हिन्दी में व्यंग्य-विनोद की सजीव शैली के पुरस्कर्ताओं में बाबू बालमुकुंद गुप्त के 'शिवशंभु के चिट्ठे' अपना अप्रतिम स्थान रखते हैं। शिवशम्भु के कल्पित नाम से, गुप्तजी ने लार्ड कर्जन के शासनकाल में, भारतीय जनता की दुर्दशा को प्रकट करने के लिए आठ चिट्ठे लिखे थे। ये चिट्ठे उस समय की राजनीतिक गुलामी और लार्ड… Continue reading गूंगी प्रजा का वकील : शिवशंभु शर्मा (भूमिका) भाग-5
सुंदर विचार
बालमुकुंद गुप्त शिवशंभू के चिट्ठे (निबंध) भाग-4
इस पाठ का पूर्व अंश भाग-1, भाग-2 और भाग-3 में दिया गया है, कृपया इस भाग-4 को देखने से पहले, इसके पहले भाग-1, भाग-2 और भाग-3 को अवश्य देख लें जिससे कि विषय की निरंतरता बनी रहे – 7. बिदाई संभाषण माई लार्ड! अंत को आपके शासन-काल का इस देश में अंत हो गया। अब आप इस… Continue reading बालमुकुंद गुप्त शिवशंभू के चिट्ठे (निबंध) भाग-4
बालमुकुंद गुप्त – ‘शिवशंभू के चिट्ठे’ (निबंध) भाग-3
इस पाठ का पूर्व अंश भाग-1 और भाग-2 में दिया गया है, कृपया इस भाग-3 को देखने से पहले, इसके पहले भाग-1 और भाग-2 को अवश्य देख लें जिससे कि विषय की निरंतरता बनी रहे – 5. आशा का अन्त! माई लार्ड! अब के आपके भाषण ने नशा किरकिरा कर दिया। संसार के सब दुःखों… Continue reading बालमुकुंद गुप्त – ‘शिवशंभू के चिट्ठे’ (निबंध) भाग-3
बालमुकुंद गुप्त – शिवशंभू के चिट्ठे (निबंध) भाग-2
इस पाठ का प्रथम अंश भाग-1 में दिया गया है – 3. वैसराय का कर्त्तव्य माई लार्ड! आपने इस देश में फिर पदार्पण किया, इससे यह भूमि कृतार्थ हुई। विद्वान, बुद्धिमान और विचार शील पुरुषों के चरण जिस भूमि पर पड़ते हैं, वह तीर्थ बन जाती है। आपमें उक्त तीन गुणों के सिवा चौथा गुण… Continue reading बालमुकुंद गुप्त – शिवशंभू के चिट्ठे (निबंध) भाग-2
बालमुकुंद गुप्त – शिवशंभू के चिट्ठे (निबंध) भाग-1
1. बनाम लार्ड कर्जन माई लार्ड! लड़कपन में इस बूढ़े भंगड़ को बुलबुल का बड़ा चाव था। गाँव में कितने ही शौक़ीन बुलबुलबाज़ थे। वह बुलबुलें पकड़ते थे, पालते थे और लड़ाते थे, बालक शिवशम्भु शर्मा बुलबुलें लड़ाने का चाव नहीं रखता था। केवल एक बुलबुल को हाथ पर बिठाकर ही प्रसन्न होना चाहता था।… Continue reading बालमुकुंद गुप्त – शिवशंभू के चिट्ठे (निबंध) भाग-1
प्रताप नारायण मिश्र : ‘शिवमूर्ति’ (निबंध)
हमारे ग्रामदेव भगवान भूतनाथ सब प्रकार से अकथ्य अप्रतर्क्य एवं अचिन्त्य हैं। तौ भी उनके भक्त जन अपनी रुचि के अनुसार उनका रूप, गुण, स्वभाव कल्पित कर लेते हैं। उनकी सभी बातें सत्य हैं, अतः उनके विषय में जो कुछ कहा जाय सब सत्य है। मनुष्य की भांति वे नाड़ी आदि बंधन से बद्ध नहीं… Continue reading प्रताप नारायण मिश्र : ‘शिवमूर्ति’ (निबंध)
भारतेंदु हरिश्न्द्र – ‘भारतवर्ष की उन्नति कैसे हो सकती है?
बलिया वाला भाषण यह नवम्बर सन् 1884 में बलिया के ददरी मेले में ‘आर्य देशोपकारिणी’ सभा में दिया गया भाषण है। बाद में नवोदिता ‘हरिश्चन्द्र चन्द्रिका’ में यह 3 दिसम्बर सन् 1884 में छपा। इस साल बलिया में ददरी का मेला बड़ी धूम-धाम से हुआ। श्री मुंशी बिहारीलाल, मुंशी गणपति राय, मुंशी चतुर्भुज सहाय सरीखे… Continue reading भारतेंदु हरिश्न्द्र – ‘भारतवर्ष की उन्नति कैसे हो सकती है?
भारतेंदु ‘दिल्ली दरबार दर्पण’ (निबंध) भाग-2
सन् 1858 ईसवी की नवंबर को श्रीमती महारानी की ओर से एक इश्तिहार जारी हुआ था, जिसमें हिंदुस्तान के रईसों और प्रजा को श्रीमती की कृपा का विश्वास कराया गया था, जिसको उस दिन से आज तक वह लोग राजसंबंधी बातों में बड़ा अनमोल प्रमाण समझते हैं। वह प्रतिज्ञा, एक ऐसी महारानी की ओर से… Continue reading भारतेंदु ‘दिल्ली दरबार दर्पण’ (निबंध) भाग-2
भारतेंदु ‘दिल्ली दरबार दर्पण’ (निबंध) भाग-1
जयति राजराजेश्वरी जय युवराज कुमार। जय नृप-प्रतिनिधि कवि लिटन जय दिल्ली दरबार। स्नेह भरन तम हरन दोउ प्रजन करन उजियार। भयो देहली दीप सो यह देहली दरबार॥ सब राजाओं की मुलाक़ातों का हाल अलग-अलग लिखना आवश्यक नहीं, क्योंकि सबके साथ वही मामूली बातें हुईं। सब बड़े-बड़े शासनाधिकारी राजाओं को एक-एक रेशमी झंडा और सोने का… Continue reading भारतेंदु ‘दिल्ली दरबार दर्पण’ (निबंध) भाग-1
निर्मल वर्मा : ‘परिंदे’ कहानी भाग-3
डॉक्टर लेटे-लेटे बुड़बुड़ाया। मिस वुड ने नीचे झुककर देखा, वह कुहनी पर सिर टिकाए चुपचाप सो रहा था। ऊपर का होंठ ज़रा-सा फैलकर मुड़ गया था, मानो किसी से मज़ाक़ करने से पहले मुस्कुरा रहा हो। उसकी उँगुलियों में दबा हुआ सिगार नीचे झुका हुआ लटक रहा था। ‘मेरी, मेरी, व्हाट डू यू वान्ट-’ दूसरे… Continue reading निर्मल वर्मा : ‘परिंदे’ कहानी भाग-3