‘छायावाद’ में शैव दर्शन

छायावादी काव्य हिंदी साहित्य महत्त्वपूर्ण काव्य-आंदोलन है, जिसमें आत्मानुभूति, प्रकृति-सौंदर्य, रहस्यबोध, प्रेम, सौंदर्य और मानवीय चेतना के साथ भारतीय दार्शनिक परंपराओं का गहरा प्रभाव दिखाई देता है। इनमें शैव दर्शन, विशेषतः कश्मीर शैव दर्शन, की छाप जयशंकर प्रसाद के काव्य में सबसे अधिक स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। प्रसाद की कामायनी को इस दृष्टि से विशेष महत्त्व प्राप्त है। छायावाद काल में हिंदी साहित्य का महत्वपूर्ण अध्याय शुरू हो चुका था। एक तरफ भारत में स्वतंत्रता आन्दोलन जोरों पर था, दूसरी ओर हिंदी साहित्य भी अपने उत्कर्ष पर था। छायावादी कवि मानवता को धरातल बनाकर अपनी रचनाएँ सींच रहे थे। विश्व युद्धों के कारण चारों ओर विनाश फैला था। छायावादी कवियों ने जिसमें जयशंकर प्रसाद, ‘निराला’ सुमित्रानंदन पंत व रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने अपनी रचनाओं के माध्यम से युद्धों का विरोध किया। इसके साथ-साथ स्वतंत्रता सेनानियों का हौसला बढ़ाया।

प्रसाद जी अपने महाकाव्य “कामायनी” के माध्यम से मनुष्य के विनाश और पूर्णनिर्माण का सुन्दर संदेश दे रहे हैं। “कामायनी” में जलप्लावन की कथा शतपथ ब्राह्मण, ऋग्वेद व पुराणों से ली गई है। कामायनी का मूलाधार ग्रंथ शतपथ ब्राह्मण, ऋग्वेद और पुराणों में श्रद्धा, मनु और इड़ा की कथाएँ क्रमहीन, असंबद्ध तथा परस्पर उलझी हुई थी। अतः प्रसाद ने इन समस्त कड़ियों को जोड़कर कामायनी में एक सुश्रृंखला तथा सुव्यवस्थित कथानक अंकन किया है।”

“कामायनी” का सैद्धांतिक पक्ष शैव-मत पर आधारित प्रतिभिज्ञा-दर्शन है। कश्मीरी शैव-दर्शन बासुगुप्त, सोमानंद, अभिनवगुप्त व क्षेमराज की रचनाओं पर आधारित है। अभिनवगुप्त का संस्कृत साहित्य और हिंदी साहितय में विशेष योगदान है। प्रसाद जी ने अपनी रचना में प्रत्यभिज्ञा-दर्शन को स्थापित कर समाज समाज में आनंद का भाव जगाया। प्रसाद जी ने जड़ और चेतन में शिव का वास माना व अपनी धार्मिक, अध्यात्मिक व दार्शनिक का परिचय ‘चिंता’ सर्ग की प्रथम पंक्तियों में माध्यम से व्यक्त की है:-

