बालमुकुंद गुप्त – शिवशंभू के चिट्ठे (निबंध) भाग-1

1. बनाम लार्ड कर्जन

माई लार्ड! लड़कपन में इस बूढ़े भंगड़ को बुलबुल का बड़ा चाव था। गाँव में कितने ही शौक़ीन बुलबुलबाज़ थे। वह बुलबुलें पकड़ते थे, पालते थे और लड़ाते थे, बालक शिवशम्भु शर्मा बुलबुलें लड़ाने का चाव नहीं रखता था। केवल एक बुलबुल को हाथ पर बिठाकर ही प्रसन्न होना चाहता था। पर ब्राह्मण कुमार को बुलबुल कैसे मिले? पिता को यह भय कि बालक को बुलबुल दी तो वह मार देगा, हत्या होगी। अथवा उसके हाथ से बिल्ली छीन लेगी तो पाप होगा। बहुत अनुरोध से यदि पिता ने किसी मित्र की बुलबुल किसी दिन ला भी दी तो वह एक घण्टे से अधिक नहीं रहने पाती थी। वह भी पिता की निगरानी में।

सराय के भटियारे बुलबुलें पकड़ा करते थे। गाँव के लड़के उनसे दो-दो तीन-तीन पैसे में ख़रीद लाते थे। पर बालक शिवशम्भु तो ऐसा नहीं कर सकता था। पिता की आज्ञा बिना वह बुलबुल कैसे लावे और कहाँ  रखे? उधर मन में अपार इच्छा थी कि बुलबुल ज़रूर हाथ पर हो। इसी से जंगल में उड़ती बुलबुल को देखकर जी फड़क उठता था। बुलबुल की बोली सुनकर आनन्द से हृदय नृत्य करने लगता था। कैसी-कैसी कल्पनाएँ  हृदय में उठती थीं। उन सब बातों का अनुभव दूसरों को नहीं हो सकता। दूसरों को क्या होगा? आज यह वही शिवशम्भु है, स्वयं इसी को उस बालकाल के अनिर्वचनीय चाव और आनन्द का अनुभव नहीं हो सकता।

बुलबुल पकड़ने की नाना प्रकार की कल्पनाएँ मन ही मन में करता हुआ बालक शिवशम्भु सो गया। उसने देखा कि संसार बुलबुलमय है। सारे गाँव में बुलबुलें उड़ रही है। अपने घर के सामने खेलने का जो मैदान है, उसमें सैकड़ों बुलबुल उड़ती फिरती है। फिर वह सब ऊँची नहीं उड़तीं। बहुत नीची-नीची उड़ती है। उनके बैठने के अड्डे भी नीचे-नीचे है। वह कभी उड़ कर इधर जाती हैं और कभी उधर, कभी यहाँ बैठती है और कभी वहाँ, कभी स्वयं उड़कर बालक शिवशम्भु के हाथ की उँगलियों पर आ बैठती है। शिवशम्भु आनन्द में मस्त होकर इधर-उधर दौड़ रहा है। उसके दो तीन साथी भी उसी प्रकार बुलबुलें पकड़ते और छोड़ते इधर-उधर कूदते फिरते है।

आज शिवशम्भु की मनोवाञ्छा पूर्ण हुई। आज उसे बुलबुलों की कमी नहीं है। आज उसके खेलने का मैदान बुलबुलिस्तान बन रहा है। आज शिवशम्भु बुलबुलों का राजा ही नहीं, महाराजा है। आनन्द का सिलसिला यहीं नहीं टूट गया। शिवशम्भु ने देखा कि सामने एक सुन्दर बाग है। वहीं से सब बुलबुलें उड़कर आती हैं। बालक कूदता हुआ दौड़कर उसमें पहुंचा। देखा, सोने के पेड़ पत्ते और सोने ही के नाना रंग के फूल हैं। उन पर सोने की बुलबुलें बैठी गाती हैं और उड़ती फिरती हैं। वहीं एक सोने का महल है। उस पर सैकड़ों सुनहरी कलश हैं। उन पर भी बुलबुलें बैठी हैं। बालक दो-तीन साथियों सहित महल पर चढ़ गया। उस समय वह सोने का बागीचा सोने के महल और बुलबुलों सहित एक बार उड़ा। सब कुछ आनन्द से उड़ता था, बालक शिवशम्भु भी दूसरे बालकों सहित उड़ रहा था। पर यह आमोद बहुत देर तक सुखदायी न हुआ। बुलबुलों का ख्याल अब बालक के मस्तिष्क से हटने लगा। उसने सोचा– हैं! मैं कहां उड़ा जाता हूं? माता-पिता कहां? मेरा घर कहां? इस विचार के आते ही सुखस्वप्न भंग हुआ। बालक कुलबुलाकर उठ बैठा। देखा और कुछ नहीं, अपना ही घर और अपनी ही चारपाई है। मनोराज्य समाप्त हो गया.

