राजपूत

जावेद अख्तर साहब जो एक कवि, हिंदी फिल्मों के गीतकार और पटकथा लेखक हैं उन्होंने ट्वीटर पर ट्विट किया था कि “राजपूत बहुत कमजोर थे”। फ़िल्म ‘पद्मावती’ पर जावेद अख्तर” ने ऐसा कहा था कि राजपूत रजवाड़े अंग्रेजों से तो लड़े नहीं, अब सड़कों पर आ रहे हैं। ये सब उनके अपने विचार और सोंच का हिस्सा है। हम अपनी सोंच और विचार में बंधकर किसी वर्ग, जाति, धर्म या समूह पर नकारत्मक टिप्पणी नहीं कर सकते हैं खास करके वे लोग जो सामाजिक जीवन में सम्मान जनक स्थिति में हों उन्हें यह अवश्य सोंचना चाहिए कि उनको प्रतिष्ठा के उस स्तर तक पहुँचाने में किसी वर्ग या समुदाय विशेष का ही हाथ नहीं है बल्कि पूरे समाज का सहयोग और योगदान होता है फिर वे इस तरह की टिप्पणी कैसे कर सकते हैं? उनकी अहंकार भरी ऐसी टिप्पणी की निंदा होनी चाहिए। पता नहीं कब तक अहंकार में चूर लोग इस तरह की व्यवहार से समाज को ‘जाति’ और ‘धर्म’ के नाम पर एक दूसरे को भला-बुरा कहते रहेंगें और आपस में लड़ाते रहेंगें।

असल में राजपूतों के इतिहास औए वीरता की कहानियों को इसी मानसिकता वाले लोगों ने मुगलकालीन भारत के इतिहास में दबाने और छुपाने की कोशिश की है और स्वतंत्र भारत में भी तुष्टिकरण की राजनीति ने राजपूतों की गौरवशाली इतिहास तथा हिन्दू सभ्यता और संस्कृति के रक्षकों की कुर्वानियों को छुपाने और दबाने का कार्य किया है। हमारे पाठशालाओं, विद्यालयों और विश्वविधालयों में कभी भी इस वीरता और त्याग के इतिहास को पढ़ाया ही नहीं जाता है। सिर्फ उन्हीं लोगों की कथा और कहानियाँ पढाई जाती है जिन्होंने देश को सिर्फ लुटा है तथा हिन्दू धर्म भारतीय सभ्यता और संस्कृति के गौरव को क्षति पहुँचाने का काम किया है। इसतरह से इनलोगों ने आधुनिक समाज के सामने इतिहास को तोड़ मरोड़ कर पेश किया है।

जिन लोगों ने कहा कि ‘राजपूत कमजोर हैं उन लोगों ने कभी राजपूत वीरों की वीरता की कहानियाँ पढ़ी ही नहीं है। कोई बात नहीं आपने नहीं पढ़ी है ये आप की गलती है। भारत के कई वीर राजपूतों की वीरगाथा के इतिहास को तक़रीबन हर हिन्दुस्तानियों ने पढ़ा और सुना होगा। यहाँ इतिहास के पन्नों में छुपाये गये कई ऐसे राजपूतों की वीरता की चर्चा करुँगी जिनके नाम से ही कई मुश्लिम शासकों ने अपने घुटने टेक दिए थे।

1. सन् 1840 काबुल का युद्ध- सन् 1840 ई. में हुए काबुल के युद्ध के बारे में बहुत कम लोग जानते है। इस युद्ध में 8,000 पठानों की सेना ने 1,200 राजपूतों के साथ युद्ध किया था। ये 8,000 पठान मिलकर भी 1,200 राजपूतों का मुकाबला नहीं कर सके थे।

2. चितौड़ की तीसरी लड़ाई– चितौड़ की तीसरी लड़ाई में मुगलों को मुँह की खानी पड़ी थी। यह लड़ाई मुगलों और राजपूतों के बीच में हुई थी। इस युद्ध में राजपूतों की 8,000 सेना और मुगलों की 60,000 सेना थी। इस युद्ध में 48,000 हजार सैनिक मारे गए थे जिसमें  8,000 राजपूत और 40,000 मुग़ल थे। 10,000 के करीब घायल हुए थे। अगर राजपूत 15,000 होते तो शायद अकबर जिन्दा नहीं बचता। 

