बालमुकुंद गुप्त – शिवशंभू के चिट्ठे (निबंध) भाग-2

इस पाठ का प्रथम अंश भाग-1 में दिया गया है –

3. वैसराय का कर्त्तव्य

माई लार्ड! आपने इस देश में फिर पदार्पण किया, इससे यह भूमि कृतार्थ हुई। विद्वान, बुद्धिमान और विचार शील पुरुषों के चरण जिस भूमि पर पड़ते हैं, वह तीर्थ बन जाती है। आपमें उक्त तीन गुणों के सिवा चौथा गुण राजशक्ति का है। अत: आपके श्रीचरण-स्पर्श से भारतभूमि तीर्थ से भी कुछ बढ़कर बन गई। आप गत मंगलवार को फिरसे भारत के राजसिंहासन पर सम्राट के प्रतिनिधि बनकर विराजमान हुए। भगवान आपका मंगल करे और इस पतित देश के मंगल की इच्छा आपके हृदय में उत्पन्न करे।

बम्बई में पाँव रखते ही आपने अपने मन की कुछ बातें कह डाली हैं। यद्यपि बम्बई की म्यूनिसिपलिटी ने वह बातें सुनने की इच्छा अपने अभिनन्दन-पत्र में प्रकाशित नहीं की थी, तथापि आपने बेपूछे ही कह डालीं। ठीक उसी प्रकार बिना बुलाये यह दीन भंगड़ ब्राह्मण शिवशम्भु  शर्मा तीसरी बार अपना चिट्ठा लेकर आपकी सेवा में उपस्थित है। इसे भी प्रजा का प्रतिनिधि होने का दावा है। इसीसे यह राज-प्रतिनिधि के सम्मुख प्रजा का कच्चा चिट्ठा सुनाने आया है। आप सुनिये न सुनिये, यह सुनाकर ही जावेगा।

अवश्य ही इस देश की प्रजा ने इस दीन ब्राह्मण को अपनी सभा में बुलाकर कभी अपने प्रतिनिधि होने का टीका नहीं दिया और न कोई पट्टा ही लिख दिया है। आप जैसे बाजाबता राजप्रतिनिधि हैं, वैसा बाजाबता शिवशम्भु प्रजा का प्रतिनिधि नहीं है। आपको सम्राट ने बुलाकर अपना वैसराय फिर से बनाया। विलायती गजट में खबर निकली। वही खबर तार द्वारा भारत में पहुँची। मार्ग में जगह-जगह स्वागत हुआ। बम्बई में स्वागत हुआ। कलकत्ते में कई बार गजट हुआ। रेल से उतरे और राजसिंहासन पर बैठते समय दो बार सलामी की तोपें सर हुईं। कितने ही राजा नवाब बेगम आपके दर्शनार्थ बम्बई पहुँचे। बाजे बजते रहे, फौजें सलामी देती रहीं। ऐसी एक भी सनद प्रजा-प्रतिनिधि होने की शिवशम्भु के पास नहीं है। तथापि वह इस देश की प्रजा का, यहाँ के चिथड़ा पोश कंगालों का प्रतिनिधि होने का दावा रखता है। क्योंकि उसने इस भूमि में जन्म लिया है। उसका शरीर भारत की मिट्टी से बना है और उसी मिट्टी में अपने शरीर की मिट्टी को एक दिन मिला देने का इरादा रखता है। बचपन में इसी देश की धूल में लोटकर बड़ा हुआ, इसी भूमि के अन्न-जल से उसकी प्राण-रक्षा होती है। इसी भूमि से कुछ आनन्द हासिल करने को उसे भंग की चन्द पत्तियाँ मिल जाती हैं। गाँव में उसका कोई झोंपड़ा नहीं है। इस पर भूमि को छोड़कर उसका संसार में कहीं ठिकाना भी नहीं है। इस भूमि पर उसका जरा स्वत्व न होनेपर भी इसे वह अपनी समझता है।

शिवशम्भु को कोई नहीं जानता। जो जानते हैं, वह संसार में एकदम अनजान हैं! उन्हें कोई जानकर भी जानना नहीं चाहता। जानने की चीज शिवशम्भु के पास कुछ नहीं है। उसके कोई उपाधि नहीं, राज-दरबार में उसकी पूछ नहीं। हाकिम से हाथ मिलाने की उसकी हैसियत नहीं। उनकी हां में हां मिलने की उसे ताब नहीं। वह एक कपर्दक शून्य घमण्डी ब्राह्मण है। हे राजप्रतिनिधि! क्या उसकी दो-चार बातें सुनियेगा?

