पोखरा ठकुराइन का (कविता)

एक दिन पोती ने दादी से पूछा-
“दादी, ये बताओ न,
सब कुछ ठकुराइन का ही क्यों है?”

दादी मुस्कुराईं,
झुर्रियों में छिपी कहानियों का पन्ना खोला-
“क्यों बेटी, क्या पूछा तूने?”

पोती बोली-

पोखरा ठकुराइन का,
कुआँ ठकुराइन का,
तो फिर पानी किसका दादी?
जिससे सबकी प्यास बुझे,
उसपर भी उनका ही अधिकार है क्या?

फुलवारी ठकुराइन की,
आम-इमली ठकुराइन की,
तो फिर फूलों की खुशबू और
फलों की मिठास किसकी दादी?
क्या हवा भी बँट जाती है जात-पात में?

घर-दुआर ठकुराइन का,
खेत-खलिहान ठकुराइन का,
तो फिर अन्न किसका दादी?
जो मिट्टी में बीज बोता,
क्या फसल पर उसका हक नहीं होता?

दादी ने लाठी सँभाली,
आँखों में धीमी-सी ज्वाल लिये बोली-
“बेटी, ये दुनिया अभी सोई है,
सदियों से बेड़ियों में जकड़ी हुई है।

पर तू चिंता मत कर,
वक़्त का पहिया रुकता नहीं, घूमता है,
एक दिन सचमुच सबका होगा,
उस दिन पोखरा भी हमारा होगा,
कुआँ भी, खेत भी, खलिहान भी –
और उस दिन पानी, फूल, अनाज –
सबके हिस्से का होगा।”

पोती ने दादी की गोद में सिर रखा,
मन में एक सपना खिल उठा –
जहाँ ठकुराइन का कुछ न होगा,
सबका सब होगा,
बराबरी का –
इंसानियत का।

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