3. सुमेल-गिरी युद्ध : मारवाड़ के 6 हजार योद्धाओं ने शेरशाह की 80 हजार से ज्यादा मुगल सेना को पीछे हटने को मजबूर कर दिया था। मारवाड़ के रण बांकुरों के शौर्य की साक्षी रही सुमेल गिरी रणभूमि इतिहास के पन्नों में अपने गौरव के लिए जानी जाती है। पहाड़ी दर्रों के बीच हुए हल्दी घाटी युद्ध से भी 32 साल पूर्व मारवाड़ के पहाड़ी मैदान में लड़ी गई इस लड़ाई के जांबाज राव जैता, राव कूंपा, राव खींवकरण, राव पंचायण, राव अखैराज सोनगरा, राव अखैराज देवड़ा, राव सूजा, मान चारण, लुंबा भाट अलदाद कायमखानी सहित 36 कौम के लगभग 6 हजार (कुछ किताबों में 12 हजार) सैनिकों ने शेरशाह की 80 हजार सैनिकों की भारी भरकम सेना का डटकर मुकाबला किया था। शासक मालदेव के प्रति विश्वास और जन भावना से उपजे जोश के बूते इन जांबाजों ने सीमित संसाधनों के बावजूद भी अपना रण कौशल दिखाया था। इससे शेरशाह के सैनिकों में भगदड़ मच गई थी। छोटी सेना के बड़े पराक्रम को भांप कर शेरशाह के सैनिकों ने उनको गिरी-सुमेल छोड़ने की सलाह दी थी और बौखलाए शेरशाह को तब यह कहना पड़ा था कि “एक मुट्ठी बाजरे के लिए वह दिल्ली की सल्तनत खो देता।’ इस रण में मारवाड़ के पराक्रमी जांबाज शहीद हो गए लेकिन इनका युद्ध कौशल, युद्ध स्थल इतिहास का अध्याय बन गया।

4. हल्दी घाटी की लड़ाई- यह युद्ध 18 जून सन् 1576 ई. को महाराणा प्रताप और मुग़ल बादशाह अकबर के बीच लड़ा गया था। यह युद्ध महाभारत के युद्ध की तरह विनाशकारी युद्ध सिद्ध हुआ था। मुट्ठी भर राजपूत सैनिकों के बल पर महाराणा प्रताप ने अकबर की सेना के छक्के छुड़ा दिए थे। कई वर्षो तक चली इस लड़ाई में महाराणा प्रताप की वीरता और युद्ध कौशल के आगे अकबर की विशाल सेना पश्त होती रही। मेवाड़ को जितने के लिए अकबर ने बहुत कोशिश किया लेकिन न तो वो जीत सका और ना ही महाराणा प्रताप ने कभी हार मानी। 

5. तराईन की लड़ाई– मुहम्मद गौरी ने पृथ्वीराज पर 18 बार आक्रमण किया। जिसमे 17 बार मुहम्मद गौरी को पराजित होना पड़ा था। 17 बार मुहम्मद गौरी को पराजित करने वाले पृथ्वीराज चौहान ने इंसानियत के नाम पर 17 बार मुहम्मद गौरी को जीवन दान दिया ये अलग बात है कि 18वीं बार की लड़ाई में हार जाने के बाद मुहम्मद गौरी ने उनको बहुत तरह के अमानवीय यातनाएं दी जो कोई भी हिन्दू राजा कभी भी किसी दुश्मन के साथ नहीं कर सकता था।

6. बाप्पा रावल और राणा सांगा जैसे योद्धाओं के नाम से ही कई मुग़ल शासक और मुग़ल महिलाएँ कांपने लगती थी।

7. रावत रत्न सिंह चुंडावत की रानी हाडा का त्याग पढ़ाया ही नहीं गया है, जिसने अपना सिर काटकर रणभूमि में भेज दिया था।

8. पाली के “आउला ठाकुर खुशाल सिंह चम्पावत” के गाथा को नहीं पढ़ाया जाता है, जिन्होंने एक अंग्रेज अफसर के सिर को काटकर किले पर लटका दिया था।

9. दिलीप सिंह जूदेव को नहीं पढ़ाया जाता है जिन्होंने एक लाख आदिवासियों को दुबारा हिन्दू बनाया था।