आपने बम्बई में कहा है कि भारत भूमि को मैं किस्सा-कहानी की भूमि नहीं, कर्त्तव्य भूमि समझता हूँ। उसी कर्त्तव्य के पालन के लिये आपको ऐसे कठिन समय में भी दूसरी बार भारत में आना पड़ा। माई लार्ड! इस कर्त्तव्य भूमि को हम लोग कर्म्म भूमि कहते हैं। आप कर्त्तव्य पालन करने आये हैं और हम कर्म्मों का भोग भोगने। आपके कर्त्तव्य पालन की अवधि है, हमारे कर्म्म भोगने की अवधि नहीं। आप कर्त्तव्य-पालन करके कुछ दिन पीछे चले आवेंगे। हमें कर्म्म के भोग भोगते-भोगते यहीं समाप्त होना होगा और न जाने फिर भी कब तक वह भोग समाप्त होगा। जब थोड़े दिन के लिये आपका इस भूमि से स्नेह है, तो हम लोगों का कितना भारी स्नेह होना चाहिये, यह अनुमान कीजिये; क्योंकि हमारा इस भूमि से जीने-मरने का साथ है।

माई लार्ड! यद्यपि आपको इस बात का बड़ा अभिमान है कि अंग्रेजों में आपकी भांति भारतवर्ष के विषय में शासन-नीति समझने वाला और शासन करनेवाला कोई नहीं है। यह बात विलायत में भी आपने कई बार हेर-फेर लगाकर कही और इस बार बम्बई में उतरते ही फिर कही। आप इस देश में रहकर 72 महीने तक जिन बातों की नींव डालते रहे, अब उन्हें 24 मास या उससे कम में पूरा कर जाना चाहते हैं। सरहदों पर फौलादी दीवार बना देना चाहते हैं, जिससे इस देश की भूमि को कोई बाहरी शत्रु उठाकर अपने घर में न ले जावे! अथवा जो शान्ति आपके कथनानुसार धीरे-धीरे यहाँ संचित हुई है, उसे इतना पक्काकर देना चाहते हैं कि आपके बाद जो वैसराय आपके राजसिंहासन पर बैठे, उसे शौकीनी और खेल तमाशे के सिवा दिन में और नाच बाल या निद्रा के सिवा और रात को कुछ करना न पड़ेगा। पर सच जानिये कि आपने इस देश को कुछ नहीं समझा। खाली समझने की शेखी में रहे और आशा नहीं कि इन अगले कई महीनों में भी कुछ समझें। किन्तु इस देश में आपको खूब समझ लिया और अधिक समझने की जरूरत नहीं रही। यद्यपि आप कहते हैं कि यह कहानी का देश नहीं, कर्त्तव्य का देश है, तथापि यहाँ की प्रजा ने समझ लिया है, कि आपका कर्त्तव्य ही कहानी है। एक बड़ा सुन्दर मेल हुआ था अर्थात् आप बड़े घमण्डी शासक हैं और यहाँ  की प्रजा के लोग भी बड़े भारी घमण्डी। पर कठिनाई इस बात की है कि दोनों का घमण्ड दो तरह का है। आपको जिन बातों का घमण्ड है, उन पर यहाँ के लोग हंस पड़ते हैं; यहाँ के लोगों को जो घमण्ड है, उसे आप समझते नहीं और शायद समझेंगे भी नहीं।

जिन आडम्बरों को करके आप अपने मन में बहुत प्रसन्न होते हैं कि बड़ा कर्तव्यपालन किया, वह इस देश की प्रजा की दृष्टि में कुछ भी नहीं है। वह इतने आडम्बर देख-सुन चुकी और कल्पना कर चुकी है कि और किसी आडम्बर का असर उस पर नहीं हो सकता। आप सरहद को लोहे की दीवार से मजबूत करते हैं। यहाँ की प्रजा ने पढ़ा है कि एक राजा ने पृथिवी को काबू में करके स्वर्ग में सीढ़ी लगानी चाही थी। आप और लार्ड किचनर मिलकर जो फौलादी दीवार बनाते हैं, उससे बहुत मजबूत एक लार्ड कैनिंग बना गये थे। आपने भी बम्बई की स्पीच में कैनिंग का नाम लिया है। आज 49 साल हो गये, वह दीवार अटल-अचल खड़ी हुई है। वह स्वर्गीया महारानी का घोषणापत्र है, जो एक नवम्बर 1858 ई. को कैनिंग महोदय ने सुनाया था। वही भारतवर्ष के लिए फौलादी दीवार है। वही दीवार भारत की रक्षा करती है। उसी दीवार को भारतवासी अपना रक्षक समझते हैं। उस दीवार के होते आपके या लार्ड किचनर के कोई दीवार बनाने की जरूरत नहीं है। उसकी आड़ में आप जी चाहे जितनी मजबूत दीवारों की कल्पना कर सकते हैं।

