भक्तिकाल हिंदी साहित्य का स्वर्ण युग है

आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार भक्ति काल की समय सीमा संवत् (1375-1700) तक मानी जाती है। हिंदी साहित्य के इतिहास में भक्तिकाल का महत्व अधिक है। हिंदी साहित्य के स्वर्ण-युग कहने का तात्पर्य है- वह काल जिसमें रचित साहित्य अपने पूर्ववर्ती  या परवर्ती काल में रचित साहित्य से उत्कृष्ट कोटि का रहा हो इस दृष्टि से देखा जाए तो भक्तिकालीन काव्य को ही सर्वोत्तम माना जा सकता है।

प्रसिद्ध विद्वान ग्रियर्सन ने हिंदी साहित्य के इतिहास में भक्तिकाल को, “हिंदी साहित्य का स्वर्ण काल कहा है।”

श्यामसुन्दरदास ने “भक्ति काल को स्वर्णयुग युग कहा है।” उनके अनुसार जिस युग में कबीर, जायसी तुलसी सूर जैसे प्रसिद्ध कवियों, रस सिद्ध कवियों और महात्माओं की दिव्य वाणी उनके अंतः करण से निकलकर देश के कोने-कोने में फैली थी। निश्चित वह हिंदी साहित्य का स्वर्ण युग था।

आदिकाल की कविता का प्रमुख विषय वीरता एवं श्रृंगार का वर्णन के साथ आश्रयदाताओं का अतिशयोक्तिपूर्ण प्रशंसा करना था। रासो साहित्य में ये प्रवृतियाँ प्रचुर मात्र में विद्यमान हैं। अत्यधिक वीरगाथात्मक साहित्य अप्रमाणिक, संदिग्ध एवं परवर्ती काल का है। इस काल में जनसामान्य की आकांक्षाओं को अभिव्यक्त करने का कोई प्रयास नहीं किया गया। ऐसी स्थिति में आदिकाल को हिंदी का स्वर्ण युग कहना किसी भी प्रकार से उचित नहीं हैं। 

रीतिकाल की कविता दरबारी परिवेश से जुड़ी हुई थी। उसमें चमत्कार प्रदर्शन की प्रवृतियाँ, आश्रयदाताओं की प्रशंसा एवं श्रृंगार रस की प्रधानता दिखाई देती है। काव्य में नीति  नैतिकता की ओर ध्यान दिया गया और न ही लोकमंगल की ओर। अतः इस युग को हिंदी साहित्य का स्वर्ण युग की संज्ञा कदापि नहीं दी जा सकती है।

आधुनिक काल का साहित्य अपनी व्यापकता एवं विविधता कि दृष्टि से कुछ अंशों में भक्तिकाल से आगे हैं किन्तु अनुभूति की गहनता और भाव प्रवणता के क्षेत्र में वह भी भक्तिकाल साहित्य के समकक्ष नहीं है।

भक्तिकाल का साहित्य निश्चित रूप से आधुनिक काल के साहित्य से श्रेष्ठतर, अनुपम और विलक्षण है उसका भाव पक्ष मार्मिक तथा कला पक्ष आकर्षण है। भक्तिकालीन साहित्य भारतीय संस्कृति, धर्म, रीति-नीति, दर्शन, विचारधारा आदि का उद्घाटन करता है। समन्वय की जो प्रवृति भक्तिकाल साहित्य में मिलती है, वह कहीं नहीं दिखाई पड़ती है। भक्तिकाल लोकमंगल का साहित्य है जो भटके हुए व्यक्ति को आशा एवं स्फूर्ति और हीन व्यक्ति को स्वाभिमान का संदेश देता है। तुलसी, सूर, कबीर, जायसी, मीरा, रसखान, नानक, हितहरिवंश, नंददास आदि जैसे कवियों की पियूषवर्षिणी वाणी से ‘साहित्य’ शब्द को सार्थक करता है।

भक्तिकाल को स्वर्ण युग कहने के निम्नलिखित तत्व/कारण है:

1. स्वांतः सुखाय काव्य की रचना:

भक्तिकालीन कवियों ने ‘स्वांतः सुखाय’ काव्य की रचना की है। भक्तकवि तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में अपनी काव्य रचना का उद्देश्य स्पष्ट करते हुए घोषणा किया है- “स्वांतः सुखाय तुलसी रघुनाथ गाथा।” कबीर एवं सूर की रचनाएँ भी स्वांतः सुखाय से प्रेरित थीं। काव्य रचना के लिए इन्हें न तो किसी दरबार का आश्रय लेना पड़ा और न ही आश्रयदाता की झूठी प्रशंसा करनी पड़ी। तुलसी ने तो यहाँ तक कहा है कि सांसारिक व्यक्तियों के गुणों का गान करने से सरस्वती भी अपना सुर धुन-धुन करके पछताने लगती है, कि मैंने ऐसे व्यक्ति को कविता करने की शक्ति क्यों दी- “कीन्हे प्राकृतजन गुण गाना सिर धुनि गिरा लगाती पछिताना।” रीतिकाल के कवि किसी राजा के दरबार आश्रय की खोज करते थे, वहीं भक्तिकाल के कवि दरबार और राजा की उपेक्षा करते हुए स्पष्ट घोषणा करते हैं- “संतन कौ कहा सिकरी सौं काम आवत जाय पनहिया टूटी बिसरी गायों हरि नाम।”     

2. लोकमंगल साहित्य की रचना:

भक्तिकालीन कवियों की रचनाएँ लोकमंगल का विधान करने वाली हैं। इन कवियों ने लोकहित को ध्यान में रखकर काव्य की रचना किया। तुलसीदास जी ने तो कविता का उद्देश्य लोकहित को स्वीकार करते हुए कहा है- “कीरति भनिति भूति भली सोई सुरसरी सम सबकहँ हित होई।” अतः वही कविता श्रेयस्कर होती है, जो गंगा के समान सबका हित करनेवाली है। कबीर का संपूर्ण काव्य लोक हितकारी है। समाज की कुरीतियों, पाखंड, अंधविश्वास आदि को दूर करने के लिए उन्होंने निरंतर प्रयास किया। आचरण की शुद्धता एवं कर्म की पवित्रता पर बल देनेवाले कबीर ने अपने उपदेशों से लोकमंगल का विधान करने का पूरा प्रयास किया। सूरदास के काव्य में लोकरंजक की प्रवृति विद्यमान हैं। कृष्ण के मधुर रूप का झांकी अंकित करते हुए उनहोंने जनमानस में प्रेम, माधुर्य एवं सौंदर्य की प्रतिष्ठा की है। जायसी ने सांस्कृतिक धरातल पर हिंदू-मुस्लिम एकता विधान करते हुए लोकमंगल की चेष्टा की है। अन्य किसी भी काल के कवियों ने लोकहित पर अपना ध्यान केंद्रित नहीं किया।

3. अध्यात्मिकता एवं साहित्यिकता का समन्वय:

भक्तिकाल काव्य में अध्यात्मिकता एवं साहित्यिकता का अपूर्व समन्वय दिखाई देता है। तुलसी का रामचरितमानस हिंदू धर्म का व्याख्या करनेवाला ऐसा एक ग्रंथ है, जो प्रत्येक हिंदू के पूजाघर में अपना स्थान रखता है। इस ग्रंथ के प्रति जनसाधारण की इतनी श्रद्धा है कि इसे विघ्न विनाशक मानकर इसके अखंड पाठ आयोजित किया जाता है। रामचरितमानस में भारतीय धर्म एवं संस्कृति की सुन्दर व्याख्या की गई है। यह ग्रंथ अपनी उच्चकोटि की काव्यकला के लिए भी प्रसिद्ध है। कबीर के काव्य में भी उपदेश एवं अध्यात्म की प्रधानता  है। सूरदास के पदों में भी अध्यात्मिक विषयों का उल्लेख है तथा उच्चकोटि के काव्य तत्व के दर्शन होते है।

