बालमुकुंद गुप्त – ‘शिवशंभू के चिट्ठे’ (निबंध) भाग-3

इस पाठ का पूर्व अंश भाग-1 और भाग-2 में दिया गया है, कृपया इस भाग-3 को देखने से पहले, इसके पहले भाग-1 और भाग-2 को अवश्य देख लें जिससे कि विषय की निरंतरता बनी रहे –

5. आशा का अन्त!

माई लार्ड! अब के आपके भाषण ने नशा किरकिरा कर दिया। संसार के सब दुःखों और समस्त चिन्ताओं को जो शिवशम्भु शर्मा दो चुल्लू बूटी पीकर भूला देता था। आज उसका उस प्यारी विजया पर भी मन नहीं है। आशा से बँधा हुआ यह संसार चलता है। रोगी को रोग से, कैदी को कैद से, ऋणी को ऋण से, कंगाल को दरिद्रता से, इसी प्रकार हरेक क्लेशित पुरुष को एक दिन अपने क्लेश से मुक्त होने की आशा होती है। चाहे उसे इस जीवन में क्लेश से मुक्ति न मिले, पर आशा के सहारे इतना होता है कि वह धीरे-धीरे अपने क्लेशों को झेलता हुआ एक दिन इस क्लेशमय जीवन से तो मुक्त हो जाता है। पर हाय! जब उसकी यह आशा भी भंग हो जाय, उस समय उसके कष्ट का क्या ठिकाना!

“किस्मत पे उस मुसाफिरे खस्ता के रोइये।
    जो थक गया हो बैठ के मंजिल के सामने।”

बड़े लाट होकर आपके भारत में पदार्पण करने के समय इस देश के लोग श्रीमान् से जो-जो आशाएँ करते और सुख-स्वप्न देखते थे, वह सब उड़न् छू हो गये। इस कलकत्ता महानगरी के समाचार-पत्र कुछ दिन चौंक-चौंक पड़ते थे कि आज बड़े लाट अमुक मोड़ पर वेश बदले एक गरीब काले आदमी से बातें कर रहे थे। परसों अमुक आफिस में जाकर काम की चक्की में पिसते हुए क्लर्कों की दशा देख रहे थे, और उनसे कितनी ही बातें पूछते जाते थे। इससे हिन्दू समझने लगे कि फिर से विक्रमादित्य का आविर्भाव हुआ या अकबर का अमल हो गया। मुसलमान खयाल करने लगे कि खलीफा हारूंरशीद का जमाना आ गया। पारसियों ने आपको नौशीरवाँ समझने की मोहलत पाई थी या नहीं, ठीक नहीं कहा जा सकता। क्योंकि श्रीमान् ने जल्द अपने कामों से ऐसे जल्दबाज लोगों के कष्ट कल्पना करने के कष्ट से मुक्त कर दिया था। वह लोग थोड़े ही दिनों में इस बात के समझने के योग्य हो गये थे कि हमारा प्रधान शासक न विक्रम के रंगढंग का है, न हारूं या अकबर के, उसका रंग ही निराला है! किसी से नहीं मिलता!

माई लार्ड! इस देश की दो चीजों में अजब तासीर है। एक यहाँ जलवायु की और दूसरे यहाँ के नामक की, जो उसी जलवायु से उत्पन्न होता है। नीरस से नीरस शरीर में यहाँ का जलवायु नमकीनी ला देता है। मजा यह कि उसे नमकीनी की खबर तक नहीं होती। एक फारिस का कवि कहता है कि हिन्दुस्थान में एक हरी पत्ती तक बेनमक नहीं है, मानो यह देश नमक से सींचा गया है। किन्तु शिवशम्भु शर्मा का विचार इस कवि से भी कुछ आगे है। वह समझता है कि यह देश नमक की एक महाखानि है, इसमें जो पड़ गया, वही नमक बन गया। श्रीमान् कभी चाहें तो सांभर झील के तटपर खड़े होकर देख सकते हैं। जो कुछ उसमें गिर जाता, वही नमक बन जाता है। यहाँ के जलवायु से अलग खड़े होकर कितनों ही ने बड़ी-बड़ी अटकलें और लम्बे-चौड़े मनसूबे बाँधे,  पर यहाँ के जलवायु का असर होते ही वह सब काफूर हो गये।

