पंडित रामनरेश त्रिपाठी संपूर्ण परिचय

ये पूर्वछायावादी युग के हिंदी कवि, उपन्यासकार और संपादक थे। रामनरेश त्रिपाठी ने मिलन‘, ‘पथिक और स्वप्नजैसी राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत रचनाएँ लिखी। इन्होंने ग्राम गीतों के संकलन ‘कविता कौमुदी’ का संपादन किया और बाल साहित्य के विकास में भी अपना योगदान दिया। ये हिंदी साहित्य सम्मलेन प्रयाग के प्रचार मंत्री भी रहे थे। रामनरेश त्रिपाठी ने लोक गीतों के चयन के लिए कश्मीर से कन्याकुमारी और सौराष्ट्र से गुवाहाटी तक सारे राज्यों का भ्रमण किया था। ये द्विवेदी युग के उन साहित्यकारों में से हैं, जिन्होंने द्विवेदी- मण्डल के प्रभाव से पृथक रहकर अपने मौलिक प्रतिभा से साहित्य क्षेत्र में कार्य किया। इन्होंने दक्षिण राज्यों में भी हिंदी के प्रचार हेतु सराहनीय कार्य किया। रामनरेश त्रिपाठी अपनी काव्य कृतियों में प्रकृति के सफल चितेरे रहे है।

उदाहरण के लिए यहाँ ‘पथिक’ की दो पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं-

“प्रति क्षण नितान वेष बनाकर रंग-विरंग निराला।

रवि के सम्मुख थिरक रही है नभ में वारिद माला॥”

जन्म- 4 मार्च 1889 ई. कोइरीपुर, जिला जौनपुर (उ.प्र.) में निधन- 1962 ई. को हुआ था।

पिता- पंडित रामदत्त त्रिपाठी

रामनरेश त्रिपाठी जी के महत्वपूर्ण रचनाएँ:

प्रबंधात्मक खण्डकाव्य:

1. मिलन (1917 ई.)

2. पथिक (1920 ई.)

3. स्वप्न (1929 ई.)

मुक्तक काव्य – मानसी (1927 ई.)

उपन्यास- वीरांगना और लक्ष्मी

नाटक- सुभद्रा, जयंत और प्रेमलोक

कहानी संग्रह- स्वप्नों के चित्र

आलोचना- तुलसीदास और उनकी कविता

संस्मरण- तीस दिन मालवीय जी के साथ

संकलित काव्य संग्रह- ‘कविता कौमुदी’ (1917 ई.)

यह आठ भाग में है और शिवाबावनी

जीवन चरित- महात्मा बुद्ध तथा अशोक

बाल साहित्य- आकाश की बातें, बालकथा कहानी, गुपचुप कहानी, फूलरानी और बुद्धिविनोद

टीका साहित्य- ‘श्रीरामचरितमानस’ का टीका     

प्रमुख रचनाओं का वर्ण्य विषय:

मिलन (1917 ई.)- प्रबंधात्मका खण्डकाव्य

इसमें विदेशी शासन से मुक्ति एवं देश के उद्धार की भावना व्यक्त हुई है। देश प्रेम की भावना से प्रेरित होकर युवक आनंद कुमार और युवती विजया देश को शत्रुओं से मुक्त कराने के लिए नौका पर सवार होकर यात्रा आरंभ करते हैं। तेज आँधी से नौका टूट जाती है। मुनि के प्रयत्न से युवक और उसके पिता की रक्षा होती है। शासक दल द्वारा इन तीनों को (आनंद कुमार, विजया, मुनि) मार डालने का आदेश दिया जाता है। जनता शासक दल का विरोध करती है। अंत में स्वदेश का उद्धार होता है। इस खण्डकाव्य में प्रेम के उदात्त स्वरुप का चित्रण भी हुआ है।   

पथिक (1920 ई.)- प्रबंधात्मक खण्डकाव्य

इसमें उपनिवेशवाद से मुक्ति का भाव प्रकट हुआ है। जीवन के कष्टों से दुखी पथिक अपनी पत्नी और बच्चों को त्यागकर प्रकृति के आँचल में शरण लेता चाहता है। पत्नी उसे खोज निकालती है। साधु द्वारा प्रबोधित होकर पथिक दुखी जनता को राजा के अत्याचार के विरोध में संगठित करता है। राजा द्वारा पथिक को मृत्युदंड दिया जाता है। उसके बलिदान से जनता जागृत होती है तथा राजा को देश से निकाल देती है। इस रचना पर गाँधीवाद का प्रभाव भी है। इसमें भारतीय नारी के पारम्परिक आदर्शों को भी प्रतिष्ठित किया गया है। इस रचना में द्विवेदी युगीन इतिवृत्तात्मक शैली की अपेक्षा कथोपकथन शैली का सहारा लिया गया है। 

