छायावाद के प्रतिनिधि कवि जयशंकर प्रसाद

जीवन परिचय- जयशंकर प्रसाद

जन्म- 30 जनवरी 1889 ई. काशी के ‘गोवर्धनसराय’ में हुआ था। इनका परिवार ‘सूघनी साहू’ के नाम से जाना जाता था।

निधन- 15 नवंबर 1937 ई. में हुआ था।

पिता- बाबू देविप्रसाद और माता- मुन्नी देवी थी।

जयशंकर प्रसाद जी के उपनाम:

1. इनके बचपन का नाम ‘झारखंडी’ था।

2. इन्हें आधुनिक कविता का ‘सुमेरु’ कहा जाता है।

3. इलाचंद्र जोशी और डॉ. गणपतिचंद्र गुप्त ने इन्हें ‘छायावाद का जनक’ माना।

4. इन्हें भारतीय संस्कृति का ‘पुनरुद्धारक’ भी माना जाता है।

5. ब्रजभाषा में ये ‘कलाधर’ नाम से कविताएँ लिखते थे।

इनके तीन गुरु थे-

1. मोहिनिलाल- इन्होंने मोहिनिलाल से संस्कृत की शिक्षा प्राप्त किया था।

2. रसमयसिद्ध-  रसमयसिद्ध से इन्होंने अध्यात्म का ज्ञान प्राप्त किया था।

3. दीनबंधु मिश्र- दीनबंधु मिश्र से इन्होंने इतिहास की शिक्षा प्राप्त किया था। नौ वर्ष की आयु में इन्होंने एक ‘सवैया’ लिखकर अपने गुरु रसमयसिद्ध को सुनाया था, जो वर्तमान में उपलब्ध नहीं है।

रामस्वरूप चतुर्वेदी के अनुसार:

1. इनकी प्रथम कविता ‘सावन पंचक’ थी। 1906 में ‘भारतेंदु’ पत्रिका में ‘कलाधर’ नाम से प्रकाशित हुई थी।

2. प्रथम छायावादी कविता ‘प्रथम प्रभात’ थी। 1913 में प्रकाशित हुई थी।

जयशंकर प्रसाद की महत्वपूर्ण कविताएँ:

1. उर्वशी (1909 ई.) यह चंपू काव्य है।

2. वनमिलन (1909 ई.)

3. विदाई (1909 ई.)

4. नीरव प्रेम (1909 ई.)

5. कल्पना का सुख (1909 ई.)

6. अयोध्या का उद्धार (1910 ई.)

7. बभ्रुवाहन (1911 ई.) यह चंपू काव्य है।

जयशंकर प्रसाद के प्रसिद्ध काव्य संकलन/संग्रह:

1. प्रेमपथिक (1905 ई.) यह प्रथम काव्य संकलन है। आरंभ में इसमें ‘ब्रजभाषा’ और ‘खड़ीबोली’ दोनों में मिश्रित कविताएँ थी। 1913 ई. में इसका संशोधित संस्करण प्रकाशित हुआ, जिसमें केवल ‘खड़ीबोली’ की कविताएँ रखी गई थी।

2. करुणालय (1913 ई.), यह हिंदी का प्रथम ‘गीति-नाट्य’ है। यह प्रेम और स्वतंत्रता के विषयों पर आधारित है। 1913 ई. में यह ‘इन्दु’ पत्रिका में प्रकाशित किया गया था, बाद में 1928 ई. में इसे स्वतंत्र रुप से प्रकाशित किया गया।

3. कानन-कुसुम (1913 ई.), यह ‘गीतिकाव्य’ है।

4. महाराणा का महत्व (1914 ई.), यह ऐतिहासिक काव्य है।

5. झरना (1918 ई.) यह ‘गीतिकाव्य’ है। इसे छायावाद की ‘प्रयोगशाला का प्रथम आविष्कार’ कहा जाता है।

6. चित्राधार (1918 ई.), यह जयशंकर प्रसाद जी के आरंभिक कविताओं का काव्य संग्रह है।

7. आँसू (1925 ई.) यह ‘खंडकाव्य’ है। इसमें 133 छंद है। इसे हिंदी का ‘मेघदूत’ कहा जाता है।

