हम हंसना भूल गए (कविता)

अपने आप में इतना उलझ गए हैं, कि  

हम हंसना भूल गए हैं।

दूसरों को सुखी देखकर, अपने सुख को भूल गए हैं।

इसलिए हम हंसना भूल गए हैं।

दूसरे की बुराई देखने में, अपनी बुराई भूल गए हैं ।

इसलिए हम हँसना भूल गए हैं ।

मोबाईल में समय गवांकर, अपनों से दूर हो गए हैं ।

इसलिए हम हंसना भूल गए हैं ।

सुख कि खोज में गाँवों को छोड़, शहर आ गये हैं ।

इसलिए हम हँसना भूल गए हैं ।

गाँव, नगर सब कुछ छुट गया, अब अकेले रह गए हैं ।

इसलिय हम हँसना भूल गए हैं।

अपने आप में इतना उलझ गए हैं, कि  

हम हंसना भूल गए हैं।।

Leave a comment

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.