“हिम गिरि के उत्तुंग शिखर पर, बैठ शिला की शीतल छाँह।

   एक पुरुष, भीगे नैनों से, देख रहा था प्रलय प्रवाह।

नीचे जल था, ऊपर हिम था, एक तरल था, एक सघन।

               एक तत्व की ही प्रधानता- कहो उसे जड़ या चेतन॥”1

‘दर्शन’ सर्ग में मनु को शिव के साक्षात नटराज रूप के दर्शन होते हैं:-

“बन गया तमस था अलक जाल,

 सर्वांग ज्योतिमय था विशाल।”2

‘कामायनी’ महाकाव्य शैव-दर्शन का व्यवहारिक रूप भी है। इसका सभी सर्ग मानव-जीवन के विकास की यात्रा हैं। ‘चिंता’-सर्ग मानव की सृष्टि या जन्म का वर्णन करता है। यहाँ ‘कामायनी’ के माध्यम से प्रसाद जी का उद्देश्य मात्र कहानी कहना नहीं है बल्कि मानव मन में समय व परिस्थितियों के साथ-साथ होने वाले परिवर्तन का वर्णन करना है। चिंता, आशा, श्रद्धा काम वासना, लज्जा, कर्म, ईर्ष्या, इडा, स्वप्न व संघर्ष मानव मन के भाव या प्रतीक हैं। निर्वेद, दर्शन, रहस्य व आनंद इस महाकाव्य का मुख्य प्रतिपाद्य हैं। चिंता-सर्ग से आनंद-सर्ग की यात्रा मानव जीवन के परिवर्तन की यात्रा है, जो अंत में शिव साधना द्वारा आनंद को प्राप्त करती है।

छायावादी काव्य में प्रकृति पर सबसे अधिक रचना करनेवाले कवि सुमित्रानंदन पंत जी ने प्रकृति में ही माँ, सखा व सहचरी के रूप को देखा। उन्होंने अपनी कविता ‘परिवर्तन, में शैव-दर्शन का चित्रण किया है। पंत जी ने प्रकृति के माध्यम से शैव-दर्शन का वर्णन किया है। प्रकृति के विनाशकारी व सृजन दोनों रूपों का चित्रण कर परिवर्तन को संसार का अहम् हिस्सा माना। पंत जी ‘परिवर्तन’ कविता में संसार को मिथ्या मानते हैं।

कविता के छठे भाग में उन्होंने परिवर्तन को ‘तांडव’ कहकर पुकारा है वे लिखते हैं-

“अहे निष्ठुर परिवर्तन !
तुम्हारा ही तांडव नर्तन
विश्व का करुण विवर्तन !
तुम्हारा ही नयनोन्मीलन,
निखिल उत्थान, पतन !
अहे वासुकि सहस्र फन !”3

परिवर्तन कविता में पंत जी ने जीवन और मृत्यु का साक्षात् चित्रण किया है। सृष्टि और विनाश का सुन्दर चित्रण किया है उसी की (ईश्वर) असीम सत्ता को स्वीकार कर लिखते हैं:-

“खोलता इधर जन्म लोचन,

मूँदती उधर मृत्यु क्षण, क्षण;

अभी उत्सव औ’ हास-उल्लास

             अभी अवसाद, अश्रु, उच्छावास !”4

पंत जी की अनेक कविताओं में अद्वैत-दर्शन झलकता है। ‘नौका-विहार’ कविता में उन्होंने नौका के पार उतरने पर उल्लास व्यक्त करते है। पंत जी ‘गंगा’ कविता में गंगा नदी को शिव के सर से बहती हुई हिमालय के रास्ते काशी में पहुँची कहते है व शिव के लिए अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं:-

“यह विष्णुपदी, शिव मौलि सुता

 यह भीष्म प्रसू ओं जन्हु सुता

 वह देव निम्नगा, स्वर्गंगा

 वह सागर पुत्र तारिणी श्रुता।”5

छायावाद के तीसरे मुख्य स्तंभ सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ ने अपने काव्य में विभिन्न विषयों को दिखाया है। दर्शन का चित्रण सबसे तीव्र ‘राम की शक्ति पूजा’ में मिलता है। हिंदू धर्म के सबसे प्रचलित तीनों शिव, विष्णु और शाक्त दर्शन का एक ही स्थान पर सुन्दर चित्रण मिलता है। शक्ति की पूजा शाक्त धर्म में सर्वोपरी मानी जाती है। ‘राम की शक्ति पूजा’ में राम रावण युद्ध में राम चिंतामय होते हैं। फिर सीता जी की छवि उनके मन में आती और उनको अपने शरीर के भीतर नवीन उर्जा का आभास होता है। निराला जी लिखते हैं-


“सिहरा तन, क्षण भर भूला मन, लहरा समस्त,
हर धनुर्भंग को पुनर्वार ज्यों उठा हस्त,
फूटी स्मिति सीता ध्यानलीन राम के अधर,
फिर विश्व विजय भावना हृदय में आयी भर”6