4. समन्वयवादी प्रवृतियाँ:

भक्तिकालीन कवियों की प्रमुख प्रवृति रही है- समन्वयवाद। विशेष रूप से गोस्वामी तुलसीदास अपने काव्य में समन्वयवादी प्रवृति के कारण लोकप्रिय हुए हैं। वे सच्चे अर्थों में लोकनायक थे लोकनायक वही हो सकता है जो समन्वय कर सके। सगुण और निर्गुण का समन्वय, ज्ञान और भक्ति का समन्वय, शैव और वैष्णव का समन्वय, राजा और प्रजा का समन्वय आदि उनके काव्य में प्रमुख रूप से देखे जा सकते हैं। कबीर के काव्य में भी समन्वय की चेष्टा धार्मिक धरातल पर की गई है। 

5. भाव-पक्ष एवं कला-पक्ष का संतुलन:

भक्तिकाल को स्वर्ण युग मानने का सबसे प्रमुख कारण है। इसमें उपलब्ध भाव पक्ष और कला पक्ष का संतुलन है। इस काल के साहित्य में भाव पक्ष एवं कला पक्ष का मणिकांचन संयोग हुआ है। काव्य में भाषा के विविध रूप दिखाई पड़ते हैं। भक्त कवियों का अनुभूति पक्ष जितना सशक्त है, अभिव्यक्ति पक्ष भी उतना ही सबल है। सूरदास, नंददास, कबीर, मीरा, रसखान जैसे भक्त कवियों के काव्य में भाए-पक्ष की जितनी गहनता है, उतनी ही उत्कृष्टता उनके कला-पक्ष में विद्यमान है

6. भाषा-सौंदर्य:

भक्तिकालीन काव्य में भाषा के विभिन्न रूप दिखाई पड़ते हैं। कृष्णभक्त कवियों ने ब्रजभाषा में काव्य रचना करते हुए, उसे सरस, मधुर और कोमल बनाते हुए व्यापक काव्यभाषा के रूप में प्रतिष्ठित किया। परिणामतः वह परवर्ती हिंदी साहित्य में रीतिकाल तक ही नहीं अपितु आधुनिककाल के प्रारंभिक चरण तक कविता पर एक छत्र अधिकार जमाये रही। सूरदास, नंददास, रसखान की भाषा अपनी कलात्मकता, सरसता एवं मधुरता के कारण रीतिकालीन कवियों की भाषा से श्रेष्ठ है। रामभक्त कवियों तथा सूफी कवियों ने यदपि अवधी का प्रयोग किया तथापि उसमें भी उन्होंने ब्रजभाषा जैसे माधुर्य एवं पदलालित्य उत्पन्न कर दिया। तुलसी एकमात्र ऐसे समर्थ कवि थे जिन्हें अवधी और ब्रज दोनों भाषओं पर सामान अधिकार प्राप्त था। कबीर की भाषा में विभिन्न बोलियों का मिश्रण होने के कारण एकरूपता नहीं नहीं थी।

7. चार प्रमुख काव्य धाराएँ:

भक्तिकाल की काव्य भूमि अत्यंत व्यापक है। इस काल के चार प्रमुख कवि अलग-अलग  काव्यधाराओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। कबीर संत काव्य-धारा के प्रतिनिधि कवि हैं तो जायसी सूफी काव्य धारा के तुलसी रामकाव्य धारा का प्रतिनिधित्व करते हैं, तो सूरदास  कृष्ण-काव्य धारा का। भक्तिकाल का काव्य गुणवक्ता और परिणाम दोनों दृष्टियों से अत्यंत समृद्ध है। अतः हम कह सकते हैं कि भावों की उदारता एवं कला की उत्तमता की दृष्टि से भक्तिकाल हिंदी साहित्य स्वर्ण युग है। अतः भक्तिकाल को हिंदी साहित्य की महानतम उपलब्धि मानना समाचीन है।  

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