समानाधिकरण तत्पुरुष समास अथार्त ‘कर्मधारय समास’- कर्मधारय समास में, एक शब्द दूसरे शब्द की विशेषता बताता है, यानी पहले शब्द का अर्थ दूसरे शब्द के गुण या विशेषता को दर्शाता है।
उदाहरण-
‘नीलकमल’ में ‘नीला’ रंग कमल की विशेषता को दर्शाता है।
परिभाषा: कर्मधारय समास में, पूर्वपद (पहला पद) विशेषण होता है और उत्तरपद (दूसरा पद) विशेष्य होता है, या दोनों पदों के बीच उपमान-उपमेय का संबंध होता है.
उदाहरण:
नीलकमल: नीला है जो कमल
महापुरुष: महान है जो पुरुष
चंद्रमुख: चंद्र के समान मुख
कमलनयन: कमल के समान नयन
पीतांबर: पीला है जो अंबर (कपड़ा)
पं. कामता प्रसाद गुरु के अनुसार- “जिस तत्पुरुष समास के विग्रह में दोनों पदों के साथ एक ही (कर्ता कारक की) विभक्ति आती है, उसे समानाधिकरण तत्पुरुष या कर्मधारय समास कहते हैं। (BPSC, bihar LOK SEWAA AAYOG, 1990,91)
पं. कामता प्रसाद गुरु के अनुसार- “समानाधिकरण तत्पुरुष के विग्रह करने पर दोनों शब्दों में एक ही विभक्ति लगती है। समानाधिकार तत्पुरुष का प्रचलित नाम ‘कर्मधारय समास’ है। कर्मधारय कोई अलग समास नहीं है। यह तत्पुरुष समास का उपभेद है।”
जिस समस्त पद का उत्तर पद प्रधान हो तथा पूर्वपद एवं उत्तर पद में विशेष्य विशेषण अथवा उपमान उपमेय का संबंध हो उसे ‘कर्मधारय समास’ कहते हैं।
डॉ. वासुदेवनंदन प्रसाद के शब्दों में- “जिस तत्पुरुष समास में समस्त होनेवाले पद समानाधिकरण हों, अथार्त विशेष्य-विशेषण भाव को प्राप्त हों, कर्ताकारक के हों और लिंग-वचन में सामान हों वहाँ ‘कर्मधारय तत्पुरुष समास’ होता है।”
उपर्युक्त दिए गए परिभाषाओं के अनुसार समास की निम्नलिखित विशेषताएँ स्पष्ट होती है।
1. कर्मधारय तत्पुरुष समास का ही एक उपभेद है।
2. इसके समस्त पद का उत्तर पद प्रधान होता है।
3. इसका पूर्व पद मुख्यतः विशेषण होता है और इसके दोनों पद विग्रह करके कर्ताकारक में ही रखे जाते हैं।
4. कर्मधारय समास में कभी दोनों ही पद संज्ञा या कभी दोनों ही पद विशेषण होते है। कभी-कभी पूर्व पद संज्ञा और उत्तर पद विशेषण होता है।
5. इस समास में उपमान-उपमेय, उपमेय-उपमान, विशेषण-विशेष्य, विशेष्य-विशेषण, विशेषण-विशेषण, विशेष्य-विशेष्य का प्रयोग होता है। इसमें प्रायः दो पद होते है और विशेष बात यह है कि दोनों ही पद प्रायः एक ही विभक्ति (कर्ताकारक) में प्रयुक्त होता हैं।
कर्मधारय और तत्पुरुष समास में मुख्य अंतर यह भी है कि तत्पुरुष समास में द्वितीया से सप्तमी विभक्ति अथार्त कर्म, करण, सम्प्रदान, अपादान, संबंध, अधिकरण तक के चिह्नों का प्रथम पद में प्रयोग होता है, जबकि कर्मधारय समास में केवल एक ही विभक्ति कर्ताकारक चिह्न का प्रयोग होता है।
यहाँ हम विशेषण और विशेष्य तथा उपमेय और उपमान को समझते है-
विशेषण- संज्ञा या सर्वनाम की विशेषता बताने वाले शब्दों को ‘विशेषण’ कहते हैं। जैसे- नीला, काली, गोरी, अधिक, कम, एक, दो आदि।
विशेष्य- जिस विशेषण शब्द की विशेषता बताई जाए, उसे ‘विशेष्य’ कहते हैं।
उपमेय- जिस व्यक्ति या वस्तु की उपमा दी जाती है, उसे उपमेय कहते है।
