जन्म- सन् 1864 ई. में उत्तर प्रदेश के रायबरेली जिले के दौलतपुर गाँव में हुआ था।
पिता- पंडित रामसहाय द्विवेदी थे। कहा जाता है कि उन्हें ‘महावीर का इष्ट’ था, इसलिए पिता ने अपने पुत्र का नाम ‘महावीर’ रखा। माता- ज्योतिष्मती थी।
निधन- 21 दिसम्बर 1938 ई. को रायबरेली में हुआ।
* महावीर प्रसाद द्विवेदी जी की प्रारम्भिक शिक्षा गाँव की पाठशाला में ही हुई। प्रधानाध्यापक ने भूल से इनका नाम महावीर प्रसाद लिख दिया था। हिंदी साहित्य में यही नाम अमर हुआ।
* तेरह वर्ष की अवस्था में अंग्रेज़ी पढ़ने के लिए ये रायबरेली के ज़िला स्कूल में भर्ती हुए। यहाँ संस्कृत के अभाव में इन्हें वैकल्पिक विषय फ़ारसी लेना पड़ा था। उसके बाद वे कुछ दिनों तक उन्नाव ज़िले के ‘रनजीत पुरवा स्कूल’ में और कुछ दिनों बाद फ़तेहपुर में पढ़ने के बाद पिता के पास बम्बई चले गए।
* बम्बई में इन्होंने संस्कृत, गुजराती, मराठी और अंग्रेज़ी की पढ़ाई की।
* जीविका के लिए इन्होंने रेलवे में नौकरी कर ली। कुछ दिनों तक नागपुर और अजमेर में कार्य करने के बाद ये पुन: बम्बई लौट आए।
* बम्बई में इन्होंने तार देने की विधि सीखी और रेलवे में सिगनलर हो गए। रेलवे में विभिन्न पदों पर कार्य करने के बाद अन्तत: ये झाँसी में डिस्ट्रिक्ट सुपरिण्टेण्डेण्ट के ऑफ़िस में चीफ़ क्लर्क बन गए।
* पाँच वर्ष बाद उच्चाधिकारी से नहीं पटने के कारण इन्होंने नौकरी से इस्तीफ़ा दे दिया।
* सन् 1903 ई. में महावीर प्रसाद द्विवेदी ने ‘सरस्वती‘ का सम्पादन स्वीकार किया। अपनी अद्भुत प्रतिभा, साहित्यिक सूझबूझ, व्यावहारिक कुशलता से इन्होंने ‘सरस्वती’ पत्रिका को हिंदी की सर्वश्रेष्ठ पत्रिका बना दिया।
* 1931 ई. में काशी नागरी प्रचारिणी सभा ने उन्हें ‘आचार्य’ की उपाधि से विभूषित किया तथा हिंदी साहित्य सम्मलन प्रयाग में उन्हें ‘वाचस्पति’ की उपाधि प्रदान की।
* ‘महावीर प्रसाद द्विवेदी नैतिकता के मूर्तिमान प्रतीक थे।’
* ‘इनका कृतित्व श्लाघ्य है तो इनका व्यक्तित्व पूज्य।’
* ‘भारत-भारती‘ के प्रकाशन पर इन्होंने लिखा था- “यह काव्य वर्तमान हिन्दी-साहित्य में युगान्तर उत्पन्न करने वाला है।”
* राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त इन्हें अपना गुरु मानते थे।
गुप्तजी का कहना है कि “मेरी उल्टी-सीधी प्रारम्भिक रचनाओं का पूर्ण शोधन करके उन्हें ‘सरस्वती’ में प्रकाशित करना और पत्र द्वारा मेरे उत्साह को बढ़ाना द्विवेदी महाराज का ही काम था।”
* इन्होंने ‘सरस्वती’ पत्रिका को निर्दोष, पूर्ण, सरस, उपयोगी और नियमित बनाया। अनुवादक के रूप में इन्होंने भाषा की प्रांजलता और मूल भाषा की रक्षा को सर्वाधिक महत्त्व दिया।
