व्यधिकरण तत्पुरुष समास के अन्य भेद
जिस तत्पुरुष समास में कारक चिह्न का लोप नहीं होता उसे अलुक् तत्पुरुष समास कहते हैं। अलुक् तत्पुरुष समास में कारक चिह्न किसी न किसी रूप में विद्यमान रहता है।
अलुक् शब्द अ + लुक् के योग से बना है, जिसका शाब्दिक अर्थ ‘न छिपना’ होता है। दरअसल, तत्पुरुष समास की प्रक्रिया में किसी न किसी कारक चिह्न का लोप होता है, लेकिन जब समास प्रक्रिया में कारक विभक्ति का लोप नहीं हो तो उसे अलुक् तत्पुरुष समास कहते हैं।
पं. कामता प्रसाद गुरु के अनुसार- “परसर्गाधार व्यधिकरण तत्पुरुष समास के कारक के अलावा अन्य भेद निम्नलिखित हैं-
1. अलुक् तत्पुरुष
2. उपपद तत्पुरुष
3. नञ् तत्पुरुष
4. प्रादि तत्पुरुष
1. अलुक तत्पुरुष समास – जिस व्यधिकरण समास में पहले पद की विभक्ति का लोप नहीं होता, उसे अलुक तत्पुरुष समास कहते हैं। इस समास में विभक्ति चिह्न ज्यों का त्यों बना रहता हैं। इसमें ‘लुक्’ पारिभाषिक शब्द है, जिसका अर्थ होता है- ‘प्रत्यय का लोप हो जाना।’
अलुक का अर्थ है- ‘प्रत्यय का लोप न होना।’ यहाँ विभक्तियाँ प्रत्यय हैं। विभक्ति का लोप न होना अलुक है।
इस प्रकार यह कहा जा सकता हैं, कि जहाँ प्रथम पद (पूर्वपद) में प्रयुक्त विभक्ति का लोप नहीं होना अथार्त शब्द का विभक्ति के साथ ही प्रयोग होता है। उसे अलुक समास कहते है। जैसे- युधिष्ठिर – युद्ध में स्थिर रहने वाला।
इस उदाहरण में युद्ध की जगह युधि हो गया है अथार्त ‘में’ चिह्न मिल गया है। यह सप्तमी विभक्ति हो गया है।
इसी तरह अन्य उदाहरण- तीर्थंकर– तीर्थों को करने वाला। इसमें पहला शब्द तीर्थ नहीं बल्कि तीर्थंम है अथार्त संस्कृत के कर्म कारक की विभक्ति ‘म्’ उपस्थित है, अतः तीर्थंकर अलुक् तत्पुरुष समास है।
अलुक् तत्पुरुष के निम्नलिखित उदाहरण इस प्रकार हैं-
| समस्त पद | समास | विभक्ति |
| खेचर | आकाश में विचरण करने वाला | सप्तमी |
| आत्मनेपद | आत्मा के लिए प्रयुक्त पद | चतुर्थी |
| धनंजय | धनं (कुबेर) को जय करने वाला | द्वितीया |
| धुरंधर | धुरी को धारण करने वाला | द्वितीया |
| भयंकर | भय को करने वाला | द्वितीया |
| प्रलयंकर | प्रलय को करने वाला | द्वितीया |
| मनसिज | मनसि(मन)में जन्म लेनेवाला (कामदेव) | सप्तमी |
| मृत्युंजय | मृत्यु को जय करने वाला | द्वितीया |
| वसुंधरा | वसुओं को धारण करने वाला | द्वितीया |
| सरसिज | सर (तालाब) में जन्म लेने वाला | सप्तमी |
| तीर्थंकर | तीर्थों को करने वाला | द्वितीया |
| युधिष्ठिर | युधि (युद्ध) में स्थिर रहने वाला | द्वितीया |
| वनेचर | वन में विचरण करने वाला | सप्तमी |
| वाचस्पति | वाचः (वाणी) का पति | षष्ठी |
| शुभंकर | शुभ को करने वाला | द्वितीया |
| विश्वभर | विश्वं (विश्व को) भरण करने वाला | द्वितीया |
कुछ अन्य उदाहरण इस प्रकार हैं-
| बृहस्पति | बृहद है जो पति |
| कर्तरिप्रयोग | कर्ता से संबंधित प्रयोग |
