अज्ञेय की कविता ‘साँप’ : विवेचना ‘साँप’ कविता में कवि साँप को प्रतीक बनाकर नगरीय सभ्यता में रहने वाले मनुष्य के दोगले और कुटिल चरित्र पर तीखा व्यंग्य करते हैं। कवि कहता है कि साँप नगर में तो बस गया है, पर वह सभ्य नहीं बन पाया। इसके माध्यम से कवि यह संकेत देता है… Continue reading अज्ञेय की कविता ‘साँप’
Author: इंदु सिंह
स्वामी विवेकानंद : धैर्य और विश्वास
स्वामी विवेकानंद का जीवन संघर्ष, साधना और आत्मविश्वास की अद्भुत गाथा है। उनका व्यक्तित्व हमें यह सिखाता है कि विपरीत परिस्थितियाँ भी यदि धैर्य और विश्वास से सामना की जाएँ, तो सफलता स्वयं मार्ग खोज लेती है। एक बार की बात है जब स्वामी विवेकानंद अमेरिका में आयोजित विश्व धर्म महासभा में भाग लेने गए।… Continue reading स्वामी विवेकानंद : धैर्य और विश्वास
स्वामी विवेकानंद : आज्ञा माँ शारदा की
एक बार स्वामी विवेकानंद ने माँ शारदे से पूछा, “माँ क्या मैं दुनिया को धर्म का उपदेश देने जा सकता हूँ?” माँ शारदे ने उनकी तरफ देख कर कहा- “बेटा, तुम्हारा कार्य दुनिया के लिए है। जब तक तुम दूसरों के लिए नहीं जिओगे, तुम्हारी साधना अधूरी रहेगी।” इसी प्रेरणा ने उन्हें जीवन भर समाजसेवा… Continue reading स्वामी विवेकानंद : आज्ञा माँ शारदा की
सार्वनामिक विशेषण के भेद
सार्वनामिक विशेषण के भेद: (मानक हिंदी व्याकरण तथा रचना के अनुसार) कुछ सर्वनाम जब किसी संज्ञा की विशेषता बताने के लिए विशेषण के रूप में प्रयुक्त होते हैं तब उन्हें ‘सार्वनामिक विशेषण’ कहा जाता है। जैसे- 1. मेरी किताब 2. अपना बेटा 3. किसी का मकान 4. कौन-सी कमीज 5. कोई लड़का आदि। यहाँ, मेरी,… Continue reading सार्वनामिक विशेषण के भेद
स्वामी विवेकानंद का ‘बच्चों से प्यार’
स्वामी विवेकानंद को बच्चों से बहुत लगाव था। एक बार उन्होंने कहा था- “बच्चों के हृदय में ईश्वर का वास होता है। अगर हम उन्हें सही दिशा दिखाएँगे, तो वे समाज का भविष्य बदल सकते है।” वे बच्चो के साथ खेलते और उन्हें शिक्षा के महत्व को समझाते थे। स्वामी विवेकानंद केवल एक महान संन्यासी… Continue reading स्वामी विवेकानंद का ‘बच्चों से प्यार’
नेताजी सुभाष चन्द्रबोस : ‘सेवा ही सच्चा राष्ट्र धर्म है’
सुभाषचंद्र बोस के घर के सामने एक बुढ़िया भिखारिन रहती थी। वे देखते थे कि वह हमेशा भीख मांगती थी। उसका दर्द साफ दिखाई देता था। उसकी ऐसी अवस्था देखकर उनका दिल दहल जाता था। भिखारिन से मेरी हालत कितनी अच्छी है यह सोचकर वे स्वयं शर्म महसूस करते थे। उन्हें यह देखकर बहुत कष्ट होता… Continue reading नेताजी सुभाष चन्द्रबोस : ‘सेवा ही सच्चा राष्ट्र धर्म है’
कर्म कारक और संप्रदान कारक में अन्तर
कर्म कारक- शब्द के जिस रूप पर क्रिया का फल पड़ता है उसे ‘कर्म कारक’ कहते हैं। ‘कर्म कारक’ की विभक्ति ‘को’ है। कभी-कभी ‘को’ विभक्ति का प्रयोग नहीं भी होता है। जैसे- 1. मोहन पत्र लिखता है। 2. मैंने पत्र लिखा। 3. सोहन ने मोहन को समझाया। विभक्ति रहित कर्म को पहचानने के लिए… Continue reading कर्म कारक और संप्रदान कारक में अन्तर
नेताजी सुभाषचंद्र बोस : “निष्काम सेवा”
ओडिशा के कटक शहर स्थित उड़िया बाजार में एक बार प्लेग फैल गया। केवल बापू पाड़ा मोहल्ला इससे बचा हुआ था क्योंकि वहां पढ़े-लिखे लोग रहते थे और वे आसपास की सफाई पर ध्यान देते थे। वहां के कुछ लड़कों ने सफाई अभियान चलाने के लिए एक दल बनाया जिसमें 10 साल के बच्चे से… Continue reading नेताजी सुभाषचंद्र बोस : “निष्काम सेवा”
नेताजी सुभाषचंद्र बोस : ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा।’
भारत को अंग्रेजों के शासन से स्वतंत्र कराने के लिए अनेक क्रांतिकारियों ने अपना बलिदान दिया है। उन्हीं क्रांतिकारियों में से एक क्रांतिकारी थे नेताजी सुभाषचंद्र बोस। बालक सुभाष बचपन से ही राष्ट्राभिमानी थे। उन्होंने भारत को स्वतंत्र कराने के लिए देश के युवकों को आवाहन कर नारा दिया था कि, ‘तुम मुझे खून दो,… Continue reading नेताजी सुभाषचंद्र बोस : ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा।’
सुभाषचंद्र बोस ‘हिंदी भाषा का महत्व’
नेताजी सुभाषचंद्र बोस उन दिनों बर्मा में थे। वे अंग्रेजों के विरुद्ध आजाद हिन्द फ़ौज के सिपाहियों को युद्ध के लिए तैयार कर रहे थे। बर्मा में व्यवसाय करने वाले भारतीयों ने नेताजी से संपर्क किया। नेताजी के इस काम के लिए उन व्यापारियों ने काफी धन जमा किया ताकि इस राष्ट्रीय कार्य में किसी… Continue reading सुभाषचंद्र बोस ‘हिंदी भाषा का महत्व’