आज भारतीय पुराण-परंपरा की एक ऐसी विलक्षण नारी के विषय में अपने विचार प्रस्तुत करना चाहती हूँ, जिसका व्यक्तित्व केवल मातृत्व की गरिमा तक सीमित नहीं है। वह ज्ञान, आत्मबोध, वैराग्य, कर्तव्य और राजधर्म इन सभी को एक साथ जोड़ने वाली स्त्री थी। हम प्रायः मातृत्व को त्याग, ममता और वात्सल्य के संदर्भ में देखते हैं। किंतु मदालसा का मातृत्व हमें एक दूसरी दृष्टि देता है। उनके लिए बच्चे का पालन-पोषण केवल उसके शरीर और व्यक्तित्व का निर्माण करना ही नहीं, बल्कि उसके विवेक और चेतना का भी निर्माण है।
मदालसा की कथा मार्कण्डेय पुराण में मिलती है। इस कथा में उनका संबंध राजा कुवलयाश्व, जिन्हें ऋतध्वज भी कहा गया है, से बताया गया है। उनके चार पुत्र हुए- विक्रान्त, सुबाहु, शत्रुमर्दन और अलर्क। पुराण के अनुसार मदालसा अपने आरंभ के तीन पुत्रों को बचपन से ही आत्मज्ञान और संसार की अनित्यता का बोध कराती हैं। मदालसा की लोरी में मातृत्व का दार्शनिक रूप मिलता है। मदालसा की सबसे प्रसिद्ध पहचान उनकी लोरी से है, जिसे वे अपने बच्चे को सुनाती हैं-
“शुद्धोऽसि बुद्धोऽसि निरञ्जनोऽसि, संसारमाया परिवर्जितोऽसि।”
अर्थात्- हे पुत्र! तुम्हारा वास्तविक स्वरूप शुद्ध, बुद्ध और निष्कलंक है। संसार की माया तुम्हारे मूल स्वरूप को निर्धारित नहीं करती।
यह केवल बच्चे को सुलाने वाली लोरी नहीं है। इसमें भारतीय दर्शन की एक गहरी दृष्टि दिखाई देती है। मदालसा अपने बच्चे को उसके बाहरी नाम, शरीर और सांसारिक पहचान से आगे उसके आत्मस्वरूप की ओर ले जाती हैं। मानो वे कहती हैं- तुम केवल शरीर नहीं हो।
तुम केवल किसी परिवार, पद या संपत्ति से परिभाषित नहीं होते। तुम्हारे भीतर एक ऐसी चेतना है जो इन बाहरी पहचानों से बड़ी है। यहाँ मातृत्व का एक प्रकार से दार्शनिक शिक्षण है। मदालसा की लोरी का मूल भाव यह है कि मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप को पहचाने और संसार की अस्थायी वस्तुओं को ही अंतिम सत्य न माने। इस दृष्टि से यह प्रसंग भारतीय आत्मज्ञान-परंपरा से जुड़ता है।
मदालसा की कथा का सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष उनके चार पुत्रों का प्रसंग है। पहले तीन पुत्रों- विक्रान्त, सुबाहु और शत्रुमर्दन को वे वैराग्य और आत्मज्ञान की शिक्षा देती हैं। पुराण के अनुसार, उनकी शिक्षा के परिणामस्वरूप उनमें सांसारिक जीवन के प्रति अनासक्ति उत्पन्न होती है। लेकिन चौथे पुत्र अलर्क के मामले में स्थिति अलग थी। राजा चाहते थे कि उसका पुत्र राजवंश की परंपरा निभाए और एक योग्य राजा बने। इसलिए अलर्क के पालन-पोषण की दिशा अलग निर्धारित हुई। यहाँ मदालसा के व्यक्तित्व का दूसरा पक्ष सामने आता है। उन्होंने अलर्क को संसार से विमुख नहीं किया, बल्कि उसे संसार के बीच रहते हुए कर्तव्य निभाने की शिक्षा दी। अर्थात् मदालसा के लिए शिक्षा का कोई एक सार्वभौमिक साँचा नहीं था। जिस पुत्र के लिए वैराग्य उपयुक्त था, उसे उन्होंने वैराग्य की शिक्षा दी। और जिस पुत्र को राजधर्म निभाना था, उसे उन्होंने राजधर्म, आत्मसंयम, न्याय और प्रजापालन का ज्ञान दिया। यह शिक्षा-दर्शन आज भी विचारणीय है।