| कर्मणिप्रयोग | कर्म से संबंधित प्रयोग |
रूढ़ अर्थ में प्रयुक्त अन्य उदाहरण इस प्रकार हैं-
| सब्जीवाला | सब्जी देने वाला |
| मिठाईवाला | मिठाई (पकवान) से संबंधित काम करने वाला |
| चायवाला | चाय बनाने का कार्य करने वाला |
| सूबेदार | सूबे का दार (मालिक) |
| पहरेदार | पहरे का दार (करने वाला) |
| किरायेदार | किराये का दार (देने वाला) |
| चूहेदानी | चूहे पकड़ने की दानी |
| केलेवाला | केलेवाला |
| कुल्फीवाला | कुल्फी का काम करने वाला |
| ठेलेवाला | ठेले का मालिक |
विशेष नोट- इस समास का प्रयोग संस्कृत में है, हिंदी में ऐसे उदाहरण बहुत कम हैं।
2. उपपद तत्पुरुष- कभी-कभी धातुओं में प्रत्यय लगाने के लिए अनिवार्य रूप से कोई न कोई उपपद रखना पड़ता है। ऐसे समस्त पदों को ‘उपपद तत्पुरुष’ कहते हैं।
पं. कामता प्रसाद गुरु के शब्दों में- “जब तत्पुरुष समास का दूसरा पद कृदंत होता है, जिसका स्वतंत्र उपयोग नहीं हो सकता हैं। ऐसे समस्त पदों को उपपद तत्पुरुष समास कहते हैं। उदाहरण-
जलज- जल में उत्पन्न करने वाला
कुंभकार- कुंभ को करने वाला उपर्युक्त दिए गए उदाहरणों में ‘जलज’ में ‘ज’ और ‘कुंभकार’ में ‘कार’ दोनों अप्रचलित कृदंत हैं।
‘उपपद’ के कुछ अन्य उदाहरण इस प्रकार हैं-
| अंबुधि | अंबु को धारण करने वाला |
| अंबुद | अंबु (जल) को धारण करने वाला |
| कृतघ्न | कृत (उपकार) को न मानने वाला |
| कष्टप्रद | कष्ट को प्रदान करनेवाला |
| कुंभकार | कुंभ को करने वाला |
| कठफोड़वा | काठ को फोड़ने वाला |
| चर्मकार | चर्म का कार्य करने वाला |
| चित्रकार | चित्र को बनाने वाला |
| जलधि | जल को धारण करने वाला |
| जलज | जल में जन्म लेने वाला |
| जलचर | जल में विचरण करने वाला |
| थलचर | थल में विचरण करने वाला |
| नभचर | नभ में विचरण करने वाला |
| नीरद | नीर (जल) को देने वाला |
| नीरज | जल (जल) में उत्पन्न होने वाला |
| पंकज | पंक (कीचड़) में जन्म लेने वाला |
| फिल्मकार | फिल्म का कार्य करने वाला |
| महीप | पृथ्वी को पालने वाला |
| मनोज्ञ | मन को जानने वाला |
| मूर्तिकार | मूर्ति को बनाने (कार्य करने) वाला |
| राजनीतिज्ञ | राजनीति को जानने वाला |
| वारिज | वारि (जल) में जन्म लेने वाला |
| शिल्पकार | शिल्प का कार्य करने वाला |
| शक्तिदायक | शक्ति को देने वाला |
| संगीतकार | संगीत का कार्य करने वाला |
| सुखदायी | सुख को देने वाला |
| स्वर्णकार | स्वर्ण का कार्य करने वाला |
| साहित्यकार | साहितय का कार्य करने वाला |
| स्वस्थ | स्व में स्थिर रहने वाला |
| वारिधि | वारि को धारण करेने वाला |
| बटमार | बाट (मार्ग) में मारने वाल |
नोट- यह समास संस्कृत में ही अधिक प्रचलित है। हिंदी में इस समास के उदाहरण कम हैं।
इस समास के अधिकांश उदाहरण में तीसरा अर्थ प्रधान है, जिसके कारण इन्हें बहुव्रीहि समास के उदाहरणों में सम्मिलित किया जाता है।