उपमान- जिस व्यक्ति या वस्तु की उपमा दी जा रही है। जैसे- चंद्रमुख अथार्त चंद्रमा रूपी मुख यहाँ ‘मुख’ उपमेय और ‘चंद्रमा’ उपमान है।
नोट: कर्मधारय समास तत्पुरुष समास का ही भेद है। अतः इसका उत्तर पद प्रधान होता है।
कर्मधारय समास के दो भेद हैं-
1. विशेषता वाचक कर्मधारय 2. उपमान वाचक कर्मधारय
1. विशेषता वाचक कर्मधारय- जिस समास में विशेष्य-विशेषण का भाव सूचित होता है उसे ‘विशेषता वाचक कर्मधारय समास’ कहते हैं।
विशेषता वाचक कर्मधारय के सात भेद हैं-
1. विशेषणपूर्व पद
2. विशेषणोत्तर पद
3. विशेषणोंभय पद
4. विशेष्यपूर्व पद
5. अव्ययपूर्व पद
6. संख्यापूर्व पद
7. मध्यपद लोपी
2. उपमान वाचक कर्मधारय- जिस समास में उपमान वाचक भाव का बोध होता है, उसे ‘उपमान वाचक कर्मधारय समास’ कहते हैं।
उपमान वाचक कर्मधारय के चार भेद हैं-
1. उपमानपूर्व पद
2. उपमानोत्तर पद
3. अवधारणापूर्व पदी
4. अवधारणोत्तर पद
यहाँ विशेषतावाचक कर्मधारय समास के सात भेद का वर्णन इस प्रकार हैं-
1. विशेषणपूर्व पद- इसमें पहला पद विशेषण होता है। जैसे-
| समास | समास विग्रह |
| अल्पायु | अल्प है जो आयु |
| अंधविश्वास | अंध है जो विश्वास |
| अल्पसंख्यक | अल्प है संख्या जो |
| अल्पबचत | अल्प है जो बचत |
| अल्पजीवी | अल्प है जो जीवी |
| अरुणाचल | अरुण है जो अचल |
| अंधभक्ति | अंध है जो भक्ति |
| अंधश्रद्धा | अंध है जो श्रद्धा |
| अल्पेक्षा | अल्प है जो इच्छा |
| अधमरा | आधा है जो मरा हुआ |
| उत्तरार्द्ध | उत्तर वाला आधा |
| उदयाचल | उदय होता है जिस अचल (पहाड़) से |
| उड़नखटोला | उड़ता है जो खटोला |
| उड़नतस्तरी | उड़ती है जो तस्तरी |
| उच्चायोग | उच्च है जो आयोग |
| कृष्णांगी | कृष्ण है जिसका अंग वह |
| कृष्णसर्प | काला है जो सर्प |
| कृष्णपक्ष | कृष्ण है जो पक्ष |
| कालीमिर्च | काली है जो मिर्च |
| कृतार्थ | पूर्ण हो गया अर्थ जो |
| कुमार्ग | कुत्सित है जो मार्ग |
| कुधर्म | कुत्सित है जो धर्म |
| कुपथ | कुत्सित है जो पथ |
| कुकृत्य | कुत्सित है जो कृत्य |
| कुलक्षण | कुत्सित है जो लक्षण |
| कुमति | कुत्सित है जो मति |
| कुपुत्र | कु (बुरा) है जो पुत्र |
| कोमलांगी | कोमल हैं जिसके अंग |
| कुमारगंधर्व | कुमार है जो गंधर्व |
| खड़ी बोली | खड़ी है जो बोली |
| खुशबू | खुश है जो बू (गंध) |
| गतांक | गत है जो अंक |
| गतायु | गत है जिसकी आयु |
| चरमसीमा | चरम तक पहुँचती है जिसकी सीमा |
| छुटभैया | छोटा है जो भैया |
| ज्वालामुखी | ज्वाला के समान मुख है जो |
| टटपूंजिया | टाट की है पूँजी जो |
| तीव्रबुद्धि | तीव्र है जिसकी बुद्धि |
| तीव्रदृष्टि | तीव्र है जिसकी दृष्टि |
| तलघर | तल में है जो घर |
| दीर्घावधि | दीर्घ है जो अवधि |
| दीर्घजीवी | दीर्घ है जीवन जो |
| दीर्घायु | दीर्घ है जिसकी आयु |
| नवोढ़ा | नव है जो ऊढ़ा |
| नवागंतुक | नव है जो आगंतुक |
| नवयुवक | नव है जो युवक |
| नवांकुर | नव है जो अंकुर |
| न्यूनार्थक | न्यून है जिसका अर्थ |
| नीलाकाश | नीला है जो आकाश |
