न कोई राजमहल,
न कोई विरासत का ताज,
काँटों की पगडंडी थी,
आँखों में था एक आगाज़।
मुंबई की गलियों में पला,
संघर्षों से नाता जोड़ा,
सिक्के नहीं थे जेब में मगर
हौसलों की उड़ान ऊँची थी।
कभी रंगों से सपने रचे,
कभी मंच पर शब्द जिए,
चेहरे पर जितने भाव थे,
सब उसने रक्त से सिए ।
जब आया वह पर्दे पर,
तब किरदार जाग उठा,
नाना के अभिनय की आँच से
पत्थर जैसे दिल पिघला।
नायक होकर भी वह
नायकत्व से दूर रहा,
कभी किसान, कभी मजदूर बना,
व्यवस्था से मजबूर रहा।
था दर्द उसके आवाज़ में,
और आँखों में अनेक सवाल,
हर संवाद के साथ वह
जीता था भरपूर किरदार।
“क्रांतिवीर” हुंकार बनी,
टकराई, व्यवस्था से
“तिरंगा” में देशभक्ति ने
मन में जगाई आग नई।
कभी “परिंदा” बनकर उसने
अनभिज्ञ दुनिया को जाना,
कभी “अभय” की खामोशी में
मनुष्य का भय पहचाना।
पुरस्कार मिला, सम्मान मिला,
पर मन उसका नहीं बदला,
जिसने संघर्षों को देखा हो,
वह कैसे खुद को भूल सका?
किसानों के सूखे खेतों में
उसने अपना दर्द देखा,
भूखे चेहरे, खाली आँखें
इनमें अपना मर्म देखा।
जब महाराष्ट्र के गाँवों में
सूखे ने दस्तक दी ,
तब उसने केवल शब्द नहीं,
अपने हाथों से मदद दी।
वह कहा नहीं महान हूँ,
जीवन उसका कहता है
जिसके भीतर मानवता है,
वही सच में जीता है।
सिनेमा की चकाचौंध में
बहुत चेहरे आए कुछ चले गए,
कुछ पर्दे पर चमकते हैं,
कुछ दिल में उतर जाते हैं।
नाना पाटेकर, सिर्फ नाम नहीं,
संघर्ष का जीवित मिसाल हैं।
तो पर्दे पर केवल अभिनेता नहीं
संपूर्ण मानव आदमी दिखाई देता है।
जय हिंद