10. अलवर के राजा जयसिंह और रॉल्स रॉयस में कचरा ढोने की कहानी। यह कहानी सन् 1920 ई. की है। राजा जयसिंह लंदन घुमने गए हुए थे। एक दिन राजा जय सिंह लंदन के ब्रांड स्ट्रीट में सैर कर रहे थे। उसी बीच उनकी नजर वहां रॉल्स रॉयस कार के शोरुम पर पड़ी। उन्हें यह कार देखने में अच्छी लगी थी। जिसके कारण वे कार को खरीदने की इच्छा से शोरुम के अन्दर देखने गए थे। वहाँ शोरुम के एक शेल्समैन ने राजा जय सिंह को मामूली भारतीय समझ कर बुरी तरह बेइज्जत करके बाहर निकाल दिया था। इस बेइज्जती के बाद राजा जय सिंह अपने होटल के कमरे में आकर अपने सेवक को बोले कि इस शोरुम के मालिक को फोन करके बताओ कि अलवर का राजा उनके रॉल्स रॉयस कार खरीदने के इच्छुक है। कुछ समय बाद राजा जय सिंह अपने राजसी कपड़ों में शोरुम पहुंचे। इस बार उनके पहुँचने से पहले ही लाल कारपेट बिछाकर सभी सेल्समैन राजा के सम्मान में सिर झुकाकर अभिवादन करने के लिए खड़े थे। उस समय उस शोरूम में 7 कारें खड़ी थी। राजा जय सिंह ने सभी कारें खरीदकर भारत पहुँचाने तक के खर्च का भुगतान कर दिया और वापस भारत लौट गये। भारत आने के बाद राजा जय सिंह ने सभी कारों को अलवर के नगरपालिका में दे दिया और आदेश दिया कि सभी कारों को सिर्फ शहर के कूड़ा-करकट और गंदगी उठाने के काम पर लगा दिया जाए। यह समाचार रातों रात पूरे विश्व में फैल गई।  जिससे कम्पनी की बहुत बेइज्जती हो रही थी। इसके बाद जब भी कोई यूरोप और अमेरिका में रॉल्स रॉयस होने का दावा करता था तब लोग उस पर हँसते और पूछते थे कि कौन सी कार है तुम्हारे पास? अरे! कही वहीँ कार तो नहीं है जो भारत में कचरा ढ़ोने के लिए इस्तेमाल किया जाता है? राजा जय सिंह ने अंग्रेजों से सिर्फ बदला लेने के लिए 7 रॉल्स रॉयस खरीदी थी? जिसके कारण रातों रात इस कार की बिक्री गिर गई थी। टेलीग्राम के द्वारा रॉल्स रॉयस के मालिक ने माफी मांगी और विनती की कि रॉल्स रॉयस कार से कचरा नहीं उठवाएं। इसके बाद कंपनी ने राजा जय सिंह को 6 कारें तोहफे के तौर पर भारत भेजी तब जाकर के राजा जय सिंह ने उन कारों से कचरा उठवाना बंद किया। ये तब की बात है, जब भारत गुलाम था। जब गुलाम हिंदुस्तान में राजपूत राजाओं की इतनी आन, बान और शान थी तो आप समझ सकते हैं कि इन राजाओं का आत्म सम्मान, भारतीयता की रक्षा और सम्मान के लिए क्या सोंच थी।

राजपूत की परिभाषा- इतिहास के अनुसार राजपूत वह है जो युद्ध करते-करते अपने रक्त से धरती का एक-एक कण रंग देता है, अपने शौर्य, पराक्रम और वीरता से सूर्य को भी ढक देता है अर्थात उसका तेज भी फीका कर देता है। राजपुत मातृभूमि का एक भी कण शत्रुओं के हाथ में नहीं जाने देता है ऐसा करते-करते चाहे वह स्वयं टुकड़े-टुकड़े ही क्यों न हो जाए। वही राजपूत कहलाता है। यह राजपूत शब्द राजकुल में पैदा होने से नही होता है बल्कि राजा जैसा कर्तव्य करने और राजा जैसा धर्म “सर्व जन हिताय, सर्व जन सुखाय” करने से राजपूत शब्द की उत्पत्ति हुई है। राजपूत को तीन शब्दों में प्रयोग किया जाता है, पहला “राजपूत”, दूसरा “क्षत्रिय” और तीसरा “ठाकुर”, आज इन शब्दों की भ्रान्तियों के कारण यह राजपूत समाज कभी-कभी बहुत ही संकट में पड गया है। राजपूत कहलाने से आज की सरकार और देश के लोग यह समझ बैठते है कि यह जाति बहुत ऊंची है और इसे जितना हो सके नीचा दिखाया जाना चाहिये। नीचा दिखाने के लिये लोग संविधान का सहारा ले बैठे है। राजपूतों को आत्मसम्मान, देश और धर्म की रक्षा करनी आती है लेकिन समाज की गिरती व्यवस्था को देखकर उन्हें भी दुःख होता है, राजपूतों को अपशब्द पसंद नहीं है। वह कभी किसी भी प्रकार की दुर्वव्यवस्था और दुर्व्यहार को पसंद नही करते हैं।

”चार हुतासन सों भये कुल छत्तिस वंश प्रमाण

भौमवंश  से   धाकरे   टांक   नाग  उनमान

चौहानी  चौबीस  बंटि कुल  बासठ वंश प्रमाण.”

अर्थ:-दस सूर्य वंशीय क्षत्रिय, दस चन्द्र वंशीय, बारह ऋषि वंशी एवं चार अग्नि वंशीय कुल छत्तिस क्षत्रिय वंशों का प्रमाण है, बाद में भौमवंश, नागवंश क्षत्रियों को सामने करने के बाद जब चौहान वंश चौबीस अलग-अलग वंशों में जाने लगा तब क्षत्रियों के बासठ अंशों का प्रमाण  मिलता है।

ये है हमारे राजपूतों की वीरगाथा। हमारे देश में कई राजपूत वीर योद्धा और वीरांगनाएँ भी थी। जिन्होंने मुगलों का डटकर सामना किया और उनके आगे झुकने के बजाए उनसे लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। अफसोस तो इस बात का है कि आज भी उनके नाम को इतिहास के पन्नों से गुम कर दिया गया है।

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