आडम्बर से इस देश का शासन नहीं हो सकता। आडम्बर का आदर इस देश की कंगाल प्रजा नहीं कर सकती। आपने अपनी समझ में बहुत कुछ किया; पर फल यह हुआ कि विलायत जाकर वह सब अपने ही मुँह से सुनाना पड़ा। कारण यह है कि करने से अधिक कहने का आपका स्वभाव है। इससे आपका करना भी कहे बिना प्रकाशित नहीं होता। यहाँ  की अधिक प्रजा ऐसी है, जो अब तक भी नहीं जानती कि आप यहाँ  के वैसराय और राजप्रतिनिधि हैं और एक बार विलायत जाकर फिर से भारत में आये हैं। आपने गरीब प्रजा की ओर न कभी दृष्टि खोलकर देखा, न गरीबों ने आपको जाना। अब भी आपकी बातों से आपकी वह चेष्टा नहीं पाई जाती। इससे स्मरण रहे कि जब अपने पद को त्याग कर आप फिर स्वदेश में जावेंगे, तो चाहे आपको अपने कितने ही गुण-कीर्तन करने का अवसर मिले, यह तो भी न कह सकेंगे कि कभी भारत की प्रजाका मन भी अपने हाथ में किया था!

यह वह देश है, जहाँ की प्रजा एक दिन पहले रामचन्द्र के राजतिलक पाने के आनन्द में मस्त थी और अगले दिन अचानक रामचन्द्र बन को चले, तो रोती-रोती उनके पीछे जाती थी। भरत को उस प्रजा का मन प्रसन्न करने के लिये कोई भारी दरबार नहीं करना पड़ा, हाथियों का जुलूस नहीं निकालना पड़ा, वरञ्च दौड़कर वन में जाना पड़ा और रामचन्द्र को फिर अयोध्या में लाने का यत्न करना पड़ा। जब वह न आये, तो उनकी खड़ाऊं को सिरपर धरकर अयोध्या तक आये और खड़ाऊंओं को राजसिंहासन पर रखकर स्वयं चौदह साल तक बल्कल धारण करके उनकी सेवा करते रहे। तब प्रजा ने समझा कि भरत अयोध्या का शासन करने योग्य हैं।

माई लार्ड! आप वक्तृता देने में बड़े दक्ष हैं। पर यहाँ वक्तृता का कुछ और ही वजन है। सत्यवादी युधिष्ठिर के मुख से जो निकल जाता, वही होता था। आयु भर में उसने एक बार बहुत भारी पोलिटिकल जरूरत पड़ने से कुछ सहज-सा झूठ बोलने की चेष्टा की थी। वही बात महाभारत में लिखी हुई है। जब तक महाभारत है, वह बात भी रहेगी। एक बार अपनी वक्त्तृताओं से इस विषय को मिलाइये और फिर विचारिये कि इस देश की प्रजा के साथ आप किस प्रकार अपना कर्त्तव्य पालन करेंगे। साथ ही इस समय इस अधेड़ भंगड़ ब्राह्मण को अपनी भाँग-बूटी की फिकर करने की आज्ञा दीजिये। ‘भारतमित्र’, 17 दिसम्बर सन् 1904

