रीतिकालीन कवि: घनानंद

रीतिकाल में प्रमुख तीन काव्य धाराएँ थी- रीतिबद्ध, रीतिसिद्ध और रीतिमुक्त। कवि घनानंद रीतिमुक्त काव्यधारा के अग्रणी कवि थे। कवि के व्यक्तित्व और कृतित्व की रचना उनके कवित्व ने स्वयं ही की है-

“लोग हैं लागि कवित्त बनावत, मोहे तौ मेरे कवित्त बनावत”

अनुमान से इनका जन्म का समय संवत् 1730 के आसपास माना जाता है। इनका जन्म बुलंदशहर के एक कायस्थ परिवार में हुआ था। घनानंद युवावस्था में ही दिल्ली चले गए और अपनी प्रतिभा के बल पर मुगल सम्राट मुहम्मद शाह रंगीला के मीर मुंशी बन गए। घनानंद कविता में निपुण और सिद्ध संगीतकार थे। मुग़ल दरबार में इनका काफी सम्मान बढ़ गया था जिसके कारण अन्य दरबारी इनके विरोधी हो गए थे। वे घनानंद को दरबार से निकलवाना चाहते थे।

एक दिन दरबारियों ने राजा से कहा- मीर मुंशी बहुत अच्छा गाते हैं। बादशाह ने उन्हें गाने के लिए कहा किन्तु घनानंद बादशाह के बात को टालते रहे। यह देखकर दरबारियों ने बादशाह को बताया कि मीरमुंशी ‘सुजान’ के कहने पर अवश्य गायेंगे। सुजान बादशाह के दरबार में नर्तकी थी। सुजान के कहते ही कवि घनानंद सुजान कि ओर मुख और बादशाह की ओर पीठ करके बहुत ही अच्छे सुर में गाना गाने लगे। उनके संगीत को सुनकर बादशाह और सभी दरबारी मन्त्र-मुग्ध हो गए परन्तु पीठ फेर कर गाने की इस बे-अदबी के कारण नाराज होकर बादशाह ने घनानंद को दरबार छोड़ने का आदेश दे दिया। घनानंद ने सुजान को भी अपने साथ चलने के लिए कहा लेकिन नर्तकी सुजान ने घनानंद के इस आग्रह को ठुकरा दिया। सुजान के इस विश्वसघात से घनानंद को बहुत धक्का लगा। इसी गहरे दुःख के कारण वे विरक्त होकर वृन्दावन चले गए। वहीं वे वृन्दावन में निम्बार्क वैष्णव संप्रदाय में दीक्षित हो गए। वृन्दावन जाने के बाद उनके मन को शांति मिली और सुजान का प्रेम, राधा-कृष्ण के प्रेम में परिवर्तित हो गया।

घनानंद ‘स्वछंद मार्गी’ प्रेमी कवि थे। प्रेम के कई रूप होते हैं,

नेह – छोटों के प्रति प्यार,

प्रीत – इश्क, मुहब्बत अपने बराबर वालों के साथ,

प्रेमी – प्रेमिका-पत्नी का संबंध,

श्रध्दा – भक्ति-ईश्वर के साथ प्रेम आदि।

प्रेम अमूर्त विषय है। इसे वाणी से नहीं भावों से ही अभिव्यक्त किया जा सकता है। हर व्यक्ति प्रेम का भूखा होता है। कवि घनानंद को भी मुग़ल दरबार की नर्तकी सुजान से प्रेम हो गया था। कवि ने सुजान के सौंदर्य के आधार पर सुन्दरता के अनेक दशाओं की व्यंजना की है। कवि अपनी नायिका की विशेषता बताते हुए कहते हैं–

रावरे रूप की रीति अनूप, नयो-नयो लागै ज्यों-ज्यों निहारियै।

त्यों इन आंखिन बानि अनोखी अधानि कहूँ नहिं आन तिहारिये।

कवि कहते हैं- प्रिय के सुन्दर रूप से प्रियतम को कभी भी तृप्ति नहीं मिलती है। वह जीतनी बार भी उसे देखता है उतनी बार उसे नई लगती है। जब से सुजान को घनानंद ने देखा  है तब से उनकी आँखें किसी और को देखना ही नहीं चाहती है। उनके आँखों में सिर्फ सुजान ही बसी थी। घनानंद की कविता में सुजान की परम प्रेम की व्यख्या है। घनानंद स्वयं प्रेमी थे। उनका सुजान से गहरा और एक तरफा प्रेम था।