जिस प्रकार शिव और शक्ति का वर्णन हुआ है वैसा ही राम सीता जी के लिए सकारात्मक उर्जा के रूप में हाआ है। सीता जी की स्मृति मात्र से राम में शिव के धनुष तोड़ने वाली आशा का संचार होने लगा। आगे निराला जी के दोनों पाँव को आस्तिक और नास्तिक रूप में अंकित किया है। चिंतामय राम की आँखों से जब दो मोती रूपी आँसू टपक पड़ते हैं, उनके चरणों में ध्यान लगाकर हनुमान जी उनके सत्, चित् और आनंदमय रूप के दर्शन होते हैं। तभी हनुमान को लगता है कि शक्ति खेल खेल रही है। वह उत्तेजित होकर तीव्र वेग से आकाश की तरफ चलने लगते हैं। वातावरण में प्रलय जैसे स्थिति उत्पन्न होने वाली थी। एकादश रूद्र के समान गर्जना करते हुए हनुमान महाकाश में पहुँचते हैं। वहाँ हनुमान जी ने देखा कि घने अन्धकार जैसी महाकाली और शिव-शक्ति रावण के पक्ष में उपस्थित थी। यह देखकर हनुमान जी संपूर्ण महाकाश को निगलने के लिए विचलित थे। यह देखकर क्षण भर के लिए शिव को भी शंका हुई और वे बोले-

“लख महानाश शिव अचल, हुए क्षण-भर चंचल,
श्यामा के पद तल भारधरण हर मन्दस्वर
बोले- “संबरो” देवि, निज तेज, नहीं वानर
यह, नहीं हुआ श्रृंगार-युग्म-गत, महावीर।
अर्चना राम की मूर्तिमान अक्षय शरीर,
चिर-ब्रह्मचर्य-रत ये एकादश रूद्र, धन्य”7

यहाँ शिव जी हनुमान के चरित्र का गुणगान करते हैं। शिव महाशक्ति को उनका कर्तव्य याद दिलाकर मौन हो जाते है। महाशक्ति अंजना माता के रुप में हनुमान जी को दर्शन देकर शांत करती है। यहाँ शिव जी को ज्ञान रूपी दिखाया गया है।

राम की आँखों से फिर आँसू टपकने लगते हैं जब वे कहते हैं कि शक्ति उधर है, जिधर अन्याय है। वे अपनी सहायता के लिए शंकर को पुकारने लगते हैं:-

“निज सहज रूप में संयत हो जानकी-प्राण
बोले- “आया न समझ में यह दैवी विधान।
रावण, अधर्मरत भी, अपना, मैं हुआ अपर,
यह रहा, शक्ति का खेल समर, शंकर, शंकर!”8

इसके अतिरक्त निराला जी ने शिव की एक विशाल छवि आकाश में चित्रित की। पहले पर्वत के रूप में पार्वती की मौलिक कल्पना करते हैं, व समुद्र को सिहं के रूप में चित्रित करते हैं। और लिखते हैं-

“देखो, बन्धुवर, सामने स्थिर जो वह भूधर
शिभित शत-हरित-गुल्म-तृण से श्यामल सुन्दर,
पार्वती कल्पना हैं इसकी, मकरन्द-विन्दु,
गरजता चरण-प्रान्त पर सिंह वह, नहीं सिन्धु।
दशदिक-समस्त हैं हस्त, और देखो ऊपर,
अम्बर में हुए दिगम्बर अर्चित शशि शेखर”9

शिव की इतनी विराट कल्पना पहले किसी ने नहीं की। निराला जी ने पूरे आकाश में शिव की कल्पना की है, जो अद्भूत है। अंत में दुर्गा के मस्तक पर शिव विराजित किया।

छायावाद की चौथी स्तंभ महादेवी वर्मा के काव्य में अध्यात्म की चित्रमय प्रस्तुती हुई है। महादेवी वर्मा जी ने अपने अध्यात्म को दर्शाने के लिए अनेक प्रतीकों और बिम्बों को माध्यम बनाया है। दीपक, पतंगा, आँसू, तम, अली, बादल, फूल, आदि का प्रयोग किया है। उनकी कविताओं में क्षणभंगुरता व कण-कण में ईश्वर के वास की भावना उजागर हुई है।

