मदालसा : राजकुमारी से आध्यात्मिक चेतना तक

मदालसा भारतीय पुराण-परंपरा में वर्णित एक ऐसी विलक्षण स्त्री हैं, जिनका चरित्र सौंदर्य, विवेक, वैराग्य, मातृत्व और आध्यात्मिक चेतना के अद्भुत समन्वय का परिचायक है। उनका उल्लेख मुख्यतः मार्कण्डेय पुराण में प्राप्त होता है। वे गन्धर्वराज विश्वावसु की पुत्री थीं। राजसी वैभव और सुख-सुविधाओं में पली-बढ़ी मदालसा केवल रूप-सौंदर्य की प्रतिमूर्ति नहीं थीं, बल्कि उच्च आध्यात्मिक चेतना और जीवन-दृष्टि से संपन्न थीं। कालांतर में उनका विवाह राजकुमार ऋतुध्वज के साथ हुआ। ऋतुध्वज एक पराक्रमी और धर्मनिष्ठ राजकुमार थे। विवाह के पश्चात मदालसा का जीवन राजपरिवार की जिम्मेदारियों से जुड़ गया। वे एक आदर्श पत्नी के रूप में ऋतुध्वज के प्रति समर्पित थीं।

एक बार ऋतुध्वज असुरों के विरुद्ध युद्ध करने के लिए गए। युद्ध में उनकी सेना असुरों पर भारी पड़ रही थी। अपनी पराजय की आशंका से व्याकुल मायावी असुरों ने शत्रु-पक्ष का मनोबल तोड़ने के लिए यह अफवाह फैला दी कि ऋतुध्वज युद्ध में मारे गए हैं। जब यह दुःखद समाचार मदालसा तक पहुँचा तो पति के प्रति उनका प्रेम और समर्पण इतना गहरा था कि वे इस असहनीय वियोग को सहन नहीं कर सकीं। उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए। उधर ऋतुध्वज ने युद्ध में असुरों पर विजय प्राप्त की और विजयी होकर राजमहल लौटे। लेकिन महल में प्रवेश करते ही उन्हें अपनी प्रिय मदालसा के न होने का समाचार मिला। विजय का उल्लास क्षणभर में गहन शोक में बदल गया। मदालसा के वियोग ने उन्हें भीतर तक तोड़ दिया राजा को बड़ा सदमा लगा और वे राज-काज छोड़कर विक्षिप्तों की तरह व्यवहार करने लगे।

मदालसा का पुनर्जीवन

ऋतुध्वज की प्रिय पत्नी मदालसा के वियोग ने उन्हें भीतर तक तोड़ दिया था। अपने मित्र की यह अवस्था उनके प्रिय मित्र नागराज से भी देखी नहीं गई। मित्र के दुःख को अपना दुःख समझकर नागराज हिमालय की ओर चले गए और भगवान शिव की कठोर तपस्या करने लगे। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए और उनसे वर माँगने को कहा। नागराज ने अपने लिए कुछ भी नहीं माँगकर अपने मित्र ऋतुध्वज के लिए मदालसा के पुनर्जीवन का वर माँगा। भगवान शिव के वरदान से मदालसा पुनः मानव-जीवन में लौट आईं। किंतु यह पुनर्जीवन केवल उनके शरीर का पुनरागमन नहीं था; यह उनकी चेतना का पुनर्जन्म भी था। मृत्यु का साक्षात्कार कर लौटने वाली मदालसा अब वह मदालसा नहीं थीं, जो पहले थीं। उन्होंने मानव शरीर की नश्वरता को निकट से देखा था और जीवन के उस सत्य को पहचान लिया था, जिसे सामान्य मनुष्य सांसारिक मोह में रहते हुए देख नहीं पाता।

अब उनके लिए विषय-भोग, सांसारिक सुख और भौतिक आकर्षण अपना महत्त्व खो चुके थे। उनका मन आत्मचिंतन और आध्यात्मिक चिंतन में रमने लगा। मृत्यु ने उन्हें जीवन का मूल्य सिखाया और पुनर्जीवन ने उन्हें जीवन का उद्देश्य समझाया। इसी परिवर्तित चेतना के साथ जब ऋतुध्वज ने संतान प्राप्ति की इच्छा व्यक्त की तो मदालसा ने सहज ही कहा- “मैं संतान नहीं चाहती।” ऋतुध्वज के लिए यह उत्तर अप्रत्याशित था। उन्होंने इसका कारण पूछा। मदालसा ने अपनी आशंका व्यक्त करते हुए कहा कि यदि संतान कुसंस्कारी हो गई अथवा कुल के लिए कलंक बन गई, तो उसके कारण उत्पन्न दुःख को वे सहन नहीं कर पाएँगी। ऋतुध्वज ने उन्हें समझाते हुए कहा कि जब वे दोनों धर्म के मार्ग पर चलने वाले हैं, तो उनकी संतान कुसंस्कारी कैसे और क्यों होगी? मदालसा का उत्तर गहन था- “कभी-कभी अच्छे माता-पिता की संतान भी बुरी हो जाती है और बुरे माता-पिता की संतान भी अच्छी हो जाती है। यह आवश्यक नहीं कि अच्छे माता-पिता की संतान अच्छी ही हो।”