3. नञ् तत्पुरुष- जिस समस्त पद का पहला पद अभावात्मक/ नकारात्मक ‘न’ का अर्थ देने वाला हो उसे नञ् तत्पुरुष समास कहते हैं। इसके समस्त पद के प्रारंभ में ‘अ’ या ‘अन’ का प्रयोग करते है।
इस प्रकार शब्द के प्रारंभ में ‘अ’ या ‘अन’ को देखकर इस समास की पहचान सरलता से की जा सकती है। विग्रह करते समय इसके दोनों प्रकार के पदों में ‘न’ का सामान रूप से प्रयोग होता है। ‘नञ्’ संक्षिप्त रूपही ‘न’ है।
उदाहरण के लिए: “न ब्राह्मण” का अर्थ है “अब्राह्मण” यानी जो ब्राह्मण नहीं है।
‘नञ् तत्पुरुष’ समास के कुछ और उदाहरण इस प्रकार हैं-
| अनश्वर | न नश्वर |
| अनदेखा | न देखा हुआ |
| अनचाहा | न चाहा हुआ |
| असत्य | न सत्य |
| अकारण | न कारण/ बिना कारण |
| अडिग | न डिगने वाला |
| अगोचर | न गोचर |
| अनिच्छुक | न इच्छुक |
| अनुपयुक्त | न उपयुक्तता से रहित अनशन |
| असभ्य | न सभ्य (नहीं है सभ्य जो) |
| अप्रिय | न प्रिय |
| अमोघ | न मोघ |
| अलग | न लगा हुआ |
| अकाज | न काज (कार्य) |
| अटूट | न टुटा हुआ |
| अतृप्त | न तृप्त |
| अनादि | न आदि |
| अमंगल | न मंगल |
| अलौकिक | न लौकिक |
| नगण्य | न गण्य |
| नागवार | न (नहीं) है गवारा जो |
| अनावश्यक | न आवश्यक |
| अकाट्य | न काटने योग्य |
| अशोच्य | न शोचनीय |
| अमिट | न मिट |
| अव्यय | न व्यय |
| अस्थिर | न स्थिर |
| अपवित्र | न पवित्र |
| अदृश्य | न दृश्य |
| अज्ञान | न ज्ञान |
| अछूत | न छूत |
| अचल | न चल |
| अचेतन | न चेतन |
| अकाल | न काल (समय ठीक नहीं है) |
| अजर | न बूढ़ा होने वाला |
| अटल | न टलने वाला |
| अजन्मा | न जन्म लेने वाला |
| अनादृत | नहीं है ढका जो |
| अनाश्रित | बिना आश्रय के |
| अनशन | भोजन से रहित |
| अनजान | न जाना हुआ |
| अनुदार | न उदार |
| नागवार | न (नहीं) है गवारा जो |
| अज्ञान | न ज्ञान |
| अविकृत | न विकृत |
| अनाचार | न आचार |
| अनचाहा | न चाहा हुआ |
| नालायक | न लायक |
| नामुराद | न (नहीं) है मुराद जो |
| असंभव | न संभव |
| अनिष्ट | न इष्ट |
| अमर | न मरने वाला |
| अनबन | न बनना |
| अनादि | न आदि |
| अगोचर | न गोचर |
| अनंत | न अंत |
| नापसंद | न पसंद |
4. प्रादि तत्पुरुष समास:
कामता प्रसाद गुरु के अनुसार- जिस प्रादि तत्पुरुष के प्रथम स्थान में उपसर्ग आता है, उसे संस्कृत व्याकरण में ‘प्रादि समास’ कहते हैं।
प्रादि (प्र + आदि) से उपसर्गों का बोध होता है। जिस समस्त पद में ‘प्र’, ‘परा’, ‘अप’ आदि उपसर्ग पूर्व पद हो उसमें प्रादि तत्पुरुष होता है।
डॉ. हरदेवबाहरी के शब्दों में- इसमें अपि, प्रति, उप आदि पहले खंड में होते हैं।
‘प्रादि तत्पुरुष’ समास के उदाहरण इस प्रकार हैं-
| अतिवृष्टि | अधिक वृष्टि |
| अतिक्रम | आगे जाना |
| प्रगति | प्रथम गति |
| प्रतिध्वनि | ध्वनि के बाद ध्वनि |
| प्रतिबिंब | बिंब के सामान बिंब |
| प्रतिमूर्ति | किसी आकृति की नकल |
| परित्यक्त | उपकार के पहले किया गया उपकार |
जय हिंद