संभवत: ऐसे ही पूर्वग्रह का प्रत्याख्यान करने के लिए द्विवेदीजी ने अपनी साहित्य-साधना के आरंभिक सोपान पर ही 'हिंदी साहित्य की भूमिका' के साथ ही 'प्राचीन भारत का कला-विलास' (1940) नामक पुस्तक लिखी जो आगे चलकर परिवर्धित रूप में 'प्राचीन भारत के कलात्मक विनोद' नाम से छपी। प्राचीन भारत में प्रचलित कलाओं के लगभग सौ… Continue reading नामवर सिंह: ‘संस्कृति और सौंदर्य’ (निबंध) भाग-2
सुंदर विचार
नामवर सिंह: संस्कृति और सौंदर्य- निबंध भाग-1
'अशोक के फूल' केवल एक फूल की कहानी नहीं, भारतीय संस्कृति का एक अध्याय है; और इस अध्याय का अनंगलेख पढ़ने वाले हिंदी में पहले व्यक्ति हैं हजारीप्रसाद द्विवेदी। पहली बार उन्हें ही यह अनुभव हुआ कि 'एक-एक फूल, एक-एक पशु, एक-एक पक्षी न जाने कितनी स्मृतियों का भार लेकर हमारे सामने उपस्थित है। अशोक… Continue reading नामवर सिंह: संस्कृति और सौंदर्य- निबंध भाग-1
विवेकी राय: उठ जाग मुसाफिर (निबंध)
वहाँ जाते समय कल्पना कर रहा था कि सदा की भाँति तन-मन से पूर्ण स्वस्थ होंगे, पूर्ववत धधाकर सहास मिलेंगे, सदाबहार से दिखेंगे, फुल्ल कुसमित। ऐसी संक्रामक निरोगता कि प्रतिमूर्ति के चाहक-ग्राहक कम नहीं होते। सो घिरे होंगे गाँव के या इधर-उधर के प्रबुद्ध लोगों से। कुछ ले लो इस अंतिम आदमी से। क्या लोगे… Continue reading विवेकी राय: उठ जाग मुसाफिर (निबंध)
कुबेरनाथ राय : उत्तराफाल्गुनी के आस-पास (निबंध)
वर्षा ऋतु की अंतिम नक्षत्र है उत्तराफाल्गुनी। हमारे जीवन में गदह-पचीसी सावन-मनभावन है, बड़ी मौज रहती है, परंतु सत्ताइसवें के आते-आते घनघोर भाद्रपद के अशनि-संकेत मिलने लगते हैं और तीसी के वर्षों में हम विद्युन्मय भाद्रपद के काम, क्रोध और मोह का तमिस्त्र सुख भोगते हैं। इसी काल में अपने-अपने स्वभाव के अनुसार हमारी सिसृक्षा… Continue reading कुबेरनाथ राय : उत्तराफाल्गुनी के आस-पास (निबंध)
सरदार पूर्ण सिंह : मजदूरी और प्रेम (निबंध) भाग-2
5. मजदूरी और कला आदमियों की तिजारत करना मूर्खों का काम है। सोने और लोहे के बदले मनुष्य को बेचना मना है। आजकल भाप की कलों का दाम तो हजारों रुपया है; परंतु मनुष्य कौड़ी के सौ-सौ बिकते हैं! सोने और चाँदी की प्राप्ति से जीवन का आनंद नहीं मिल सकता। सच्चा आनंद तो मुझे… Continue reading सरदार पूर्ण सिंह : मजदूरी और प्रेम (निबंध) भाग-2
सरदार पूर्ण सिंह : मजदूरी और प्रेम (निबंध) भाग-1
1. हल चलाने वाले का जीवन हल चलाने वाले और भेड़ चराने वाले प्रायः स्वभाव से ही साधु होते हैं। हल चलाने वाले अपने शरीर का हवन किया करते हैं। खेत उनकी हवनशाला है। उनके हवनकुंड की ज्वाला की किरणें चावल के लंबे और सुफेद दानों के रूप में निकलती हैं। गेहूँ के लाल-लाल दाने… Continue reading सरदार पूर्ण सिंह : मजदूरी और प्रेम (निबंध) भाग-1
विद्यानिवास मिश्र : ‘मेरे राम का मुकुट भीग रहा है’ (निबंध)
महीनों से मन बेहद-बेहद उदास है। उदासी की कोई खास वजह नहीं, कुछ तबीयत ढीली, कुछ आसपास के तनाव और कुछ उनसे टूटने का डर, खुले आकाश के नीचे भी खुलकर साँस लेने की जगह की कमी, जिस काम में लगकर मुक्ति पाना चाहता हूँ, उस काम में हज़ार बाधाएँ; कुल ले-देकर उदासी के लिए… Continue reading विद्यानिवास मिश्र : ‘मेरे राम का मुकुट भीग रहा है’ (निबंध)
हजारीप्रसाद द्विवेदी ‘नाख़ून क्यों बढ़ते हैं’ निबंध
बच्चे कभी-कभी चक्कर में डाल देनेवाले प्रश्न कर बैठते हैं। अल्पज्ञ पिता बड़ा दयनीय जीव होता है। मेरी छोटी लड़की ने जब एक दिन पूछ दिया कि आदमी के नाख़ून क्यों बढ़ते हैं, तो मैं कुछ सोच ही नहीं सका। हर तीसरे दिन नाख़ून बढ़ जाते हैं, बच्चे कुछ दिन तक अगर उन्हें बढ़ने दें,… Continue reading हजारीप्रसाद द्विवेदी ‘नाख़ून क्यों बढ़ते हैं’ निबंध
आचार्य रामचंद्र शुक्ल ‘कविता क्या’ है? निबंध भाग- 5
इस पाठ का पूर्व अंश भाग-1,2,3 और भाग-4 में दिया गया है, कृपया इस विडिओ को देखने से पहले, इसके पहले के विडिओ में भाग-1,2,3 और भाग-4 को अवश्य देख लें जिससे कि विषय की निरंतरता बनी रहे– कविता की भाषा कविता में कही गई बात चित्र-रूप में हमारे सामने आनी चहिए, यह हम पहले… Continue reading आचार्य रामचंद्र शुक्ल ‘कविता क्या’ है? निबंध भाग- 5
आचार्य रामचंद्र शुक्ल ‘कविता क्या’ है? निबंध भाग- 4
इस पाठ का पूर्व अंश भाग-1,2 और भाग-3 में दिया गया है, कृपया इस विडिओ को देखने से पहले, इसके पहले के विडिओ में भाग-1,2 और भाग-3 को अवश्य देख लें जिससे कि विषय की निरंतरता बनी रहे – चमत्कारवाद काव्य के संबंध में चमत्कार’ अनूठापन आदि शब्द बहुत दिनों से लाए जाते हैं। चमत्कार… Continue reading आचार्य रामचंद्र शुक्ल ‘कविता क्या’ है? निबंध भाग- 4