हिंदी साहित्य को पढ़ना और पढ़ाना जितना आसान समझा जाता है, असल में यह उतना आसान है नहीं। हिंदी साहित्य में अनेक विधाएँ हैं। उन सभी विधाओं में काव्य और काव्य विधा में ‘छायावाद’ का तो कुछ कहना ही नहीं छायावाद हिंदी। छायावाद हिंदी साहित्य की अत्यंत समृद्ध, सौंदर्य शालिनी, सशक्त एवं कलात्मक काव्य धारा है। हिंदी साहित्य के इतिहास में आधुनिक काल का इसे तृतीय उत्थान माना जाता है। सन् 1918 ई. के आसपास प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद जो राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक एवं धार्मिक परिस्थितियाँ थी, उनसे प्रेरणा लेकर एक नवीन कल्पना, प्रवीण कवियों का काव्य प्रस्फुटित हुआ। वह काव्य था छायावाद। छायावाद ने भावों को नया परिवेश और नई अभिव्यक्ति दिया। प्राचीन संस्कृति, साहित्य और मध्यकालीन हिंदी साहित्य से छायावाद ने सांस्कृतिक और भावात्मक संबंध जोड़ दिया।
‘छायावाद’ आधुनिक हिंदी साहित्य का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। यह भक्ति साहित्य आंदोलन के बाद का सबसे महत्वपूर्ण काव्य आंदोलन है। जहाँ काव्य, दर्शन, कला और कल्पना का मिलन होता है। यहाँ जीवन का जगत से और मानव का प्रकृति से समन्वय है। यद्यपि छायावाद के भाग्य का उदय द्विवेदी युग के उत्तरार्ध में ही हो गया था, किन्तु इसका नामकरण सन् 1920 ई. में श्री मुकुटधर पांडे जी के द्वारा किया गया। वे प्रगतिवाद के रचनाकार थे। उन्होंने अपने काव्य में उन आत्मगत भावनावों को स्थान दिया जो द्विवेदी युग की काव्य प्रवृति से भिन्न थे। नवीन कोटी की अभिव्यंजना प्रणाली के साथ-साथ भावात्मक तथा परोक्ष सत्ता के प्रति आत्म प्रति समर्पण भाव उनकी काव्य की विशेषता थी। उनकी आध्यात्मिक भावना ठाकुर रवीन्द्रनाथ की आध्यात्मिकता एवं मानवता वादी विचारधारा से प्रभावित थी।
छायावादी विद्वानों का मनना था कि सन् 1918 ई. में प्रकाशित हुई जयशंकर प्रसाद की पहली रचना ‘झरना’ छायावाद की प्रथम कविता संग्रह था। इसके प्रकाशित होते ही हिंदी साहित्य जगत में द्विवेदी युग की धारा पर हिंदी पद शैली में बदलाव दिखने लगा था। देखते ही देखते इस शैली की अविरल धारा साहित्य प्रेमियों के हृदय में अपना जगह बना ली। इस नई शैली के चार आधार स्तंभ थे। जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, सुमित्रानंदन पंत और महादेवी वर्मा। कहा जाता है कि इस नई शैली को परिभाषित एवं नामकरण करने का श्रेय पंडित मुकुटधर पाण्डेय को जाता है। सन् 1918 ई. से लोकप्रिय हो चुकी इस शैली के संबंध में सन् 1920 ई. में जबलपुर से प्रकाशित पत्रिका ‘श्री शारदा’ में जब मुकुटधर पांडे जी की ‘लेखमाला’ का प्रकाशन हुआ, तब इस विषय पर राष्ट्रव्यापी विमर्श हुआ और छायावाद ने अपना सम्मान स्थापित किया। छायावाद पर प्रकाशित लेखमाला और छायावाद ले संबंध में मुकुटधर पाण्डेय जी स्वयं कहते हैं- “सन् 1920 ई. में छायावाद का नाम का नामकरण हुआ और जबलपुर की ‘श्री शारदा’ पत्रिका में हिंदी में छायावाद शीर्षक नाम से मेरी लेखमाला निकली। इसके पहले सन् 1918 ई. में जयशंकर प्रसाद का ‘झरना’ निकल चुका था। यह छायावादी कविताओं का प्रथम संग्रह था। