बहुव्रीहि समास- बहुव्रीहि दो शब्दों के मेल से बना है।
बहु + व्रीहि = बहुव्रीहि जिसमें ‘बहु’ का अर्थ होगा ‘बहुत सारे अर्थों का’ और व्रीहि का अर्थ होगा ‘निषेध करने वाला’ अथार्त
बहुत सारे अर्थों का निषेध कर एक अर्थ को रखनेवाला समास को बहुव्रीहि समास कहते है।
पं. कामता प्रसाद गुरु के अनुसार- “जिस समास में कोई भी पद प्रधान नहीं होता और जो अपने पदों से भिन्न किसी संज्ञा का विशेषण होता है, उसे बहुव्रीहि समास कहते हैं।” (BPSC 1989, 99)
जहाँ पहला पद और दूसरा पद मिलकर किसी तीसरे पद की ओर संकेत करते हैं, वहाँ बहुव्रीहि समास होता है। अथवा
जिस समास के समस्त पदों (दोनों पदों) में कोई भी पद प्रधान नहीं हो, बल्कि तीसरा पद प्रधान हों, उसे बहुव्रीहि समास कहते हैं। जैसे-
अयोध्यानंदन- अयोध्या का नंदन है जो अथार्त् राम
अनंग– बिना अंग का है जो अथार्त् कामदेव
अनंत- नहीं है जिसका अंत अथार्त् ईश्वर
बहुव्रीहि का अर्थ है– बहु = बहुत + व्रीही = धान्य (वाला) व्यक्ति अथार्त संपन्न व्यक्ति। इस प्रकार यह नाम बहुव्रीहि अपना स्वयं का एक अच्छा उदाहरण भी है।
इस समास के विग्रह में संबंधवाचक सर्वनाम के साथ ‘कर्ता’ और ‘संबोधन कारकों’ को छोड़कर शेष जिन कारकों की विभक्तियाँ लगती हैं, उन्हीं के नामों के अनुसार इस समास का नाम है।
योगरूढ़ शब्दों में बहुव्रीहि समास होता है। जैसे
उपसर्ग- उपसर्ग + शब्द (अन + अंग = अनंग अन्य अर्थ कामदेव
प्रत्यय– शब्द + प्रत्यय (हल + धर = हलधर अन्य अर्थ बलराम
शब्द– शब्द + शब्द (नील + कंठ = नीलकंठ अन्य अर्थ शिव
जिस शब्द का अन्य अर्थ निकले वहाँ बहुव्रीहि समास होगा।
जिस शब्द का अन्य अर्थ नहीं निकले वहाँ बहुव्रीहि समास नहीं होगा है।
पौराणिक देवी-देवताओं के लिए रूढ़ हुए बहुव्रीहि समास के उदाहरण:
अंजनीपुत्र – अनजनी का पुत्र है जो अथार्त् हनुमान
अयोध्यानंदन – अयोध्या का नंदन है जो अथार्त् राम
अंगराज – अंग देश का राजा है जो अथार्त् कर्ण
अब्जनाभ – नाभि में अब्ज (कमल) है जिसके अथार्त् विष्णु
अब्जयोनी – अब्ज (कमल) है योनी (उत्पत्ति स्थल) जिसकी अथार्त विष्णु
अन्नपूर्णा – अन्न से पूर्ण करने वाली है जो अथार्त् पार्वती
अनंग – बिना अंग का है जो अथार्त् कामदेव
अंशुमाली – वह अंशु (किरणों) की माला है जिसके सहस्त्रकर आदि
आशुतोष – शीघ्र (आशु) तुष्ट हो जाते हैं जो – शिव
इंद्रधनुष – इंद्र का धनुष है जो बरसात में बनने वाला सतरंगी अर्धवृत
इंदुशेखर – इंदु (चंद्रमा) है शेखर (सिर) का आभूषण जिनके अथार्त् शिव
