प्रेम और भक्ति

भारत में त्याग की परम्परा पुरातन काल से ही चली आ रही है। हमारे देश में अनेक महापुरुष, नारी, विद्वान आदि त्यागी हुए है जो देश और धर्म के लिए बड़े से बड़ा त्याग कर चुके हैं। त्याग करने में वे थोड़ा भी हिचकिचाते नहीं हैं। त्याग की भावना अत्यंत पवित्र है। त्याग करने वाले लोग ही संसार को प्रकाशमान बनाते हैं। गीता में भगवान कहते हैं कि “त्याग से शांति की प्राप्ति होती है और जहाँ त्याग है वही शांति होती है”।

हम सभी जानते हैं कि मीरा बचपन से ही कृष्ण भक्त थी। इनका विवाह उदयपुर के महाराणा कुमार भोजराज के साथ हुआ था। विवाह के थोड़े दिन बाद ही उनके पति का स्वर्गवास हो गया था। पति के स्वर्गवास के पश्चात् इनकी कृष्ण भक्ति बढ़ती जा रही थी। मीरा मंदिरों में जाकर कृष्ण के मूर्ति के समक्ष भजन गाने के साथ-साथ नाचने भी लगती थी। इस प्रकार मीराबाई का कृष्ण भक्ती में नाचना-गाना राजपरिवार को अच्छा नहीं लगता था। घरवालों ने कई बार मीराबाई को मना किया लेकिन उनकी कृष्ण भक्ति बढ़ती जा रही थी। उनकी इस व्यवहार से घरवाले नाराज थे और उन्होंने विष देकर मीरा को मारने की कोशिश किया। घरवालों के व्यवहार से परेशान होकर कभी-कभी मीरा वृन्दावन और द्वारका चली जाती थी, जहाँ उन्हें लोगों से सम्मान और प्यार मिलता था। अपने घर वालों के व्यवहार से दुखी होकर मीरा ने तुलसीदास को पत्र लिखा-

स्वस्ति श्री तुलसी कुलभूषण दूषन-हरन गोसाईं।
बारहिं बार प्रणाम करहु अब हरहूँ सोक-समुदाई।।
घर के स्वजन हमारे जेते सबन्ह उपाधि बढ़ाई ।
साधु-संग अरु भजन करत माहिं देत कलेस महाई।।
मेरे माता-पिता के समह, हरिभक्त सुखदाई ।
हमको कहा उचित करिबो है, सो लिखिए समझाई।।

अथार्त- मीरा तुलसी दास जी से कहती हैं कि हे तुलसी दास जी मैं आपको बार-बार प्रणाम करती हूँ कि आप मेरा सभी दुःख दूर करें, मेरा मार्गदर्शन करें। मेरे पति भगवान को प्यारे हो गये हैं अर्थात उनका स्वर्गवास हो गया है। साधु-सन्तों की सेवा और भगवत भजन में मेरे सम्बन्धी लोग (ससुराल वाले) मुझे बहुत कष्ट दे रहें हैं। मुझे मेरे भगवन श्री कृष्ण से दूर करने की कोशिश कर रहे हैं। मेरे लिए मेरे माता पिता से ज्यादा, भगवान की भक्ति में सुख मिलता है जो मेरे सम्बन्धियों को रास नहीं आती है। अब मैं क्या करूँ मुझे समझ में नहीं आ रहा है। आप मुझे राह दिखाएं या मेरे लिए क्या उचित है मुझे समझाने का कष्ट करें। मीरा बाई के इस पत्र को पढ़कर तुलसीदास जी ने जबाब दिया-

जाके प्रिय न राम-वैदेही।
ताजिये ताहि कोटि बैरी सम, जद्यपि परम सनेही।।
तज्यो पिता प्रह्लाद, विभीषण बंधू, भरत महतारी।
बलि गुरु तज्यो कंत ब्रज-बनितन्हीं, भए मुद-मंगलकारी।।
नाते नेह रामके मनियत सुहृद सुसेब्य जहाँ लौं।
अंजन कहा आँखि जेहि फूटै, बहुतक कहौं कहाँ लौं।
तुलसी सो सब भाँती परम हित पूज्य प्रानते प्यारो ।
जासो होय सनेह राम-पद, एतो मतो हमारो।

अथार्त- ये पंक्तियाँ तुलसीदास जी के विनय पत्रिका से उद्धृत की गई हैं। यहाँ तुलसीदास जी मीराबाई के पत्र का जबाब देते हुए कहते हैं कि जिन्हें भगवान से प्रेम नहीं हो उसको करोड़ों दुश्मन की तरह समझ कर उसका त्याग कर देना चाहिए, चाहे वो कितना भी प्रिय क्यों न हो। जैसे- प्रह्लाद ने पिता, विभीषण ने भाई, भरत ने माता, राजा बलि ने गुरु शुक्राचार्य तथा ब्रज की गोपियों ने अपने पतियों का त्याग कर दिया। जहाँ तक हो सके भगवान की सेवा में लगना चाहिए। उन्हीं से प्रेम करना चहिए और क्या कहूँ जिस काजल को आँख में लगाने से आँख ही अंधा हो जाए उस काजल को आँख में नहीं लगाना चहिए। तुलसीदास जी कहते हैं कि भगवान ही प्राणों से भी ज्यादा प्रिय हैं और भगवान से ही प्रेम करना चहिए यही मेरा विचार है।

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