आपने माई लार्ड! जब से भारतवर्ष में पधारे हैं, बुलबुलों का स्वप्न ही देखा है या सचमुच कोई करने के योग्य काम भी किया है? ख़ाली अपना ख़याल ही पूरा किया है या यहां की प्रजा के लिए भी कुछ कर्तव्य पालन किया? एक बार यह बातें बड़ी धीरता से मन में विचारिये। आपकी भारत में स्थिति की अवधि के पाँच वर्ष पूरे हो गए अब यदि आप कुछ दिन रहेंगे तो सूद में, मूलधन समाप्त हो चुका। हिसाब कीजिये नुमायशी कामों के सिवा काम की बात आप कौन सी कर चले हैं और भड़कबाजी के सिवा ड्यूटी और कर्तव्य की ओर आपका इस देश में आकर कब ध्यान रहा है? इस बार के बजट की वक्तृता ही आपके कर्तव्यकाल की अन्तिम वक्तृता थी। ज़रा उसे पढ़ तो जाइये फिर उसमें आपकी पाँच साल की किस अच्छी करतूत का वर्णन है। आप बारम्बार अपने दो अति तुमतराक से भरे कामों का वर्णन करते हैं। एक विक्टोरिया मिमोरियल हाल और दूसरा दिल्ली-दरबार। पर जरा विचारिये तो यह दोनों काम “शो” हुए या “ड्यूटी”? विक्टोरिया मिमोरियल हाल चन्द पेट भरे अमीरों के एक-दो बार देख आने की चीज़ होगा। उससे दरिद्रों का कुछ दु:ख घट जावेगा या भारतीय प्रजा की कुछ दशा उन्नत हो जावेगी, ऐसा तो आप भी न समझते होंगे।

अब दरबार की बात सुनिये कि क्या था? आपके ख़याल से वह बहुत बड़ी चीज़ था। पर भारतवासियों की दृष्टि में वह बुलबुलों के स्वप्न से बढ़कर कुछ न था। जहाँ-जहाँ से वह जुलूस के हाथी आये, वहीं-वहीं सब लौट गये। जिस हाथी पर आप सुनहरी झूलें और सोने का हौदा लगवाकर छत्र-धारण-पूर्वक सवार हुए थे, वह अपने क़ीमती असबाब सहित जिसका था, उसके पास चला गया। आप भी जानते थे कि वह आपका नहीं और दर्शक भी जानते थे कि आपका नहीं। दरबार में जिस सुनहरी सिंहासन पर विराजमान होकर आपने भारत के सब राजा महाराजाओं की सलामी ली थी, वह भी वहीं तक था और आप स्वयं भली-भांति जानते हैं कि वह आपका न था। वह भी जहाँ से आया था वहीं चला गया। यह सब चीज़ें ख़ाली नुमायशी थीं। भारतवर्ष में वह पहले ही से मौजूद थीं। क्या इन सबसे आपका कुछ गुण प्रकट हुआ? लोग विक्रम को याद करते हैं या उसके सिंहासन को, अकबर को या उसके तख़्त को? शाहजहां की इज्जत उसके गुणों से थी या तख़्तेताऊस से? आप जैसे बुद्धिमान पुरुष के लिये यह सब बातें विचारने की हैं।

