द्वंद्व समास
(Copulative Compound)
साधारण बोलचाल की भाषा में ‘द्वंद्व’ समास के दोनों पद प्रधान होते हैं।
पं. कामता प्रसाद गुरु के शब्दों में- “जिस समास में सब पद अथवा उनका समाहार प्रधान रहता है, उसे द्वंद्व समास कहते है।”
द्वंद्व समास में समस्त पद के दोनों पद प्रधान होते हैं। समस्त पद का विग्रह करने पर बीच में ‘और’ या ‘एवं’ लगाना होता है। इसमें दोनों को मिलाते समय मध्य में स्थित योजक लुप्त हो जाता है।
जैसे- ‘माता और पिता’ यहाँ माता और पिता का समस्त पद होगा- ‘माता-पिता’
इसमें दोनों पद समान होते है। इस समास में ऐसे संख्यावाची शब्दों का भी प्रयोग किया जाता है, जिनके दोनों ही पद संख्या का बोध कराते है।
पं. कामता प्रसाद गुरु के अनुसार- द्वंद्व समास के तीन प्रकार है- 1. इतरेतर द्वंद्व 2. समाहार द्वंद्व 3. वैकल्पिक द्वंद्व और समुच्चयबोधक
1. इतरेतर द्वंद्व- जिस समास के समस्त पद ‘और’ समुच्चयबोधक से जुड़े हुए हों पर इस समुच्चयबोधक का लोप हो, उसे ‘इतरेतर द्वंद्व’ समास कहते हैं।
इस समास में दोनों पदों के बीच ‘और’ ‘एवं’ ‘तथा’ आदि योजक शब्दों का लोप होता है। इस समास में ऐसे संख्यावाची शब्दों का भी प्रयोग किया जाता है, जिनके दोनों पद (पूर्व पद और उत्तर पद) संख्या का बोध कराते हैं। इस समास में दोनों पद का अलग-अलग अर्थ रहकर भी अपना अस्तित्व बनाए रखते हैं। इस समास से बने पद बहुधा बहुवचन में प्रयुक्त होते है, क्योंकि वे दो या दो से अधिक पदों के मेल से बने होते हैं। जैसे-
1. राम-कृष्ण = राम और कृष्ण
2. भरत-शत्रुघन् = भरत और शत्रुघन्
3. ऋषि-मुनि = ऋषि और मुनि
4. गाय-बैल = गाय और बैल
5. भाई-बहन = भाई और बहन
यहाँ यह ध्यान रखना चाहिए कि इतरेतर द्वंद्व समास में दोनों पद न केवल प्रधान होते हैं, बल्कि वे अपना अलग-अलग अस्तित्व भी रखते हैं।
अपवाद- इस समास में द्रव्यवाचक हिंदी की समस्त संज्ञाएँ बहुधा एकवचन में आती हैं। यदि दोनों पद मिलकर प्रायः एक ही वस्तु को सूचित करते हैं, तो वे भी एकवचन में आते हैं। जैसे- घी-गुड़, खान-पान, दूध- भात, दाल-रोटी आदि।
शेष द्वंद्व समास बहुवचन में आते हैं।
इतरेतर समास के अन्य उदाहरण इस प्रकार हैं-
| समस्त पद | विग्रह |
| अमीर- गरीब | अमीर और गरीब |
| अड़सठ | आठ और आठ |
| अड़ोस-पड़ोस | अड़ोस और पड़ोस |
| अचार-व्यवहार | अचार और व्यवहार |
| आगा-पीछा | आगा और पीछा |
| आन-बान-शान | आन, बान और शान |
| इकतीस | एक और तीस |
| उछल-कूद | उछल और कुद |
| ऋषि-मुनि | ऋषि और मुनि |
| ऊपर-नीचे | ऊपर और नीचे |
| खट्टा-मीठा | खट्टा और मीठा |
| खान-पान | खान और पान |
| ग्यारह | एक और एक |