मदालसा का यह चिंतन तत्कालीन सामाजिक धारणाओं से आगे दिखाई देता है। वे केवल वंश, कुल और संस्कार को संतान के चरित्र का एकमात्र निर्धारक नहीं मानतीं थी। उनके कथन से यह मालूम होता है कि मनुष्य का व्यक्तित्व अनेक परिस्थितियों, संस्कारों और उसके स्वयं के कर्मों से निर्मित होता है। यही प्रसंग आगे चलकर मदालसा के मातृत्व को एक अद्भुत दार्शनिक ऊँचाई देता है। वे मातृत्व से विमुख नहीं होतीं है, बल्कि मातृत्व को केवल संतान को जन्म देने के बजाय उसके भीतर विवेक, वैराग्य और आत्मज्ञान जगाने की साधना में परिवर्तित कर देती हैं। इस दृष्टि से मदालसा का पुनर्जीवन तीन स्तरों पर देखा जा सकता है- मृत्यु, आत्मबोध और आध्यात्मिक मातृत्व। यही परिवर्तन मदालसा को भारतीय पुराण-परंपरा की विशिष्ट स्त्री-चेतना के रूप में स्थापित करता है। वह केवल पत्नी नहीं थी, केवल माता नहीं थी, वह गुरु-माता थी, जो अपनी संतान को संसार में सफल होने से पहले स्वयं को पहचानना सिखाती है।

संतान-प्राप्ति : मातृत्व की एक नई परिभाषा

मदालसा ने बड़ी कठिनाई से संतान प्राप्ति के लिए सहमति दी। किंतु इसके साथ उन्होंने ऋतुध्वज के सामने एक शर्त रखी- संतानों के लालन-पालन और संस्कार का दायित्व उनका होगा और उनकी शिक्षा में पति हस्तक्षेप नहीं करेंगे। मदालसा के लिए मातृत्व केवल संतान को जन्म देना नहीं था, वह इसे एक आत्मा को उसके वास्तविक स्वरूप का बोध कराने वाली साधना मानती थीं। गर्भधारण के पश्चात उनका अधिकांश समय उपासना, चिंतन और आध्यात्मिक साधना में व्यतीत होने लगा। उनका विश्वास था कि माता के विचार, संस्कार और जीवन-दृष्टि का प्रभाव गर्भस्थ शिशु पर भी पड़ता है।

समय आने पर उनके यहाँ एक पुत्र का जन्म हुआ। मदालसा ने अत्यंत प्रेम और पवित्र भाव से उसका लालन-पालन किया। शिशु जब रोता, तब सामान्य माताओं की तरह केवल सांसारिक शब्दों से उसे बहलाने के बजाय वे उसे वेदांत का ज्ञान देने वाली लोरी सुनातीं थी-  

 “शुद्धोऽसि बुद्धोऽसि निरञ्जनोऽसि,
     संसारमाया परिवर्जितोऽसि।”

अर्थात्- हे पुत्र! तुम्हारा वास्तविक स्वरूप शुद्ध, बुद्ध और निष्कलंक है। संसार की माया तुम्हारे मूल स्वरूप को निर्धारित नहीं करती।

“तू शुद्ध है, तू बुद्ध है, तू है निरंजन सर्वदा।

संसार-माया से रहित, तू स्वरूपस्थित सर्वदा॥”

इस लोरी में मातृत्व और अध्यात्म का अद्भुत संगम दिखाई देता है। मदालसा अपने पुत्र को उसके शरीर, नाम और सांसारिक पहचान से आगे ले जाकर उसके आत्मस्वरूप का परिचय कराती हैं।

पुत्रों में वैराग्य : मातृत्व या मोक्ष-साधना?

समय बीतता गया और मदालसा के तीन पुत्र हुए- विक्रांत, सुबाहू और शत्रुमर्दन। तीनों पुत्रों पर अपनी माता के संस्कारों का गहरा प्रभाव पड़ा। मदालसा ने उन्हें संसार के मोह-माया से निर्लिप्त रहकर निवृत्तिमार्ग की ओर अग्रसर किया। परिणामतः तीनों ने राजसी वैभव और सांसारिक सुखों का त्याग कर संन्यास का मार्ग स्वीकार कर लिया। ऋतुध्वज के लिए यह स्थिति अत्यंत पीड़ादायक थी। वे चिंतित रहने लगे कि यदि सभी पुत्र संन्यास ले लेंगे, तो राजवंश और राज्य का उत्तराधिकार कौन संभालेगा?