| नीलगगन | नीला है जो गगन |
| नीलकंठ | नीला है जो कंठ |
| नीलोत्पल | नीला है जो उत्पल (नीला कमल) |
| नीलकमल | नीला है जो कमल |
| नीलगाय | नीली है जो गाय |
| पीतांबर | पीला है जो अंबर/वस्त्र |
| प्राणप्रिय | प्राणों के समान प्रिय |
| परमआयु | परम है जो आयु |
| परमाणु | परम है जो अणु |
| परमात्मा | परम है जो आत्मा |
| परमानंद | परम है जो आनंद |
| परमेश्वर | परम है जो ईश्वर |
| पनघट | पानी भरा जाने वाला घाट |
| प्रियजन | प्रिय है जो जन |
| पूर्वकाल | पूर्व है जो काल |
| पुच्छलतारा | पूँछ है जिस तारे के/पूँछ वाला तारा |
| पूर्णांक | पूर्ण है जो अंक |
| बहुसंख्यक | बहुत है संख्या जो |
| बहुमूल्य | बहुत है मूल्य जो |
| बहुरंगी | बहुत है रंग जो |
| बहुरुपिया | बहुत है रूप जो |
| भ्रष्टाचार | भ्रष्ट है जिसका आचार |
| महावीर | महान है जो वीर |
| महात्मा | महान है जो आत्मा |
| महासागर | महान है जो सागर |
| महाभोज | महान है जो भोज |
| महादेवी | महान है जो देवी |
| महर्षि | महान है जो ऋषि |
| मीनाक्षी | मछली के सामान है जो आँख |
| रक्तकमल | रक्त जैसा है जो कमल |
| राजीवनयन | कमल के समान है जो नेत्र |
| लघूत्तर | लघु है जो उत्तर |
| लालकुर्ती | लाल है जो कुर्ती |
| विशालबाहु | विशाल है जिसकी बाहुएँ |
| विशालकाय | विशाल है जो काय (शरीर) |
| श्वेतांबर | श्वेत है जो अंबर |
| शुक्लपक्ष | शुक्ल है जो पक्ष |
| सद्गुण | सत् है जो गुण |
| सद्बुद्धि | सत् है जो बुद्धि |
| सद्भावना | सत् है जो भावना |
| सुदर्शन | अच्छे है जिसके दर्शन |
| सुपुत्र | अच्छा है जो पुत्र |
| सुपाच्य | सुष्ठ (अच्छा) है जो पचने में |
| सुलोचना | सुन्दर है लोचन जिसके |
| सुपथ | अच्छा है जो पथ |
| सुरम्य | सुष्ठ (अधिक) है जो रम्य |
| सूर्यमुखी | सूर्य के समान मुख |
| हीनार्थ | हीन है अर्थ जो |
| हताशा | हत है जिसकी आशा |
2. विशेषणोत्तर पद- इस कर्मधारय समास में दूसरा पद विशेषण होता है। जैसे-
| जन्मांतर | जन्म है जो अन्य |
| नराधम | अधम है जो नरों में |
| प्रभुदयाल | दयाल है जो प्रभु |
| पुरुषोत्तम | उत्तम है जो पुरुषों में |
| रामदीन | दीन है जो राम |
| शिवदीन | दीन है जो शिव |
| शिवदयाल | दयाल है जो शिव |
| मुनिवर | वर (श्रेष्ठ) है जो मुनियों में |
| रामदयाल | दयालु है जो राम |
| रामकृपाल | कृपालु है जो राम |
3. विशेषणोभय पद- इस समास में दोनों पद विशेषण होते हैं। जैसे-
| ऊँच-नीच | ऊँचा है जो नीचा है |
| कृताकृत | किया-बेकिया या (अधूरा छोड़ दिया) |
| कालास्याह | जो काला है जो स्याह (काला) है |
| खटामीठा | जो खट्टा है जो मीठा है |
| देवर्षि | जो देव है जो ऋषि है |
| दो-चार | दो हैं जो चार हैं जो |
| बड़ा-छोटा | जो बड़ा है जो छोटा है |
| मोटा-ताजा | जो मोटा है जो ताजा है |
| लाल-पीला | जो लाल है जो पीला है |
| श्यामसुन्दर | जो श्याम है जो सुन्दर है |
| शुद्धाशुद्ध | अत्यंत शुद्ध |
4. विशेष्यपूर्व पद- इसमें पूर्वपद (प्रथम पद) विशेष्य होता है। इस प्रकार के सामासिक पद अधिकतर संस्कृत में मिलते है। जैसे-
