घूंघरू (कविता)

मैं घूंघरू हूँ ! अजीब है जिंदगी मेरी,

कभी पैरों की शोभा बढ़ाती हूँ मैं ।

जिस पग में बांधी जाती हूँ

नाम वही पा जाती हूँ,

मैं घूंघरू हूँ ! अजीब है जिंदगी मेरी।

मैं कभी मंदिरों में बजती हूँ,

कभी महफिल में बजाई जाती हूँ।

कभी तोड़ी जाती हूँ।

कभी टूट के बिखर जाती हूँ,

मैं घूंघरू हूँ ! अजीब है जिंदगी मेरी।

कभी कोठों पर सजाई जाती हूँ,

कभी किन्नर संग बजाई जाती हूँ।

जहाँ भी चली जाती हूँ,

नाम वही पा जाती हूँ।

मैं घूंघरू हूँ ! अजीब है जिंदगी मेरी।

कहीं नाम मिली,

कहीं बदनाम हुई ।

मीरा के पग में दीवानी कहलाई।

रक्काषा के पग में बदनाम हुई।

मैं घूंघरू हूँ ! अजीब है जिंदगी मेरी।

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