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने रोमैंटिसिजम के पर्याय के रूप में जिसे स्वच्छंदतावाद कहा था, वह ‘छायावाद’ का अग्रगामी था। रोमैंटिसिजम जिसे हारफोर्ड ने संवेदनशीलता का बढ़ जाना’, भावोंत्कर्ष कहा था, वही हिंदी में छायावाद के रूप में परिणत हुआ था।” छायावाद की मुख्य विशेषताएँ हैं- मानवतावाद, सौंदर्यवाद, रहस्यवाद, रोमैंटिक तथा निराशाबाद। छायावाद की कुछ कविताओं में ऐसी मर्मभेदी करुण ध्वनि है, जो करूण होने के बावजूद अत्यंत मधुर है। ‘छायावाद’ के सौंदर्य-बोध और ‘कल्पना’ की पूर्ववर्ती कविताओं में बड़ा अंतर था। छायावादी काव्य एवं छायावाद शब्द के प्रयोग पर उसे समय साहित्य-जगत् में हो रही चर्चाओं में थोड़े बहुत विरोध में स्वर भी सुनायी देने लगे थे। जिसका कारण निराला एवं उनके अनुयायियों द्वारा छंदों का अंग-भंग करना था, किंतु यह सृजन के पहले का हो हल्ला था। आगे उसी लेख मेंमुकुटधर पाण्डेय कहते हैं- “द्विवेदी जी ने सुकवि किंकर के छद्मनाम नाम से ‘सरस्वती’ पत्रिका में ‘छायावाद’ की कठोर आलोचना की। उनका व्यंग्यपूर्ण कटाक्ष था कि किसी कविता के भावों की छाया यदि कहीं अन्यत्र जा कर पड़े तो उसे छायावाद कविता कहते हैं। तब मेरा माथा ठनका। लोग छाया शब्द का लाभ उठाकर ‘छायावाद’ का छीछा लेदर कर रहे थे। उसे समय छायावादी कवियों की बाढ़-सी आ गई थी। मैंने ‘माधुरी’ पत्रिका में लेख लिख कर इस नयी शैली के लिए ‘छायावाद’ शब्द का प्रयोग नहीं करने का आग्रह किया। पर उस बात पर किसी ने ध्यान नहीं दिया, ‘जो शब्द चल रहा चल पड़ा सो चल पड़ा।’ छायावाद शब्द अब हिंदी साहित्य में स्थापित हो गया था। अब इसे सिद्ध करने में मुकुटधर पाण्डेय की ‘श्री शारदा’ में प्रकाशित लेखमाला की अहम् भूमिका थी। उनकी इस लेखमाला के संबंध में प्रो. ईश्वर शरण पाण्डेय जी कहते हैं, “यह लेखमाला हिंदी साहित्य की ‘दीप्त-धरोहर’ है।” ‘सरस्वती’ पत्रिका जुलाई, 1920 में प्रकाशित मुकुटधर पाण्डेय जी की कविता ‘कुररी के प्रति’ को छायावादी कविता माना गया। ‘कुररी के प्रति’ मुकुटधर पाण्डेय की ऐसी कविता थी जिसमें छायावाद के सभी तत्त्व समाहित थे।” इस कविता के संबंध में डॉ. शिवमंगल सिंह सुमन ने रायगढ़ के एक समारोह में 1-2 दो मार्च, 1986 में कहा था, ‘कुररी के प्रति’ कविता में तो भारतवर्ष की सारी संवेदना की परंपरा समाहित है…। पाण्डेय जी ने स्वयं कहा था- “‘छायावाद’ लिखा नहीं जाता, लिख जाता है।” द्विवेदी युगीन छंद बद्धता की परिपाटी को तोड़ते हुए पाण्डेय जी कहते हैं-
काव्य नहीं केवल छंद प्रबंध,
वाणी और हृदय का वह अनुबंध।