उमेश – उमा (पार्वती) का ईश है जो अथार्त् शिव
एकदंत – एक है दंत जिसका अथार्त् गणेश
कपीस – कपियों के ईश है जो अथार्त् हनुमान्
कपीश्वर – कपियों (वानरों) का ईश्वर है जो अथार्त् हनुमान्
कुसुमशर- कुसुम के सर (बाण) हैं जिसके अथार्त् कामदेव
कुसुमशर – कुसुम के शर (बाण) हैं जिसके अथार्त् कामदेव
कौशल्यानंदन – कौशल्या का नंदन (पुत्र) है जो अथार्त् राम
गजवदन – गज के समान वदन है जिसका अथार्त् गणेश
गिरिराजनंदन – गिरिजा (हिमालय की पुत्री पार्वती) के नंदन पुत्र हैं जो अथार्त् गणेश
गिरिधारी – गिरि (पहाड़) को धारण करने वाला अथार्त् कृष्ण
गोपीनाथ – गोपियों का नाथ है जो अथार्त कृष्ण
घनश्याम – घन (बादल) के समान श्याम (रंग) है जिसका अथार्त् कृष्ण
चतुर्भुज – वह जिसके चार भुजाएँ है अथार्त् विष्णु
चंद्रशेखर – चंद्र है शेखर (सर पर आभूषण) जिसके अथार्त् शिव
चंद्रमौली – चंद्र है मौली (मस्तक) पर जिसके अथार्त् शिव
चंद्रचूड़ – चंद्र है चूड़ (सिर) पर जिसके अथार्त् शिव
चतुर्मुख – चार है मुख जिसके अथार्त् ब्रह्मा
चतुरानन – चार है आनन (मुख) जिसके अथार्त् ब्रह्मा
त्र्यम्बका – तीन माताएँ हैं जिसके अथार्त् पार्वती
त्र्यम्बक – त्रि (तीन) अम्बक (नेत्र) है जिसके अथार्त् शिव
दशरथनंदन – दशरथ का नंदन (पुत्र) है जो अथार्त् राम
दामोदर – दामन में बंधा हुआ उदर जिसका अथार्त् कृष्ण
द्वारकाधीश – द्वारका का धीश है जो अथार्त् कृष्ण
दीर्घबाहु – वह जिसकी बाहु (भुजाएँ) दीर्घ हैं अथार्त् विष्णु
दुर्वासा – दु: (बुरे) वस्त्र (वसन) पहनने वाला एक ऋषि विशेष का नाम
देवराज – देवों का राजा है जो अथार्त् इंद्र
देवेंद्र – देवों का इंद्र है जो अथार्त् इंद्र
धनंजय – वह जो धन (पृथ्वी, भौतिक संपदा आदि) का जय करता है अथार्त् अर्जुन
धवलवसना – धवल (साफ़ या सफ़ेद) वस्त्र को पहने हुए है जो अथार्त् सरस्वती
धूर्जटि – छुएँ के सामान जटा है जिसकी अथार्त् शिव
नीलकंठ – नीला है कंठ जिसका अथार्त् शिव
पंचानन – वह जिसके पाँच आनन है अथार्त् शिव
पद्मासना – वह जो पदम (कमल) के आसन वाली है अथार्त् सरस्वती/ लक्ष्मी (दोनों के लिए रूढ़)
पद्मनाभ – वह जिसकी नाभि में पद्म (कमल) है अथार्त् विष्णु
पंचशर – वह जिसके पाँच (पाँच फूलों के) शर है अथार्त् कामदेव
पार्वतीनंदन – पार्वती के नंदन (पुत्र) है जो अथार्त् गणेश
पुंडरीक – वह जो कमल के समान है अथार्त् विष्णु
पुंडरीकाक्ष – वह जिसकी अक्षि (आँखें) पुंडरीक (कमल) के सामान है अथार्त् विष्णु
