कोसी नदी : बिहार का शोक
मैं हिमालय की गोद में जन्मी,
बर्फीली चट्टानों को चीरती,
कहीं अरुण, कहीं सुनकोसी,
कहीं तमोर बनकर बहती हूँ
मैं तीन धाराओं का संगम,
पहाड़ों की बेटी हूँ।
नेपाल की घाटियों से उतर
जब मैदानों की ओर चली,
अपने साथ हिम का पानी,
पहाड़ों की मिट्टी,
और सदियों की स्मृतियाँ लाई।
मैं कोसी हूँ,
किसी ने मुझे सप्तकोसी कहा,
किसी ने बिहार का शोक।
मेरा मन चंचल है,
मेरी चाल अनिश्चित-
आज जहाँ बहती हूँ,
कल वहाँ नहीं होती।
अपना रास्ता स्वयं बनाती हूँ,
रेत और गाद के ढेर लगाती हूँ,
धरती की छाती पर
अपनी नई लकीर खींचती हूँ।
कभी खेतों को सींचती हूँ,
कभी अन्न के दाने उगाती हूँ,
कभी जीवन की प्यास बुझाती हूँ
तो कभी
एक ही रात में
गाँव के गाँव बहा ले जाती हूँ।
मेरे उफनते जल में
सिर्फ पानी नहीं होता,
पहाड़ों की मिट्टी होती है,
बादलों का वेग,
टूटे बाँधों का भय
और उन आँखों का आँसू
जिन्होंने वर्षों से
बार-बार अपना घर बनाया है।
मैंने देखा है-
किसान की हथेली पर
दरारों से भी गहरी पीड़ा,
माँ की आँखों में
बच्चे को बचाने की बेचैनी,
कंधे पर गठरी रखे
गाँव छोड़ते लोग,
और पीछे छूटता हुआ
मिट्टी का वह घर
जिसमें उनकी पूरी उम्र बसी थी।
लोग मुझे दोष देते हैं-
कहते हैं- “कोसी, तुम बिहार का शोक हो!”
पर क्या कभी
किसी ने मेरे भीतर झाँककर देखा है?
क्या मैं अकेली दोषी हूँ?
पहाड़ों पर कटते वन,
बढ़ता अतिक्रमण,
बाँधों और तटबंधों की विवशता,
नदी के प्राकृतिक मार्ग में
मानव का हस्तक्षेप-
इन सबका बोझ भी
तो मेरे ही कंधों पर है।
मैं नदी हूँ,
मेरी अपनी भाषा है
मुझे बहना आता है,
रुकना नहीं।
मुझे बाँधोगे
तो मैं रास्ता खोजूँगी,
मुझे रोकेंगे
तो मैं किनारा तोड़ूँगी,
मुझे समझोगे
तो मैं जीवन दूँगी।
मुझे शत्रु मत समझो,
मैं तो प्रकृति का संदेश हूँ
धरती की धड़कन हूँ,
पहाड़ों का पिघला हुआ आँसू हूँ,
बादलों का दिया हुआ जीवन हूँ।
मुझे चाहिए
न तिरस्कार, न भय-
मुझे केवल
समझदारी और सम्मान चाहिए
मेरे किनारे बसे लोगों से
मैं आज भी कहती हूँ-
मेरे साथ जीना सीखो,
मेरे स्वभाव को समझो,
तुम अपने हिसाब से
मेरे बहाव को मत बाँधो।
मेरे किनारे
फिर हरे होंगे खेत,
फिर गूँजेगी बच्चों की हँसी,
फिर लौटेंगे पंछी,
फिर होगी मिट्टी में
धान की खुशबू।
क्योंकि मैं विनाश ही नहीं,
सृजन भी हूँ।
मैं आँसू भी हूँ,
मैं अन्न भी हूँ।
मैं पीड़ा भी हूँ,
मैं प्राण भी हूँ।
हिमालय से निकलकर
मैदानों को पार करती हुई,
गंगा की बाँहों में समाकर
मैं अपनी यात्रा पूरी करती हूँ।
मेरी कहानी
वहीं समाप्त नहीं होती
हर वर्ष जब बादल घिरते हैं,
जब पहाड़ों पर वर्षा होती है,
जब मेरी धाराएँ जागती हैं,
तब मैं फिर लौटती हूँ
एक सवाल लेकर-
“दोष मेरा है या तुम्हारी भूलों का?”
मैं कोसी हूँ-
हिमालय की बेटी,
बिहार की जीवन धारा,
बिहार का शोक कही गई नदी,
पर सच पूछो तो-
मैं शोक नहीं, प्रकृति की चेतावनी हूँ।
मुझे पढ़ो, समझो, सम्मान दो-
मैं तुम्हें विनाश नहीं, जीवन देना चाहती हूँ- 2
जय हिंद जय भारत