बालमुकुंद गुप्त शिवशंभू के चिट्ठे (निबंध) भाग-4

इस पाठ का पूर्व अंश भाग-1, भाग-2 और भाग-3 में दिया गया है, कृपया इस भाग-4 को देखने से पहले, इसके पहले भाग-1, भाग-2 और भाग-3 को अवश्य देख लें जिससे कि विषय की निरंतरता बनी रहे –

7. बिदाई संभाषण

माई लार्ड! अंत को आपके शासन-काल का इस देश में अंत हो गया। अब आप इस देश से अलग होते हैं। इस संसार में सब बातों का अंत है। इससे आपके शासन-काल का भी अंत होता, चाहे आपकी एक बार की कल्पना के अनुसार आप यहाँ के चिरस्थायी वायसराय भी हो जाते। किंतु इतनी जल्दी वह समय पूरा हो जाएगा, ऐसा विचार न आप ही का था, न इस देश के निवासियों का। इससे जान पड़ता है कि आपके और यहाँ के निवासियों के बीच में कोई तीसरी शक्ति और भी है, जिस पर यहाँ वालों का तो क्या, आपका भी क़ाबू नहीं है।

बिछड़न-समय बड़ा करुणोत्पादक होता है। आपको बिछड़ते देखकर आज हृदय में बड़ा दुःख है। माई माई लार्ड! आपके दूसरी बार इस देश में आने से भारतवासी किसी प्रकार प्रसन्न न थे। वह यही चाहते थे कि आप फिर न आवें। पर आप आए और उससे यहाँ के लोग बहुत ही दुखित हुए। वे दिन-रात यही मनाते थे कि जल्द श्रीमान् यहाँ से पधारें। पर अहो! आज आपके जाने पर हर्ष की जगह विषाद होता है। इसी से जाना कि बिछड़न-समय बड़ा करुणोत्पादक होता है, बड़ा पवित्र, बड़ा निर्मल और कोमल होता है। वैर-भाव छूटकर शांत रस का आविर्भाव उस समय होता है।

माई लार्ड का देश देखने का इस दीन भंगड़ ब्राह्मण को कभी इस जन्म में सौभाग्य नहीं हुआ। इससे नहीं जानता कि वहाँ बिछड़ने के समय लोगों का क्या भाव होता है। पर इस देश के पशु-पक्षियों को भी बिछड़ने के समय उदास देखा है। एक बार शिवशंभू के दो गायें थीं। उनमें एक अधिक बलवाली थी। वह कभी-कभी अपने सींगों की टक्कर से दूसरी कमज़ोर गाय को गिरा देती थी। एक दिन वह टक्कर मारने वाली गाय पुरोहित को दे दी गई। देखा कि दुर्बल गाय उसके चले जाने से प्रसन्न नहीं हुई, वरंच उस दिन वह भूखी खड़ी रही, चारा छुआ तक नहीं। माई लार्ड! जिस देश के पशुओं की बिछड़ते समय यह दशा होती है, वहाँ के मनुष्यों की कैसी दशा हो सकती है, इसका अंदाज़ा लगाना कठिन नहीं है।

आगे भी इस देश में जो प्रधान शासक आए, अंत में उनको जाना पड़ा। इससे आपका जाना भी परंपरा की चाल से कुछ अलग नहीं है, तथापि आपके शासन-काल का नाटक घोर दुखांत है, और अधिक आश्चर्य की बात यह है कि दर्शक तो क्या, स्वयं सूत्रधार भी नहीं जानता था कि उसने जो खेल सुखांत समझकर खेलना आरंभ किया था, वह दुखांत हो जावेगा। जिसके आदि में सुख था, मध्य में सीमा से बाहर सुख था, उसका अंत ऐसे घोर दुःख के साथ कैसे हुआ? आह! घमंडी खिलाड़ी समझता है कि दूसरों को अपनी लीला दिखाता हूँ। किंतु पर्दे के पीछे एक और ही लीलामय की लीला हो रही है, यह उसे ख़बर नहीं!