ब्रजनंदन – ब्रज का नंदन है जो अथार्त् कृष्ण
ब्रजवल्लभ – वह जो ब्रज का वल्लभ (स्वामी) है अथार्त् कृष्ण
ब्रजकिशोर – ब्रज का किशोर है जो (किशोर विशेष) अथार्त् कृष्ण
ब्रजमोहन – ब्रज का मोहन है जो अथार्त् कृष्ण
ब्रजेश – ब्रज का ईश है जो अथार्त् कृष्ण
ब्रजबिहारी – ब्रज का बिहारी है जो अथार्त् कृष्ण
मधुसूदन – मधु का सूदन (वध) करनेवाला अथार्त् कृष्ण
मधुरिपु – मधु दैत्य के शत्रु हैं जो अथार्त् विष्णु
मदनरिपु – मदन (कामदेव) के रिपु हैं जो अथार्त् शिव
मकरध्वज – वह जिसके मकर का ध्वज है अथार्त् कामदेव
महादेव – महान है जो देव अथार्त् शिव
मनसिज – मन में जो जन्म लेता है जो अथार्त् कामदेव
महावीर – महान है जो वीर अथार्त् हनुमान
मारुतसुत – मारुत का सुत है जो अथार्त् हनुमान
मन्मथ – मन को मथनेवाला अथार्त् कामदेव
मंदोदरी – उदर जिसका मंद (छोटा) हो वह स्त्री विशेष अथार्त् रावण की पत्नी मंदोदरी
महेश्वर – महान है जो ईश्वर अथार्त् शिव
माखनचोर – माखन को चुराने वाला (व्यक्ति विशेष) अथार्त् श्री कृष्ण
माधव – मधु राक्षस को मारने वाला अथार्त् कृष्ण
मीनकेतु – मीन के ध्वज वाला अथार्त् कामदेव
मुरारि – मुर (राक्षस का नाम) के अरि (शत्रु) है जो अथार्त् कृष्ण
यशोदानंदन – यशोदा का नंदन (पुत्र) है जो अथार्त् कृष्ण
युधिष्ठिर – जो युद्ध में स्थिर रहता है वह (व्यक्ति विशेष) अथार्त् धर्मराज (अपवाद) यह अलुक् तत्पुरुष भी है।
रतिकांत – वह जो रति का कांत (पति) है अथार्त् कामदेव
रघुनाथ – रघु का नाथ है जो अथार्त् राम
रघुनंदन – रघु का नंदन है जो अथार्त् राम
रामभ्राता – राम का भ्राता है जो अथार्त् लक्ष्मण
रेवतीरमण – वह जो रेवती के साथ रमण करते है अथार्त् बलराम
रोहिणीनंदन – वह जो रोहिणी का नंदन (पुत्र) है अथार्त् बलराम
लक्ष्मीकांत – लक्ष्मी का कांत है जो अथार्त् विष्णु
लक्ष्मीनारायण – लक्ष्मी में रमण करता है जो अथार्त् विष्णु
वक्रतुंड – जिनका तुंड (मुख) वक्र (टेढ़ा) है- विष्णु
वज्रांग – जिनका अंग वज्र का है अथार्त् हनुमान
वज्रदेह – वज्र के समान देह है जिनका वह अथार्त् हनुमान
वज्रायुद्ध – वह जिनके वज्र का आयुध है अथार्त् इंद्र
शिवसुत – शिव के पुत्र हैं जोश अथार्त् गणेश
श्रीश – वह जो श्री (लक्ष्मी) के ईश हैं अथार्त् विष्णु
शेषशायी – शेषनाग पर शयन करते हैं जो अथार्त् विष्णु
शैलतनया – शैल की जो तनया (पुत्री) है अथार्त् पार्वती
षडानन – वह जिनके षट् आनन है अथार्त् कार्तिकेय
षण्मुख – वह जिनके षट् मुख हैं अथार्त् कार्तिकेय
