करोना (कहानी)

‘करोना’ यह एक ‘वायरस’ का नाम है, जो चीन के ‘वुहान’ शहर ‘हुबेई’ में दिसंबर के महिने में जन्म लिया था। सबसे पहले इस वायरस की पुष्टि एक व्यक्ति के अन्दर हुई थी। पाँच दिन बाद उस बीमार व्यक्ति के 53 वर्षीय पत्नी को निमोनिया हो गया। निमोनिया इस करोना बीमारी का आम लक्षण था।… Continue reading करोना (कहानी)

माँ की भूमिका

‘माँ’ शब्द की कोई परिभाषा नहीं होती है यह शब्द अपने आप में परिपूर्ण है। असहनीय शारीरिक पीड़ा के पश्चात् बच्चे को जन्म देने वाली माँ को भागवान का दर्जा दिया जाता है, क्योंकि ‘माँ’ जननी है। भागवान ने माँ के द्वारा ही सम्पूर्ण सृष्टि की रचना की है।   माता-पिता बनना मनुष्य के जीवन… Continue reading माँ की भूमिका

‘निशात बाग’ का सेव (लघु कथा)

वह हमारी जिंदगी का एक यादगार लम्हा था। कश्मीर के “निशात बाग का सेव”। ये कहानी सन् 1982 ई० की है। उस समय आज की तरह कश्मीर का माहौल खराब नहीं था। सब कुछ बहुत अच्छा था। हम सब बेखौफ हर जगह आ जा सकते थे। सच में हमने “धरती के स्वर्ग” कहा जाने वाले… Continue reading ‘निशात बाग’ का सेव (लघु कथा)

उषा और अनिरुद्ध (अनोखी प्रेम कथा)

‘उषा’ बाणासुर की पुत्री थी और ‘अनिरुद्ध’ श्री कृष्ण भगवान के पौत्र। बाणासुर की पुत्री उषा परम सुंदरी थी। अनिरुद्ध भी कामदेव से सामान सुन्दर थे। उषा ने अनिरुद्ध के सुन्दरता और बल की चर्चा सुनी थी, लेकिन देखा नहीं था। एक दिन उषा गहरी नींद में सो रही थी। सपने में एक सुन्दर राजकुमार… Continue reading उषा और अनिरुद्ध (अनोखी प्रेम कथा)

भविष्य के सपने (लघु कथा)

एक दिन हिन्दी की एक शिक्षिका दशवीं कक्षा में हिन्दी पढ़ा रही थी। आने वाले कुछ महीनों बाद वार्षिक परीक्षा होने वाली थी। पाठ समाप्त करने के पश्चात् शिक्षिका ने बच्चों से पूछा कि आप सब बड़े होकर क्या बनना चाहते हैं? एक बच्चे ने कहा, बड़ा होकर मैं डॉक्टर बनना चाहता हूँ। दूसरे ने… Continue reading भविष्य के सपने (लघु कथा)

ज्ञान का अहंकार (कहानी)

महाकवि कालिदास के कंठ में साक्षात माता सरस्वती का वास था। कालिदास को शास्त्रार्थ में कोई भी पराजित नहीं कर सकता था। अपार यश, प्रतिष्ठा और सम्मान को पाकर कालिदास जी को अपने विद्वता और ज्ञान पर घमंड हो गया था। उन्हें लगा कि उनसे बड़ा ज्ञानी कोई नहीं है। एक बार पड़ोसी राज्य से… Continue reading ज्ञान का अहंकार (कहानी)

दुष्यंत और शकुंतला (कहानी)

प्रेम ना बारी उपजै प्रेम ना हाट बिकाय, राजा प्रजा जेहि रुचै, शीश देयी ले जाए। कबीरदास जी कहते है कि प्रेम ना तो खेत में पैदा होता है और ना ही बाजार में बिकता है। राजा हो या प्रजा जो भी चाहे इसे (प्रेम को) अपना सिर झुका कर अथार्त घमंड को छोड़कर प्राप्त… Continue reading दुष्यंत और शकुंतला (कहानी)

सात समन्दर पार (कहानी)

ऐसा लोग कहते हैं कि जोड़ी भगवान के घर से ही बनकर आता है। कहाँ तक सच है? हम सब को पता नहीं। एक मास्टर जी अपने परिवार के साथ शहर में रहने के लिए गए। मास्टर जी की पत्नी एक सुशील और धार्मिक विचार की महिला थी। उनके दो बेटे थे। बड़े का नाम… Continue reading सात समन्दर पार (कहानी)

वो बीते हुए दिन (कहानी)

‘प्रेम’- इस ढाई अक्षर के प्रेम शब्द को परिभाषित करना अत्यंत ही कठिन है। ‘प्रेम’ शब्द का कोई रंग, रूप या आकर नहीं होता है। इसे हम सब भावना के द्वरा ही महसूस करते हैं। प्रेम को ‘रूप’ और ‘आकर’ हम मनुष्य ही दे सकते हैं जैसे माँ-पिता, भाई-बहन, दादा-दादी, चाचा-चाची, प्रेमी-प्रेमिका के प्रेम सम्बन्ध… Continue reading वो बीते हुए दिन (कहानी)

गुजरी महल (कहानी)

भारत के इतिहास में कई सफल और असफल प्रेमी-प्रेमिकाओं की प्रेम कहानियाँ है जिसे कभी भी भुलाया नहीं जा सकता है। ये प्रेम कहानियाँ सुनने में परिलोक की कथा जैसी लगती हैं। जिसमे सिर्फ सुख ही सुख होता हो दुख तो कभी आता ही नहीं है। ये प्रेम कहानियाँ इतनी आसान और इतनी सरल नहीं… Continue reading गुजरी महल (कहानी)