अफसोस माई लार्ड! यहाँ के जलवायु की तासीर ने आपमें अपनी पिछली दशा के स्मरण रखने की शक्ति नहीं रहने दी। नहीं तो अपनी छ: साल पहले की दशा से अबकी दशा का मिलान करके चकित होते। घबरा के कहते कि ऐं! मैं क्या हो गया? क्या मैं वही हूँ, जो विलायत से भारत की ओर चलने से पहले था? बम्बई में जहाज से उतर कर भूमि पर पाँव रखते ही यहाँ के जलवायु का प्रभाव आप पर आरम्भ हो गया था। उसके प्रथम फलस्वरूप कलकत्ते में पदार्पण करते ही आपने यहाँ के म्यूनिसिपल कार्पोरेशन की स्वाधीनता की समाप्ति की। जब वह प्रभाव कुछ और बढ़ा, तो अकाल पीड़ितों की सहायता करते समय आपकी समझ में आने लगा कि इस देश के कितने ही अभागे सचमुच अभागे नहीं, वरञ्च अच्छी मजदूरी के लालच से जबरदस्ती अकाल पीड़ितों में मिलकर दयालु सरकार को हैरान करते हैं! इससे मजदूरी कड़ी की गई।

इसी प्रकार जब प्रभाव तेज हुआ, तो आपने अकाल की तरफ से आँखों पर पट्टी बाँधकर दिल्ली-दरबार किया। अन्त को गत वर्ष आपने यह भी साफ कह दिया कि बहुत से पद ऐसे हैं, जिनके पैदाइशी तौर से अंगरेज ही पाने के योग्य हैं। भारतवासियों को सरकार जो देती है, वह भी उनकी हैसियत से बढ़कर है। तब इस देश के लोगों ने समझ लिया था कि अब श्रीमान् पर यहाँ के जलवायु का पूरा सिक्का जम गया। उसी समय आपको स्वदेश-दर्शन की लालसा हुई। लोग समझे, चलो, अच्छा हुआ, जो हो चुका, वह हो चुका, आगे को तासीर की अधिक उन्नति से पीछा छूटा। किन्तु आप कुछ न समझे। कोरिया में जब श्रीमान् की आयु अचानक सात साल बढ़कर चालीस हो गयी, उस समय भी श्रीमान् की समझ में आ गया था कि वहाँ की सुन्दर आब हवा के प्रताप से आप चालीस साल के होने पर भी बत्तीस-तैंतीस के दिखाई देते हैं। पर इस देश की आब हवा की तासीर आपके कुछ समझ में न आई। वह विलायत में भी श्रीमान् के साथ लगी गई, और जब तक वहाँ रहे, अपना जोर दिखाती रही। यहाँ तक कि फिर आपको एक बार इस देश में उठा लाई, किसी विध्न-बाधा की परवा न की।

माई लार्ड! इस देश का नमक यहाँ के जलवायु का साथ देता है; क्योंकि उसी जलवायु से उसका जन्म है। उसकी तासीर भी साथ-साथ होती रही। वह पहले विचार-बुद्धि खोता है। पीछे दया और सहृदयाता को भगाता है और उदारता को हजम कर जाता है। अन्त को आँखों पर पट्टी बाँधकर, कानों में ठीठे ठोककर, नाक में नकेल डालकर आदमी को जिधर-तिधर घसीटे फिरता है और उसके मुँह से खुल्लम-खुल्ला इस देश की निन्दा कराता है। आदमी के मन में वह यही जमा देता है कि जहाँ का खाना, वहाँ की खूब निन्दा करना और अपनी शेखी मारते जाना। हम लोग भी उस नमक की तासीर से बेअसर नहीं हैं। पर हमारी हड्डियाँ उसीसे बनी हैं, इस कारण हमें इतना ज्ञान रहता है कि हमारे देश के नामक की क्या तासीर है। हम लोग खूब जानते थे कि यदि श्रीमान् कहीं दूसरी बार भारत में आ गये, तो एकदम नमक की खान में जाकर नमक हो जावेंगे। इसीसे चाहते थे कि दोबारा आप न आवें। पर हमारी पेश न गई। आप आये और आते ही उस नमक की तासीर का फल अपने कौंसिल और कानवोकेशन में प्रकट कर डाला!