| विंध्यपर्वत | विंध्य नामक पर्वत |
| कुमारी श्रमणा | कुमारी (क्वाँरी लड़की) |
| कुमार श्रमणा | श्रमणा (संन्यास ग्रहण की हुई) |
| मदन मनोहर | मदन जो मनोहर है |
| श्याम सुंदर | श्याम जो सुंदर है |
5. अव्ययपूर्व पद- जिस समास के समस्त पद में पूर्व पद अव्यय हो लेकिन उत्तर पद प्रधान हो वहाँ अव्ययपूर्व पद कर्मधारय समास होता है। जैसे-
| निराशा | आशा से रहित |
| दुर्वचन | बुरे वचन |
| कुवेश | बुरा है जो वेश |
| सुयोग | अच्छा योग |
| अधमरा | आधा है जो मारा हुआ |
| दुकाल | बुरा काल |
6. संख्यापूर्व पद (द्विगु समास)
‘द्विगु’ शब्द का शाब्दिक अर्थ है। ‘दो गायों का समूह’ अतः द्विगु शब्द में द्विगु समास ही है।
परिभाषा– वह समास जिसका पहला पद यानी पूर्व पद कोई संख्यावाची शब्द तथा उत्तर पद संज्ञा शब्द हो तथा सम्पूर्ण सामासिक पद का कोई अन्य अर्थ अभिव्यक्त नहीं हो उसे द्विगु समास कहते है। जैसे–
चौराहा = चार राहों का समाहार (यहाँ चौराहा का कोई अन्य अर्थ नहीं निकल रहा है। अतः यह ‘द्विगु’ समास है।
‘द्विगु समास’ तत्पुरुष समास का ही एक भेद है। अतः इसका उत्तर पद प्रधान होता है।
पं. कामता प्रसाद गुरु के शब्दों में – “जिस कर्मधारय समास में पहले पद संख्यावाचक होता है और जिससे समुदाय (समाहार) का बोध होता है, उसे संख्या पूर्वपद कर्मधारय समास कहते हैं। इसी समास को संस्कृत व्याकरण में द्विगु समास कहते हैं।”
7. मध्यपद लोपी- जिस समस्त पद के पूर्व पद और उत्तर पद के मध्य में आने वाले कारक चिह्न परसर्ग या अन्य कोई पद के लुप्त होने पर बनने वाला समास मध्य पद लोपी समास कहलाता है। जैसे, उदाहरण के रूप में –
| कीर्तिमंदिर | कीर्ति से बना मंदिर |
| कन्यादान | कन्या का वैदिक मन्त्रों के साथ दान |
| गीदड़भभकी | गीदड़ जैसी भभकी |
| गुरुभाई | एक ही गुरु से पढ़ा हुआ |
| गोबर-गणेश | गोबर का बना गणेश |
| घोड़ागाड़ी | घोड़े से चलने वाली गाड़ी |
| जलमुर्गी | जल में रहने वाली मुर्गी |
| जलकुम्भी उत्पन्न होने | जल में उत्पन्न होने वाली कुम्भी |
| जलकौआ | जल में रहने वाला कौआ |
| जलपोत | जल में रहने वाला पोत |
| जलयान | जल पर चलने वाला यान |
| जटाशंकर | जटा युक्त शंकर |
| डाकगाड़ी | डाक लेकर जाने वाली गाड़ी |
| तिलचावल | तिल मिश्रित चावल |
| दहीबड़ा | दही में डूबा हुआ बड़ा |
| पकौड़ी | पकी हुई बड़ी |
| पनचक्की | पानी से चलने वाली चक्की |
| पनडुब्बी | पानी में डूबकर चलने वाली पोत |
| पनबिजली | पानी से बनने वाली बिजली |
| बैलगाड़ी | बैलों से चलने वाली गाड़ी |
| पर्णशाला | पर्ण निर्मित शाला |
| रेलगाड़ी | रेल (पटरी) पर चलने वाली गाड़ी |
| वनमानुष | वन में रहने वाला मानुष |
| वायुयान | वायु से चलने वाला यान |
| स्वर्णहार | स्वर्ण निर्मित हार |
| शक़रपारा | शक्कर से बना पारा |
| हाथघड़ी | हाथ में लगाई जाने वाली घड़ी |
दिए गए उपर्युक्त उदाहरणों में पदों के मध्य योजक शब्दों का लोप हुआ है।
2. उपमान वाचक कर्मधारय – उपमान वाचक कर्मधारय के चार भेद हैं-
