते)
संप्रदान में देने याउपकार करने का भाव मुख्य होता है।