इतने दिन आप सरकारी भेदों के जानने से, अच्छे पद पाने से, उन्नति की बातें सोचने से, सुगमता के शिक्षा लाभ करने से, अपने स्वत्वों के लिये पार्लामेण्ट आदि में पुकारने से इस देश के लोगों को रोकते रहे। आपकी शक्ति में जो-कुछ था, वह करते रहे। पर उसपर भी सन्तोष न हुआ, भगवान की शक्ति पर भी हाथ चलाने लगे! जो सत्यप्रियता इस देश को सृष्टि के आदि से मिली है, जिस देश का ईश्वर “सत्यंज्ञान-मनन्तंब्रह्म” है, वहाँ के लोगों को सभा में बुला के ज्ञानी और विद्वान का चोला पहनकर उनके मुँह पर झूठा और मक्कार कहने लगे। विचारिये तो यह कैसे अधःपतन की बात है? जिस स्वदेश को श्रीमान् ने आदर्श सत्य का देश और वहाँ के लोगों को सत्यवादी कहा है, उसका आला नमूना क्या श्रीमान् ही हैं? यदि सचमुच विलायत वैसा ही देश हो, जैसा आप फरमाते हैं और भारत भी आपके कथनानुसार मिथ्या वादी और धूर्त देश हो, तोभी तो क्या कोई इस प्रकार कहता है? गिरे को ठोकर मारना क्या सज्जन और सत्यवादी का काम है? अपनी सत्यवादिता प्रकाश करने के लिये दूसरे को मिथ्यावादी कहना ही क्या सत्यवादिता का सबूत है?

माई लार्ड! जब आपने शासक होने के विचार को भूलकर इस देश की प्रजा के हृदय में चोट पहुँचाई है, तो दो-एक बातें पूछ लेने में शायद कुछ गुस्ताखी न होगी। सुनिये, विजित और विजेता में बड़ा अन्तर है। जो भारतवर्ष हजार साल से विदेशीय विजेताओं के पाँवों में लोट रहा है, क्या उसकी प्रजा की सत्यप्रियता विजेता इंग्लैण्ड के लोगों की सत्यप्रियता का मुकाबिला कर सकती है? यह देश भी यदि विलायत की भाँति स्वाधीन होता और यहाँ के लोग ही यहाँ के राजा होते, तब यदि अपने देश के लोगों को यहाँ के लोगों से अधिक सच्चा साबित कर सकते तो आपकी अवश्य कुछ बहादुरी होती। स्मरण करिये, उन दिनों को कि जब अंगरेजों के देश पर विदेशियों का अधिकार था। उस समय आपके स्वदेशियों की नैतिक दशा कैसी थी, उसका विचार तो कीजिये। यह वह देश है कि हजार साल पराये पाँव के नीचे रहकर भी एकदम सत्यता से च्युत नहीं हुआ है। यदि आपका यूरोप या इंग्लैण्ड दस साल भी पराधीन हो जावे, तो आपको मालूम पड़े कि श्रीमान् के स्वदेशीय कैसे सत्यवादी और नीति परायण हैं। जो देश कर्मवादी है, वह क्या कभी असत्यवादी हो सकता है? आपके स्वदेशीय यहाँ बड़ी-बड़ी इमारतों में रहते हैं। जैसी रुचि हो, वैसे पदार्थ भोग सकते हैं। भारत आपके लिये भोग्य भूमि है। किन्तु इस देश के लाखों आदमी इसी देश में पैदा होकर आवारा कुत्तों की भाँति भटक-भटककर मरते हैं। उनको दो हाथ भूमि बैठने को नहीं, पेट भरकर खाने को नहीं, मैले चिथड़े पहनकर उमरें बिता देते हैं और एक दिन कहीं पड़कर चुपचाप प्राण दे देते हैं। हालकी इस सर्दी में कितनों ही के प्राण जहाँ-तहाँ निकल गये। इस प्रकार क्लेश पाकर मरने पर भी क्या कभी वह लोग यह कहते हैं कि पापी राजा है, इससे हमारी यह दुर्गति है? माई लार्ड! वह कर्मवादी हैं। वह यही समझते हैं कि किसी का कुछ दोष नहीं है, सब हमारे पूर्व कर्मों का दोष है! हाय! हाय! ऐसी प्रजा को आप धूर्त कहते हैं!