इस बार बंबई में उतरकर माई लार्ड! आपने जो जो इरादे ज़ाहिर किए थे, ज़रा देखिए तो उनमें से कौन-कौन पूरे हुए। आपने कहा था कि यहाँ से जाते समय भारतवर्ष को ऐसा कर जाऊँगा कि मेरे बाद आने वाले बड़े लाटों को वर्षो तक कुछ करना न पड़ेगा, वह कितने ही वर्षों सुख की नींद सोते रहेंगे। किंतु बात उल्टी हुई। आपको स्वयं इस बार बेचैनी उठानी पड़ी है और इस देश में जैसी अशांति आप फैला चले हैं, उसके मिटाने में आपके पद पर आने वालों को न जाने कब तक नींद और भूख हराम करनी पड़ेगी। इस बार आपने अपना बिस्तर गर्म राख पर रखा है और भारतवासियों को गर्म तवे पर पानी की बूँदों की भाँति नचाया है। आप स्वयं भी ख़ुश न हो सके और यहाँ की प्रजा को सुखी न होने दिया, इसका लोगों के चित्त पर बड़ा ही दुःख है।

विचारिये तो क्या शान आपकी इस देश में थी और अब क्या हो गई! कितने ऊँचे होकर आप कितने नीचे गिरे! अलिफ़ लैला के अलहदीन ने चिराग़ रगड़कर और अबुलहसन ने बग़दाद के ख़लीफ़ा की गद्दी पर आँख खोलकर वह शान न देखी, जो दिल्ली-दरबार में आपने देखी। आपकी और आपकी लेडी की कुर्सी सोने की थी और आपके प्रभु महाराज के छोटे भाई और उनकी पत्नी की चाँदी की। आप दाहिने थे, वह बाएँ, आप प्रथम थे वह दूसरे। इस देश के सब रईसों ने आपको सलाम पहले किया और बादशाह के भाई को पीछे। जुलूस में आपका हाथी सबसे आगे और सबसे ऊँचा था; हौदा, चँवर, छत्र आदि सामान सबसे बढ़-चढ़कर थे। सारांश यह कि ईश्वर और महाराज एडवर्ड के बाद इस देश में आप ही का दरजा था। किंतु अब देखते हैं कि जंगी लाट के मुक़ाबले में आपने पटखनी खाई, सिर के बल नीचे आ रहे! आप के स्वदेश में वही ऊँचे माने गए, आपको साफ़ नीचा देखना पड़ा! पद-त्याग की धमकी से भी ऊँचे न हो सके।

आप बहुत धीर-गंभीर प्रसिद्ध थे। उस सारी धीरता-गंभीरता का आपने इस बार कौंसिल में बेक़ानूनी क़ानून पास करते और कनवोकेशन में वक्तृता देते समय दीवाला निकाल दिया। यह दीवाला तो इस देश में हुआ। उधर विलायत में आपके बार-बार इस्तीफ़ा देने की धमकी ने प्रकाश कर दिया कि जड़ हिल गई है। अंत में वहाँ भी आपको दिवालिया होना पड़ा और धीरता-गंभीरता के साथ दृढ़ता को भी तिलांजलि देनी पड़ी। इस देश के हाकिम आपकी ताल पर नाचते थे, राजा-महाराजा डोरी हिलाने से सामने हाथ बाँधे हाज़िर होते थे। आपके एक इशारे में प्रलय होती थी। कितने ही राजों को मट्टी के खिलौने की भाँति आपने तोड़-फोड़ डाला। कितने ही मट्टी-काठ के खिलौने आपकी कृपा के जादू से बड़े-बड़े पदाधिकारी बन गए। आपके एक इशारे में इस देश की शिक्षा पायमाल हो गई, स्वाधीनता उड़ गई। बंग देश के सिर पर आरा रखा गया। ओह, इतने बड़े माई लार्ड का यह दरजा हुआ कि एक फ़ौजी अफ़सर उनके इच्छित पद पर नियत न हो सका और उनको उसी ग़ुस्से के मारे इस्तीफ़ा दाख़िल करना पड़ा, वह भी मंज़ूर हो गया। उनका रखाया एक आदमी नौकर न रखा गया, उल्टा उन्हीं के निकल जाने का हुक्म मिला!