| ज्ञान-विज्ञान | ज्ञान और विज्ञान |
| गाय-भैंस | गाय और भैंस |
| गौरी-शंकर | गौरी और शंकर |
| गाय-बैल | गाय और बैल |
| घी-शक्कर | घी और शक्कर |
| घी-दूध | घी और दूध |
| घन-घोर | घन और घोर |
| घी-गुड़ | घी और गुड़ |
| चवालीस | चार और चालीस |
| चौदह | चार और दस |
| चौसठ | चार और साठ |
| चिट्ठी-पत्री | चिट्ठी और पत्री |
| चिट्ठी-पाती | चिट्ठी और पाती |
| छल-कपट | छल और कपट |
| छियासी | छह और अस्सी |
| जन्म-मरण | जन्म और मरण |
| जलवायु | जल और वायु |
| तन-मन-धन | तन, मन और धन |
| तिल-चावल | तिल और चावल |
| तिरपन | तीन और पचास |
| दूध-रोटी | दूध और रोटी (R.A.S. 2000) |
| दाल-रोटी | दाल और रोटी |
| देवासुर | देव और असुर |
| दान-धान | दान औए धान |
| धनुर्बाण | धनुष और बाण |
| धन-दौलत | धन और दौलत |
| धूप-छाँव | धूप और छाँव |
| नर-नारी | नर और नारी |
| नमक-मिर्च | नमक और मिर्च |
| नदी-नाले | नदी और नाले |
| नाक-कान | नाक और कान |
| पच्चीस | पाँच और बीस |
| पाला-पोसा | पाला और पोसा |
| पंद्रह | पाँच और दस |
| पाप-पुण्य | पाप और पुण्य |
| बत्तीस | दो और तीस |
| बारह | दो और दस |
| बाईस | दो और बीस |
| बेटा-बेटी | बेटा और बेटी |
| भीमार्जुन | भीम और अर्जुन |
| भाई-बहन | भाई और बहन |
| माँ-बाप | माँ और बाप |
| यश–अपयश | यश और अपयश |
| राजा-रंक | राजा और रंक |
| राम-बलराम | राम और बलराम |
| रात-दिन | रात और दिन |
| राम-कृष्ण | राम और कृष्ण (BPSC,1982) |
| राधा-कृष्ण | राधा और कृष्ण |
| लव-कुश | लव और कुश (BPSC,1986) |
| लीपा-पोती | लीपना और पोतना |
| शिव-पार्वती | शिव और पार्वती |
| शीतोष्ण | शीत और उष्ण |
| सुख-दुख | सुख और दुख |
| सीता-राम | सीता और राम |
| हृष्ट-पुष्ट | हृष्ट और पुष्ट |
| हाथी-घोड़ा | हाथी और घोड़ा |
| हाथ-पाँव | हाथ और पाँव |
संख्यावाची शब्दों में इतरेतर द्वंद्व समास का
स्पष्टीकरण –
(एक) 1 से 9 (नौ) तथा 10, 20, 30, 40, 50, 60, 70,
80, 90, 100 जैसी पूर्णांक संख्यावाची शब्दों को छोड़कर अन्य सभी संख्यावाची शब्द द्वंद्व समास के उदाहरण होंगे।
उपर्युक्त दिए गए संख्याओं के अतिरिक्त अन्य सभी संख्याओं के प्रयोग करने पर दोनों पद संख्यावाची होने से इतरेतर द्वंद्व समास बन जाता है।
लिंग संबंधी स्पष्टीकरण- एक ही लिंग के शब्दों से बने समास का मूल लिंग बना रहता है। परंतु भिन्न लिंगों के शब्दों में बहुधा पुल्लिंग होता है। कभी-कभी अंतिम और कभी-कभी प्रथम शब्द का भी लिंग आता है। जैसे-
गाय-बैल (पु.), नाक-कान (पु.), घी-शक्कर (पु.), दूध-रोटी (स्त्री.), चिट्ठीपाती (स्त्री.), भाई-बहन (पु.), माँ-बाप (पु.)