चीज वह बनना चाहिये जिसका कुछ देर क़याम हो। माता-पिता की याद आते ही बालक शिवशम्भु का सुखस्वप्न भंग हो गया। दरबार समाप्त होते ही वह दरबार-भवन, वह एम्फीथियेटर तोड़कर रख देने की वस्तु हो गया। उधर बनाना, इधर उखाड़ना पड़ा। नुमायशी चीज़ों का यही परिणाम है। उनका तितलियों का सा जीवन होता है। माई माई लार्ड! आपने कछाड़ के चाय वाले साहबों की दावत खाकर कहा था कि यह लोग यहाँ नित्य हैं और हम लोग कुछ दिन के लिये। आपके वह “कुछ दिन” बीत गये। अवधि पूरी हो गई। अब यदि कुछ दिन और मिलें तो वह किसी पुराने पुण्य के बल से समझिये। उन्हीं की आशा पर शिवशम्भु शर्मा यह चिट्ठा आपके नाम भेज रहा है, जिससे इन माँगे दिनों में तो एक बार आपको अपने कर्तव्य ख़्याल हो।

जिस पद पर आप आरूढ़ हुए वह आपका मौरूसी नहीं– नदी-नाव संयोग की भांति है। आगे भी कुछ आशा नहीं कि इस बार छोड़ने के बाद आपका इससे कुछ सम्बन्ध रहे। किन्तु जितने दिन आपके हाथ में शक्ति है, उतने दिन कुछ करने की शक्ति भी है। जो कुछ आपने दिल्ली आदि में कर दिखाया उसमें आपका कुछ भी न था, पर वह सब कर दिखाने की शक्ति आप में थी। उसी प्रकार जाने से पहले, इस देश के लिये कोई असली काम कर जाने की शक्ति आप में है। इस देश की प्रजा के हृदय में कोई स्मृति-मन्दिर बना जाने की शक्ति आप में है। पर यह सब तब हो सकता है, कि वैसी स्मृति की कुछ क़दर आपके हृदय में भी हो। स्मरण रहे धातु की मूर्तियों के स्मृति-चिह्न से एक दिन क़िले का मैदान भर जायगा। महारानी का स्मृति-मन्दिर मैदान की हवा रोकता था या न रोकता था, पर दूसरों की मूर्तियाँ इतनी हो जावेंगी कि पचास-पचास हाथ पर हवा को टकराकर चलना पड़ेगा। जिस देश में लार्ड लैंसडौन की मूर्ति बन सकती है, उसमें और किस-किस की मूर्ति नहीं बन सकती? माई लार्ड! क्या आप भी चाहते हैं कि उसके आसपास आपकी एक वैसी ही मूर्ति खड़ी हो?

यह मूर्तियाँ किस प्रकार के स्मृति-चिह्न है? इस दरिद्र देश के बहुत-से धन की एक ढेरी है, जो किसी काम नहीं आ सकती। एक बार जाकर देखने से ही विदित होता है कि वह कुछ विशेष पक्षियों के कुछ देर विश्राम लेने के अड्डे से बढ़कर कुछ नहीं है। माई माई लार्ड! आपकी मूर्ति की वहाँ क्या शोभा होगी? आइये मूर्तियाँ दिखावें। वह देखिये एक मूर्ति है, जो क़िले के मैदान में नहीं है, पर भारतवासियों के हृदय में बनी हुई है। पहचानिये, इस वीर पुरुष ने मैदान की मूर्ति से इस देश के करोड़ों गरीबों के हृदय में मूर्ति बनवाना अच्छा समझा। यह लार्ड रिपन की मूर्ति है। और देखिये एक स्मृति-मन्दिर, यह आपके पचास लाख के संगमर्मर वाले से अधिक मज़बूत और सैकड़ो गुना कीमती है। यह स्वर्गीया विक्टोरिया महारानी का सन् 1858 ई. का घोषणापत्र है। आपकी यादगार भी यहीं बन सकती है, यदि इन दो यादगारों की आपके जी में कुछ इज्ज़त हो।

मतलब समाप्त हो गया। जो लिखना था, वह लिखा गया। अब ख़ुलासा बात यह है कि एक बार ‘शो’ और ड्यूटी का मुक़ाबिला कीजिये. ‘शो’ को ‘शो’ ही समझिये. ‘शो’ ड्यूटी नहीं है! माई लार्ड! आपके दिल्ली दरबार की याद कुछ दिन बाद उतनी ही रह जावेगी जितनी शिवशम्भु शर्मा के सिर में बालकपन के उस सुखस्वप्न की है.