अति सूधो सनेह को मारण है, जहाँ नेकु सयानप बांक नहीं।

तहाँ सांचे चलै तजि आपनयौ झझकै कपटी जे निसांक नहीं।।

घनानंद की कविता का प्राण उनकी प्रेम की विरहानुभूति थी। घनानंद की कविता में प्रेम के पीर की अनेक रूप विधमान हैं। घनानंद के जीवन में प्रेम का स्थान बहुत ही ऊँचा था। उनका सम्पूर्ण जीवन काव्य प्रेम रुपी रस से ओत-प्रोत था। इनका प्रेम सामान्य नहीं उदात्त था। इन्होंने सुजान के पेशे से नहीं, सुजान से प्रेम किया था। घनानंद ने सुजान से नकारात्मक प्रतिक्रिया पाकर भी प्रेम करना नहीं छोड़ा बल्कि उन्होंने सुजान के प्रेम को अपनी रचनाओं में पिरोकर उसे और भी अमर बना दिया। प्रेम के मार्ग में इन्हें जो दुःख और पीड़ा मिली उससे वे निराश नहीं हुए बल्कि और भी उत्साह से प्रेम के पथ पर आगे बढ़ते चले गए। घनानंद ने अपने प्रेम को आध्यात्मिकता की पराकाष्ठा तक पंहुचा दिया। घनानंद ने जिस तरह प्रेम रूपी सागर में डूबकर सुजान से प्रेम किया उसी तरह आध्यात्म रूपी सागर में डूब कर भगवान श्री कृष्ण से भक्ति किया। घनानंद ने प्रेम और भक्ति के बीच की रेखाओं को मिटा दिया। इनका लौकिक प्रेम कब अध्यात्मिक प्रेम में बदल गया यह उन्हें भी नहीं पता चला। घनानंद को प्रेम में पीड़ा मिलती है लेकिन उस पीड़ा में ही वे आनंद का अनुभव करते हैं। प्रेम को ये साधना का दर्जा देते हैं तथा प्रेम के दोनों ही पक्षों (संयोग और वियोग) को सम्पूर्णता से अनुभव करते हैं। वे ‘संयोग’ का अनुभव जिस तन्मयता के साथ करते हैं, ‘वियोग’ का भी अनुभव उसी तन्मयता के साथ करते हैं। घनानंद के प्रेम में पलायन का भाव कहीं भी नहीं मिलता है और न ही निराशा दिखाई देती है। प्रेम में विरह से पलायन के लिए मृत्यु का वरन करना तो इनकी दृष्टि में कायरता थी। इसीलिए घनानंद ने प्रेम के दो परम्परागत आदर्श के प्रतीक माने जाने वाले ‘मछली’ और ‘पतंग’ की भर्त्सना (फटकार) की है-

“हमें मरिबो बिसराम गनै वह तो बापुरो मीट तज्यौ तरसै।

वह रूप छठा न सहारि सकै यह तेज तवै चितवै बरसे।

घनआनंद कौन अनोखी दसा मतिआवरी बावरी ह्वै थरसै।

बिछुरे-मिले मीन-पतंग-दसा खा जो जिय की गति को परसै।।”

सुख हो या दुख, दोनों की तीव्र और अत्यधिक घनीभूत अनुभूति वर्णनातीत हो जाती है। घनानंद की प्रेमानुभूति भी ऐसी ही है जिससे इनकी कविताओं में काफी कुछ मौन से ही सम्प्रेषित हो जाता है। घनानंद की बात (काव्य का कथ्य) रुपी दुल्हन, ऊर रुपी भवन में मौन का घूँघट डालकर बैठी रहती है। कोई काव्य मर्मज्ञ ‘सुजान’ ही इसे प्राप्त कर सकता है। –

“उर भौन में मौन को घूँघट कै दुरि बैठी बिराजत बात बनी।

मृदु  मंजू  पदार्थ-भूषन सों  सुलसै  हुलसै  रस-रूप  मनी।।”

घनानंद स्वयं अपने प्रिय को सम्बोधित करते हुए कहते हैं कि मैं तुमसे कितना प्रेम करता हूँ इसे शब्दों में कैसे व्यक्त करूँ? मैं नहीं कर सकता हूँ तथा करने की आवश्यकता भी नहीं क्योंकि तुम ‘सुजान’ हो। कुछ भी कह सकने में असमर्थ और चातक की भाँति बादल की ओर दृष्टि लगाये प्रिया का ध्यान सारे संसार से हटकर प्रिय की ओर ही लगा हुआ है।

“मन  जैसे कछू तुम्हें चाहत है सु-बखनीयै कैसे सुजान ही हौ।

इन  प्राननि  एक सदा गति रावरे, बावरे लौं लगियै नित लौ।

बुधि  और  सुधि नैननि बैननि मैं करिबास निरंतर अंतर गौ।

उधरौ जग चाय रहे घनआनंद  चातिक  त्यौं तकिये अब तो।।  

घनान्द का प्रेम इसलिए भी अनोखा है क्योंकि इसमें इनका अथवा इनकी इच्छा का कोई महत्व नहीं है बल्कि इनका सारा हृदय-व्यापार ही इनके प्रिय पर केंद्रित है। प्रेम को सामान्यतः आग का दरिया आदि कहा गया है। स्वयं घनानंद के समकालीन कवि बोधा प्रेम के विषय में कहते हैं कि – 