एक दिन मदालसा की एक सहेली ने उनसे प्रश्न किया- “तुम कैसी माँ हो? क्या तुम्हारे भीतर ममता नहीं है? तुम अपने छोटे-छोटे बच्चों को संन्यासी बनाकर वन की ओर कैसे भेज देती हो?” मदालसा का उत्तर उनके मातृत्व की असाधारण आध्यात्मिक दृष्टि को प्रकट करता है। उनका मानना था कि माता का वास्तविक कर्तव्य केवल संतान को संसार में स्थापित करना नहीं, बल्कि उसे जन्म-मरण के बंधन से मुक्त होने का मार्ग दिखाना भी है। उनकी दृष्टि में संसार के सुख क्षणिक हैं और जन्म-मरण का चक्र ही मनुष्य के लिए परम दुःख का कारण है। इसलिए वे अपनी संतानों को उस चक्र से मुक्त करने की आकांक्षा रखती थीं। यहाँ मदालसा के मातृत्व को सामान्य सांसारिक ममता के प्रतिलोम के रूप में नहीं, बल्कि आध्यात्मिक ममता के रूप में समझना अधिक उपयुक्त होगा। वे पुत्रों को अपने पास बाँधकर रखने के बजाय उन्हें आत्मज्ञान की ओर मुक्त करती हैं।

अलर्क : निवृत्ति के साथ प्रवृत्ति का संतुलन

मदालसा पुन जब गर्भवती हुईं, तब ऋतुध्वज ने उनसे अनुरोध किया कि यदि सभी पुत्र निवृत्तिमार्ग अपना लेंगे, तो विशाल राज्य का संचालन कौन करेगा? उन्होंने आग्रह किया कि कम-से-कम इस पुत्र को राजधर्म और क्षत्रियधर्म की शिक्षा दी जाए। मदालसा ने पति की बात स्वीकार कर ली। चौथे पुत्र का नाम अलर्क रखा गया। इस बार उनकी शिक्षा-पद्धति में एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन दिखाई देता है। उन्होंने अलर्क को संन्यास की ओर प्रेरित करने के बजाय राजधर्म, क्षत्रिय धर्म, कर्तव्य, शासन और प्रजा-पालन की शिक्षा दी। यहीं मदालसा के चरित्र की सबसे बड़ी विशेषता सामने आती है- वे किसी एक जीवन-पथ को सभी के लिए अनिवार्य नहीं मानतीं। जिन पुत्रों में निवृत्ति की प्रवृत्ति थी, उन्हें उन्होंने आत्मज्ञान और संन्यास की ओर प्रेरित किया, जबकि अलर्क के लिए उन्होंने प्रवृत्तिमार्ग अर्थात् राजधर्म को उचित माना।

इस प्रकार मदालसा का मातृत्व केवल पुत्रों को संस्कार देने तक सीमित नहीं है, बल्कि वह संतान की प्रकृति और उसके जीवन-उद्देश्य के अनुरूप शिक्षा देने की कला भी है। यही कारण है कि मदालसा भारतीय परंपरा में केवल एक आदर्श माता नहीं, बल्कि माता-गुरु और दार्शनिक शिक्षिका के रूप में विशिष्ट स्थान रखती हैं।

मदालसा का मातृत्व इसलिए कालजयी है क्योंकि वह बच्चे को अपने सपनों के लिए  विस्तार मात्र नहीं मानती हैं। वह बच्चे को उसकी स्वतंत्र पहचान कराना चाहती है। इससे बच्चे को अपने जीवन का अर्थ स्वयं समझने की क्षमता मिलती है। भारतीय परंपरा में माँ को ‘गुरु’ का स्थान ऐसे नहीं मिला। मदालसा इस सत्य की सशक्त प्रतीक हैं। उन्होंने अपने पुत्रों को संसार से भागना नहीं, बल्कि आवश्यकता के अनुसार संसार को समझना सिखाया, उन्होंने उन्हें धन और सत्ता से ऊपर ज्ञान और विवेक का मूल्य बताया।

आज की माँ यदि मदालसा से शिक्षा ग्रहण कर सकती, तो वह यह कि वे अपने बच्चों के लिए भविष्य मत चुने, उन्हें ऐसा विवेक दे कि बच्चा अपना भविष्य स्वयं चुन सकें। यही मदालसा के मातृत्व का सार है। उनकी यही कथा युगों के बाद आज भी प्रासंगिक है। मदालसा केवल पुराणों की एक पात्र नहीं हैं, वे उस भारतीय मातृशक्ति का प्रतीक हैं जो पालन के साथ अपने बच्चे को निर्माण करती है, प्रेम के साथ अनुशासन देती है और संस्कारों के माध्यम से बेहतर मनुष्य तथा बेहतर समाज का निर्माण करती है।

जय हिंद

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