11 अप्रैल 1903 को ‘भारत मित्र’ में प्रकाशित


2. श्रीमान् का स्वागत

जो अटल है, वह टल नहीं सकती। जो होनहार है, वह होकर रहती है। इसीसे फिर दो वर्ष के लिए भारत के वैसराय और गवर्नर-जनरल होकर लार्ड कर्जन आते हैं। बहुत से विघ्नों को हटाते और बाधाओं को भगाते फिर एक बार भारतभूमि में आपका पदार्पण होता है। इस शुभयात्रा के लिए वह गत नवम्बर को सम्राट एडवर्ड से भी विदा ले चुके हैं। दर्शन में अब अधिक विलम्ब नहीं है।

इस समय भारतवासी यह सोच रहे हैं कि आप क्यों आते हैं और आप यह जानते भी हैं कि आप क्यों आते हैं। यदि भारतवासियों का वश चलता तो आपको न आने देते और आपका वश चलता तो और भी कई सप्ताह पहले आ विराजते। पर दोनों ओर की बाग किसी और ही के हाथ में है। निरे बेबश भारतवासियों का कुछ वश नहीं है और बहुत बातों पर वश रखने वाले लार्ड कर्जन को भी बहुत बातों में बेबश होना पड़ता है और उक्त श्रीमान् को अपने चलने में विलम्ब देखना पड़ा है। कवि कहता है—

“जो कुछ खुदा दिखाये, सो लाचार देखना।”

“अभी भारतवासियों को बहुत कुछ देखना है और लार्ड कर्जन को भी बहुत कुछ। श्रीमान् के नये शासन-काल के यह दो वर्ष निसन्देह देखने की वस्तु होंगे। अभीसे भारतवासियोंकी दृष्टियां सिमटकर उस ओर जा पड़ी हैं। यह जबरदस्त द्रष्टा लोग अब बहुत काल से केवल निर्लिप्त निराकार तटस्थ द्रष्टा की अवस्था में अतृप्त लोचन से देख रहे हैं और न जाने कब तक देखे जावेंगे। अथक ऐसे हैं कि कितने ही तमाशे देखे गये, पर दृष्टि नहीं हटाते हैं। उन्होंने पृथ्वीराज, जयचन्द की तबाही देखी, मुसलमानों की बादशाही देखी। अकबर, बीरबल, खानखाना और तानसेन देखे, शाहजहानी तख्ते-ताऊस और शाही जुलूस देखे। फिर वही तख्त नादिर को उठाकर ले जाते देखा। शिवाजी और औरंगजेब देखे। क्लाइव, हेष्टिंगस से वीर अंग्रेज देखे। देखते-देखते बड़े शौक से लार्ड कर्जन का हाथियों का जुलूस और दिल्ली दरबार देखा। अब गोरे पहलवान मिस्टर सेण्डोकी छातीपर कितने ही मन बोझ उठाना देखने को टूटे पड़ते हैं। कोई देखानेवाला चाहिये, भारतवासी देखने को सदा प्रस्तुत हैं। इस गुण में वह मोंछ मरोड़कर कह सकते हैं कि संसार में कोई उनका सानी नहीं। लार्ड कर्जन भी अपनी शासित प्रजा का यह गुण जान गये थे, इसीसे श्रीमान् ने लीलामय रूप धारण करके कितनी ही लीलाएँ दिखायीं।