वे कहती है-

“पल के मनके फेर पुजारी विश्व सो गया,
प्रतिध्वनि का इतिहास प्रस्तरों बीच खो गया,
साँसों की समाधि सा जीवन,
मसि-सागर का पंथ गया बन
रुका मुखर कण-कण स्पंदन”10

दीपशिखा के आरम्भ में ‘चिंतन के कुछ क्षण’ में महादेवी जी कहती हैं कि अलौकिक आत्मसमर्पण को समझने के लिए लौकिक का सहारा लेना होगा।” जब संपूर्ण आत्म समर्पण उस विराट के लिए होता है तभी सत्, चित् और आनंद की अनुभूति होती है। अपने को परम सत्ता में समर्पित करती महादेवी जी लिखती है:-

“शेषयामा यामिनी मेरा निकट निर्वाण!

पागल रे शलभ अनजान!

तिमिर में बुझ खो रहे विद्युत् भरे निश्वास मेरे,

नि:स्व होंगे प्राण मेरा शून्य उर होगा सवेरे;

राख हो उड़ जायगी यह

अग्निमय पहचान!”11

महादेवी जी की रचनाओं में सर्वात्मवाद तथा महाकरुणावाद का चित्रण हुआ है। विभिन्न प्रतीकों का प्रयोग कर अलौकिक सत्ता को देखने का प्रयास करती हैं। वे लिखती हैं:-

“फिर विकल हैं प्राण मेरे!
तोड़ दो यह क्षितिज मैं भी देख लूं उस ओर क्या है!
जा रहे जिस पंथ से युग कल्प उसका छोर क्या है?”12

        रामधारी सिंह ‘दिनकर’ हिंदी के महान् हस्ताक्षर हैं। ‘रश्मिरथी’ कविता में ‘महाभारत’ के एक पात्र कर्ण को विषय बनाकर लिखा गया खंडकाव्य है। कर्ण की चारित्रिक विशेषताओं का चित्रण किया गया है। इस कविता का मूल भाव युद्ध का विरोध करना है। राष्ट्र कवि ने ‘महाभारत’ को आधार बनाकर कर्ण का उदात्त चित्रण किया है और नैतिकता पर बल दिया है। इसके तीसरे सर्ग में कवि ने शिव के विराट रूप का चित्रण इस प्रकार किया है जिसमे पूरे ब्रह्माण्ड समाया है। वे लिखते हैं: (कृष्ण दुर्योधन संवाद)

“अम्बर में कुन्तल-जाल देख,
पद के नीचे पाताल देख,
मुट्ठी में तीनों काल देख,
मेरा स्वरूप विकराल देख।
सब जन्म मुझी से पाते हैं,
फिर लौट मुझी में आते हैं।”13

      छायावाद में विभिन्न प्रकार के वाद तथा दार्शनिक बोध लिए रचनाओं का निर्माण हुआ है। शांतिप्रिय द्विवेदी जी ने तो एक स्थान पर छायावाद को एक दार्शनिक अनुभूति कहा है। रामधारी सिंह ‘दिनकर’ के काव्य संग्रह में ‘तांडव’ नामक कविता में कवि ने शिव का नटराज रूप में सुंदर चित्रण कर अपनी श्रद्धा व्यक्त की है वे लिखते है:-

“नाचो, हे नाचो, नटवर !
चन्द्रचूड़ ! त्रिनयन ! गंगाधर ! आदि-प्रलय ! अवढर ! शंकर!
नाचो, हे नाचो, नटवर!”

“स्वामिन्, अंधड़-आग बुला दो, 
जले पाप जग का क्षण-भर में,

डिम-डिम डमरू बजा निज कर में

नाचो, नयन तृतीय तरेरे !

ओर-छोर तक सृष्टि भस्म हो

चिता-भूमि बन जाए अरेरे !

