समास और समास के भेद : भाग-6 (द्वंद्व समास)

द्वंद्व समास

(Copulative Compound)

साधारण बोलचाल की भाषा में ‘द्वंद्व’ समास के दोनों पद प्रधान होते हैं।

पं. कामता प्रसाद गुरु के शब्दों में- “जिस समास में सब पद अथवा उनका समाहार प्रधान रहता है, उसे द्वंद्व समास कहते है।”

द्वंद्व समास में समस्त पद के दोनों पद प्रधान होते हैं। समस्त पद का विग्रह करने पर बीच में ‘और’ या ‘एवं’ लगाना होता है। इसमें दोनों को मिलाते समय मध्य में स्थित योजक लुप्त हो जाता है।

जैसे- ‘माता और पिता’ यहाँ माता और पिता का समस्त पद होगा- ‘माता-पिता’

इसमें दोनों पद समान होते है। इस समास में ऐसे संख्यावाची शब्दों का भी प्रयोग किया जाता है, जिनके दोनों ही पद संख्या का बोध कराते है।

पं. कामता प्रसाद गुरु के अनुसार- द्वंद्व समास के तीन प्रकार है- 1. इतरेतर द्वंद्व 2. समाहार द्वंद्व 3. वैकल्पिक द्वंद्व और समुच्चयबोधक

1. इतरेतर द्वंद्व- जिस समास के समस्त पद ‘और’ समुच्चयबोधक से जुड़े हुए हों पर इस समुच्चयबोधक का लोप हो, उसे ‘इतरेतर द्वंद्व’ समास कहते हैं।

इस समास में दोनों पदों के बीच ‘और’ ‘एवं’ ‘तथा’ आदि योजक शब्दों का लोप होता है। इस समास में ऐसे संख्यावाची शब्दों का भी प्रयोग किया जाता है, जिनके दोनों पद (पूर्व पद और उत्तर पद) संख्या का बोध कराते हैं। इस समास में दोनों पद का अलग-अलग अर्थ रहकर भी अपना अस्तित्व बनाए रखते हैं। इस समास से बने पद बहुधा बहुवचन में प्रयुक्त होते है, क्योंकि वे दो या दो से अधिक पदों के मेल से बने होते हैं। जैसे-

1. राम-कृष्ण = राम और कृष्ण

2. भरत-शत्रुघन् = भरत और शत्रुघन्

3. ऋषि-मुनि = ऋषि और मुनि

4. गाय-बैल = गाय और बैल

5. भाई-बहन = भाई और बहन

यहाँ यह ध्यान रखना चाहिए कि इतरेतर द्वंद्व समास में दोनों पद न केवल प्रधान होते हैं, बल्कि वे अपना अलग-अलग अस्तित्व भी रखते हैं।

अपवाद- इस समास में द्रव्यवाचक हिंदी की समस्त संज्ञाएँ बहुधा एकवचन में आती हैं। यदि दोनों पद मिलकर प्रायः एक ही वस्तु को सूचित करते हैं, तो वे भी एकवचन में आते हैं। जैसे- घी-गुड़, खान-पान, दूध- भात, दाल-रोटी आदि।

शेष द्वंद्व समास बहुवचन में आते हैं।

इतरेतर समास के अन्य उदाहरण इस प्रकार हैं-

समस्त पदविग्रह
अमीर- गरीबअमीर और गरीब
अड़सठआठ और आठ
अड़ोस-पड़ोसअड़ोस और पड़ोस
अचार-व्यवहारअचार और व्यवहार
आगा-पीछाआगा और पीछा
आन-बान-शानआन, बान और शान
इकतीसएक और तीस
उछल-कूदउछल और कुद
ऋषि-मुनिऋषि और मुनि
ऊपर-नीचेऊपर और नीचे
खट्टा-मीठाखट्टा और मीठा
खान-पानखान और पान
ग्यारहएक और एक
ज्ञान-विज्ञानज्ञान और विज्ञान
गाय-भैंसगाय और भैंस
गौरी-शंकरगौरी और शंकर
गाय-बैलगाय और बैल
घी-शक्करघी और शक्कर
घी-दूधघी और दूध
घन-घोरघन और घोर
घी-गुड़घी और गुड़
चवालीसचार और चालीस
चौदहचार और दस
चौसठचार और साठ
चिट्ठी-पत्रीचिट्ठी और पत्री
चिट्ठी-पातीचिट्ठी और पाती
छल-कपटछल और कपट
छियासीछह और अस्सी
जन्म-मरणजन्म और मरण
जलवायुजल और वायु
तन-मन-धनतन, मन और धन 
तिल-चावलतिल और चावल
तिरपनतीन और पचास
दूध-रोटीदूध और रोटी (R.A.S. 2000)
दाल-रोटीदाल और रोटी
देवासुरदेव और असुर
दान-धानदान औए धान
धनुर्बाणधनुष और बाण
धन-दौलतधन और दौलत
धूप-छाँवधूप और छाँव
नर-नारीनर और नारी
नमक-मिर्चनमक और मिर्च
नदी-नालेनदी और नाले
नाक-काननाक और कान   
पच्चीसपाँच और बीस
पाला-पोसापाला और पोसा
पंद्रहपाँच और दस
पाप-पुण्यपाप और पुण्य
बत्तीसदो और तीस
बारहदो और दस
बाईसदो और बीस
बेटा-बेटीबेटा और बेटी
भीमार्जुनभीम और अर्जुन
भाई-बहनभाई और बहन
माँ-बापमाँ और बाप
यश–अपयशयश और अपयश
राजा-रंकराजा और रंक
राम-बलरामराम और बलराम
रात-दिनरात और दिन
राम-कृष्णराम और कृष्ण (BPSC,1982)
राधा-कृष्णराधा और कृष्ण
लव-कुशलव और कुश (BPSC,1986)
लीपा-पोतीलीपना और पोतना
शिव-पार्वतीशिव और पार्वती
शीतोष्णशीत और उष्ण
सुख-दुखसुख और दुख
सीता-रामसीता और राम
हृष्ट-पुष्टहृष्ट और पुष्ट
हाथी-घोड़ाहाथी और घोड़ा
हाथ-पाँवहाथ और पाँव