इसीसे लोग बहुत कुछ सोच-विचार कर रहे हैं कि इन दो वर्षों में भारत प्रभु लार्ड कर्जन और क्या-क्या करेंगे। पिछले पांच साल से अधिक समय में श्रीमान् ने जो कुछ किया, उसमें भारतवासी इतना समझने लगे हैं कि श्रीमान् की रुचि कैसी है? और कितनी बातों को पसन्द करते हैं। यदि वह चाहें, तो फिर हाथियों का एक बड़ा भारी जुलूस निकलवा सकते हैं। पर उसकी वैसी कुछ जरूरत नहीं जान पड़ती। क्योंकि जो जुलूस वह दिल्ली में निकलवा चुके हैं, उसमें सबसे ऊँचे हाथी पर बैठ चुके हैं। उससे ऊँचा हाथी यदि सारी पृथ्वी में नहीं, तो भारतवर्ष में और नहीं है। इसीसे फिर किसी हाथी पर बैठने का श्रीमान् को और क्या चाव हो सकता है। उससे ऊँचा हाथी और नहीं है। ऐरावत का केवल नाम है, देखा किसीने नहीं है। मेम थकी हड्डियां किसी-किसी अजायबखाने में उसी भांति आश्चर्य्य की दृष्टि से देखी जाती हैं, जैसे श्रीमान् के स्वदेश के अजायबखाने में कोई छोटा-मोटा हाथी। बहुत लोग कह सकते हैं कि हाथी की छोटाई-बड़ाई पर बात नहीं, जुलूस निकले तो फिर भी निकल सकता है। दिल्ली नहीं तो और कहीं सही। क्योंकि दिल्ली में आतशबाजी खूब चल चुकी थी, कलकत्ते में फिर चलायी गयी। दिल्ली में हाथियों की सवारी हो चुकनेपर भी कलकत्ते में रोशनी और घोडागाड़ी का तार जमा था, कुछ लोग कहते हैं कि जिस काम को लार्ड कर्जन पकड़ते हैं, पूरा करके छोड़ते हैं। दिल्ली-दरबार में कुछ बातों की कसर रह गयी थी। उदयपुर के महाराणा न तो हाथियों के जुलूस में साथ चल सके, न दरबार में हाजिर होकर सालामी देने का मौका उनको मिला। इसी प्रकार बड़ौदा-नरेश हाथियों के जुलूस में शामिन न थे। वह दरबार में भी आये, तो बड़ी सीधी-सादी पोशाक में- इतनी सीधी-साधीमें, जितनी से आज कलकत्ते में फिरते हैं। वह ऐसा तुमतराक और ठाठबाटका समय था कि स्वयं श्रीमान् वैसराय को पतलून तक कारचोबी पहनना और राजा-महाराजाओं को काठकी तथा ड्यूक आफ कनाट को चांदी की कुरसी पर बिठाकर स्वयं सोने के सिंहासन पर बैठना पड़ा था। उस मौके पर बड़ौदा-नरेश का इतनी सफाई और सादगी से निकल जाना, एक नयी आन थी। इसके सिवा उन्होंने झुक के सलाम नहीं किया, बड़ी सादगी से हाथ मिलाकर चल दिये थे। यह कई एक कसरें ऐसी हैं, जिनको मिटाने को फिर दरबार हो सकता है। फिर हाथियों का जुलूस निकल सकता है। 

इन लोगों के विचार में कलाम नहीं। पर समय कम है, काम बहुत होंगे। इसके सिवा कई राजा-महाराजा पहले दरबार ही में खर्च से इतने दब चुके हैं कि श्रीमान् लार्ड कर्जन के बाद यदि दो वैसराय और आवें और पांच-पांच की जगह सात-सात साल तक शासन करें, तब तक भी उनका सिर उठाना कठिन है। इससे दरबार या हाथियों के जुलूस की फिर आशा रखना व्यर्थ है। पर सुना है कि अबके विद्या का उद्धार श्रीमान् जरूर करेंगे। उपकार का बदला देना महत् पुरुषों का काम है। विद्या ने आपको धनी किया है, इससे आप विद्या को धनी किया चाहते हैं। इसीसे कंगालों से छीनकर आप धनियों को विद्या देना चाहते हैं। इससे विद्या का वह कष्ट मिट जावेगा, जो उसे कंगालको धनी बनाने में होता है। नींव पड़ चुकी है, नमूना कायम होने में देर नहीं। अब तक गरीब पढ़ते थे, इससे धनियों की निन्दा होती थी कि वह पढ़ते नहीं। अब गरीब न पढ़ सकेंगे, इससे धनी पढ़ें या न पढ़ें, उनकी निन्दा न होगी। इस तरह लार्ड कर्जन की कृपा उन्हें बेपढ़े भी शिक्षित कर देगी।