कवि ने अपनी कलम से जहाँ एक तरफ परिताप से युक्त ‘कुररी के प्रति’ कविता लिखी तो वहीं उन्होंने दूसरी ओर श्रम साधना तथा शोषण का विरोध करने वाली कविताएँ भी लिखी है जैसे- ‘किसान’, ‘खलिहान’, ‘बाल परिचायक’, आदि। पाण्डेय जी की भाषा अवधी से मिलती-जुलती खड़ीबोली थी। वे गद्य और पद दोनों में लिखते थे। उन्होंने गीत-शैली को भी जन्म दिया। हिंदी को राष्ट्रभाषा की सेवा और देश-सेवा के समकक्ष मानने के कारण तथा खड़ीबोली में गद्य के विकास की संभावनाओं को दृष्टिगत रखते हुए पाण्डेय जी ने खड़ीबोली को ही अपनी काव्य-भाषा बनाया। अतः सौंदर्य और आध्यात्मिक भावों से युक्त पाण्डेय जी के काव्य- संसार में वास्तविक संसार का भी स्थान है। नैसर्गिक सौंदर्य-बोध के साथ उन्होंने अपने शब्दों के आडंबर और वाग्जाल को हमेशा अपने से दूर रखा। एक सहज अनुभूति के साथ ‘छायावाद’ काव्य-जगत में भावुकतापूर्ण आध्यात्मिकता की प्रतिष्ठा करता है। ‘कवि’ शीर्षक कविता की निम्नांकित पंक्तियां दृष्टि है-
भूत, भविष्यत्, वर्तमान पर होती है जिसकी सम दृष्टि
प्रतिभा जिसकी मर्त्यधाम में करती सदा सुधा की वृष्टि।
जो करुणा श्रृंगार, हास्य वीरादि नवों रस का आधार
जिसको ईश्वरीय तत्वों का अनुभव युत है ज्ञान-अपार।
मुकुटधर पांडे का जन्म 30 सितंबर, सन् 1895 को छत्तीसगढ़ में बिलासपुर के नजदीक वर्तमान जिला जांजगीर चंपा के एक छोटे से ग्राम बालपुर में हुआ था। कम उम्र में ही पिता की मृत्यु हो जाने के पश्चात बालक मुकुटधर के मन में गहरा प्रभाव पड़ा, किंतु वे अपने कार्य से विमुख नहीं हुए। सन् 1909 में जब वे 14 वर्ष के हुए, तब उनकी पहली कविता आगरा से प्रकाशित होने वाली पत्रिका ‘स्वदेश बांधव’ में प्रकाशित हुई और सन 1919 में उनका पहला कविता- संग्रह ‘पूजा फुल’ प्रकाशित हुआ। उसी वर्ष किशोर कवि प्रयाग विश्वविद्यालय की प्रवेशिका परीक्षा उत्तीर्ण हुआ। बालपुर और रायगढ़ कुछ दिनों के लिए छूट गया तब उनका दिल अधीर हो पुकार उठा:
बालकाल! तू मुझसे ऐसी, आज बिदा क्यों लेता है,
मेरे इस सुखमय जीवन को, दुःख भय से भर देता है।
इतनी कम उम्र में अपनी प्रतिभा और काव्यकौशल को प्रस्तुत करने वाले मुकुटधर पाण्डेय अपने अध्ययन के संबंध में स्वयं कहते हैं, “सन् 1915 में प्रयाग विश्वविद्यालय की प्रवेशिका परीक्षा में उत्तीर्ण होकर मैं महाविद्यालय में भर्ती हुआ, किंतु मेरी पढ़ाई आगे नहीं पढ़ पाई। मैंने हिंदी, अरबी, बंगल और उड़िया साहित्य का अध्ययन किसी अध्ययन किसी विद्यालय या महाविद्यालय में नहीं किया है।” मुकुटधर पाण्डेय जी को अपने गांव से बहुत लगाव था। उन्होंने अपनी कविता ‘ग्रामीण-जीवन’ में गांव का बड़ा ही मनोहारी चित्रण किया है। वह कहते हैं:
वट-पीपल की शीतल छाया फैली कैसी है चहुँ ओर
द्विजगण सुन्दर गान सुनाते नृत्य कहीं दिखलाते मोर।
‘महानदी’ के प्राकृतिक सुंदरता और सहज ग्रामीण जीवन का आनंद लेते हुए कवि ने अपनी लेखनी से ‘महानदी’ की मनोहरी लहरों और उसकी छटा का वर्णन करते हुए लिखा है:
तुझे देखकर शैशव की है स्मृतियाँ उर में उठती जाग।
लेता है कैशोर काल का, अंगड़ाई अल्हड़ अनुराग।
