बिंब (Image)

‘बिंब’ वह शब्दचित्र है जो कल्पना द्वारा ऐन्द्रिक (इन्द्रियों से संबंधित) अनुभवों के आधार पर निर्मित होता है।

      विश्वकोष के अनुसार – “बिंब चेतन स्मृतियाँ हैं, जो मौलिक उत्तेजना के अभाव में उस विचार को संपूर्ण या आंशिक रूप से प्रस्तुत करती है।”

      ‘बिंब’ अंग्रेजी के ‘Image’ इमेज शब्द का हिंदी रूपांतरण है।

      ‘Image’ शब्द लैटिन के ‘Imago’ शब्द से बना है।

बिंब का अर्थ है- छाया / प्रतिछाया / अनुकृति / परछाई / प्रतिमूर्ति / मानसछवि आदि

बिंब के प्रतिपादक – टी. ई. ह्यूम (1883-1917 ई.) ये वेल्जियम के निवासी थे।

बिबंवाद के समर्थक – एजरा पाउंड (1885-1975 ई.) ये अमेरिका के निवासी थे।

एमी लॉवेल, हिल्डा डूलिटिल, रिचर्ड्स एल्डिंगटन, आदि है।

बिंबवाद का इतिहास:

      > प्रतीकवाद की अस्पष्टता और भावुकता के विरोध में पाश्चात्य काव्यशास्त्र में 1907ई. में टी. ई. ह्यूम द्वारा बिंबवाद का प्रवर्तन किया गया।

      > 1008ई. में बिंबवाद के प्रचार-प्रसार के लिए पोयाट्स क्लब की स्थापना की गई

      > 1915ई. में बिंबवाद का घोषणा पात्र जारी किया गया

      > 1924ई. में बिंबवाद के समर्थकों की संयुक्त रचना ‘स्पेकुलेशन’ प्रकाशित हुई।

पाश्चात्य विद्वानों के अनुसार बिंब की परिभाषा:

सी. डी. लेविस के अनुसार – “बिंब एक प्रकार का भाव गर्भित शब्द है।”

कैरोलिन के अनुसार – “बिंब कवि के विचारों का लघु रूप है।”

एलेन टेट के अनुसार – “बिंब एक अमूर्त विचार अथवा भावना की पुनर्रचना है।”

टी. ह्यूम में अनुसार – “बिंब दो विरोधी संवेदनाओं का आतंरिक तनाव है।”

एडिथ रेकर्ड के अनुसार – “बिंब विधान अनुभूति को मानसिक चित्रों के अभिव्यक्त करने की एक पद्धति है।”

जोसेफ टी शिल्पी – “बिंब इंद्रियगोचर पदार्थ की पुनर्रचना है।”

एनसाइकलोपीडिया ऑफ ब्रिटेनिका के अनुसार – “बिंब चेतन स्मृतियाँ हैं, जो इंद्रिय बोध की मौलिक उत्तेजना के अभाव में उस इन्द्रिये बोध को संपूर्ण रूप में या आंशिक रूप में पुनरुत्पादित करती है।”

भारतीय विद्वानों के अनुसार बिंब की परिभाषा:

      आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार – “काव्य में अर्थ ग्रहण मात्र से नहीं चलता, बिंब ग्रहण अपेक्षित होता है।” (पुस्तक- रस मीमांसा)

      आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार – “काव्य का काम है कल्पना में बिंब अथवा मूर्त भावना उपस्थित करना, बुद्धि के सामने कोई विचार लाना नहीं।” (काव्य मीमांसा)

काव्य में बिंब को स्वीकारते हुए उन्होंने मान्यताएँ प्रस्तुत की है-

      > बिंब विशेष या एक व्यक्ति का होता है, सामान्य या जाति का नही  

      > काव्य में बिंब स्थापना प्रधान वस्तु है

      > बिंब में जो अर्थ बोध होता है वह काल्पनिक और अस्थिर होता है  

      डॉ नगेंद्र के अनुसार – “बिंब एक प्रकार का चित्र है जो किसी पदार्थ के साथ विभिन्न इन्द्रियों के सन्निकर्ष से प्रमाता के चित्र में उद्बुद्ध हो जाता है।”

डॉ नगेंद्र की बिंब विषयक धारणाएँ:

      > बिबं एक पदार्थ नहीं वरन उसकी प्रतिकृति या प्रतिछवि है।

      > बिंब मूल सृष्टि नहीं पुनः सृष्टी है।

      > बिबं में एकरूपता नहीं होती बिंब एक प्रकार का चित्र है जो इन्द्रियों के सन्न निष्कर्ष से प्रमाता (पाठक/ श्रोता) के चित्र में उद्बुद्ध हो जाता है।

      > काव्य बिंब शब्दार्थ के माध्यम से कल्पना द्वारा निर्मित एक ऐसी माँस छवि है जिसके मूल में भाव की प्रेरणा रहती है।

      केदारनाथ सिंह के अनुसार – “बिबं वह शब्द चित्र है जो कल्पना के द्वारा ऐन्द्रिय अनुभवों के आधार पर निर्मित होता है।”

भारत में हिंदी के बिबंवाद के सबसे बड़े कवि डॉ केदारनाथ सिंह है।

डॉ केदारनाथ की बिंब विषयक धारणाएँ:

      > बिंब काव्य की विशेषता का बोधक है।

      > बिंब मनुष्य की संपूर्ण मानसिक जटिलताओं का बोधक है।

      > बिंब में चित्रात्मकता होती है, किन्तु आधुनिक काव्यों में यह चित्रात्मकता गौण हो गई है।

      भगीरथ मिश्र के अनुसार – “वस्तु, भाव या विचार को कल्पना एवं मानसिक क्रिया के माध्यम से इंद्रियगम्य बनाने वाला व्यापार ही बिंब विधान है।”

डॉ भगीरथ की बिंब विषयक  धारणाएँ:

      > बिंब रचना काव्य का मुख्य व्यापार है।

      > बिंब काव्य का सहायक उपकरण है।

      > बिंब अप्रस्तुत विधान प्रणाली नहीं है।

      > बिंबों के द्वारा कवि वस्तु, घटना, व्यापार, गुण, विशेषता विचार आदि साकार या निराकार पदार्थों को प्रत्यक्ष या इंद्रिय ग्राह्य बनाता है।    

      डॉ कुमार विमल के अनुसार – “बिंब विधान कला का क्रिया पक्ष है जो कल्पना से उत्पन्न होता है। यह कल्पना के विकास की एक सरणि है।”

बिंब की विशेषताएँ:

      > बिंब वस्तु नहीं वस्तु की प्रतिकृति है।

      > बिंब स्मृति में उपस्थित होती चित्र है।

      > बिंब को मूल उत्तेजना की आवश्यकता नहीं होती है।

      > बिंब के लिए ऐन्द्रिक बोध की आवश्यकता होती है।

      > बिंब एक प्रकार का शब्द चित्र है। यह मूर्त होता है।

      > काव्य बिंब का मध्यम शब्द होता है।

      > बिंब अस्थिर, अस्पष्ट, निष्क्रिय एवं संश्लिष्ट होता है।

बिंब के पाँच तत्व है: अनूभूति, भाव, आवेग, ऐंद्रिकता, कल्पना

बिंब रचना की प्रक्रिया:

पहले प्रत्याक्षीकारण या अनुकृति, स्मृति, कल्पना, स्मृति की जागृति, स्मृति निर्वैतिकरण होता है, चयन, संश्लेषण।

      सी डी लेविस के अनुसार बिंब के गुण: इन्होने बिंब के छः गुण बताएँ है-

ताजगी, तीव्रता या सघनता, पूर्व स्मृति को जगा देने की शक्ति, भास्वरता (चमक), औचित्य और उर्वरता।

बिंब के भेद: रॉबिन स्केल्टन के अनुसार – (दि पॉयटिक्स पैटर्न- पुस्तक)

साधारण बिंब- जिसमे इंद्रिय संवेदना हो जैसे- रंग, स्वाद, बोध आदि

भाव बिंब – जिसमे सत्य, न्याय, प्रेम, घृणा से संबंधित हो वह भाव बिंब होता है।

तत्क्षण बिंब – शब्द या वाक्य को सुनकर मन शीघ्रता से उत्पन होने वाला छवि।

विकीर्ण बिंब – मानवीय इच्छाओं एवं सुख-दुःख से संबंधित बिंब विकीर्ण बिंब है।

      जैसे- संयोग, वियोग, विरह, सुख, दुःख आदि।

अमूर्त बिंब – सत्य, दया, प्रेम आदि।

मिश्रित बिंब – अमूर्त और मूर्त दोनों का मिश्रण होता है।

संश्लिष्ट बिंब – मन में अनेक छवियों का एक साथ उभरना संश्लिष्ट बिंब है।

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