8. लहर (1933 ई.) यह ‘गीतिकाव्य’ है।

9. कामायनी (1935 ई.) यह ‘महाकाव्य’ है।

जयशंकर प्रसाद के महत्वपूर्ण नाट्य रचनाएँ:

1. ‘सज्जन’ (1910 ई.) यह पौराणिक, प्रथम नाटक है। ‘सज्जन’ जयशंकर प्रसाद का प्रथम नाटक है। इसमें गीतों का आधिक्य, वार्तालाप में शायरी और शैली में पारसी नाटकों का प्रभाव है।

2. कल्याणी परिणय (1912 ई.) इसे चंद्रगुप्त का पूर्व संस्करण माना जाता है।

3. करुणालय (1913 ई.) हिंदी का प्रथम ‘गीतिनाट्य’ है।

4. प्रायश्चित (1914 ई.)

5. राज्यश्री (1915 ई.), यह प्रसाद जी का प्रथम ऐतिहासिक नाटक है।  

6. विशाख (1921-22 ई.) यह प्रसाद जी का प्रथम ‘प्रौढ़’ नाटक है।

7. अजातशत्रु (1922 ई.)

8. जनमेजय का नागयज्ञ (1926 ई.)

9. कामना (1927 ई.) यह हिंदी का पहला ‘प्रतीकात्मक’ नाटक है।

10. स्कंदगुप्त (1928 ई.)

11. एक घूँट (1929 ई.) 

12. चंद्रगुप्त (1931 ई.)

13. ध्रुवस्वामिनी (1933 ई.) यह समस्यात्मक नाटक है।

14. अग्निमित्र (अपूर्ण) 30 ऑकटूबर 1944 में दैनिक पत्र ‘आज’ में प्रकाशित हुआ था। जयशंकर प्रसाद के नाटक ‘करुणालय’ में वैदिककाल, ‘सज्जन’ में महाभारतकाल, ‘जनमेजय का नागयज्ञ’ में उपनिषद् काल, ‘अजातशत्रु’ में बौद्ध काल, ‘विशाख’ में बौद्धों का पतनकाल, ‘चंद्रगुप्त’ में यूनानियों का आक्रमण काल, स्कंदगुप्त में हूणविद्रोहकाल और ‘प्रायश्चित’ में जयचंद के काल का ऐतिहासिक चित्रण है। ‘सज्जन’ ‘कल्याणी परिणय’ और ‘करुणालय’ लघु नाट्य कृतियाँ हैं।        

जयशंकर प्रसाद के महत्वपूर्ण उपन्यास:

1. कंकाल (1929 ई.) 2. तितली (1934 ई.) 3. इरावती (अपूर्ण), 1961 ई. में इसे निराला जी ने पूरा किया।

जयशंकर प्रसाद जी के महत्वपूर्ण कहानी संकलन:

जयशंकर प्रसाद की पहली कहानी – ‘ग्राम’ 1911 ई. में ‘इंदु पत्रिका’ में प्रकाशित हुई थी। इनकी अंतिम कहानी ‘सालवती’ 1935 ई. है। 

डॉ. नामवर सिंह ने इनकी कहानियों की संख्या 72 मानी जाती है।

डॉ. नगेंद्र ने इनकी कहानियों की संख्या कुल 69 मानी जाती है।

कमल किशोर गोयनका ने इनकी कहानियों की संख्या 67 मानी जाती है।

इनकी संपूर्ण कहानियाँ 5 कहानी संग्रह में संकलित हैं।

1. छाया (1912 ई.), इसमें 6 कहानियाँ हैं। छाया- द्वितीय संस्करण (1916), इसमें 11 कहानियाँ हैं। 

2. प्रतिध्वनि (1926 ई.), इसमें कुल 15 कहानियाँ हैं।

3. आकाशदीप (1929 ई.), इसमें कुल 19 कहानियाँ हैं।

4. आँधी (1929 ई.), इसमें कुल 11 कहानियाँ हैं।

5. इंद्रजाल (1936 ई.) इसमें कुल 14 कहानियाँ हैं। कुल मिलाकर 70 कहानियाँ प्रकाशित हैं।

जयशंकर प्रसाद जी के निबंध संग्रह:

1. काव्य कला व अन्य निबंध (1936 ई.)