4. पीछे मत फेंकिये

माई लार्ड! सौ साल पूरे होने में कई महीनों की कसर है। उस समय ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने लार्ड कार्नवालिस को दूसरी बार इस देश का गवर्नर-जनरल बनाकर भेजा था। तब से अब तक आप ही को भारतवर्ष का फिर से शासक बनकर आने का अवसर मिला है। सौ वर्ष पहले के उस समय की ओर एक बार दृष्टि कीजिये! तबमें और अबमें कितना अन्तर हो गया है, क्या से क्या हो गया है। जागता हुआ रंक अति चिन्ता का मारा सो जावे और स्वप्न में अपने को राजा देखे, द्वार पर हाथी झूमते देखे अथवा अलिफलैला के अबुलहसन की भांति कोई तरुण युवक प्याले पर उड़ाता घर में बेहोश हो और जागने पर आँखें मलते-मलते अपने को बगदाद का खलीफा देखे, आलीसान सजे महल की शोभा उसे चक्कर में डाल दे, सुन्दरी दासियों के जेवर और कामदार वस्त्रों की चमक उसकी आँखों में चकाचौंध लगा दे तथा सुन्दर बाजों और गीतों की मधुर ध्वनि उसके कानों में अमृत ढालने लगे- तब भी उसे शायद आश्चर्य न हो, जितना सौ साल पहले के भारत में अंगरेजी राज्य की दशा को आजकल की दशा के साथ मिलाने से हो सकता है।

जुलाई सन् 1805 ई. लार्ड कार्नवालिस दूसरी बार भारत के गवर्नर-जनरल होकर कलकत्ते में पधारे थे। उस समय ईस्ट इण्डिया कम्पनी की सरकार पर चारों ओर से चिन्ताओं की भरमार हो रही थी, आशंकाएँ  उसे दम नहीं लेने देती थीं। हुलकर से एक नई लड़ाई होने को थी। सेंधिया से लड़ाई चलती थी। खजाने में बरकत-ही-बरकत थी। जमीन का कर वसूल होने में बहुत देर थी। युद्ध स्थल में लड़नेवाली सेनाओं को पाँच-पाँच महीने से तनख्वाह नहीं मिली थी। विलायत के धनियों में कम्पनी का कुछ विश्वास न था। सत्तर साल का बूढ़ा गवर्नर-जनरल यह सब बातें देखकर घबराया हुआ था। उससे केवल यही बन पड़ा कि दूसरी बार पदारूढ़ होने के तीन ही मास पीछे गाजीपुर में जाकर प्राण दे दिया। कई दिन तक इस बात की खबर भी लोगों ने नहीं जानी। आज विलायत से भारत तक दिन में कई बार तार दौड़ जाता है। कई एक घण्टों में शिमले से कलकत्ते तक स्पेशल ट्रेन पार हो जाती है। उस समय कलकत्ते से गाजीपुर जाने में बड़े लाटको कितने ही दिन लगे थे। गाजीपुर में उनके लिये कलकत्ते से जल्द किसी प्रकार की सहायता पहुँचाने का कुछ उपाय न था।

किन्तु अब कुछ और ही समय है। माई लार्ड! लार्ड कार्नवालिस के दूसरी बार गवर्नर-जनरल होकर भारत में आने और आपके दूसरी बार आने में बड़ा अन्तर है। प्रताप आपके साथ-साथ है। अंगरेजी राज्य के भाग्य का सूर्य्य मध्याह्न में है। उस समय के बड़े लाट को जितने दिन कलकत्ते से गाजीपुर जाने में लगे होंगे, आप उनसे कम दिन में विलायत से भारत में पहुँच गये। लार्ड कार्नवालिस को आते ही दो-एक देशी रईसों के साथ लड़ाई करने की चिन्ता थी, आपके स्वागत के लिये कोड़ियों राजा-रईस बम्बई दौड़े गये और जहाज से उतरते ही उन्होंने आपका स्वागत करके अपने भाग्य को धन्य समझा। कितने ही बधाई देने कलकत्ते पहुँचे और कितने और चले आ रहे हैं। प्रजा की चाहे कैसी ही दशा हो, पर खजाने में रुपये उबले पड़ते हैं। इसके लिये चारों ओर से आपकी बड़ाई होती है। साख इस समय की गवर्नमेण्ट की इतनी है कि विलायत में या भारत में एक बार हुँ करते ही रुपये की वर्षा होने लगती है। विलायती मंत्री आपकी मुट्ठी में है। विलायत की जिस कन्सर्वेटिव गवर्नमेण्ट ने आपको इस देशका वैसराय किया, वह अभी तक बराबर शासन की मालिक है। लिबरल निर्जीव हैं। जान ब्राइट, ग्लाडस्टोन ब्राडला जैसे लोगों से विलायत शून्य है, इससे आप परम स्वतन्त्र हैं। इण्डिया आफिस आपके हाथ की पुतली है। विलायत के प्रधानमंत्री आपके प्रिय विशारदों में गिनती है। वरञ्च कह सकते हैं कि विलायत के मंत्री लोग आपके मुँह की ओर ताकते हैं। सम्राट का आप पर बहुत भारी विश्वास है। विलायत के प्रधान समाचार पत्र मानो आपके बन्दीजन हैं। बीच-बीच में आपका गुणगान सुनना पुण्य कार्य्य समझते हैं। सारांश यह कि लार्ड कार्नवालिस के समय और आपके समय में बड़ा ही भेद हो गया है।