मदालसा अलर्क को राजधर्म की शिक्षा बताती हुई कहती है कि राजा का पहला दायित्व अपनी प्रजा की रक्षा और उसके कल्याण से जुड़ा है। वे उसे आत्मसंयम, विवेकपूर्ण परामर्श और धर्म सम्मत शासन की शिक्षा देती हैं। मार्कण्डेय पुराण के अध्यायों में राजधर्म, सामाजिक कर्तव्य और सदाचार का विस्तृत विवेचन मिलता है। मदालसा सत्ता को अधिकार के रूप में नहीं, उत्तरदायित्व के रूप में देखने की शिक्षा देती हैं। राजा यदि अपने निजी स्वार्थ में डूब जाए तो शासन का उद्देश्य नष्ट हो जाता है। इसलिए शासक के लिए आत्मसंयम और न्याय आवश्यक हैं। यह विचार आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्था के संदर्भ में भी चर्चा योग्य है, यद्यपि पुराण का सामाजिक-राजनीतिक संदर्भ अपने समय का है।
मदालसा केवल पुत्रों की माँ ही नहीं, उनकी गुरु भी थीं उनके व्यक्तित्व का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि वह अपने पुत्रों की पहली गुरु बनती हैं। वे केवल यह नहीं कहतीं है कि क्या करना चाहिए। वे जीवन के मूल प्रश्नों पर विचार करने की दृष्टि देती हैं। वे अपने पुत्रों को बताते हुए कहती हैं कि, मनुष्य कौन है? उसका वास्तविक स्वरूप क्या है? संसार में उसका कर्तव्य क्या है? धन, सत्ता और परिवार का उसके जीवन में क्या स्थान है? और अंततः वह अपने जीवन को किस उद्देश्य से सार्थक करे? इस प्रकार मदालसा की शिक्षा में आत्मज्ञान और सामाजिक उत्तरदायित्व दोनों दिखाई देते हैं।
स्त्री-शिक्षा के संदर्भ में मदालसा
आज जब हम स्त्री-शिक्षा की बात करते हैं, तब मदालसा की कथा को केवल ‘आदर्श माँ’ की कथा के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। मदालसा स्वयं ज्ञानी थीं। वे दार्शनिक प्रश्नों पर विचार करती हैं, अपने पुत्रों को तर्क और जीवन-दृष्टि देती हैं तथा अलर्क को राजधर्म और सामाजिक कर्तव्य समझाती हैं। अर्थात् कथा में स्त्री केवल परिवार की व्यवस्था करने वाली भूमिका में नहीं है, वह ज्ञान की वाहक और अगली पीढ़ी की निर्माता भी है। यही बिंदु आधुनिक स्त्री-शिक्षा के संदर्भ में विशेष महत्त्व रखता है। एक शिक्षित स्त्री केवल स्वयं शिक्षित नहीं होती, उसके ज्ञान और दृष्टि का प्रभाव परिवार तथा अगली पीढ़ी पर भी पड़ सकता है।
हालाँकि यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि प्राचीन पुराण-कथा को आधुनिक स्त्री-अधिकारों की अवधारणाओं के साथ पूरी तरह समान नहीं माना जा सकता। दोनों के सामाजिक संदर्भ अलग हैं। फिर भी मदालसा का चरित्र इस बात का महत्त्वपूर्ण उदाहरण है कि भारतीय परंपरा में स्त्री को ज्ञान देने वाली और संस्कार निर्मात्री के रूप में भी चित्रित किया गया है।
आज के संदर्भ में मदालसा
आज की शिक्षा-व्यवस्था में बच्चों की सफलता का अर्थ प्रायः अच्छे अंक, अच्छी नौकरी और आर्थिक स्थिरता से जोड़ा जाता है। लेकिन क्या इतना पर्याप्त है? यदि बच्चा सफल है, परंतु उसमें संवेदना नहीं है, तो क्या वह पूर्णतः शिक्षित है? यदि उसके पास ज्ञान है, लेकिन विवेक नहीं है, तो क्या वह ज्ञान समाज के लिए उपयोगी होगा? यदि उसके पास अधिकारों की समझ है, लेकिन कर्तव्य का बोध नहीं है, तो क्या उसका व्यक्तित्व संतुलित कहा जा सकता है? मदालसा की कथा इन प्रश्नों पर विचार करने का अवसर देती है। उनकी शिक्षा हमें बताती है कि शिक्षा केवल सूचना का संचय नहीं, जीवन-दृष्टि का निर्माण भी है।
आधुनिक मातृत्व के लिए संदेश