जिस प्रकार आपका बहुत ऊँचे चढ़कर गिरना यहाँ के निवासियों को दुखित कर रहा है, गिरकर पड़ा रहना उससे भी अधिक दुखित करता है। आपका पद छूट गया तथापि आपका पीछा नहीं छूटा है। एक अदना क्लर्क जिसे नौकरी छोड़ने के लिए एक महीने का नोटिस मिल गया हो नोटिस की अवधि को बड़ी घृणा से काटता है। आपको इस समय अपने पद पर रहना कहाँ तक पसंद है- यह आप ही जानते होंगे। अपनी दशा पर आपको कैसी घृणा आती है, इस बात के जान लेने का इन देशवासियों को अवसर नहीं मिला, पर पतन के पीछे इतनी उलझन में पड़ते उन्होंने किसी को नहीं देखा।

माई लार्ड, एक बार अपने कामों की ओर ध्यान दीजिए। आप किस काम को आए थे और क्या कर चले। शासक-प्रजा के प्रति कुछ तो कर्तव्य होता है, यह बात आप निश्चय मानते होंगे। सो कृपा करके बतलाइए, क्या कर्तव्य आप इस देश की प्रजा के साथ पालन कर चले! क्या आँख बंद करके मनमाने हुक्म चलाना और किसी की कुछ न सुनने का नाम ही शासन है? क्या प्रजा की बात पर कभी कान न देना और उसको दबाकर उसकी मर्ज़ी के विरुद्ध ज़िद्द से सब काम किए चले जाना ही शासन कहलाता है? एक काम हो ऐसा बतलाइए, जिसमें आपने ज़िद्द छोड़कर प्रजा की बात पर ध्यान दिया हो। कैसर और ज़ार भी घेरने-घोसोटने से प्रजा की बात सुन लेते हैं पर आप एक मौक़ा तो ऐसा बताइए जिसमें किसी अनुरोध या प्रार्थना सुनने के लिए प्रजा के लोगों को आपने अपने निकट फटकने दिया हो और उनकी बात सुनी हो। नादिरशाह ने जब दिल्ली में क़तलेआम किया तो आसिफ़ज़ाह के तलवार गले में डालकर प्रार्थना करने पर उसने क़तलेआम उसी दम रोक दिया। पर आठ करोड़ प्रजा के गिड़गिड़ाकर बंग-विच्छेद न करने की प्रार्थना पर आपने ज़रा भी ध्यान नहीं दिया। इस समय आपकी शासन-अवधि पूरी हो गई है तथापि बंग-विच्छेद किए बिना घर जाना आपको पसंद नहीं है! नादिर से भी बढ़कर आपकी ज़िद्द है। क्या आप समझते हैं कि आपकी ज़िद्द से प्रजा के जी में दुःख नहीं होता? आप विचारिये तो एक आदमी को आपके कहने पर पद न देने से आप नौकरी छोड़े जाते हैं, इस देश की प्रजा को भी यदि कहीं जाने की जगह होती, तो क्या वह नाराज़ होकर इस देश को छोड़ न जाती?

यहाँ की प्रजा ने आपकी ज़िद्द का फल यहीं देख लिया। उसने देख लिया कि आपकी जिस ज़िद्द ने इस देश की प्रजा को पीड़ित किया, आपको भी उसने कम पीड़ा न दी, यहाँ तक कि आप स्वयं उसका शिकार हुए। यहाँ की प्रजा वह प्रजा है, जो अपने दुःख और कष्टों की अपेक्षा परिणाम का अधिक ध्यान रखती है। वह जानती है कि संसार में सब चीज़ों का अंत है। दुःख का समय भी एक दिन निकल जावेगा, इसी से सब दुःखों को झेलकर, पराधीनता सहकर भी वह जीती है। माई लार्ड! इस कृतज्ञता की भूमि की महिमा आपने कुछ न समझी और न यहाँ की दीन प्रजा की श्रद्धा-भक्ति अपने साथ ले जा सके, इसका बड़ा दुःख है।