संसार में अब अंगरेजी प्रताप अखण्ड है। भारत के राजा अब आपके हुक्म के बन्दे हैं। उनको लेकर चाहे जुलूस निकालिये, चाहे दरबार बनाकर सलाम कराइये, उन्हें चाहे विलायत भिजवाइये, चाहे कलकत्ते बुलवाइये, जो चाहे सो कीजिये, वह हाजिर हैं। आपके हुक्मकी तेजी तिब्बत के पहाड़ों की बरफ को पिघलाती है। फारिस की खाड़ी का जल सुखाती है, काबुल के पहाड़ों को नर्म करती है। जल, स्थल वायु और आकाशमण्डल में सर्वत्र आपकी विजय है। इस धराधाम में अब अंगरेजी प्रताप के आगे कोई उँगली उठानेवाला नहीं है। इस देश में एक महाप्रतापी राजा के प्रताप का वर्णन इस प्रकार किया जाता था कि इन्द्र उसके यहाँ जल भरता था, पवन उसके यहाँ चक्की चलाता था, चांद-सूरज उसके यहाँ रोशनी करते थे इत्यादि। पर अंगरेजी प्रताप उससे भी बढ़ गया था। समुद्र अंगरेजी राज्य का मल्लाह है, पहाड़ों की उपत्यकाएँ बैठने के लिये कुर्सी-मूढ़े। बिजली कलें चलानेवाली दासी और हजारों मील खबर लेकर उड़नेवाली दूती। इत्यादि-इत्यादि।

आश्चर्य्य है माई लार्ड! एक सौ साल में अंगरेजी राज्य और अंगरेजी प्रताप की तो इतनी उन्नति हो; पर उसी प्रतापी ब्रिटिश राज्य के अधीन रहकर भारत अपनी रही-सही हैसियत भी खो दे! इस अपार उन्नति के समय में आप जैसे शासक के जीमें भारतवासियों को आगे बढ़ाने की जगह पीछे धकेलने की इच्छा उत्पन्न हो! उनका हौसला बढ़ाने की जगह उनकी हिम्मत तोड़ने में आप अपनी बुद्धि का अपव्यन करें! जिस जाति से पुरानी कोई जाति इश धराधाम पर मौजूद नहीं, जो हजार साल से अधिक की घोर पराधीनता सहकर भी लुप्त नहीं हुई, जीती है, जिसकी पुरानी सभ्यता और विद्या की आलोचना करके विद्वान और बुद्धिमान लोग आज भी मुग्ध होते हैं, जिसने सदियों इस पृथ्वी पर अखण्ड शासन करके सभ्यता और मनुषत्व का प्रचार किया- वह जाति क्या पीछे हटाने और धूल में मिला देने के योग्य है आप जैसे उच्च श्रेणी के विद्वान के जीमें यह बात कैसे समाई कि भारतवासी बहुत से काम करने के योग्य नहीं और उनको आपके सजातीय ही कर सकते हैं? आप परीक्षा करके देखिये कि भारतवासी सचमुच उन ऊँचे से ऊँचे कामों को कर सकते हैं या नहीं, जिनको आपके सजातीय कर सकते हैं? श्रम में, बुद्धि में, विद्या में, काम में, वक्त्तृता में, सहिष्णुता में किसी बात में इस देश के निवासी संसार में किसी जाति के आदमियों से पीछे रहनेवाले नहीं हैं। वरंच दो-एक गुण भारतवासियों में ऐसे हैं कि संसार भर में किसी जाति के लोग उनका अनुकरण नहीं कर सकते। हिन्दुस्थानी फारसी पढ़ के ठीक फारिसवालों कि भाँति बोल सकते, कविता कर सकते हैं। अंगरेजी बोलने में वह अंगरेजों की पूरी नकल कर सकते हैं, कण्ठ-तालू को अंगरेजों के सदृश बना सकते हैं। पर एक भी अंगरेज ऐसा नहीं है, जो हिन्दुस्थानियों की भाँति साफ हिन्दी बोल सकता हो। किसी बात में हिन्दुस्थानी पीछे रहनेवाले नहीं हैं। हाँ, दो बातों में वह अंगरेजों की नकल या बराबरी नहीं कर सकते हैं। एक तो अपने शरीर के काले रंग को अंगरेजों की भाँति गोरा नहीं बना सकते और दूसरे अपने भाग्य को उनके भाग्य से रगड़कर बराबर नहीं कर सकते।