महत्वपूर्ण काव्य के विशेष तथ्य:

1. ‘कानन-कुसुम’ (1913 ई.)

1. ‘कानन कुसुम’ जयशंकर प्रसाद जी के खड़ीबोली की कविताओं का पहला संकलन है। इसमें प्रकृति, प्रेम, दार्शनिक विचार और सामाजिक चिंतन जैसे विषयों को गहराई से दर्शाया गया है।  

2. ‘झरना’ (1918 ई.), ‘झरना’ के प्रकाशन के साथ प्रसाद की प्रथम छायावादी कविता ‘प्रथम प्रभात’ भी प्रकाशित हुई थी। यह प्रथम छायावादी काव्य संकलन है।

‘अयोध्या का उद्धार’– कालिदास कृत ‘रघुवंश’ के 16वें सर्ग पर आधारित है   

    2. ‘वन मिलन’- ‘अभिज्ञान शाकुंतलम्’ पर आधारित है।  

    3. ‘प्रेम राज्य’- प्रेम राज्य विजयनगर और अहमदाबाद के बीच हुए तालीकोट युद्ध की ऐतिहासिक घटना को केंद्र में रखकर लिखा गया है। यह वीरगाथा काव्य है। उपर्युक्त तीनों लंबी कविताएँ है। ये तीनों कविताएँ ‘चित्राधार’ काव्य संकलन में संकलित है।

    3. ‘प्रथम प्रभात’ (1913 ई.) यह प्रसाद जी की पहली ‘छायावादी’ कविता है। यह कविता ‘झरना’ काव्य संकलन में संकलित है।

    4. ‘लहर’ (1933 ई.) ‘लहर’ काव्य संकलन में चार लंबी कविताएँ संकलित है:

    1. अशोक की चिंता 2. शेर सिंह का शस्त्र समर्पण 3. पेशोला की प्रतिध्वनि और 4. प्रलय की छाया

    5. ‘झरना’ काव्य संकलन में कविताओं की संख्या 58 हैं।

    6. ‘प्रेम पथिक’ पर गोल्ड स्मिथ की रचना ‘हरमीट’ का प्रभाव है।

    7. कामायनी (1935 ई.)

    कथानक: इसका कथानक शतपथ ब्राह्मण ग्रंथ (आठवें अध्याय) में है।

    अन्य आधार- ऋग्वेद, छन्दोग्य उपनिषद्, मतस्यपुराण, से भी कुछ अंश लिया गया है।

    कामायनी का दर्शन- ‘प्रत्यभिज्ञावाद’ (शैवदर्शन)

    ‘प्रत्यभिज्ञावाद’ का आशय– प्रकृति की आदि शक्ति महाचित्ति’ है। यह प्रकृति में संतुलन स्थापित रखती है। यदि कोई प्रकृति के संतुलन को भंग करता है तो ‘महाचित्ति’ क्रुद्ध होकर उसका विनाश कर देती है।

    कामायनी का उद्देश्य:

    कामायनी का मुख्य दो उद्देश्य है- 1. आनंदवाद की स्थापना (मुख्य उद्देश्य यही है।) 2. समरसतावाद की प्रतिष्ठा

    कामायनी के सर्ग:

    कामायनी में मुख्य 15 सर्ग हैं। कामायनी के सर्गों का नामकरण मनोविकार के आधार पर किया गया है।

    1. चिंता   2. आशा   3. श्रद्धा  4. काम   5. वासना 6. लज्जा  7. कर्म    8. ईर्ष्या   9. इडा   10. स्वप्न 11. संघर्ष 12. निर्वेद  13. दर्शन 14. रहस्य 15. आनंद

    * इनमें सबसे छोटा सर्ग- चिंता है।

    * सबसे बड़ा सर्ग- आनंद है।

    * इसमें मंगलाचरण नहीं हुआ है।

    * कामयानी के सर्गों के नामकरण की प्रेरणा रामधारी सिंह ‘दिनकर’ से मिली।

    कामायनी की प्रतीक योजना:

    1. मनु – मन का प्रतीक है।

    2. श्रद्धा (कामायनी) – ह्रदय का (रागात्मिका बुद्धि) है।

    3. इडा – बुद्धि (व्यवसायिक बुद्धि) है।

    4. आकुली और किरात – आसुरी शक्ति का प्रतीक है।

    5. मानव/कुमार – मानव जाति का प्रतीक है ।

    6. कैलास मानसरोवर – मुक्ति स्थल का प्रतीक है।

    7. वृषभ- आनंद सर्ग में वृषभ का चित्रण है। वृषभ (बैल) धर्म का प्रतीक है।

    कामायनी के महत्वपूर्ण तथ्य:

    • रमेशचंद्र शाह ने ‘कामना’ को कामायनी का पूर्वराग कहा है
    • ‘कामना’ नाटक को कामायनी का पूर्व संस्करण/पीठिका माना जाता है।
    • ‘कामायनी’ का बाहरी ढाँचा बहुत कुछ ‘कामना’ नाटक जैसा है।
    • ‘प्रेम पथिक’ काव्य भी कामायनी की पूर्व पीठिका है।
    • कामायनी से पूर्व जयशंकर प्रसाद ‘एक घूँट’ में भी आनंदवाद की प्रतिष्ठा कर चूके थे।
    • कामायनी का मुख्य छंद ‘ताटंक’ है। ताटंक- यह अर्द्धमात्रिक छंद है। इसके विषम चरणों में 16-16 मात्राएँ तथा सम चरणों में 14-14 मात्राएँ होती है। सम चरणों के अंतिम तीन वर्ण गुरु होते हैं।
    • कामायनी शांत रस प्रधान काव्य है।
    • ‘लज्जा सर्ग’ को कामायनी का ‘ह्रदय स्थल’ नामवर सिंह ने कहा है।
    • ‘आनंद सर्ग’ को कामायनी का ‘ह्रदय स्थल’ मुक्तिबोध ने कहा है।
    • कामायनी के चिंता सर्ग’ का कुछ अंश 1928 ई. में ‘सुधा पत्रिका’ में प्रकाशित हुआ था।
    • कामायनी भारतीय आनंदवाद का साकार रूप है। जिस आनंदवाद की अभिव्यक्ति कामायनी में हुई है उसकी प्रतिष्ठा प्रसाद जी ने ‘एक घूँट’ नाटिका में पहले ही कर चुके थे।
    • प्रसाद जी ने कामायनी के ‘स्वप्न’ और ‘संघर्ष’ सर्गों में सारस्वत प्रदेश का जो वर्णन किया है, उसमें पूंजीवादी सभ्यता और वर्ग संघर्ष का संकेत है। स्वप्न सर्ग में औधिगीकरण का भी उल्लेख है

    कामायनी के विषय में साहित्यकारों के कथन: किसने कामायनी को क्या कहा-

    1. डॉ. नगेंद्र – कामायनी मानव चेतना का महाकाव्य है। यह आर्ष ग्रंथ है।

    2. मुक्तिबोध- कामायनी जीवन की पुनर्रचना है।

    3. मुक्तिबोध- कामायनी फैंटेसी है।

    4. इन्द्रनाथ मदान- कामायनी एक असफल कृति है।

    5. नंददुलारे वाजपेयी- कामायनी नये युग का प्रतिनिधि काव्य है।

    6. सुमित्रानंदन पंत- कामायनी ताजमहल है।

    7. डॉ. नगेंद्र- कामायनी एक ‘रूपक’ है।

    8. विश्वंभर मानव- कामायनी विराट सामंजस्य की सनातन गाथा है।

    9. डॉ. नगेंद्र कामयानी समग्रतः में समासोक्ति का विधान लक्षित करती है।

    10. श्यामनारायण पांडेय– कामायनी विश्व का आठवाँ महाकाव्य हैं।

    11. रामधारी सिंह ‘दिनकर’- ने ‘दोष रहित दोष सहित’ नामक निबंध में कामायनी को आधी कविता माना है