आज माता-पिता अपने बच्चों के भविष्य को लेकर अत्यंत चिंतित रहते हैं। वे चाहते हैं कि उनके बच्चे जीवन में आगे बढ़ें, सफल हों और सम्मान प्राप्त करें। यह स्वाभाविक है। लेकिन मदालसा की कथा हमें एक और प्रश्न पूछती है- क्या हम बच्चों को केवल सफल बनाना चाहते हैं या सार्थक भी? बच्चे को प्रतियोगिता के लिए तैयार करना आवश्यक है, लेकिन उससे अधिक आवश्यक है उसे विवेक देना। उसे अपने अधिकारों की जानकारी देना आवश्यक है, लेकिन उसके साथ दूसरों के अधिकारों का सम्मान करना भी सिखाना होगा। उसे महत्वाकांक्षी बनाना आवश्यक है, लेकिन महत्वाकांक्षी के साथ संवेदना और संयम भी आवश्यक हैं। यही मदालसा के मातृत्व का आधुनिक अर्थ निकाला जा सकता है।
मदालसा और व्यक्तित्व की स्वतंत्रता
मदालसा का एक और पक्ष विशेष रूप से उल्लेखनीय है। वे अपने चारों पुत्रों को एक जैसा नहीं बनातीं। यह शिक्षा की अत्यंत आधुनिक प्रतीत होने वाली अवधारणा है- हर बालक की प्रकृति और क्षमता को पहचानना आवश्यक है। किसी बच्चे पर माता-पिता की अपनी अधूरी इच्छाएँ थोप देना शिक्षा नहीं है। बच्चे की प्रतिभा को पहचानना, उसकी प्रकृति को समझना और उसे उचित दिशा देना ही वास्तविक मार्गदर्शन है। मदालसा के चार पुत्रों का प्रसंग इसी विचार को एक सांस्कृतिक रूपक के रूप में हमारे सामने रखता है।
अलर्क का अंतिम प्रसंग
मदालसा की शिक्षा केवल बचपन तक सीमित नहीं रहती। पुराण के अंतिम प्रसंगों में अलर्क राजा बनता है। आगे चलकर जब उसके माता-पिता वृद्ध होते हैं। राजा कुवलयाश्व राज्य त्यागकर वन की ओर जाते हैं और मदालसा भी उनके साथ जाती हैं। जाने से पहले वह अलर्क को अंतिम उपदेश देती हैं और उसे एक अंगूठी भी देती हैं, जिसमें संकट के समय पढ़ने के लिए संदेश अंकित थे। यह प्रसंग प्रतीकात्मक रूप से अत्यंत सुंदर है। माँ अपने पुत्र को जीवन भर अपने साथ नहीं रखती। वह उसे अपने बिना जीवन जीने योग्य बनाती है। शायद यही सच्चे मातृत्व की सबसे बड़ी कसौटी है। मदालसा की कथा हजारों वर्ष पुरानी सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा है, लेकिन उसमें उठाए गए कुछ प्रश्न आज भी हमारे सामने हैं-
हम शिक्षा का उद्देश्य क्या मानते हैं?
हम अपने बच्चों को क्या देना चाहते हैं- सिर्फ उपलब्धियाँ या विवेक भी?
हम मातृत्व को केवल संरक्षण मानते हैं या व्यक्तित्व-निर्माण भी? और सबसे महत्त्वपूर्ण
क्या हम अपने बच्चों को अपने सपनों का प्रतिबिंब बनाना चाहते हैं, या उन्हें अपना स्वतंत्र व्यक्तित्व बनने देना चाहते हैं?
मदालसा का उत्तर स्पष्ट रूप से आत्मबोध, विवेक और कर्तव्य की ओर दिखाई देता है। उनकी कथा हमें यह स्मरण कराती है कि- माँ केवल बच्चे का हाथ पकड़कर उसे चलना नहीं सिखाती, वह एक दिन उसका हाथ छोड़कर उसे अपने पैरों पर चलने योग्य भी बनाती है। यही मदालसा के मातृत्व की सबसे बड़ी शक्ति है। वे केवल पुराणों की एक पात्र नहीं हैं।
वे भारतीय सांस्कृतिक चेतना में उस ज्ञानमयी मातृशक्ति का प्रतीक हैं, जो ममता को शिक्षा से, शिक्षा को आत्मबोध से और आत्मबोध को कर्तव्य से जोड़ती है। और शायद इसी कारण मदालसा की कथा आज भी हमें यह कहने के लिए प्रेरित करती है- “बच्चों को केवल जीवन मत दीजिए, उन्हें जीवन को समझने की दृष्टि भी दीजिए।”
जय हिन्द