सहस्त्राक्ष – वह जिनके सहस्त्र (हजार) अक्षि (आँखें) है अथार्त् इंद्र
सप्तऋषि – वे जो ऋषि सात है वे सात ऋषियों के विशेष नाम
सहस्त्राक्ष – सहस्त्र (हजार) है अक्षि (आँखें) जिसके अथार्त् इंद्र
सूतपुत्र – वह जो सूत (सारथि) का पुत्र है अथार्त् कर्ण
सुमित्रानंदन – सुमित्रा का नंदन (पुत्र) है जो अथार्त् लक्ष्मण
सूर्यपुत्र – वह जो सूर्य का पुत्र है अथार्त् कर्ण
हलधर – वह जो हल को धारण करने वाला अथार्त् बलराम हंसासिनी – हँस है आसन जिसका अथार्त् सरस्वती
हिरण्यगर्भ – हिरण्य (सोने) का गर्भ है जिसका अथार्त् ब्रह्मा
हृषिकेश – वह जो हृषिक (इंद्रियों) के ईश है अथार्त् विष्णु/कृष्ण
हिमसुता – हिम की सुता (पुत्री) है जो अथार्त् पार्वती
हिमतनया – वह जो हिम की तनया है (पुत्री) है अथार्त् पार्वती
‘रूढ़’ होने वाले शब्दों में भी बहुव्रीहि समास होती है। जैसे-
तिरंगा – तीन है रंग जिसके अथार्त् राष्ट्रीय झंडा
त्रिवेद – तीन देवों का समूह विशेष- ब्रह्मा, विष्णु महेश
त्रिदोष – तीन दोषों का समूह विशेष- वात, पित्त, कफ
त्रिवेणी – तीन वेणियों (नदियों) का संगम स्थल- प्रयाग
त्रिगुण – तीन गुणों का समूह विशेष- रजो, तमो, सतो
त्रिलोक – तीन लोकों का समूह- आकाश, पताल, पृथ्वी
त्रिशूल – तीन है शूल (काँटे) जिसमें शिवाजी का अस्त्र
त्रिकुट – तीन कूटों (छोरों) का समूह विशेष अथार्त् एक पर्वत जिस पर लंका पूरी
दोआब- दो नदियों (गंगा यमुना) के बीच का भाग विशेष, आर्यों का उद्गम स्थल
दो मुँहा – दो है मुँह जिसके दोगला
दोमुँही – दो हैं मुँह जिसके अथार्त् साँप की एक प्रजाति
पंजाब – पाँच है नदियाँ जहाँ अथार्त् राज्य विशेष का नाम
पंचतंत्र – पाँच है तंत्र (ज्ञान सूत्र) जिसमें एक संस्कृत ग्रन्थ
पंचांग – पाँच है अंग जिसमें- ज्योतिष, गणित, विज्ञान, आदि से संपन्न ज्योतिष की पुस्तक
भूपति – भू का पति जो अथार्त् राजा
भूदेव – भू (पृथ्वी) का है देव जो ब्राह्मण
भूपाल – भू का पालक है जो अथार्त् राजा
भूदान – भू का दान- विनोबा भावे द्वारा चलाया गया एक विशेष आन्दोलन
रामायण – राम का अयन (आश्रय) अथार्त् वाल्मीकि रचित काव्य
राजपूत – राजा का है पूत जो अथार्त् एक जाति विशेष
राज्यसभा – राज्य की है सभा जो अथार्त् संसद का उच्च सदन
राष्ट्रपति – राष्ट्र का है पति जो अथार्त् राष्ट्राध्यक्ष
लोकसभा – लोक (जनता) की है सभा जो अथार्त् संसद का निम्न सदन
वज्रदेही – वज्र के सामान कठोर है देह (शरीर) जिसके अथार्त् हनुमान