1. उपमानपूर्व पद
2. उपमानोत्तर पद
3. अवधारणापूर्व पदी
4. अवधारणोत्तर पद
1. उपमान पूर्व पद- जिस वस्तु की उपमा दिया जाता है उसका वाचक शब्द जिस समास से आरंभ होता है उसे उपमानपूर्व पद समास कहते हैं। जैसे-
‘चंद्रमुख’ चंद्रमा के सामान मुख। यहाँ ‘मुख’ उपमेय तथा ‘चंद्रमा’ उपमान है। अतः इस समास के अनुसार ‘चंद्रमुख’ समस्त पद है। क्योंकि उपमान पहले और उपमेय बाद में आया है। यहाँ ‘चंद्रमा’ उपमान तथा ‘मुख’ उपमेय है। इसके अन्य उदाहरण निम्नलिखित हैं-
| कमलनयन | कमल के समान नयन |
| कुसुम ह्रदय | कुसुम के समान हृदय |
| कोकिल वयनी | कोयल के समान बोली |
| घनश्याम | घन की तहर श्याम |
| चन्द्रवदन | चंद्रमा के समान वदन (मुँह) |
| चंद्रमुख | चंद्रमा के समान मुख |
| ज्वालामुखी | ज्वाला के समान मुख |
| तुषारधवल | तुषार (बर्फ) के समान धवल |
| नीरज नयन | नीरज (कमल) के समान नयन |
| प्राणप्रिय | प्राणों के समान प्रिय |
| पाषणहृदय | पाषाण के समान ह्रदय |
| भीष्मवत | भीष्म के समान |
| मीनाक्षी | मीन (मछली) के समान अक्षी (आँखें) |
| मृगनयनी | मृग के नयन के समान नयन वाली |
| राजीवलोचन | राजीव (कमल) के समान लोचन |
2. उपमानोत्तर पद – इस समास के प्रथम पद में उपमेय तथा उत्तर पद में उपमान होता है। जहाँ उपमेय और उपमान मिलकर एक हो जाएँ वहाँ रूपक अलंकार होता है। जैसे-
| कर-कमल | कमल रूपी कर |
| कर-किसलय | किसलय (कोमल पत्ता) रूपी कमल |
| कीर्तिलता | लता रूपी कीर्ति |
| चरण-कमल | कमल रूपी चरण |
| चरणाविंद | चरण रूपी अरविंद |
| देवर्षि | ऋषि रूपी देव |
| नर केसरी | केसरी (शेर) रूपी नर |
| नरशार्दूल | शार्दूल (बाघ) रूपी नर |
| नेत्र-कमल | कमल रूपी नेत्र |
| पाणि-पल्लव | पल्लव के समान पाणि (हाथ) |
| भवसागर | सागर रूपी संसार |
| मुख कमल | कमल रूपी मुख |
| मुखारविंद | अरविंद रूपी मुख |
| विद्याधन | धन रूपी विद्या |
| विरह सागर | सागर रूपी विरह |
| वदन सुधाकर | सुधाकर रूपी वदन |
| संसार-सागर | सागर रुपी संसार |
3. अवधारणापूर्व पदी- जिस समास के पूर्वपद के अर्थ पर उत्तर पद का अर्थ अवलंबित होता है, उसे अवधारणापूर्व पदी कर्मधारय समास कहते है। जैसे-
| कर्मबंध | कर्म ही बंधन अथवा कर्म रूपी बंधन |
| मुखचंद्र | मुख ही चंद्र अथवा मुख रूपी चंद्र |
| पुरुषरत्न | पुरुष ही रत्न अथवा पुरुष रूपी रत्न |
| पुत्ररत्न | पुत्र ही रत्न अथवा पुत्र रूपी रत्न |
| स्त्रीरत्न | स्त्री ही रत्न अथवा स्त्री रूपी रत्न |
| बुद्धिबल | बुद्धि ही बल अथवा बुद्धि रूपी बल |
| विद्यारत्न | विद्या ही रत्न अथवा विद्या रूपी रत्न |
| गुरुदेव | गुरु ही देव अथवा गुरु रूपी देव |
4. अवधारणोत्तर पद-
पं. कामता प्रसाद गुरु के अनुसार– “जिस समास के दूसरे पद के अर्थ पर पहले पद का अर्थ अवलंबित/आश्रित रहता है, उसे ‘अवाधरणोत्तर पद’ कहते है।
जैसे- साधु समाज प्रयाग (साधुसमाज- रूपी प्रयाग) इस उदाहरण में दूसरे शब्द ‘प्रयाग’ के अर्थ पर प्रथम पद साधुसमाज का अर्थ अवलंबित/आश्रित है।”
जय हिंद