    12. हरदेव बाहरी– कामायनी आधुनिक हिंदी साहित्य का सर्वोत्तम महाकाव्य है।

    13. रामरतन भटनागर– कामायनी मधुरस से रिक्त महाकाव्य है।

    14. हजारीप्रसाद द्विवेदी ने– कामायनी वर्तमान हिंदी कविता की दुर्लभ कृति है।

    15. डॉ. बच्चन सिंह ने – कामायनी फूहड़ मार्क्सवाद का नमूना

    16. डॉ. नगेंद्र ने – कामायनी मनोविज्ञान की पैरवी है।

    17. डॉ. नागेंद्र- कामायनी मनोविज्ञान की ट्रीटाइज है।

    18. डॉ. कमलेश्वर प्रसाद सिंह- कामायनी ‘मनु’ और ‘श्रद्धा’ एक पुनर्मिलन प्रत्याशा है।

    19. रामस्वरूप चतुर्वेदी- कामायनी आधुनिक समीक्षक और रचनाकार दोनों के लिए परीक्षा स्थल है।

    कामायनी के बारे में आलोचकों के प्रमुख कथन:

    1. आचार्य नंददुलारे वाजपेयी के शब्दों में– “कामायनी नये युग का प्रतिनिधि काव्य है।”

    2. आचार्य नंददुलारे वाजपेयी के शब्दों में- “कामायनी मानवता का रसात्मक इतिहास एवं नवीन युग का महाकाव्य है।” (पहले नंददुलारे वाजपेयी ने कहाँ था।)

    नोट- आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने भी, कामायनी को मानवता का रसात्मक इतिहास कहा है। (बाद में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने कहा)

    3. रामधारी सिंह ‘दिनकर’ के शब्दों में- “मैं कामायनी को आधि या इससे थोड़ा अधिक ही कविता मानता हूँ। यह छायावाद के ऊपर लगाए गए पलायनवाद का उत्तर है।”

    4. रामधारी सिंह ‘दिनकर’ के शब्दों में- “कामायनी नारी की गरिमा का महाकाव्य है।”

    5. डॉ. नगेन्द्र के शब्दों में- “कामायनी मानव चेतना के विकास का महाकाव्य है यह आर्ष ग्रंथ है।”

    6. डॉ. नामवर सिंह के शब्दों में- “कामायनी आधुनिक सभ्यता का प्रतिनिधि महाकाव्य है।”

    7. डॉ. नामवर सिंह के शब्दों में- “कामायनी में नारी की लक्षण का जो भव्य चित्रण हुआ है वह संपूर्ण भारतीय साहित्य में दुर्लभ है।”

    8. डॉ. नामवर सिंह के शब्दों में- “मानस ने वाल्मीकि रामायण और कामायनी ने मानस को पाठकों के लिए बदल दिया है।”

    9. डॉ. नामवर सिंह के शब्दों में- “कामायनी मार्क्सवाद की प्रस्तुति है।”

    10. गजानंद माधव मुक्तिबोध के शब्दों में- “कामायनी एक फैंटेसी है।”

    11. शांतिप्रिय द्विवेदी के शब्दों में- “कामायनी छायावाद का ‘उपनिषद्’ है।”

    12. डॉ. धीरेन्द्र वर्मा के शब्दों में- “कामायनी एक विशिष्ट शैली का महाकाव्य है, शिल्प की प्रौढ़ता कामायनी का मुख्य गुण है।”

    13. रामस्वरूप चतुर्वेदी के शब्दों में- “कामायनी आधुनिक समीक्षक और रचनाकार दोनों के लिए परीक्षा स्थल है।”

    14. आचार्य रामचंद्र शुक्ल के शब्दों में- “यदि मधुचर्या का अतिरेक और रहस्य की प्रवृत्ति बाधक नहीं होती तो कामायनी के भीतर मानवता की योजना शायद अधिक पूर्ण और सुव्यवस्थित रूप में चित्रित होती है।”

    15. सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ के शब्दों में- “कामायनी संपूर्ण जीवन का चरित्र है। यह मानवीय कमजोरियों पर मानव के विजय की गाथा है।” निराला जी ने ‘सुधा’ पत्रिका में कामायनी की समीक्षा करते हुए, उसे रहस्यवाद का पहला महाकाव्य कहा है।

    ‘कामायनी’ जयशंकर प्रसाद जी कि अंतिम रचना है। इस महाकाव्य की प्रधान पात्र श्रद्धा है। काम की पुत्री होने के कारण इसका दूसरा नाम ‘कामायनी’ है

    जय हिंद

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