कभी इस देश में आकर आपने गरीबों की ओर ध्यान न दिया। कभी यहाँ की दीन भूखी प्रजा की दशा का विचार न किया। कभी दस मीठे शब्द सुनाकर यहाँ के लोगों को उत्साहित नहीं किया- फिर विचारिये तो गालियाँ यहाँ के लोगों को आपने किस कृपा के बदले में दीं? पराधीनता की सबके जी में बड़ी भारी चोट होती है। पर महारानी विक्टोरिया के सदय बर्ताव ने यहाँ के लोगों के जी से वह दुःख भुला दिया था। इस देश के लोग सदा उनको माता-तुल्य समझते रहे। अब उनके पुत्र महाराजा एडवर्ड पर भी इस देश के लोगों की वैसी ही भक्ति है। किन्तु आप उन्हीं सम्राट एडवर्ड के प्रतिनिधि होकर इस देश की प्रजा के अत्यन्त अप्रिय बने हैं। यह इस देश के बड़े ही दुर्भाग्य की बात है! माई लार्ड! इस देश की प्रजा को आप नहीं चाहते और वह प्रजा आप को नहीं चाहती, फिर भी आप इस देश के शासक हैं और एक बार नहीं, दूसरी बार शासक हुए हैं। यही विचार कर इस अधबूढ़े भंगड़ ब्राह्मण का नशा किरकिरा हो जाता है! ‘भारतमित्र’, 25 फरवरी सन् 1905

6. एक दुराशा

नारंगी के रस में जाफरानी बसन्ती बूटी छानकर शिवशम्भु शर्म्मा खटिया पर पड़े मौजों का आनन्द ले रहे थे। खयाली घोड़े की बागें ढीली कर दी थीं। वह मनमानी जकन्दें भर रहा था। हाथ-पाँवों को भी स्वाधीनता दी गई थी। वह खटिया के तूल अरजकी सीमा उल्लंघन करके इधर-उधर निकल गये थे। कुछ देर इसी प्रकार शर्म्माजी का शरीर खटिया पर था और खयाल दूसरी दुनिया में।

अचानक एक सुरीली गाने की आवाज ने चौंका दिया। कन-रसिया शिवशम्भु खटिया पर उठ बैठे। कान लगाकर सुनने लगे। कानों में यह मधुर गीत बार-बार अमृत ढालने लगा—

चलो-चलो आज खेलें होली, कन्हैया घर।

कमरे से निकलकर बरामदे में खड़े हुए। मालूम हुआ कि पड़ोस में किसी अमीर के यहाँ गाने-बजाने की महफिल हो रही है। कोई सुरीली लय से उक्त होली गा रहा है। साथ ही देखा, बादल घिरे हुए हैं, बिजली चमक रही है, रिमझिम झड़ी लगी हुई है। बसन्त में सावन देखकर अक्ल जरा चक्कर में पड़ी। विचारने लगे कि गानेवाले को मलार गाना चाहिये था, न कि होली। साथ ही खयाल आया कि फाल्गुन सुदी है, वसन्त के विकास का समय है, वह होली क्यों न गावे? इसमें तो गानेवाले की नहीं, विधि की भूल है, जिसने वसन्त में सावन बना दिया है। कहाँ तो चाँदनी छिटकी होती, निर्मल वायु बहती, कोयल की कूक सुनाई देती; कहाँ भादोंकी-सी अँधियारी है, वर्षा की झड़ी लगी हुई है! ओह! कैसा ऋतु विपर्यय है!