विषधर – विष को धारण करने वाल है जो अथार्त् सर्प
वीरप्रसूता – वीरों को जन्मदेने वाली है जो वह (स्त्री विशेष)
शाखामृग – शाखाओं पर कूदने वाला मृग अथार्त् बंदर (2011, RAJ, SI)
जिस भी शब्द के अंत में ‘पाणी’ जुड़ा हो वहा बहुव्रीहि समास ही होगा जैसे
वज्रपाणी – जिसके पाणी में वज्र है अथार्त् इंद्र
चक्रपाणी – चक्र है पाणि में जिसके अथार्त् विष्णु
वीणाधारणी – वीणा को धारण करनेवाली अथार्त् सरस्वती
वीणापाणि – वह जिनके पाणी (हाथ) में वीणा है अथार्त् सरस्वती
वेदपाणी – जिसके पाणी में वेद है अथार्त् ब्रहमा
शूलपाणी – वह जिसके पाणी (हाथ) में शूल (त्रिशूल) है अथार्त् शिव
‘नीलांबर’ शब्द को छोड़कर जिस भी शब्द के अंत में ‘अंबर’ हो वहा बहुव्रीहि समास होगा।
पीतांबर – पीला है अंबर (वस्त्र) जिसका अथार्त् कृष्ण
रक्तांबर – लाल है अंबर जिसका अथार्त् दुर्गा
बाघाम्बर – बाघ है अंबर जिसका अथार्त् शिव
‘बालवाहिनी’ और ‘रोगीवाहिनी’ को छोड़कर जिस भी शब्द के अंत में ‘वाहन’ या ‘वाहिनी’ आ जाए वहाँ बहुव्रीहि समास होगा। जैसे-
मयूरवाहन – जिनके मयूर का वाहन है अथार्त् कार्तिकेय
मूषकवाहन – मुसक (चूहा) है वाहन जिसका अथार्त् गणेश
गरुड़वाहन – गरुड़ है वाहन जिसका अथार्त् विष्णु
उलूकवाहन – उलूक (उल्लू) है वाहन जिसका अथार्त् लक्ष्मी
वृषभवाहन – वृषभ (बैल) है वाहन जिसका अथार्त् शिव
सिंहवाहिनी – सिंह है वाहन जिसका अथार्त् दुर्गा
जिस भी शब्द के अंत में नयन, नेत्र, लोचन, अक्षि हो वहाँ बहुव्रीहि समास होगा। जैसे-
त्रिलोचन – तीन है लोचन (आँखें) जिनके अथार्त् शिव
त्रिनेत्र – तीन हैं नेत्र जिसके अथार्त् शिव
त्रिनयन – तीन है नयन (नेत्र) जिसके अथार्त् शिव
कमलनयन – कमल के सामान नयन है जिनके अथार्त् विष्णु
जिस भी शब्द के अंत में धर, धरा और धि होगा वहाँ बहुब्रीहि समास होगा। जैसे-
मुरलीधर – मुरली को धारण करने वाला है जो अथार्त् कृष्ण
गिरिधर – गिरि (पहाड़) को धारण करने वाला अथार्त् कृष्ण
गंगाधर – गंगा नदी को धारण करता है जो अथार्त् शिव
वंशीधर – वंशी को धारण करने वाला है जो अथार्त् कृष्ण
चंद्रधर – चंद्र को धारण करने वाला अथार्त् शिव
चक्रधर – चक्र को धारण करने वाला अथार्त् विष्णु
शशिधर – वह जो शशि को धारण करता है अथार्त् शिव
जिस भी शब्द के अंत में ज, जा जुड़ा हो वहाँ बहुव्रीहि समास होगा।
जलज – जल में जन्म लेने वाला अथार्त् कमल
मनोज – वह जो मन में जन्म लेता है अथार्त् कामदेव
अग्रज – आगे जन्म लेने वाला अथार्त् बड़ा भाई