संख्यावाची शब्दों में इतरेतर द्वंद्व समास का

  स्पष्टीकरण –

(एक) 1 से 9 (नौ) तथा 10, 20, 30, 40, 50, 60, 70,

80, 90, 100 जैसी पूर्णांक संख्यावाची शब्दों को छोड़कर अन्य सभी संख्यावाची शब्द द्वंद्व समास के उदाहरण होंगे।

उपर्युक्त दिए गए संख्याओं के अतिरिक्त अन्य सभी संख्याओं के प्रयोग करने पर दोनों पद संख्यावाची होने से इतरेतर द्वंद्व समास बन जाता है।

लिंग संबंधी स्पष्टीकरण- एक ही लिंग के शब्दों से बने समास का मूल लिंग बना रहता है। परंतु भिन्न लिंगों के शब्दों में बहुधा पुल्लिंग होता है। कभी-कभी अंतिम और कभी-कभी प्रथम शब्द का भी लिंग आता है। जैसे-

गाय-बैल (पु.), नाक-कान (पु.), घी-शक्कर (पु.), दूध-रोटी (स्त्री.), चिट्ठीपाती (स्त्री.), भाई-बहन (पु.), माँ-बाप (पु.)

विशेष नोट- यहाँ यह ध्यान रखना चाहिए कि इतरेतर द्वंद्व में दोनों पद न केवल प्रधान होते हैं, बल्कि वे अपना-अपना अलग अस्तित्व भी रखते हैं।    

2. समाहार द्वंद्व समास- ‘समाहार’ का अर्थ है- समष्टि या समूह।जिस द्वंद्व समास के उसके समस्त पदों के अर्थ के अतिरिक्त उसी प्रकार का और भी अर्थ सूचित हो उसे समाहार द्वंद्व कहते हैं।

जब द्वंद्व समास के दोनों पद ‘और’ समुच्चय बोधक से जुड़े होने पर भी अलग-अलग अस्तित्व न रखें, बल्कि समूह का बोध कराएँ, तब वह समाहार द्वंद्व समास कहलाता है।

समाहार द्वंद्व समास की निम्नलिखित विशेषताएँ प्रमुख हैं-

1. समाहार द्वंद्व समास समूह का बोध कराता है।

2. दोनों पद समुच्चयबोधक से जुड़े होने पर भी अपना अलग-अलग अस्तित्व नहीं रखते हैं।

3. इस समास में दोनों पदों के अतिरिक्त अन्य पद भी छिपे रहते हैं और अपने पद का बोध अप्रत्यक्ष रूप से कराते हैं। जैसे-

आहार-निद्रा = आहार और निद्रा (केवल आहार निद्रा ही नहीं, बल्कि इसी तरह की और बातें भी)।

दाल-रोटी = दाल और रोटी (केवल दाल रोटी ही नहीं बल्कि भोजन के सभी मुख्य पदार्थ)।

हाथ-पाँव = हाथ और पाँव (अथार्त हाथ पाँव के अलावा शरीर के दूसरे सभी अंग भी)

इसी तरह जैसे- अन्न-जल, नोन-तेल, साँप-बिच्छू, खाना-पीना इत्यादि।

4. जब दो विशेषण पदों का संज्ञा के अर्थ में समास हो, तो समाहार द्वंद्व समास होता है।