इस देश के शिक्षितों को तो देखने की आपकी आँखों को ताब नहीं। अनपढ़-गूँगी प्रजा का नाम कभी-कभी आपके मुँह से निकल जाया करता है। उसी अनपढ़ प्रजा में नर सुलतान नाम के एक राजकुमार का गीत गाया जाता है। एक बार अपनी विपद के कई साल सुलतान ने नरवरगढ़ नाम के एक स्थान में काटे थे। वहाँ चौकीदारी से लेकर उसे एक ऊँचे पद तक काम करना पड़ा था। जिस दिन घोड़े पर सवार होकर वह उस नगर से विदा हुआ, नगर-द्वार से बाहर आकर उस नगर को जिस रीति से उसने अभिवादन किया था, वह सुनिए। उसने आँखों में आँसू भरकर कहा, “प्यारे नरवरगढ़! मेरा प्रणाम ले, आज मैं तुझसे जुदा होता हूँ। तू मेरा अन्नदाता है। अपनी विपद के दिन मैंने तुझमें काटे हैं। तेरे ऋण का बदला मैं ग़रीब सिपाही नहीं दे सकता। भाई नरवरगढ़! यदि मैंने जानबूझकर एक दिन भी अपनी सेवा में चूक की हो, यहाँ की प्रजा की शुभ चिंता न की हो, यहाँ की स्त्रियों को माता और बहन की दृष्टि से न देखा हो तो मेरा प्रणाम न ले, नहीं तो प्रसन्न होकर एक बार मेरा प्रणाम ले और मुझे जाने की आज्ञा दे!” माई लार्ड! जिस प्रजा में ऐसे राजकुमार का गीत गाया जाता है, उसके देश से क्या आप भी चलते समय कुछ संभाषण करेंगे? क्या आप कह सकेंगे, अभागे भारत! मैंने तुझसे सब प्रकार का लाभ उठाया और तेरी बदौलत वह शान देखी, जो इस जीवन में असंभव है। तूने मेरा कुछ नहीं बिगाड़ा; पर मैंने तेरे बिगाड़ने में कुछ कमी न की। संसार के सबसे पुराने देश! जब तक मेरे हाथ में शक्ति थी, तेरी भलाई की इच्छा मेरे जी में न थी। अब कुछ शक्ति नहीं है, जो तेरे लिए कुछ कर सकूँ। पर आशीर्वाद करता हूँ कि तू फिर उठे और अपने प्राचीन गौरव और यश को फिर से लाभ करे। मेरे बाद आने वाले तेरे गौरव को समझें।” आप कर सकते हैं और यह देश आपकी पिछली सब बातें भूल सकता है, पर इतनी उदारता माई लार्ड में कहाँ? 

‘भारतमित्र’, 2 सितंबर, 1905 ई.

8. वंग विच्छेद

गत 16 अक्टोबर को बंग-विच्छेद या बंगाल का पार्टीशन हो गया। पूर्व बंगाल और आसाम का नया प्रान्त बनकर हमारे महाप्रभु माई लार्ड
इंगलैण्ड के महान् राजप्रतिनिधि का तुगलकाबाद आबाद हो गया। भंगड़ लोगों के पिछले रगड़े की भाँति यही माई लार्ड की सबसे पिछली प्यारी इच्छा थी। खूब अच्छी तरह भंग घुटकर तैयार हो जानेपर भंगड़ आनन्दक से उसपर एक और रगड़ लगाता है। भंगड़-जीवन में उससे बढ़कर और कुछ आनन्द नहीं होता। माई लार्ड के भारत-शासन-जीवन में भी इससे अधिक आनन्द की बात कदाचित् कोई न होगी, जिसे पूरी होते देखने के लिये आप इस देश का सम्बन्ध-जाल छिन कर डालने पर भी उसमें  अटके रहे।