विशेष नोट- यहाँ यह ध्यान रखना चाहिए कि इतरेतर द्वंद्व में दोनों पद न केवल प्रधान होते हैं, बल्कि वे अपना-अपना अलग अस्तित्व भी रखते हैं।
2. समाहार द्वंद्व समास- ‘समाहार’ का अर्थ है- समष्टि या समूह।जिस द्वंद्व समास के उसके समस्त पदों के अर्थ के अतिरिक्त उसी प्रकार का और भी अर्थ सूचित हो उसे समाहार द्वंद्व कहते हैं।
जब द्वंद्व समास के दोनों पद ‘और’ समुच्चय बोधक से जुड़े होने पर भी अलग-अलग अस्तित्व न रखें, बल्कि समूह का बोध कराएँ, तब वह समाहार द्वंद्व समास कहलाता है।
समाहार द्वंद्व समास की निम्नलिखित विशेषताएँ प्रमुख हैं-
1. समाहार द्वंद्व समास समूह का बोध कराता है।
2. दोनों पद समुच्चयबोधक से जुड़े होने पर भी अपना अलग-अलग अस्तित्व नहीं रखते हैं।
3. इस समास में दोनों पदों के अतिरिक्त अन्य पद भी छिपे रहते हैं और अपने पद का बोध अप्रत्यक्ष रूप से कराते हैं। जैसे-
आहार-निद्रा = आहार और निद्रा (केवल आहार निद्रा ही नहीं, बल्कि इसी तरह की और बातें भी)।
दाल-रोटी = दाल और रोटी (केवल दाल रोटी ही नहीं बल्कि भोजन के सभी मुख्य पदार्थ)।
हाथ-पाँव = हाथ और पाँव (अथार्त हाथ पाँव के अलावा शरीर के दूसरे सभी अंग भी)
इसी तरह जैसे- अन्न-जल, नोन-तेल, साँप-बिच्छू, खाना-पीना इत्यादि।
4. जब दो विशेषण पदों का संज्ञा के अर्थ में समास हो, तो समाहार द्वंद्व समास होता है।
5. इस तरह के समासों का विग्रह करने पर ‘इत्यादि’, आदि का प्रयोग किया जाता है।
समाहार द्वंद्व समास के निम्नलिखित उदाहरण हैं-
| समस्त पद | विग्रह |
| आहार-निद्रा | आहार, निद्रा आदि |
| आगा-पीछा | आगा, पीछा आदि (R.A.S.1997) |
| उछल-कूद | उछल, कूद आदि |
| ऊँचा-नीचा | ऊँचा, नीचा आदि |
| कपड़े-लत्ते | कपड़े, लत्ते आदि |
| करनी-भरनी | करनी, भरनी आदि |
| कंकर-पत्थर | कंकर, पत्थर आदि |
| काम-काज | काम, काज आदि |
| कीड़ा-मकोड़ा | कीड़ा, मकोड़ा आदि |
| कूड़ा-कचरा | कूड़ा, कचरा आदि |
| कुरता-टोपी | कुरता, टोपी आदि |
| खान-पान | खान, पान आदि |
| खाना-पीना | खाना, पीना आदि |
| गोला-बारूद | गोला, बारूद आदि |
| घर-द्वार | घर, द्वार आदि |
| घर-घर | घर, घर आदि |
| घास-फूस | घास, फूस आदि |
| चमक-दमक | चमक, दमक आदि |
| चाल-चलन | चाल, चलन आदि |
| चिट्ठी-पत्री | चिट्ठी, पत्री आदि |
| जलवायु | जल, वायु आदि |
| जंगल-झाड़ी | जंगल, झाड़ी आदि |
| जीव-जंतु | जीव, जंतु आदि |
| जैसा-तैसा | जैसा, तैसा आदि |
| झाड़-फूँक | झाड़, फूँक आदि |
| टोपा-टाई | टोपा, टाई आदि |
| तीन-तेरह | तीन, तेरह आदि |
| तन-बदन | तन, बदन आदि |
| देख-भाल | देख, भाल आदि |
| देखा-देखी | देखा, देखी आदि |
| दीया-बत्ती | दीया, बत्ती आदि |
| धन-दौलत | धन, दौलत आदि |
