‘हाइकु’ मूल रूप से जापानी कविता की एक विधा है। इसका प्रचलन 16वीं शताब्दी में प्रारम्भ हो गया था। हाइकु का जन्म जापानी संस्कृति की परम्परा और जापानी लोगों के सौंदर्य चेतना में हुआ था। हाइकु में अनेक विचार धाराएँ मिलती है जैसे- बौद्ध-धर्म, चीनी दर्शन और प्राच्य-संस्कृति आदि। यह भी कहा जा सकता है कि हाइकु में इन सभी विचार धाराओं की झाँकी मिल जाती है या हाइकु इन सबका दर्पण है।
Author: इंदु सिंह
प्रेम और भक्ति
भारत में त्याग की परम्परा पुरातन काल से ही चली आ रही है। हमारे देश में अनेक महापुरुष, नारी, विद्वान आदि त्यागी हुए है जो देश और धर्म के लिए बड़े से बड़ा त्याग कर चुके हैं। त्याग करने में वे थोड़ा भी हिचकिचाते नहीं हैं। त्याग की भावना अत्यंत पवित्र है। त्याग करने वाले लोग ही संसार को प्रकाशमान बनाते हैं। गीता में भगवान कहते हैं कि “त्याग से शांति की प्राप्ति होती है और जहाँ त्याग है वही शांति होती है”।
सफ़र जिंदगी का (कविता)
आज एक झलक देखी मैंने अपनी जिंदगी उससे पूछी ऐ जिंदगी! अभी तक जो मैंने जिया, क्या वही थी मेरी जिंदगी?
प्रहरी
फौज का नाम सुनते ही हम सब का मन फौजी के प्रति आदर और सम्मान की भावना से भर जाता है। देश के रक्षक के रूप में उनके सेवा, त्याग और कर्तव्य निष्ठा के प्रति हम अपनी सेना के लोगों पर गर्व करते हैं और दिल से उनका आदर करते हैं। वे हमारे देश और… Continue reading प्रहरी
ऋतुराज बसंत
भारतवर्ष के प्रसिद्धी के अनेक कारण है जैसे- साहित्य, संस्कृति, संस्कार, भाषा आदि। भारत को ऋतुओं का देश भी कहा जाता है। भारत अनेकता में एकता का उदहारण प्रस्तुत करता है। वैसे तो हमारे देश में छः ऋतुएँ हैं लेकिन मुख्य रूप से चार का महत्व अधिक है- बसंत ऋतु, ग्रीष्म ऋतु, वर्षा ऋतु और… Continue reading ऋतुराज बसंत
बचपन के दिन (कविता)
गुरु का महत्व
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वर: ।गरु:साक्षात् परब्रह्म, तस्मै श्रीगुरुवे नमः।। पौराणिक समय से ही हमारे देश में गुरु का विशेष महत्व है। गुरु ही शिष्य के जीवन में ज्ञान रूपी प्रकाश फैलता है। कबीर दास जी भी कहते है कि गुरु कुम्भार शिष कुंभ है, गढ़ी-गढ़ी काढ़ै खोट।अंतर हाथ सहारि दै, बाहर बाहै चोट।। … Continue reading गुरु का महत्व
मिथ्या सत्य (कविता)
सत्य और मिथ्या दो है भाई, दोनों में थी हुई लड़ाई । साथ कभी ना रह सकते, क्योंकि दोनों की सोच अलग थी। कभी एक आगे बढ़ जाता, और दूसरा रह जाता पीछे। ऐसा लगता है कि, मिथ्या का ही है जमाना।
शिक्षण और प्रशिक्षण
सचिव वैद्य गुरु तीन जौं प्रिय बोलहिं भय आस ।राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास ।। गोस्वामी तुलसी दास जी ने कहा है कि मंत्री, वैद्य और गुरु यदि भय बस सच न बोलकर (हित की बात न कहकर) प्रिय बोलें अर्थात सामने वाले को खुश रखने के लिए बोलें तो उस… Continue reading शिक्षण और प्रशिक्षण
किन्नर (कविता)
“वाह रे ! कुदरत तेरी कैसी खेल निराली, एक का घर भर दिया, दुसरे की झोली भी खाली । जिसको दिया आधा, दिल का वही है राजा, फिर भी घर-घर घूमकर, बजाता है बाजा । वे अपनी पहचान को भी हैं तरसते, फिर भी, उनकी दुआओं से हैं दुसरों के घर सजते ।।” “ना तो… Continue reading किन्नर (कविता)