किन्तु इस संसार के आरम्भ में बड़ा भारी पार्थक्य होनेपर भी अन्त में बड़ी भारी एकता है। समय अन्त में सबको अपने मार्ग पर ले आता है। देशपति राजा और भिक्षा मांगकर पेट भरनेवाले कंगाल का परिणाम एक ही होता है। मिट्ठी मिट्टी में मिल जाती है और यह जीते जी लुभानेवाली दुनिया यहीं रह जाती है। कितने ही शासक और कितने ही नरेश इस पृथ्वी पर हो गये, आज उनका कहीं पता-निशान नहीं है। थोड़े-थोड़े दिन अपनी-अपनी नौबत बजा चले गये। बड़ी तलाश से इतिहास के पन्ने अथवा टूटे-फूटे खंडहरों में उनके दो-चार चिह्न मिल जाते हैं। माई लार्ड! बीते हुए समय को फिर लौटा लेने की शक्ति किसी में नहीं है, आपमें भी नहीं है। दूरकी बात दूर रहे, इन पिछले सौ साल ही में कितने बड़े लाट आये और चले गये। क्या उनका समय फिर लौट सकता है? कदापि नहीं। विचारिये तो मानों कल आप आये थे, किन्तु छः साल बीत गये। अब दूसरी बार आने के बाद भी कितने ही दिन बीत गये तथा और बीते जाते हैं। इसी प्रकार उमरें बीत जावेंगे। युग बीत जावेंगे। समय के महासमुद्र में मनुष्य की आयु एक छोटी-सी बूंद की भी बराबरी नहीं कर सकती। आपमें शक्ति नहीं है कि पिछले छ: वर्षों को लौटा सकें, या उनमें जो कुछ हुआ है, उसे अन्यथा कर सकें। दो साल आपके हाथ में अवश्य हैं। इनमें जो चाहें कर सकते हैं। चाहें तो इस देश की 30 करोड़ प्रजा को अपना अनुरक्त बना सकते हैं और इस देश के इतिहास में अच्छे वैसरायों में अपना नाम छोड़ जा सकते हैं। नहीं यह समय भी बीत जावेगा और फिर आपका करने धरने का अधिकार ही कुछ न रहेगा।

विक्रम, अशोक, अकबर के यह भूमि साथ नहीं गई। औरंगजेब अलाउद्दीन इसे मुट्ठी में दबा कर नहीं रख सके। महमूद, तैमूर और नादिर इसे लूट के माल के साथ ऊँटों सौर हाथियों पर लादकर न ले जा सके। आगे भी यह किसी के साथ न जावेगी, चाहे कोई कितनी ही मजबूती क्यों न करे। इस समय भगवान ने इसे एक और ही जाति के हाथ में अर्पण किया है, जिसकी बुद्धि, विद्या और प्रताप का संसार भर में डंका बज रहा है। माई लार्ड! उसी जाति की ओर से आप इस देश की 30 करोड़ प्रजा के शासक हैं।

अब यह विचारना आप ही के जिम्मे है कि इस देश की प्रजा के साथ आपका क्या कर्त्तव्य है। हजार साल से यह प्रजा गिरी दशा में है। क्या आप चाहते हैं कि यह और भी सौ-पचास साल गिरती चली जावे? इसके गिराने में बड़े से बड़ा इतना ही लाभ है कि कुछ संकीर्ण हृदय शासकों की यथेच्छा चरिता कुछ दिन और चल सकती हैं; किन्तु इसके उठाने और सम्हालने में जो लाभ है, उसकी तुलना नहीं हो सकती है। इतिहास में सदा नाम रहेगा कि अंगरेजों ने एक गिरी जाति के तीस करोड़ आदमियों को उठाया था। माई लार्ड! दोनों में जो बात पसन्द हो, वह कर सकते हैं। कहिये क्या पसन्द है? पीछे हटाना या आगे बढ़ाना?

‘भारतमित्र’, 21 जनवरी सन् 1904

इस पाठ का शेष अंश भाग-3 में………

जय हिंद

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