तन्हाई (कविता)

लगता है अब रातें भी मुझसे रूठने लगी हैं,

हर यादें मेरे सीने में ज्वाला सी धधकने लगी हैं।

अब तो चाँद भी मेरे छत से कहीं दूर चला जाता है,

मेरी दर्द को देख कर, वह भी मुझ से कतराता है।

मेरे भींगे हुए नैनों से डर कर, नींदें भी चली गई हैं,

बीती यादें अब करवटें बदलने लगी हैं।

साँसे भी अब तो बोझ सी लगने लगी हैं,

तेरे बिन अब शहर भी, सुनसान लगने लगी है।

हम किससे कहें दिल की बात अपनी

कहना चाहूँ होठों से, आँखें ही बता देती हैं

लगता है, अब मझ से रातें भी रूठने लगी हैं,

सोती हूँ तब भी कोई सपना ही नहीं आता।

सिर्फ एहसास ही मेरा साथ निभाने लगी हैं,

क्योंकि तन्हाई अब मेरे साथ रहने लगी है।

2 thoughts on “तन्हाई (कविता)”

  1. बहुत खूब।
    एक बात यहाँ पक्की होती है कि इतनी गहरी तन्हाई में भी कविता ने साथ नहीं छोड़ा आपका, आशा रखता हूँ के आप भी उसे कभी ना छोड़े 🙏🌺

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