‘छायावाद’ के संबंध में प्रायः जिन परिस्थितियों और प्रवृत्तियों की चर्चा होती है, उनमें देश की राजनीतिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिस्थितियों के साथ-साथ साहित्यिक परिस्थितियां भी महत्वपूर्ण थी। ऐतिहासिक दृष्टि से देखा जाए तो ‘छायावाद’ दो विश्व युद्धों के बीच का समय था, किंतु ‘छायावाद’ की पृष्ठभूमि तो पहले से ही बन रही थी। कहने का तात्पर्य यह है की प्रथम विश्व युद्ध के पहले से ही साहित्य में अनेक नहीं मान्यताओं और विचारधाराओं का प्रादुर्भाव हो रहा था। उस समय भारतीय संस्कृति पाश्चात्य विचारधाराओं से प्रभावित हो रही थी। उस समय में साम्राज्यवाद और सामंतवाद के विरुद्ध विद्रोह भी दिखाई दे रहा था। देश की बिगड़ी हुई आर्थिक, सामाजिक परिस्थितियों के साथ-साथ साहित्य, धर्म और राजनीति सब कुछ प्रभावित हो रहे थे। इन्हीं कठिन परिस्थितियों के बीच साहित्य ने छाया साहित्य में ‘छायावाद’ का जन्म हुआ था।
‘छायावाद’ एक ऐसा युगांतकारी शब्द है जिसने मुकुटधर पाण्डेय जी को हिंदी कविता के इतिहास में अमर कर दिया। ‘छायावाद’ के प्रवर्तक के रूप में मुकुटधर पाण्डेय जी को स्वयं प्रसाद जी ने मान्यता दी थी। स्वयं पाण्डेय जी के शब्दों में, “सन् 1936 में प्रसाद जी जब बीमार थे तब उन्होंने मुझसे कहा था, आप छायावाद के प्रथम कवि हैं मैंने उनसे कहा था, मैंने आपका अनुसरण किया था।” इस घटना का जिक्र पाण्डेय जी ने अपने संस्मरणात्मक लेख में विस्तार पूर्वक किया है। पाण्डेय जी ने छायावाद को समुचित स्थान दिलाने के लिए परंपरा के पुनर्वास की कोशिश की। इस कोशिश में वे किसी आलोचक की परवाह किए बिना अपनी नई पद्धति पर लिखते रहे। ‘छायावाद’ के उद्भव के रहस्य के विषय में पाण्डेय जी का कहना था कि बहुत दिनों के बाद जब कुछ लोग मेरी रचना ‘छायावाद’ के अंतर्गत पढ़ने लगे और ‘कुररी के प्रति’ को गिनाने लगे तब मुझे आश्चर्य हुआ। तब मैंने अनुभव किया कि, ‘छायावाद’ लिखा नहीं जाता लिख जाता है।
‘छायावाद’ अपने युग की अनिवार्य क्रांति थी। चौरानवे वर्ष की उम्र तक हिंदी के क्षेत्र में ‘छायावाद’ को स्थापित करने वाले मुकुटधर पाण्डेय का निधन 6 नवंबर सन् 1989 को लंबी बीमारी के बाद हो गया उन्होंने अपनी कविता में ‘महानदी’ से अनुरोध करते हुए कहा था:
चित्रोत्पले, बता तू मुझको वह दिन सचमुच कितना दूर,
प्राण प्रतीक्षारत लूटेंगे, मृत्यु पर्व का सुख भरपूर।
अंत में मैं कुछ पंक्तियों के साथ इसे समाप्त करती हूं-
विहग विदेशी कुररी जब भी, नीड़ अपने लौटेगा
कहीं दूर से अमराई में , कोयल सुर में गाएगी
महानदी हो जब उफान पर, नाव लगी हो चलने को
ऐसे ही परिवेश में आ कर , उस पीपल की छाँव में
कविवर तुम बैठे मिल जाओ , कोई कविता लिखने को
सहायक ग्रंथ
1. मुकुटधर पाण्डेय ‘पूजा फूल’ काव्य संग्रह, ‘ब्रह्म प्रेस’, इटावा
2. डॉ. बलदेव, ‘छायावाद और मुकुटधर पाण्डेय’ ‘वैभव प्रकाशन’, रायपुर
3. एम. पत्रिका कॉम 4. मुकुटधर पाण्डेय, विकिपीडिया