स्वप्न (1929 ई.)- प्रबंधात्मक खण्डकाव्य

इस काव्य में विदेशी आक्रमणकारियों से सुरक्षा का भाव व्यक्त हुआ है। शत्रु के आक्रमण को रोकने में असमर्थ राजा प्रजा को अपनी रक्षा स्वयं करने की प्रार्थना करता है। युवक राष्ट्र की रक्षा के लिए एकत्र होते हैं। माताएँ और पत्नियाँ युवकों पर गर्व करती है। सुमना लज्जित है क्योंकि उसका पति बसंत कुमार उसके आकर्षण में बंधा होने के कारण देश सेवा के लिए तैयार नहीं होता है। सुमना देश सेवा के लिए निकल पड़ती है। बसंत उससे प्रेरित होता है, और देश सेवा का व्रत लेकर वीरता से लड़ता हुआ सबका नेता बनकर विजय प्राप्त करता है।

रामनरेश त्रिपाठी जी की महत्वापूर्ण पंक्तियाँ:

1. “गंध विहीन फूल है जैसे चंद्र चन्द्रिका हीन।

   यों ही फीका है मनुष्य का जीवन प्रेम विहीन।”

2. “पराधीन रहकर अपना सुख शोक न कह सकता है।

   यह अपमान जगत में केवल पशु ही सह सकता है।”

3. “प्रेम स्वर्ग है, स्वर्ग प्रेम है, प्रेम अशंक अशोक।

   ईश्वर का प्रतिबिंब प्रेम है, प्रेम ह्रदय आलोक।”

4. “हे प्रभु आनंद दाता ज्ञान हमको दीजिए।

   शीघ्र सारे दुर्गुणों को दूर हमसे कीजिए।”

5. “सच्चा प्रेम वहीं है जिसकी तृप्ति आत्म-बलि पर हो निर्भर।

   त्याग बिना निष्प्राण प्रेम है करो प्रेम पर प्राण निछावर।”

6. “देश प्रेम वह पुण्य क्षेत्र है, अमल असीम त्याग से विलसित।

   आत्मा के विकास से जिसमें, मनुष्यता होती है विकसित।”

महत्वपूर्ण तथ्य:

1. रामनरेश त्रिपाठी ‘बाल साहित्य’ के ‘जनक’ माने जाते हैं।

2. इन्होंने ‘वानर’ नामक पत्रिका का संपादन किया था।

3. ये ‘स्वच्छंदतावादी’ कवि थे। (हिंदी के दूसरे ‘स्वच्छंदतावादी’ कवि)

4. इन्होंने “हे प्रभो! आनन्ददाता…जैसी बेजोड़ प्रार्थना लिखी जो आज भी अनेक स्कूलों में प्रार्थना के रूप में गाई जाती है।

आलोचकों के महत्वपूर्ण कथन:

* “काव्य क्षेत्र में जिस स्वाभिमान स्वछंदता का आभास पंडित श्रीधर पाठक ने दिया था उसके पथ पर चलने वाले द्वितीय उत्थान में त्रिपाठी जी ही दिखाई पड़े।” आचार्य रामचन्द्र शुक्ल    

* “रामनरेश त्रिपाठी ने ऐतिहासिक या पौराणिक कथाओं के भीतर न बंधकर अपनी भावना के अनुकूल स्वच्छंद संचरण के लिए नूतन कथाओं का उद्भावना की है, कल्पित आख्यानों के बीच यह विशेष झुकाव स्वच्छंद मार्ग का अभिलास सूचित है।” आचार्य रामचन्द्र शुक्ल

* “स्वदेश भक्ति की जो भावना भारतेंदु के समय से चली आती थी उसे सुंदर कल्पना द्वारा रमणीय और आकर्षक रूप त्रिपाठी जी ने ही प्रदान किया।” आचार्य रामचन्द्र शुक्ल

* “त्रिपाठी जी की भाषा परिष्कृत खड़ी बोली है इसमें इन्होंने कहीं कहीं उर्दू के प्रचलित शब्दों और उर्दू छंदों का व्यवहार भी किया हैं।” आचार्य रामचन्द्र शुक्ल

* “रामनरेश त्रिपाठी में जहाँ ‘स्वच्छंदतावाद’ का सहज उल्लास है वहीं भाषा का अनुशासन भी पूरा है।” रामस्वरूप चतुर्वेदी

* “इन तीनों खण्डकाव्यों द्वारा जनतंत्र के तीन खतरों विदेशी शासन, एकतंत्र और आक्रमणकारी शत्रुओं से अवगत करवाया गया है।” डॉ. बच्चन सिंह

जय हिंद

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