5. इस तरह के समासों का विग्रह करने पर ‘इत्यादि’, आदि का प्रयोग किया जाता है।

समाहार द्वंद्व समास के निम्नलिखित उदाहरण हैं-

समस्त पदविग्रह
आहार-निद्राआहार, निद्रा आदि
आगा-पीछाआगा, पीछा आदि (R.A.S.1997)  
उछल-कूद उछल, कूद आदि
ऊँचा-नीचाऊँचा, नीचा आदि
कपड़े-लत्तेकपड़े, लत्ते आदि
करनी-भरनीकरनी, भरनी आदि
कंकर-पत्थरकंकर, पत्थर आदि
काम-काजकाम, काज आदि
कीड़ा-मकोड़ा कीड़ा, मकोड़ा आदि
कूड़ा-कचराकूड़ा, कचरा आदि
कुरता-टोपीकुरता, टोपी आदि
खान-पानखान, पान आदि
खाना-पीनाखाना, पीना आदि
गोला-बारूदगोला, बारूद आदि
घर-द्वारघर, द्वार आदि
घर-घरघर, घर आदि
घास-फूसघास, फूस आदि
चमक-दमकचमक, दमक आदि
चाल-चलनचाल, चलन आदि
चिट्ठी-पत्रीचिट्ठी, पत्री आदि
जलवायुजल, वायु आदि
जंगल-झाड़ीजंगल, झाड़ी आदि
जीव-जंतु जीव, जंतु आदि
जैसा-तैसाजैसा, तैसा आदि
झाड़-फूँकझाड़, फूँक आदि
टोपा-टाईटोपा, टाई आदि
तीन-तेरहतीन, तेरह आदि
तन-बदनतन, बदन आदि
देख-भालदेख, भाल आदि
देखा-देखीदेखा, देखी आदि
दीया-बत्तीदीया, बत्ती आदि
धन-दौलतधन, दौलत आदि
धूप-बत्तीधूप, बत्ती आदि
नोन-तेलनोन, तेल आदि
नाच-गाननाच, गान आदि
पान-फूलपान, फूल आदि
पान-तंबाकूपान, तंबाकू आदि
पाला-पोसापाला, पोसा आदि
पेड़-पौधेपेड़, पौधे आदि
फल-फूलफल, फूल आदि
बाल-बच्चाबाल, बच्चा आदि
बाप-दादाबाप, दादा आदि
बोल-चालबोल, चाल आदि
भला-बुराभला, बुरा आदि
भूल-चूकभूल, चूक आदि
भूत-प्रेतभूत, प्रेत आदि
भूखा-प्यासाभूखा, प्यासा आदि
मेल-मिलापमेल, मिलाप आदि
मोटा-ताजामोटा, ताजा आदि
मोल-तोलमोल, तोल आदि
रोना-धोना  रोना, धोना आदि
रहन-सहनरहन, सहन आदि
रोक-टोकरोक, टोक आदि
लीपा-पोतीलीपा, पोती आदि
लेन-देनलेन, देन आदि
लंगड़ा-लूलालंगड़ा, लूला आदि
साँप-बिच्छुसाँप, बिच्छु आदि
साग-पातसाग, पात आदि
हुक्का-पानीहुक्का, पानी आदि
हष्ट-पुष्ट हष्ट, पुष्ट आदि
हार-जीतहार, जीत आदि
चलता-फिरताचलता, फिरता आदि
खेत-खलिहानखेत, खलिहान आदि

3. वैकल्पिक द्वंद्व समास- जिस द्वंद्व समास में दो पदों के बीच ‘या’ ‘अथवा’ आदि विकल्प सूचक अव्यय छिपे हो, उसे वैकल्पिक द्वंद्व समास कहते हैं।  इस समास में बहुधा परस्पर विरोधी शब्दों (विपरीतार्थक) का मेल होता है। जैसे-

आज-कलआज या कल
इधर-उधरइधर या उधर
कर्मधर्मकर्म या धर्म
जात-कुजात जात या कुजात
ठंडा-गर्मठंढा या गर्म
पाप-पुण्यपाप या पुण्य
ऊँच-नीचऊँच या नीच
मार-पीटमार या पीट
राग-द्वेषराग या द्वेष
शादी-गमीशादी या गमी
सुख-दुःखसुख या दुःख
आज-कलआज या कल
जीवन-मरणजीवन या मरण
सुर-असुरसूर या असुर
उल्टा-सुल्टाउल्टा या सुल्टा
घट-बढ़घट या बढ़
धर्माधर्मधर्म या अधर्म
भला-बुराभला या बुरा
यश-अपयशयश या अपयश
लाभालाभलाभ या अलाभ
साग-पातसाग या पात
कर्तव्याकर्तव्यकर्तव्य अथवा अकर्तव्य
हानि-लाभहानि या लाभ

नोट: कामता प्रसाद गुरु के अनुसार- “दो, तीन, नौ, दस, बीस, पच्चीस आदि अनिश्चित गणनावाचक (संख्यावाचक) सामाजिक विशेषण कभी-कभी संज्ञा के सामान प्रयुक्त होते हैं। उस समय उन्हें वैकल्पिक द्वंद्व कहना उचित है।” जैसे- मैं दो चार को कुछ नहीं समझता।

इसके अन्य उदाहरण:

दो – चारदो से चार तक
दो – तीनदो से तीन तक
आठ – दसआठ से दस तक
नौ – दसनौ से दस तक
दस – पाँचदस से पाँच तक
दस – बारहदस से बारह तक
दस – बीसदस से बीस तक
सौ – दो – सौसौ से दो सौ

जय हिंद

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