* हिन्दी साहित्य में महावीर प्रसाद द्विवेदी का मूल्यांकन तत्कालीन परिस्थितियों के सन्दर्भ में ही किया जा सकता है। वह समय हिन्दी के कलात्मक विकास का नहीं, हिन्दी के अभावों की पूर्ति का था। इन्होंने ज्ञान के विविध क्षेत्रों में जैसे इतिहास, अर्थशास्त्र, विज्ञान, पुरातत्त्व, चिकित्सा, राजनीति, जीवनी आदि से सामग्री लेकर हिंदी के अभावों की पूर्ति की।
* हिन्दी गद्य को माँजने-सँवारने और परिष्कृत करने में यह आजीवन संलग्न रहे। हिन्दी गद्य और पद्य की भाषा एक करने के लिए (खड़ीबोली के प्रचार-प्रसार के लिए) इन्होंने प्रबल आन्दोलन किया। निबन्धकार, आलोचक, अनुवादक और सम्पादक के रूप में इन्होंने अपना पथ स्वयं प्रशस्त किया था।
* मौलिक कृतियाँ कुल 9 हैं, जिन्हें स्वयं तुकबन्दी कहा है। इनकी समस्त कृतियों का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है।
मौलिक काव्य रचनाएँ:
1. देवी स्तुति शतक (1892 ई.)
2. कान्य कुब्जावलीव्रतम् (1898 ई.)
3. समाचार पत्र संपादक स्तव: (1898 ई.)
4. नागरी (1900 ई.)
5. काव्य मंजूषा (1903 ई.)
6. कान्य कुब्ज अबला विलाप (1907 ई.)
7. कविता कलाप (1909 ई.)
8. सुमन (1923 ई.)
9. द्विवेदी काव्यमाला (1940 ई.)- दो भाग में, इसके संपादक- देवीदत्त शुक्ल थे
अनुदित काव्य रचनाएँ:
1. विनय विनोद (1889 ई.)- भर्तृहरि के वैराग्य शतक का दोहा छंद में अनुवाद है।
2. विहार वाटिका (1890 ई.)- जयदेव गीतगोविन्द का दोहा छंद में अनुवाद है।
3. स्नेहमाला (1890 ई.)- भर्तृहरि के श्रृंगार शतक का दोहा छंद में अनुवाद है।
4. श्री महिम्न स्त्रोत (1891 ई.)- संस्कृत में रचित महिम्न स्त्रोत का वर्णित छंदों में अनुवाद है।
5. गंगा लहरी (1891 ई.)- जगन्नाथदास ‘रत्नाकर’ की रचना गंगा लहरी का सवैया छंद में अनुवाद किया गया है।
6. ऋतु तरंगिणी (1891 ई.)- कालिदास के ऋतु संहार का दोहा छंद में अनुवाद है।
7. कुमार संभव सार (1892 ई.)- कालिदास के कुमारसंभवम् के प्रथम 5 सर्गों का अनुवाद दोहा और सवैया छंदों का प्रयोग हुआ है।
8. सोहागरात (1891 ई.) अप्रकाशित (बायरन की रचना ‘ब्राइडल नाईट’ का दोहा छंदों में अनुवाद)
मौलिक गद्य रचनाएँ:
1. तरुणोपदेश (अप्रकाशित)
2. हिंदी शिक्षावाली तृतीय भाग की समालोचना (1899/1901 ई.)
3. नैषधचरित चर्चा (1899/1900 ई.)
4. हिंदी कालिदास की समालोचना (1901 ई.) हिंदी में आलोचना संबंधी प्रथम पुस्तक
5. वैज्ञानिक कोश (1906 ई.)
6. विक्रमांकदेव चरित चर्चा (1907 ई.)
7. हिंदी भाषा की उत्पत्ति (1907 ई.)
8. कौटिल्य कुठार (1907 ई.)