और कई काम हैं, कई कमीशनों के कामका फैसिला करना है, कितनी ही मिशनों की कारवाई का नतीजा देखना है। काबुल है, काशमीर है। काबुल में रेल चल सकती है। काशमीर में अंगरेजी बस्ती बस सकती है। चायके प्रचार की भांति मोटरगाड़ी के प्रचार की इस देशमें बहुत जरूरत है। बंगाल देश का पार्टीशन भी एक बहुत जरूरी काम है। सबसे जरूरी काम विक्टोरिया-मिमोरियल हाल है। सन् 1858 ई. की घोषणा को अब भारतवासियों को अधिक स्मरण रखने की जरूरत न पड़ेगी। श्रीमान् स्मृति मन्दिर बनवाकर स्वर्गीया महारानी विक्टोरिया का ऐसा स्मारक बनवा देंगे, जिसको देखते ही लोग जान जावेंगे कि महारानी वह थी, जिनका यह स्मारक है!

बहुत बातें हैं। सबको भारतवासी अपने छोटे दिमागों में नहीं ला सकते। कौन जानता है कि श्रीमान् लार्ड कर्जन के दिमाग में कैसे-कैसे आली खयाल भरे हुए हैं। आपने स्वयं फरमाया था कि बहुत बातों में हिन्दुस्थानी अंगरेजों का मुकाबला नहीं कर सकते। फिर लार्ड कर्जन तो इंग्लैण्ड के रत्न हैं। उनके दिमाग की बराबरी करने की गुस्ताखी करने की यहां के लोगों को यह बूढ़ा भंगड़ कभी सलाह नहीं दे सकता। श्रीमान् कैसे आली दिमाग शासक हैं, यह बात उनके उन लगातार कई व्याख्यानों से टपकी पड़ती है, जो श्रीमान् ने विलायत में दिये थे और जिनमें विलायतवासियों को यह समझाने की चेष्टा की थी कि हिन्दुस्थान क्या वस्तु है। आपने साफ दिखा दिया था कि विलायतवासी यह नहीं समझ सकते कि हिन्दुस्तान क्या है। हिन्दुस्थान को श्रीमान् स्वयं ही समझते हैं। समझते तो क्या समझते? विलायतमें उतना बड़ा हाथी कहां, जिसपर वह चंवर-छत्र लगाकर चढ़े थे? फिर कैसे समझा सकते कि वह किस उच्च श्रेणी के शासक हैं। यदि कोई ऐसा उपाय निकल सकता, जिसमें वह एक बार भारत को विलायत में खींच ले जा सकते, तो विलायत वालों को समझा सकते कि भारत क्या है? और श्रीमान् का शासन क्या? आश्चर्य नहीं, भविष्य में ऐसा कुछ उपाय निकल आवे, क्योंकि विज्ञान अभी बहुत कुछ करेगा।

भारतवासी जरा भय न करें, उन्हें लार्ड कर्जन के शासन में कुछ करना न पड़ेगा। आनन्द-ही-आनन्द है। चैन से भंग पियो और मौजें उड़ाओ। नजीर खूब कह गया है:—

कूंडीके नकारे पे खुतकेका लगा डंका।

नित भंग पीके प्यारे दिन-रात बजा डंका॥

पर एक प्याला इस बूढ़े ब्राह्मण को देना भूल न जाना।

भारतमित्र 26 नवम्बर सन् 1904

जय हिंद

इस पाठ का शेष अंश भाग-2 में ……….

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