माई लार्ड को इस देश में जो कुछ करना था, वह पूरा कर चुके थे। यहाँ तक कि अपने सब इरादों को पूरा करते-करते अपने शासन-काल की इति श्री भी अपने ही कर-कमल से कर चुके थे। जो कुछ करना बाकी था, वह यही बंग-विच्छेद था। वह भी हो गया। आप अपनी अन्तिम कीर्ति की ध्वजा अपने ही हाथों से उड़ा चले और अपनी आँखों को उसके प्रियदर्शन से सुखी कर चले, यह बड़े सौभाग्य की बात है। अपने शासन-काल की रकाबी में बहुत-सी कड़वी-कसैली चीजें चख जाने पर भी आप अपने लिये ‘मधुरेण समापयेत’ कर चले, यही गनीमत है।

अब कुछ करना रह भी गया हो, तो उसके पूरा करने की शक्ति माई लार्ड में नहीं है। आपके हाथों में इस देश का जो बुरा-भला होना था, वह हो चुका। एक ही तीर आपके तर्कश में और बाकी था, उससे आप बंग-भूमिका वक्षस्थल छेद चले! बस, यहाँ आकर आपकी शक्ति समाप्त हो गई! इस देश की भलाई की ओर तो आपने उस समय भी दृष्टि न की, जब कुछ भला करने की शक्ति आपमें थी। पर अब कुछ बुराई करने की शक्ति भी आपमें नहीं रही, इससे यहाँ के लोगों को बहुत ढाढस मिली है। अब आप हमारा कुछ नहीं कर सकते।

आपके शासन-काल में बंग-विच्छेद इस देश के लिये अन्तिम विषाद और आपके लिये अन्तिम हर्ष है। इस प्रकार के विषाद और हर्ष इस पृथ्वी के सबसे पुराने देश की प्रजा ने बारम्बार देखे हैं। महाभारत में सबका संहार हो जाने-पर भी घायल पड़े हुए दुर्मद दुर्योधन को अश्वत्थामा की यह वाणी सुनकर अपार हर्ष हुआ था कि मैं पाँचों पाण्डवों के सिर काटकर आपके पास लाया हूँ। उसी प्रकार सेना-सुधार-रूपी महाभारत में जंगी-लाट किचनर-रूपी भीम की विजय-गदा से जर्जरित होकर पदच्युति  हृदमें पड़े इस देश के माई लार्ड को इस खबर ने बड़ा हर्ष पहुँचाया कि अपने हाथों से श्रीमान् को बंग-विच्छेद का अवसर मिला। इसी महाहर्ष को लेकर माई लार्ड इस देश से बिदा होते हैं, यह बड़े सन्तोष की बात है। अपनों से लड़कर श्रीमान् की इज्जत गई या श्रीमान् ही गये, उसका कुछ खयाल नहीं है। भारतीय प्रजा के सामने आपकी इज्जत बनी रही, यही बड़ी बात है। इसके सहारे स्वदेश तक श्रीमान् मोछों पर ताव देते चले जा सकते हैं। श्रीमान् के खयाल के शासक इस देश ने कई बार देखे हैं। पाँच सौ से अधिक वर्ष हुए तुगलक-वंश के एक बादशाह ने दिल्ली को उजाड़ कर दौलताबाद बसाया था। पहले उसने दिल्ली की प्रजा को हुक्म दिया कि दौलताबाद में जाकर बसो। जब प्रजा बड़े कष्ट से दिल्ली को छोड़कर वहाँ जाकर बसी, तो उसे फिर दिल्ली को लौट आने का हुक्म दिया। इस प्रकार दो-तीन बार प्रजा को दिल्ली से देवगिरि और देवगिरि से दिल्ली अर्थात् श्रीमान् मुहम्मद तुगलक के दौलताबाद और अपने वतन के बीच में चकराना और तबाह होना पड़ा। हमारे इस समय के माई लार्ड ने केवल इतना ही किया है कि बंगाल के कुछ जिले आसाम में मिलाकर एक नया प्रान्त बना दिया है। कलकत्ते की प्रजा को कलकत्ता छोड़कर चटगाँव में आबाद होने का हुक्म तो नहीं दिया! जो प्रजा तुगलक-जैसे शासकों का खयाल बर्दाश्त कर गई, वह क्या आजकल के माई लार्ड के एक खयाल को बर्दाश्त नहीं कर सकती है?

