
नेताजी सुभाषचंद्र बोस उन दिनों बर्मा में थे। वे अंग्रेजों के विरुद्ध आजाद हिन्द फ़ौज के सिपाहियों को युद्ध के लिए तैयार कर रहे थे। बर्मा में व्यवसाय करने वाले भारतीयों ने नेताजी से संपर्क किया। नेताजी के इस काम के लिए उन व्यापारियों ने काफी धन जमा किया ताकि इस राष्ट्रीय कार्य में किसी तरह की बाधा न हो। व्यापारी हमेशा इस बात का ध्यान रखते थे कि नेताजी को किसी तरह की कोई परेशानी न हो। इसके लिए वे हमेशा उनके साथ संपर्क में रहते थे। उन्हीं दिनों नेताजी ने एक हिंदी भाषी व्यवसायी से हिंदी सीखना शुरू किया।
वे कहते थे, ‘मैं बांग्ला और अंग्रेजी तो जानता हूं लेकिन हिंदी अच्छी तरह से नहीं जानता। उसे सीखना बहुत जरूरी है।’
एक दिन हिंदी शिक्षक नेताजी से बोले, ‘नेताजी, आप दिन भर सैनिकों से युद्ध के विषय में बातें करते हैं। आपकी अधिकतर बातचीत अंग्रेजी में ही होती है। अभी तो आपको हिंदी की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। फिर आप हिंदी सीखने के लिए दृढ़ संकल्प क्यों हैं?’
शिक्षक की बात सुनकर नेताजी मुस्कराते हुए बोले, ‘आपका कहना बिल्कुल ठीक है कि अभी यहाँ पर हिंदी की अधिक आवश्यकता नहीं है लेकिन हमें दूरदर्शी होना चाहिए। जिस तरह से हम आजादी के लिए काम कर रहे हैं, उससे लगता है कि जल्दी ही भारत आजाद हो जाएगा। भारत के स्वतंत्र होने के बाद हम भारतीय जनता को अंग्रेजी भाषा से भी मुक्ति दिलाएंगे। ऐसे में हिंदी ही एकमात्र ऐसी भाषा होगी, जिसे ज्यादातर भारतीय समझेंगे और बोलेंगे। इसलिए हिंदी का अच्छा ज्ञान होना जरूरी है।’
नेताजी की दूरदर्शिता से शिक्षक बहुत प्रभावित हुए। वह बोले, ‘नेताजी आप धन्य हैं। आप स्वयं हिंदी भाषी नहीं हैं, लेकिन हिंदी का महत्व बहुत अच्छी तरह से जानते हैं। अब पूरा भरोसा हो गया है कि आप जैसे देश भक्तों के प्रयासों से भारत आजाद होगा और जल्द होगा।’
जय हिन्द