अनुज – पीछे जन्म लेने वाला अथार्त् छोटा भाई
गिरिजा – गिरि पर जन्म लेने वाली अथार्त् पार्वती
शैलजा – शैल में जन्म लेने वाली है जो अथार्त् पार्वती
सिंधुजा – सिन्धु में जन्म लेने वाली अथार्त् लक्ष्मी
भूमिजा – भूमि से जन्म लेने वाली है जो अथार्त् सीता
अग्रजा – आगे जन्म लेने वाली अथार्त् बड़ी बहन
अनुजा – पीछे जन्म लेने वाली अथार्त् छोटी बहन
वारिज – वह जो वारि (जल) में जन्मता है अथार्त् कमल
मकरध्वज – वह जिसके मकर का ध्वज है अथार्त् कामदेव
गरुडध्वज – वह जिनके गरुड़ का ध्वज है अथार्त विष्णु
जिस भी शब्द में ईश/पति हो वहाँ बहुव्रीहि समास होगा। जैसे-
रजनीश – रजनी (रात्रि) का ईश जो अथार्त् चन्द्रमा
सुरेश – सूरों (देवताओं) का ईश है जो अथार्त् इंद्र
सतीश – सती का ईश है जो अथार्त् शिव
नरेश – नारों का ईश (स्वामी) है जो अथार्त् राजा
राकेश - राका (रात्रि) का ईश है जो अथार्त् चंद्रमा
भूतेश – वह जो भूतों का ईश है जो अथार्त् शिव
गोपेश – गोपों का ईश है जो अथार्त् कृष्ण
रमेश – रमा का ईश है जो अथार्त् विष्णु
कमलेश – कमल का ईश है जो अथार्त् विष्णु
लंकापति – वह जो लंका का पति है अथार्त् रावण
द्वारकापति – वह जो द्वारका का पति है अथार्त् कृष्ण
उडुपति – वह जो उडु (नक्षत्र) का पति है अथार्त् चन्द्रमा
रजनीपति – वह जो रजनी का पति है अथार्त् चन्द्रमा
रघुपति – वह जो रघु (वंश) के पति (स्वामी) है अथार्त् श्रीराम
रमापति – रमा का पति है जो अथार्त् विष्णु
वाचस्पति – वह जो वाक् (भाषा/वाणी) का पति है अथार्त् बृहस्पति
शचीपति – वह जो शची का पति है अथार्त् इंद्र
पशुपति – पशुओं का पति (स्वामी) है जो अथार्त् शिव
अमरपति – अमर (देवताओं) का पति है जो अथार्त् इंद्र
कैलासपति – कैलास का पति है जो अथार्त शिव
जिस भी शब्द में (उदर/पेट) जुड़ जाए वहाँ बहुव्रीहि समास होगा। जैसे-
लंबोदर – जिसके लंबा उदर है अथार्त् गणेश
वृकोदर – जिसका वृक (भेड़िया) जैसा उदर हो अथार्त् भीम
दामोदर – दामन से बंधा है उदार जिसका अथार्त् कृष्ण
जिसमें ‘कर’ प्रत्यय (करनेवाला) जुड़ा हो वहाँ बहुव्रीहि समास होगा। जैसे-
दिनकर – दिन को करनेवाला अथार्त सूर्य
सुधाकर – वह जो सुधा (अमृत) को संभव करता है अथार्त् चंद्रमा
जिसमें भी ‘द’ (देनेवाले) और ‘दा’ (देनेवाली) प्रत्यय आ जाए वहाँ बहुव्रीहि समास होगा
नीरद – नीर को देनेवाला है जो अथार्त् बादल
षट्पद – छह हैं पद (पैर) जिसके अथार्त् भ्रमर
फिरोजाबाद – फिरोजशाह तुगलक ने किया आबाद जिसे अथार्त् एक शहर विशेष
जय हिंद