सब ज्यों का त्यों है। बंग देश भूमि जहाँ थी वहीं है और उसका हर एक नगर और गाँव जहाँ था, वहीं है। कलकत्ता उठकर चीरापूंजी के पहाड़ पर नहीं रख दिया गया और शिलांग उड़कर हुगली के पुल पर नहीं आ बैठा। पूर्व और पश्चिम बंगाल के बीच में कोई नहर नहीं खुद गई और दोनों को अलग-अलग करने के लिये बीच में कोई चीन की-सी दीवार नहीं बन गई है। पूर्व बंगाल पश्चिम बंगाल से अलग हो जाने पर भी अंगरेजी शासन ही में बना हुआ है और पश्चिमी बंगाल भी पहले की भाँति उसी शासन में है। किसी बातमें कुछ फर्क नहीं पड़ा। खाली खयाली लड़ाई है। बंग-विच्छेद करके माई लार्ड ने अपना एक ख़याल पूरा किया है। इस्तीफा देकर भी एक खयाल ही पूरा किया और इस्तीफा मंजूर हो जानेपर इस देश में पड़े रहकर भी श्रीमान् का प्रिन्स आफ वेल्स के स्वागत तक ठहरना एक खयाल-मात्र है।

कितने ही खयाली इस देश में अपना खयाल पूरा करके चले गये। दो सवा-दो सौ साल पहले एक शासक ने इस बंगदेश में एक रुपये के आठ मन धान बिकवाकर कहा था कि जो इससे सस्ता धान इस देश में बिकवाकर इस देश के धनधान्यपूर्ण होने का परिचय देगा, उसको मैं अपने से अच्छा शासक समझूँगा। वह शासक भी नहीं है, उसका समय भी नहीं है। कई एक शताब्दियों के भीतर इस भूमि ने कितने ही रंग पलटे हैं, कितनी ही इसकी सीमाएँ हो चुकी हैं। कितने ही नगर इसकी राजधानी बनकर उजड़ गये। गौड़ के जिन खण्डहरों में अब उल्लू बोलते और गीदड़ चिल्लाते हैं, वहाँ कभी बाँके महल खड़े थे और वहीं बंगदेश का शासक रहता था। मुर्शिदाबाद, जो आज एक लुटा हुआ-सा शहर दिखाई देता है, कुछ दिन पहले इसी बंगदेश की राजधानी था और उसकी चहल-पहल का कुछ ठिकाना न था। जहाँ घसियारे घास खोदा करते थे, वहाँ आज कलकत्ता-जैसा महानगर बसा हुआ है, जिसके जोड़ का एशिया में एक-आध नगर ही निकल सकता है। अब माई लार्ड के बंग-विच्छेद से ढाका, शिलांग और चटगांव में से हरेक राजधानी का सेहरा बंधवाने के लिये सिर आगे बढ़ाता है। कौन जाने इनमें से किसके नसीब में क्या लिखा है और भविष्य क्या-क्या दिखलायेगा! दो हजार वर्ष नहीं हुए, इस देशका एक शासक कह गया है- “सैकड़ों राजा जिसे अपनी-अपनी समझकर चले गये, परन्तु वह किसी के भी साथ नहीं गई, ऐसी पृथिवी के पाने से क्या राजाओं को अभिमान करना चाहिये? अब तो लोग इसके अंश के अंश को पाकर भी अपने को भूपति मानते हैं। ओहो! जिसपर पश्चाताप करना चाहिये, उसके लिये मूर्ख उल्टा आनन्द करते हैं।”