            रच दो फिर से इसे विधाता,

तुम शिव सत्य और सुन्दर ! नाचो हे नाचो, नटवर!”14

धर्मवीर भारती ने अपने दृश्य नाटक “अँधा युग” में ‘गांधारी का शाप’ अंक में शिव का वर्णन किया है। ‘गांधारी का शाप’ इस नाटक का एक महत्वपूर्ण अंक है। गांधारी महाभारत युद्ध में अपने बेटों की मृत्यु से विचलित है। वह श्री कृष्ण को इसके जिम्मेदार ठहराती है। और उसे शाप देती है। इस अंक के आरम्भ में कथा गायन में शिव की स्तुति कुछ इस प्रकार है:-

‘वे शंकर थे’

वे रौद्र-वेशधारी विराट

प्रलयंकर थे

जो शिविर-द्वार पर दीखे

अस्वत्थामा को——”

(अस्वत्थामा का स्वर)

“जटा कटाह सम्भ्रमन्निलिम्प निर्झरी समा
विलोल वीचि वल्लरी विराजमान मूर्धनि
धगद्धगद्धगज्ज्वललाट पट्ट पावके
किशोर चन्द्र शेखरे रति प्रतिक्षण मम।”15

      साहित्य की एक विशेषता यह भी है कि जिस काल में जो भी प्रवृत्तियाँ प्रधान रही है, वह पूर्णतः समाप्त नहीं हुई। धीरे-धीरे उन प्रवृत्तियों में कमी अवश्य ही देखी गई है परंतु पुर्णतः समाप्त नहीं हुई। शैव दर्शन आदिकाल से लेकर भक्तिकाल तक छायावाद व उसके बाद भी हिंदी साहित्य में विद्यमान है। अन्य वादों तथा दर्शनों के साथ-साथ शैव-दर्शन भी हिंदी साहित्य का अभिन्न अंग है। इस विषय पर शोध करके हिंदी साहित्य का विस्तार किया जा सकता है जिससे साहित्य में एक नवीनता का प्रसार होगा। 

      शैव-दर्शन एक विशेषता है कि आरम्भ से ही मानवतावादी दृष्टिकोण लेकर आया जो हम छायावादी रचनाओं में स्पष्ट रूप में देख सकते हैं।

संदर्भ ग्रंथ:

1. जयशंकर प्रसाद, ‘कामायनी’, चिंता सर्ग

2. जयशंकर प्रसाद, ‘कामायनी’, दर्शन सर्ग

3. सुमित्रानंदन पंत: पल्लव, इंडियन प्रेस लिमिटेड, प्रयाग, प्रथम वृत्ति, पृ.सं.196

4. पल्लव, पृ.सं.195 परिवर्तन- कविता

5. सुमित्रानंदन पंत द्वारा “गंगा” कविता

6. सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’: अनामिका, राम की शक्ति पूजा, प्रकाशक- भारती भण्डार लीडर

   प्रेस, इलाहबाद, द्वीतीय संस्करण, पृ.सं. 252

7. सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ ‘रामकी शक्ति पूजा’

8. सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ ‘रामकी शक्ति पूजा’

9.  सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ ‘रामकी शक्ति पूजा’

10. महादेवी वर्मा: सन्धिनी, लोकभारती प्रकाशन, इलाहबाद, पृ.सं.118

11. महादेवी वर्मा: दीपशिखा, लोकभारती प्रकाशन, प्रयागराज, संस्करण: 2021, पृ.सं.99

12. महादेवी वर्मा: सन्धिनी, पृ.सं.95

13. रामधारी सिंह ‘दिनकर’: रेणुका, रश्मिरथी, प्रकाशन, उदयाचल, पटना, 1956, पृ.सं.- 3

14. रामधारी सिंह ‘दिनकर’: तांडव, तांडव http: // kavitakosh.org तांडव
15. डॉ. धर्मवीर भारती: अन्धा युग, प्रकाशक, किताब महल, इलाहबाद, 2074, अष्टम संस्करण,

    पृ.सं.60

जय हिन्द

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