इस विचार को छोड़कर गीत के अर्थ का विचार जी में आया। होली खिलैया कहते हैं कि चलो आज कन्हैया के घर होली खेलेंगे। कन्हैया कौन? ब्रज के राजकुमार। और खेलनेवाले कौन? उनकी प्रजा ग्वालबाल। इस विचार ने शिवशम्भु शर्म्मा को और भी चौंका दिया कि ऐं! क्या भारत में ऐसा समय भी था, जब प्रजा के लोग राजा के घर जाकर होली खेलते थे और राजा-प्रजा मिलकर आनन्द मनाते थे? क्या इसी भारत में राजा लोग प्रजा के आनन्द को किसी समय अपना आनन्द समझते थे? अच्छा, यदि आज शिवशम्भु शर्म्मा अपने मित्रवर्ग-सहित, अबीर-गुलाल की झोलियाँ  भरे, रंग की पिचकारियाँ लिये, अपने राजा के घर होली खेलने जाये, तो कहाँ जाये? राजा दूर सात समुद्र पार है। राजा का केवल नाम सुना है। न राजा को शिवशम्भु ने देखा, न राजा ने शिवशम्भु को। खैर राजा नहीं, उसने अपना प्रतिनिधि भारत में भेजा है। कृष्ण द्वारिका ही में हैं, पर उद्धव को प्रतिनिधि बनाकर ब्रजवासियों को सन्तोष देने के लिये ब्रज में भेजा है। क्या उस राजा-प्रतिनिधि के घर जाकर शिवशम्भु होली नहीं खेल सकता?