वही राजा और कहता है- “यह पृथिवी मट्टी का एक छोटा-सा ढेला है, जो चारों तरफ से समुद्र रूपी पानी की रेखा से घिरा हुआ है। राजा लोग आपस में लड़-भिड़कर इस छोटे-से ढेले के छोटे-छोटे अंशों पर अपना अधिकार जमाकर राज्य करते हैं। ऐसे क्षुद्र और दरिद्री राजाओं को लोग दानी कहकर जाँचने जाते हैं। ऐसे नीचों से धन की आशा करने वाले अधम पुरुषों को धिक्कार है।” यह वह शासक था कि इस देश का चक्रवर्ती अधीश्वर होने पर भी एक दिन राजपाट को लात मारकर जंगलों और वनों में चला गया था। आज वही भारत एक ऐसे शासक का शासन-काल देख रहा है, जो यहाँ का अधीश्वर नहीं है; कुछ नियत समय के लिए उसके हाथ में यहाँ का शासन-भार दिया गया था, तो भी इतना मोह में डूबा हुआ है कि स्वयं इस देश को त्यागकर भी इसे कुछ दिन और न त्यागने का लोभ संवरण न कर सका!

यह बंग-विच्छेद बंग का विच्छेद नहीं है। बंग-निवासी इससे विच्छिन्न नहीं हुए, वरञ्च और युक्त हो गये है। जिन्होंने गत 16 अक्टूबर का दृश्य देखा है, वह समझ सकते हैं कि बंगदेश या भारतवर्ष में नहीं, पृथ्वी-भर में वह अपूर्व दृश्य था। आर्य-सन्तान उस दिन अपने प्राचीन वेश में विचरण करती थी। बंगभूमि ऋषि-मुनियों के समय की आर्य भूमि बनी हुई थी। किसी अपूर्व शक्ति ने उसको उस दिन एक राखी से बांध दिया था। बहुत काल के पश्चात् भारत-सन्तान को होश हुआ कि भारत की मट्टी बन्दना के योग्य है। इसी से वह एक स्वर से “वन्दे मातरम्” कहकर चिल्ला उठे। बंगाल के टुकड़े नहीं हुए, वरञ्च भारत के अन्यान्य टुकड़े भी बंगदेश से आकर चिमटे जाते हैं।

हां, एक बड़े ही पवित्र मेल को हमारे माई लार्ड विच्छिन्न किये जाते हैं। वह इस देश के राजा-प्रजा का मेल है। स्वर्गीय विक्टोरिया महारानी के घोषणा-पत्र और शासन-काल ने इस देश की प्रजा के जीमे यह बात जमा दी थी कि अंगरेज प्रजा की बात सुनकर और उसका मन रखकर शासन करना जानते हैं। और वह रंग के नहीं, योग्यता के पक्ष पाती हैं। कैनिंग और रिपन आदि उदार हृदय शासकों ने अपने सुशासन से इस भाव की पुष्टि की थी। इस समय के महाप्रभु ने दिखा दिया कि वह पवित्र घोषणा-पत्र समय पड़े की चाल-मात्र था। अंगरेज अपने खयाल के सामने किसी की नहीं सुनते-विशेषकर दुर्बल भारतवासियों की चिल्लाहट का उनके जीमे कुछ भी वजन नहीं है। इससे आठ करोड़ बंगालियों के एक स्वर होकर दिन-रात महीनों रोने-गाने पर भी अंगरेजी सरकार ने कुछ न सुना। बंगाल के दो टुकड़े कर डाले। उसी माई लार्ड के हाथ से दो टुकड़े कराये, जिसके कहने से उसने केवल एक मिलिटरी मेम्बर रखना भी मंजूर नहीं किया और उसके लिए माई-लार्ड को नौकरी से अलग करना भी पसन्द किया। भारतवासियों के जीमे यह बात जम गई कि अंगरेजों से भक्ति-भाव करना वृथा है, प्रार्थना करना वृथा है और उनके आगे रोना-गाना वृथा है। दुर्बल की वह नहीं सुनते। बंग-विच्छेद से हमारे महाप्रभु सरदस्त राजा-प्रजा में यही भाव उत्पन्न करा चले हैं। किन्तु हाय! इस समय इसपर महाप्रभु के देश में कोई ध्यान देने वाला तक नहीं है! महाप्रभु तो ध्यान देने के योग्य ही कहाँ।

‘भारतमित्र’, 21 अक्तुबर सन् 1904

जय हिंद

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