| धूप-बत्ती | धूप, बत्ती आदि |
| नोन-तेल | नोन, तेल आदि |
| नाच-गान | नाच, गान आदि |
| पान-फूल | पान, फूल आदि |
| पान-तंबाकू | पान, तंबाकू आदि |
| पाला-पोसा | पाला, पोसा आदि |
| पेड़-पौधे | पेड़, पौधे आदि |
| फल-फूल | फल, फूल आदि |
| बाल-बच्चा | बाल, बच्चा आदि |
| बाप-दादा | बाप, दादा आदि |
| बोल-चाल | बोल, चाल आदि |
| भला-बुरा | भला, बुरा आदि |
| भूल-चूक | भूल, चूक आदि |
| भूत-प्रेत | भूत, प्रेत आदि |
| भूखा-प्यासा | भूखा, प्यासा आदि |
| मेल-मिलाप | मेल, मिलाप आदि |
| मोटा-ताजा | मोटा, ताजा आदि |
| मोल-तोल | मोल, तोल आदि |
| रोना-धोना | रोना, धोना आदि |
| रहन-सहन | रहन, सहन आदि |
| रोक-टोक | रोक, टोक आदि |
| लीपा-पोती | लीपा, पोती आदि |
| लेन-देन | लेन, देन आदि |
| लंगड़ा-लूला | लंगड़ा, लूला आदि |
| साँप-बिच्छु | साँप, बिच्छु आदि |
| साग-पात | साग, पात आदि |
| हुक्का-पानी | हुक्का, पानी आदि |
| हष्ट-पुष्ट | हष्ट, पुष्ट आदि |
| हार-जीत | हार, जीत आदि |
| चलता-फिरता | चलता, फिरता आदि |
| खेत-खलिहान | खेत, खलिहान आदि |
3. वैकल्पिक द्वंद्व समास- जिस द्वंद्व समास में दो पदों के बीच ‘या’ ‘अथवा’ आदि विकल्प सूचक अव्यय छिपे हो, उसे वैकल्पिक द्वंद्व समास कहते हैं। इस समास में बहुधा परस्पर विरोधी शब्दों (विपरीतार्थक) का मेल होता है। जैसे-
| आज-कल | आज या कल |
| इधर-उधर | इधर या उधर |
| कर्मधर्म | कर्म या धर्म |
| जात-कुजात | जात या कुजात |
| ठंडा-गर्म | ठंढा या गर्म |
| पाप-पुण्य | पाप या पुण्य |
| ऊँच-नीच | ऊँच या नीच |
| मार-पीट | मार या पीट |
| राग-द्वेष | राग या द्वेष |
| शादी-गमी | शादी या गमी |
| सुख-दुःख | सुख या दुःख |
| आज-कल | आज या कल |
| जीवन-मरण | जीवन या मरण |
| सुर-असुर | सूर या असुर |
| उल्टा-सुल्टा | उल्टा या सुल्टा |
| घट-बढ़ | घट या बढ़ |
| धर्माधर्म | धर्म या अधर्म |
| भला-बुरा | भला या बुरा |
| यश-अपयश | यश या अपयश |
| लाभालाभ | लाभ या अलाभ |
| साग-पात | साग या पात |
| कर्तव्याकर्तव्य | कर्तव्य अथवा अकर्तव्य |
| हानि-लाभ | हानि या लाभ |
नोट: कामता प्रसाद गुरु के अनुसार- “दो, तीन, नौ, दस, बीस, पच्चीस आदि अनिश्चित गणनावाचक (संख्यावाचक) सामाजिक विशेषण कभी-कभी संज्ञा के सामान प्रयुक्त होते हैं। उस समय उन्हें वैकल्पिक द्वंद्व कहना उचित है।” जैसे- मैं दो चार को कुछ नहीं समझता।
इसके अन्य उदाहरण:
| दो – चार | दो से चार तक |
| दो – तीन | दो से तीन तक |
| आठ – दस | आठ से दस तक |
| नौ – दस | नौ से दस तक |
| दस – पाँच | दस से पाँच तक |
| दस – बारह | दस से बारह तक |
| दस – बीस | दस से बीस तक |
| सौ – दो – सौ | सौ से दो सौ |
जय हिंद