ओफ्! यह विचार वैसा ही बेतुका है, जैसे अभी वर्षां में होली गाई जाती थी! पर इसमें गानेवाले का क्या दोष है, वह तो समय समझकर ही गा रहा था। यदि वसन्त में वर्षा की झड़ी लगे, तो गानेवाले को क्या मलार गाना चाहिये? सचमुच बड़ी कठिन समस्या है। कृष्ण है, उद्धव है; पर ब्रजवासी उनके निकट भी नहीं फटकने पाते! राजा है, राजा-प्रतिनिधि है; पर प्रजाकी उन तक रसाई नहीं! सूर्य है, धूप नहीं! चन्द्र है, चाँदनी नहीं! माई लार्ड! नगर ही में हैं; पर शिवशम्भु उनके द्वार तक नहीं फटक सकता है, उनके घर चलकर होली खेलना तो विचार ही दूसरा है। माई लार्ड के घर तक प्रजा की बात नहीं पहुँच सकती। बात की हवा नहीं पहुँच सकती। जहांगीर की भाँति उसने अपने शयनागार तक ऐसा कोई घण्टा नहीं लगाया, जिसकी जंजीर बाहर से हिलाकर प्रजा अपनी फरियाद उसे सुना सके। न आगे को लगाने की आशा है। प्रजा की बोली वह नहीं समझता, उसकी बोली प्रजा नहीं समझती। प्रजा के मन का भाव वह न समझता है, न समझना चाहता है। उनके मन का भाव न प्रजा समझ सकती है, न समझने का कोई उपाय है। उसका दर्शन दुर्लभ है। द्वितीया के चन्द्र की भाँति कभी-कभी बहुत देर तक नजर गड़ाने से उसका चन्द्रानन दिख जाता है, तो दिख जाता है। लोग उंगलियों से इशारे करते हैं कि वह है। किन्तु दूज के चाँद के उदय का भी एक समय है। लोग उसे जान सकते हैं। माई लार्ड के मुखचन्द्र के उदय के लिये कोई समय भी नियत नहीं। अच्छा, जिस प्रकार इस देश का निवासी माई लार्ड का चन्द्रानन देखने को टकटकी लगाये रहता हैं या जैसे शिवशम्भु शर्मा के जीमें अपने देश के माई लार्ड से होली खेलने की आई, इस प्रकार कभी माई लार्ड को भी इस देश के लोगों की सुध आती होगी? क्या कभी श्रीमान् का जी होता होगा कि अपनी प्रजा में, जिसके दण्डमुण्ड के विधाता होकर आये हैं, किसी एक आदमी से मिलकर उसके मन की बात पूछे या कुछ आमोद-प्रमोद की बातें करके उसके मन को टटोलें? माई लार्ड को ड्यूटी का ध्यान दिलाना सूर्य को दीपक दिखाना है। वह स्वयं श्रीमुख से कह चुके हैं कि ड्यूटी में बंधा हुआ मैं इस देश में फिर आया। यह देश मुझे बहुत ही प्यारा है। इससे ड्यूटी और प्यार की बात श्रीमान् के कथन से ही तय हो जाती है। उसमें किसी प्रकार की हुज्जत उठाने की जरूरत नहीं। तथापि यह प्रश्न आपसे आप जीमें उठाता है कि इस देश की प्रजा से प्रजा के माई लार्ड का निकट होना और प्रजा के लोगों की बात जानना भी उस ड्यूटी की सीमा तक पहुँचा है या नहीं? यदि पहुँचा है, तो क्या श्रीमान् बता सकते हैं कि अपने छः साल के लम्बे शासन में इस देश की प्रजा को क्या जाना और उससे क्या सम्बन्ध उत्पन्न किया? जो पहरेदार सिरपर फैटा बाँधे, हाथ में संगीनदार बन्दूक लिये, काठ के पुतलों की भाँति गवर्नमेण्ट-हाउस के द्वार पर दण्डायमान रहते हैं या छाया की मूर्ति की भाँति ज़रा इधर-उधर हिलते-जुलते दिखाई देते हैं, कभी उनको भूले-भटके आपने पूछा है कि कैसी गुजरती है? किसी काले प्यादे-चपरासी या खानसामा आदि से कभी आपने पूछा कि कैसे रहते हो? तुम्हारे देश की क्या चाल-ढाल है? तुम्हारे देश के लोग हमारे देश को कैसा समझते हैं? क्या इन नीचे दरजे के नौकर-चाकरों को कभी माई लार्ड के श्रीमुख से निकले हुए अमृत रूपी वचनों के सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ या खाली पेड़ों पर बैठी चिड़ियों का शब्द ही उनके कानों तक पहुँचकर रह गया? क्या कभी सैर-तमाशे में टहलने के समय या किसी एकान्त स्थान में इस देश के किसी आदमी से कुछ बातें करने का अवसर मिला? अथवा इस देश के प्रतिष्ठित बेगरज आदमी को अपने घर पर बुलाकर इस देश के लोगों के सच्चे विचार जानने की चेष्टा की? अथवा कभी विदेश या रियासतों के दौरे में उन लोगों के सिवा जो झुक-झुककर लम्बी सलामें करने आये हों, किसी सच्चे और बेपरवा आदमी से कुछ पूछने या कहने का कष्ट किया। सुनते हैं कि कलकत्ते में श्रीमान् ने कोना-कोना देख डाला। भारत में क्या भीतर और क्या सीमाओं पर कोई जगह देखे बिना नहीं छोड़ी। बहुतों का ऐसा ही विचार था। पर कलकत्ता-यूनिवर्सिटी के परीक्षोत्तीर्ण छात्रों की सभा में चन्सलर का जामा पहनकर माई लार्ड ने जो अभिज्ञता प्रगट की, उससे स्पष्ट हो गया कि जिन आँखों से श्रीमान् ने देखा, उनमें इस देश की बातें ठीक देखने की शक्ति न थी। सारे भारत की बात जाय, इस कलकत्ते ही में देखने की इतनी बातें हैं कि केवल उनको भली-भाँति देख लेने से भारतवर्ष की बहुत-सी बातों का ज्ञान हो सकता है। माई लार्ड के शासन के छः साल हालवेल के स्मारक में लाठ बनवाने, ब्लैकहोल का पता लगाने, अखतरलोनी की लाठ को मैदान से उठवाकर वहाँ विक्टोरिया-मेमोरियल हाल बनवाने, गवर्नमेन्ट-हाउस के आसपास अच्छी रोशनी, अच्छे फुटपाथ और अच्छी सड़कों का प्रबन्ध कराने में बीत गये। दूसरा दौरा भी वैसे ही कामों में बीत रहा है। सम्भव है कि उसमें भी श्रीमान् के दिल पसन्द अंगरेजी मुहल्लों में कुछ और बड़ी-बड़ी सड़कें निकल जायें और गवर्नमेण्ट हाऊस की तरफ के स्वर्ग की सीमा और बढ़ जावे। पर नगर जैसा अंधेरे में था, वैसा ही रहा; क्योंकि उसकी असली दशा देखने के लिए और ही प्रकार की आँखों की जरूरत है। जब तक वह आँखें न होंगी, यह अंधेर यों ही चला जावेगा। यदि किसी दिन शिवशम्भु शर्म्मा के साथ माई लार्ड नगर की दशा देखने चलते, तो वह देखते कि इस महानगर की लाखों प्रजा भेड़ों और सूअरों की भाँति सड़े-गंदे झोंपड़ों में पड़ी लोटती है। उनके आसपास सड़ी बदबू और मैले सड़े पानी के नाले बहते हैं। कीचड़ और कूड़े के ढेर चारों ओर लगे हुए हैं। उनके शरीरों पर मैले-कुचैले फटे चिथड़े लिपटे हुए हैं। उनमें से बहुतों को आजीवन पेटभर अन्न और शरीर ढाँकने को कपड़ा नहीं मिलता। जाड़ें में सर्दी से अकड़कर रह जाते हैं। और गर्मी में सड़कों पर घूमते तथा जहाँ-तहाँ पड़ते फिरते हैं। बरसात में सड़े-सीले घरों में भीगे पड़े रहते हैं। सारांश यह है कि हरेक ऋतु की तीव्रता में सबसे आगे मृत्यु के पथ का वही अनुगमन करते हैं। मौत ही एक है, जो उनकी दशापर दया करके जल्द-जल्द उन्हें जीवनरूपी रोग के कष्ट से छुड़ाती है!