9. सम्पत्तिशास्त्र (1908 ई.)
10. कालिदास की निरंकुशता (1911 ई.)
11. नाटयशास्त्र (1912 ई.)
12. वनिता विलास (1918 ई.)
13. औद्योगिकी (1920 ई.)
14. रसज्ञरंजन (1920 ई.)
15. कालिदास और उनकी कविता (1920 ई.)
16. अतीत स्मृति (1924 ई.)
17. सुकवि संकीर्तन (1924 ई.)
18. अद्भुत अलाप (1924 ई.)
19. महिला मोद (1925 ई.)
20. विज्ञ विनोद (1926 ई.)
21. कोविद कीर्तन (1928 ई.)
22. साहित्य संदर्भ (1928 ई.)
23. विदेशी विद्वान् (1928 ई.)
24. लेखांजली (1928 ई.)
25. आलोचनांजलि (1928 ई.)
26. साहित्यालाप (1929 ई.)
27. प्राचीन चिह्न (1929 ई.)
28. चरित्र चित्रण (1929 ई.)
29. साहित्य सीकर (1930 ई.)
30. विज्ञान वार्ता (1930 ई.)
31. वाग्विलास (1930 ई.)
32. विचार विमर्श (1931 ई.)
33. संकलन (1931 ई.)
34. पुरावृत्त (1933 ई.)
महावीरप्रसाद द्विवेदी जी की गद्य रचनाएँ:
1. भामिनी विलास (1891 ई.) – पं. राजजगन्नाथ के ‘भामिनी विलास’ का अनुवाद।
2. अमृत लहरी (1896 ई.) – पं. राजजगन्नाथ के ‘यमुना स्त्रोत’ का अनुवाद।
3. बेकन विचार रत्नावली (1901 ई.)- बेकन के निबंधों का अनुवाद है।
4. शिक्षा (1906 ई.)- हरबर्ट स्पेंसर की रचना ‘एजुकेशन’ का अनुवाद है।
5. स्वाधीनता (1907 ई.) जॉन स्टुअर्ट मिल की रचना ‘ऑन लिबर्टी’ का अनुवाद।
6. जल चिकित्सा (1907 ई.)- जर्मन लेखक लुई कोने की जर्मन भाषा में रचित रचना का अनुवाद।
7. हिंदी महाभारत (1908 ई.)- महाभारत की कथा का हिंदी रूपांतरण है।
8. रघुवंश (1912 ई.)- रघुवंश महाकाव्य का अनुवाद है।
9. वेणीसंहार (1913 ई.)- संस्कृत कवि भट्ट नारायण की रचना ‘वेणी संहार’ नाटक का अनुवाद है।
10. ‘कुमारसंभवम्’(1915ई.)- कालिदास की रचना ‘कुमारसंभवम्’ का अनुवाद है।
11. मेघदूतम् (1917 ई.)- कालिदास की रचना ‘मेघदूतम’ का अनुवाद है।
12. ‘किरातार्जुनियम’ (1917 ई.)- भारवि की रचना
‘किरातार्जुनियम’ का अनुवाद है।
13. प्राचीन कवि और पण्डित (1918 ई.)- अन्य भाषाओं के लेखों के आधार पर प्राचीन कवियों का परिचय है।
14. आख्यायिका सप्तक (1917 ई.)- अन्य भाषाओं की चुनी हुई सात आख्यायिकाओं का अनुवाद है।
महावीरप्रसाद द्विवेदी जी के चर्चित लेख:
1. कवि कर्तव्य (1903 ई.)
2. कवियों की उर्मिला विषयक उदासीनता (1998 ई.)
3. आर्य समाज का कोप (1914 ई.)