“यह प्रेम को पंथ कराल महा, तलवार की धार पे धावनों है।”  

परन्तु इस मान्यता के विपरीत घनानंद ने कहा है –

“अति सूधो सनेह कर मारग  है जहाँ नेकु सयानप बाँक नहीं। 
तहाँ साँचे  चलैं तजी  आपुनपो  झझकैं कपटी जे निसाँक नहीं। 
घनआनंद प्यारे सुजान  सुनौ  आईटी एक ते दुसरो आँक नहीं। 
तम कौन धौ पाटी पढ़े हो लला मन लेहु पाई देहु छटाँक नहीं।।” 

घनान्द की प्रेमानुभूति अद्भुत है, अद्वितीय है। ऐसा इसलिए है क्योंकि ये उनकी स्वभुक्त अनुभूति है न की किताबी अथवा सुनी-सुनाई। इनका पूरा जीवन ही प्रेम को समर्पित है। इस तरह से प्रेम के सागर में डूब कर प्रेम करने वाले शायद ही मिले। इनकी प्रेमानुभूति इतनी विलक्षण थी कि कृष्ण और ब्रज-भूमि के कण-कण से इन्हें इतना प्रेम था कि ये ब्रज की रज में लोटते हुए मरना चाहते थे। कहा जाता है कि नादिरशाह के सैनिक जब इन्हें मारने लगे तब इन्होंने उनसे मुस्कुराते हुए कहा था कि वे उन्हें तड़पा-तड़पा कर धीरे-धीरे मारें ताकि वह ब्रज की रज-रज में भली-भांति लोट कर मरें। प्रेम की ऐसी विलक्षण अनुभूति दुर्लभ है। 

घनानंद की विरहानुभूति –  घनान्द विरह के कवि के रूप में प्रसिद्ध थे। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने भी इस सन्दर्भ में लिखा है वास्तव में इन्होंने संयोग के सुख को पूरी सम्पूर्णता के साथ भोगा है। संयोग की ये पूर्णता ही इनके वियोग वर्णन को प्रभावशाली बनाती है। संयोग में इन्हें जो तीव्र घनीभूत अनुभूति हुई उसी कारण इनका वियोग भी मर्मांतक सिद्ध हुआ। बिना संयोग के वियोग कैसे संभव है? संयोग के बिना वियोग के स्वर या तो काल्पनिक होंगे जो प्रभावहीन हो जाएँगे या फिर रहस्यात्मक। परन्तु घानन्द के साथ ऐसा नहीं था। इसलिये इनका वियोग अधिक प्रभावीशाली और प्रसिद्ध था क्योंकि इनकी विरहानुभूति वास्तविक और लौकिक है। इन्होंने सुजान से खुलकर प्रेम किया, पूर्ण रूप से स्वतंत्र एवं स्वछंद होकर इसलिए इनकी विरहानुभूति भी बहुत ही मार्मिक हुई। इस तरह ये विरहानुभूति की विलक्षणता के हिंदी साहित्य में एकमात्र कवि हैं। अपनी विरह की रचनाओं से ये हिंदी साहित्य के किसी भी काल के अन्य कवियों से भारी पड़ते हैं। इस मामले में छायावादी कवि भी इनसे पिछड़ जाते हैं क्योंकि उनका संयोग अपने आप में अपूर्ण है। इनकी विरह-वेदना में ऐसी ताप है जिसके ज़िक्र भर से जीभ में छाले पड़ जाए और न कहें तो ह्रदय विरह वेदना को कैसे सहे?

हिय  ही  मढ़ी  घुटी रहौं तो दुखी जिय क्यौं करी ताहि सहै ।

कहिये किहि भाँति दसा सजनि अति ताती कथा रास्नानि दहै।

घनान्द के जीवनवृत्त को देखकर यह स्पष्ट हो जाता है कि सुजान के व्यवहार से इनके ह्रदय को बड़ी ठेस पहुँची और ये ठेस इतनी मर्मान्तक सिद्ध हुई की इनके जीवन की दिशा ही बदल दी। वियोग के कारणों और रूपों की विवेचना करते हुए डॉ० रामचन्द्र तिवारी ने अपने ‘मध्ययुगीन काव्य साधना’ नामक ग्रन्थ में लिखा है “इन सभी वियोगों में सबसे अधिकमर्मांतक विश्वासघात-जनित वियोग होता है। यह जीवन की धारा को बदल देता है। घनानंद का वियोग इसी कोटि का था। जिसने उनके जीवन की दिशा को ही बदल दिया। वे श्रृंगारी कवि से भक्त कवि हो गए।” घनानंद  कभी भी सुजान की निष्ठुरता को भुला नहीं पाए थे। इनका हृदय सुजान से फट जाता है, परन्तु वे उससे घृणा नहीं करते हैं। घनानंद विरहानुभूति की ताप में तपते रहते हैं। सुजान से मिला अपकार और उसके बाद भी उसके प्रति इनका प्रेम तथा इनके व्यक्तिगत प्रेम का राधा-कृष्ण की प्रेम-मूर्ति में विलय हो जाना, ये सब मिलकर इनके काव्य को विलक्षणता प्रदान करते हैं।