परन्तु क्या इनसे भी बढ़कर और दृश्य नहीं हैं? हां, हैं। पर

जरा और स्थिरता से देखने के हैं। बालू में बिखरी हुई चीनी को हाथी अपने सूंड से नहीं उठा सकता, उसके लिये चिंवटी की जिह्वा दरकार है। इसी कलकत्ते में, इसी इमारतों के नगर में, माई लार्ड की प्रजा में हजारों आदमी ऐसे हैं, जिनको रहने को सड़ा झोंपड़ा भी नहीं है। गलियों और सड़कों पर घूमते-घूमते जहाँ जगह देखते हैं, वहीं पड़ रहते हैं। बीमार होते हैं, तो सड़कों ही पर पड़े पाँव पीटकर मर जाते हैं। कभी आग जलाकर खुले मैदान में पड़े रहते हैं। कभी-कभी हलवाइयों की भट्ठियों से चमटकर रात काट देते हैं। नित्य इनकी दो-चार लाशें जहाँ-तहाँ से पड़ी हुई पुलिस उठाती है। भला माई लार्ड तक उनकी बात कौन पहुँचावे? दिल्ली-दरबार में भी, जहाँ सारे भारत का वैभव एकत्र था, सैंकड़ों ऐसे लोग दिल्ली की सड़कों पर पड़े दिखाई देते थे; परन्तु उनकी ओर देखने वाला कोई न था। यदि माई लार्ड एक बार इन लोगों को देख पाते, तो पूछने को जगह हो जाती कि वह लोग भी ब्रिटिश राज्य के सिटीजन हैं वा नहीं? यदि हैं, तो कृपापूर्वक पता लगाइये कि उनके रहने के स्थान कहाँ हैं और ब्रिटिश राज्य से उनका क्या नाता है? क्या कहकर वह अपने राजा और उसके प्रतिनिधि को सम्बोधन करें? किन शब्दों में ब्रिटिश राज्य को असीस दें? क्या यों कहें कि जिस ब्रिटिश राज्य में हम अपनी जन्मभूमि में एक उंगल भूमि के अधिकारी नहीं, जिसमें हमारे शरीर को फटे चिथड़े भी नहीं जुड़े और न कभी पापी पेट को पूरा अन्न मिला, उस राज्य की जय हो! उसका राजप्रतिनिधि हाथियों का जुलूस निकालकर, सबसे बड़े हाथी पर चंवर-छत्र लगाकर निकले और स्वदेश में जाकर प्रजा के सुखी होने का डङ्का बजावे?