महावीरप्रसाद द्विवेदी जी के चर्चित निबंध:
हिंदी नवरत्न, उर्दू शतक, महिष शतक की समीक्षा, नाटक, नाट्यशास्त्र,कवि बनने के सापेक्ष साधन, कवि और कविता, नायिका भेद, साहित्य की महत्ता।
महावीरप्रसाद द्विवेदी जी के चरित्र प्रधान निबंध:
महात्मा बुद्ध, शंकराचार्य, भीष्म पितामह, मकाकवि होमर, सवाई जय सिंह, विजय धर्म सूरि।
ऐतिहासिक व पुरातत्त्व संबंधी निबंध:
आर्यों का जन्मभूमि, सोमनाथ मंदिर की प्राचीनता, भारतवर्ष के पुराने खंडहर।
विज्ञान संबंधी निबंध:
प्राचीन भारत के जहाज, मंगल ग्रह तक तार, प्राचीन भारत में रसायन विद्या।
भूगोल संबंधी निबंध:
व्योम विहरण और सौर जगत की उत्पत्ति।
उद्योग शिल्प संबंधी निबंध: खेती की बुरी दशा, हिन्दुस्तान का व्यापार, भारत में औद्योगिक शिक्षा।
आध्यात्मिक निबंध:
पुनर्जन्म का प्रत्यक्ष प्रमाण और वैदिक देवता।
भाषा और व्याकरण संबंधी निबंध:
हिंदी नवरत्न, भाषा और व्याकरण, शब्दार्थ विचार, अक्षर विज्ञान, संस्कृत साहित्य का महत्व, सर विलियम जोंस ने संस्कृत कैसे सीखी।
उपर्युक्त कृतियों के अतिरिक्त तेरहवें हिन्दी साहित्य सम्मेलन काशी नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा किये गये अभिनन्दन के अवसर पर इन्होंने जो भाषण दिये थे, उन्हें भी पुस्तकाकार रूप में प्रकाशित किया गया है। इनकी बनायी हुई छ: बालोपयोगी स्कूली पुस्तकें भी प्रकाशित हैं।
महाविप्रसाद द्विवेदी जी की चर्चित पंक्तियाँ:
1. “अंतःकरण की प्रवृत्तियों के चित्रण का नाम कविता है।”
2. “अर्थ सौष्ठव ही कविता का प्राण है।”
3. “सादगी असलियत और जोश समन्वित रचना काव्य है।”
4. “ज्ञान राशि से संचित कोश का नाम साहित्य है।”
5. “शिक्षित कवि की उक्तियों में चमत्कार का होना परम आवश्यक है, कविता में यदि चमत्कार नहीं, विलक्षण नहीं तो उससे आनंद की प्राप्ति नहीं हो सकती।”
6. “चींटी से लेकर हाथी पर्यंत पशु, भिक्षुक से लेकर राजा पर्यंत मनुष्य, बिंदु से लेकर समुद्र पर्यंत जल, अनंत आकाश, अनंत पृथ्वी, अनंत पर्वत सभी पर कविता हो सकती है।”
7. कवींद्र कांते कवित्ते अहो कहाँ…..
8. तुम ही अन्नदाता भारत के सचमुच बैलराज महाराज …..
9. भैसी भवानी के तब सेवा लागे करन पढ़ब गा छूटी….