“तुम  ही  गति हौ तुम ही माटी हौ तुमहि पति हौ अति दीनन की।

नित  प्रीति  करौ  गुन-हीनन  सौ  यह  रीती  सुजान प्रवीनन की।

बरसौ  घनआनंद जीवन  को  सरसौ   सुधि  चातक  छीनन   की।

मृदुतौ  चित के पण पै द्रित के निधि हौ  हित कै  रचि मीनन की ।।”

प्रस्तुत  पद  में कृष्ण या सुजान को अलग करना  दुष्कर है। घनानंद के वियोग सम्बंधित पदों में इनके आत्मा की कातर ध्वनि सुनी जा सकती है। इनके पद ऐसे लगते हैं मानों सुजान के प्रति इनके सन्देश हों। ऐसा ही एक पद यहाँ दृष्टव्य है जिसमें निवेदन और उपालम्भ के स्वर कितने स्पष्ट हैं- 

“पाहिले अपनाय  सुजान  सो, क्यौं  फिरि  तेह  कै  तोरियै  जू।

निरधार  आधार  दै  धार मझार   दई  गहि  बाँह न  बोरियै जू।
      घनआनंद अपने  चातिक  को  गन  बंधी  लै  मोह न छोरियै  जू 
      रस प्याय कै ज्वाय, बढ़ाय कै आस, बिसास में यौं बिस घोरियै जू।।”

घनानंद  के अतीत की सुन्दर प्रेमानुभूति अब विरहानुभूति का शूल बनकर हृदय में धँस गई है। अतीत के संयोग की मधुर स्मृतियाँ विरहाग्नि में घृत का कार्य कर रहीं हैं। इसी सन्दर्भ का एक पद यहाँ दृष्टव्य है जिसमें एक रमणी अपने प्रिय को उसके अनीतिपूर्ण आचरण के लिए उपालम्भ देते हुए कहती है-

“क्यों हँसि हेरी हर्यो हियरा अरू क्यों हित कै चित चाह बधाई।

कहे    को   बोली  सने  बैननि   चैननि  मैं  निसैन  चढ़ाई ।

सो सुधि मो हिय में घनआनंद  सालति  क्यों हूँ  काढ़ै न कढ़ाई।

मीत सुजान अनीति  की  पाटी  इतै पै न  जानिए कौन पढ़ाई।।”

वियोग में हृदय जलता है और आँखें बरसती है। इन आँखों को बरसना भी चाहिए  क्योँकि इन्होंने ही तो प्रिय की सुन्दर छवि को हृदय तक पहुँचाया। हृदय का इसमें क्या दोष?  पहले जो आँखें प्रिय की सुन्दर छवि को देख-देख कर प्रसन्न होती थी, तृप्त होती थी, वही आँखें अब दिन-रात अश्रु बहाती रहती है। आँखों की दीन दशा का घनानंद ने काफी अच्छा वर्णन किया है-

“जिनको  नित  नाइके  निहारती  ही तिनको  रोवती हैं।

पल-पाँवड़े  पायनी  चायनी  सौं  अँसुवानि की धरणी  हैं।

घनआनंद  जान सजीवन को सपने बिन पाईए खोवति हैं।

न खुली-मुंदी जान परैं कछु थे दुखदाई जगे पर सोवती हैं॥”

इस  संसार में सच्चा प्रेम करने वाले स्नेही लोग बहुत ही कम हैं। जैसे ही दो प्रेमियों के बीच के प्रेम की सुगंध का आभास लोगों को मिलता है वैसे ही लोग उनके विपरीत हो जाते हैं। माता-पिता, भाई-बंधु, नाते-रिश्तेदार आदि कोई भी साथ नहीं देता है। यह समाज तो सदा से प्रेम विरोधी रहा है पर शायद विधाता को भी सच्चे प्रेमियों से चिढ़ है, तभी तो वह वियोग की सेना सजाकर प्रेमी युगलों पर टूट पड़ता है

“इकतो जग मांझ सनेही कहाँ, पै कहूँ जो मिलाप की बास खिलै।

तिहि देखि सके न बड़ो विधि कूर, वियोग समाजहि साजि मिलै।”

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