इस देश में करोड़ों प्रजा ऐसी है, जिसके लोग जब संध्या-सबेरे किसी स्थान पर एकत्र होते हैं, तो महाराज विक्रम की चर्चा करते हैं और उन राजा-महाराजाओं की गुणावली का वर्णन करते हैं, जो प्रजा का दुःख मिटाने और उनके अभावों का पता लगाने के लिये रात को वेश बदलकर निकला करते थे। अकबर के प्रजापालन और बीरबल के लोकरञ्जन की कहानियाँ कहकर वह जी बहलाते हैं और समझते हैं कि न्याय और सुख का समय बीत गया। अब वह राजा संसार में उत्पन्न नहीं होते, जो प्रजा के सुख-दुःख की बातें उनके घरों में आकर पूछ जाते थे। महारानी विक्टोरिया को वह अवश्य जानते हैं कि वह महारानी थीं। अब उनके पुत्र उनकी जगह राजा और इस देश के प्रभु हुए हैं। उनको इस बात की खबर तक भी नहीं कि उनके प्रभु के कोई प्रतिनिधि हैं और वह इस देश के शासन के मालिक होते हैं तथा कभी-कभी इस देश की तीस करोड़ प्रजा का शासन करने का घमण्ड भी करते हैं। अथवा मन चाहे तो इस देश के साथ बिना कोई अच्छा बर्ताव किये भी यहाँ के लोगों को झूठा, मक्कार कहकर अपनी बड़ाई करते हैं।

इन सब विचारों ने इतनी बात तो शिवशम्मु के जीमें भी पक्की कर दी कि अब राजा-प्रजा के मिलकर होली खेलने का समय गया। जो बाकी था, वह काश्मीर-नरेश महाराज रणवीरसिंह के साथ समाप्त हो गया। इस देश में उस समय के फिर लौटने की जल्द आशा नहीं। इस देश की प्रजा का अब वह भाग्य नहीं है। साथ ही राजपुरुष का भी ऐसा सौभाग्य नहीं है, जो यहाँ की प्रजा के अकिंचन प्रेम के प्राप्त करने की परवा करे। माई लार्ड अपने शासन काल का सुन्दर से सुन्दर सचित्र इतिहास स्वयं लिखवा सकते हैं, वह प्रजा के प्रेम की क्या परवा करेंगे। तो भी इतना संदेश भंगड़ शिवशम्भु शर्म्मा अपने प्रभु तक पहाँचा देना चाहता है कि आपके द्वार पर होली खेलने की आशा करनेवाले एक ब्राह्मण को कुछ नहीं तो कभी-कभी पागल समझकर ही स्मरण कर लेना। वह आपकी गूंगी प्रजा का एक वकील है, जिसके शिक्षित होकर मुँह खोलने तक आप कुछ करना नहीं चाहते।

बमुलाजिमाने सुलतां कै रसानद, ई दुआरा?
कि बशुक्रे बादशाही जे नजर मरां गदारा।

‘भारतमित्र’, 18 मार्च सन् 1905

जय हिंद

इस पाठ का शेष अंश भाग-4 में…….

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