10 सारी प्रजा निपट दीनदुखी जहाँ है, कर्तव्य न तुझको कुछ वहाँ है।
विशेष महत्वपूर्ण तथ्य:
* मिश्रबंधुओं ने इन्हें हिंदी का भारी लेखक कहा है।
* ये ‘सरस्वती’ में भुजंगभूषण भट्टाचार्य के छद्म नाम से लेख लिखते थे।
* 1903 ई. से 1920 ई. तक ‘सरस्वती’ पत्रिका का संपादन किया।
* आरंभ में रेलवे में नौकरी की, उच्चाधिकारी से अनबन के कारण त्यागपत्र दे दिए।
* इन्होंने हिंदी गद्य एवं पद्य की भाषा को परिष्कृत किया।
* इनकी मौलिक रचनाओं की संख्या 80 मानी जाती है।
* शुक्ल जी ने इनके निबंधों को लेखमात्र कहा है। ये नायिका भेद वर्णन के विरोधी थे।
* इनकी संपूर्ण रचनाओं का प्रकाशन ‘महावीरप्रसाद द्विवेदी रचनावली’ के नाम से 15 खंडों में हुआ है।
* बाबू बालमुकुंद गुप्त ने महावीरप्रसाद द्विवेदी के निबंध ‘भाषा
और व्याकरण’ से ‘अनस्थिरता’ शब्द को लेकर उनकी आलोचना ‘आत्माराम’ नाम से की।
* बालमुकुंद गुप्त के जवाब में महावीरप्रसाद द्विवेदी ने ‘सरगौ नरक ठेकाना नाहिं’ शीर्षक निबंध ‘कल्लू अल्हइत’ नाम से लिखा।
* इस विवाद में गोविंद मिश्र ने द्विवेदी का पक्ष ‘आत्माराम की टेंटें’ निबंध लिखकर किया।
* नंददुलारे वाजपेयी ने महावीरप्रसाद द्विवेदी को कपास की खेती करने वाला निबंधकार कहा।
* नागरी प्रचारिणी सभा, काशी द्वारा इन्हें आचार्य की उपाधि से विभूषित किया गया।
महावीरप्रसाद द्विवेदी के संदर्भ में आलोचकों के कथन:
“साहित्य के क्षेत्र में उन्होंने तय कर लिया था कि हिंदी गद्य का विकास करना है… साहित्य को रीतिवाद से निकाल बाहर करना है, लगभग 20 वर्षों तक एकाग्र मन से इस निश्चित उद्देश्य की सिद्धि में वे लगे रहे और उन्हें सफलता प्राप्त हुई।” -रामविलास शर्मा
“द्विवेदी जी कि कोमलता और कठोरता दोनों का स्रोत एक ही था यह स्रोत था हिंदी भाषा और साहित्य के प्रति निष्ठा। इस निष्ठा के कारण जिसे वह अवांछित समझते थे, उसकी कठोर आलोचना करते थे, किंतु इसमें व्यक्तिगत राग द्वेष बहुत कम होता था।” – रामविलास शर्मा
“उनका उद्देश्य हिंदी प्रदेश में नवीन सामाजिक चेतना का प्रसार करना है, इस उद्देश्य की सिद्धि के लिए यह समाज विज्ञान, प्रकृति-विज्ञान, दर्शनशास्त्र और साहित्य इन सभी के विकास के लिए प्रयत्न करते हैं, महावीरप्रसाद द्विवेदी की भूमिका एकमहान शिक्षक की भूमिका है, केवल साहित्यकार की नहीं।” – रामविलास शर्मा
“द्विवेदी जी के निबंधों में उनका व्यक्तित्व स्फुटित हुआ है, उनकी आदर्शवादिता जीवन की सादगी, हृदय की सरलता, नैतिकता इन सभी की छाप उनके निबंधों पर है।” – रामचंद्र तिवारी
“भारतेंदु युगीन निबंधों की सी वैयत्तिकता का प्रदर्शन, सजीवता, रोचकता एवं सहज उच्छृंखलता का द्विवेदी के निबंधों में अभाव सा है, उनके निबंधों में भाषा की शुद्धता, सार्थकता, एकरूपता, शब्द प्रयोग पटुता आदि गुण तो मिलते हैं किंतु पर्वेक्षण की सूक्ष्मता, विश्लेषण की गंभीरता, चिंतन की मौलिकता उनकें बहुत कम है।” – गणपति चंद्र गुप्त
“द्विवेदी जी के लेखों को पढ़ने से ऐसा जान पड़ता है कि लेखक बहुत मोटी अक्ल के पाठकों के लिए लिख रहा है।….उनकी यह व्यास शैली विपक्षी को कायल करने के प्रयत्न में बड़े काम की है।” – आचार्य रामचन्द्र शुक्ल
जय हिंद
बहुत सुंदर संकलन, बहुत-बहुत बधाई और शुभकामनाएं
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