समास और समास के भेद : भाग-3 (कर्मधारय समास)

समानाधिकरण तत्पुरुष समास अथार्त ‘कर्मधारय समास’- कर्मधारय समास में, एक शब्द दूसरे शब्द की विशेषता बताता है, यानी पहले शब्द का अर्थ दूसरे शब्द के गुण या विशेषता को दर्शाता है। 

उदाहरण-

‘नीलकमल’ में ‘नीला’ रंग कमल की विशेषता को दर्शाता है। 

परिभाषा: कर्मधारय समास में, पूर्वपद (पहला पद) विशेषण होता है और उत्तरपद (दूसरा पद) विशेष्य होता है, या दोनों पदों के बीच उपमान-उपमेय का संबंध होता है. 

उदाहरण:

नीलकमल: नीला है जो कमल

महापुरुष: महान है जो पुरुष

चंद्रमुख: चंद्र के समान मुख

कमलनयन: कमल के समान नयन

पीतांबर: पीला है जो अंबर (कपड़ा) 

पं. कामता प्रसाद गुरु के अनुसार- “जिस तत्पुरुष समास के विग्रह में दोनों पदों के साथ एक ही (कर्ता कारक की) विभक्ति आती है, उसे समानाधिकरण तत्पुरुष या कर्मधारय समास कहते हैं। (BPSC, bihar LOK SEWAA AAYOG, 1990,91)

पं. कामता प्रसाद गुरु के अनुसार- “समानाधिकरण तत्पुरुष के विग्रह करने पर दोनों शब्दों में एक ही विभक्ति लगती है। समानाधिकार तत्पुरुष का प्रचलित नाम ‘कर्मधारय समास’ है। कर्मधारय कोई अलग समास नहीं है। यह तत्पुरुष समास का उपभेद है।”

    जिस समस्त पद का उत्तर पद प्रधान हो तथा पूर्वपद एवं उत्तर पद में विशेष्य विशेषण अथवा उपमान उपमेय का संबंध हो उसे ‘कर्मधारय समास’ कहते हैं।

डॉ. वासुदेवनंदन प्रसाद के शब्दों में- “जिस तत्पुरुष समास में समस्त होनेवाले पद समानाधिकरण हों, अथार्त विशेष्य-विशेषण भाव को प्राप्त हों, कर्ताकारक के हों और लिंग-वचन में सामान हों वहाँ ‘कर्मधारय तत्पुरुष समास’ होता है।”

उपर्युक्त दिए गए परिभाषाओं के अनुसार समास की निम्नलिखित विशेषताएँ स्पष्ट होती है।

1. कर्मधारय तत्पुरुष समास का ही एक उपभेद है।

2. इसके समस्त पद का उत्तर पद प्रधान होता है।

3. इसका पूर्व पद मुख्यतः विशेषण होता है और इसके दोनों पद विग्रह करके कर्ताकारक में ही रखे जाते हैं।

4. कर्मधारय समास में कभी दोनों ही पद संज्ञा या कभी दोनों ही पद विशेषण होते है। कभी-कभी पूर्व पद संज्ञा और उत्तर पद विशेषण होता है।

5. इस समास में उपमान-उपमेय, उपमेय-उपमान, विशेषण-विशेष्य, विशेष्य-विशेषण, विशेषण-विशेषण, विशेष्य-विशेष्य का प्रयोग होता है। इसमें प्रायः दो पद होते है और विशेष बात यह है कि दोनों ही पद प्रायः एक ही विभक्ति (कर्ताकारक) में प्रयुक्त होता हैं।

कर्मधारय और तत्पुरुष समास में मुख्य अंतर यह भी है कि तत्पुरुष समास में द्वितीया से सप्तमी विभक्ति अथार्त कर्म, करण, सम्प्रदान, अपादान, संबंध, अधिकरण तक के चिह्नों का प्रथम पद में प्रयोग होता है, जबकि कर्मधारय समास में केवल एक ही विभक्ति कर्ताकारक चिह्न का प्रयोग होता है।

यहाँ हम विशेषण और विशेष्य तथा उपमेय और उपमान को समझते है-

विशेषण- संज्ञा या सर्वनाम की विशेषता बताने वाले शब्दों को ‘विशेषण’ कहते हैं। जैसे- नीला, काली, गोरी, अधिक, कम, एक, दो आदि।

विशेष्य- जिस विशेषण शब्द की विशेषता बताई जाए, उसे ‘विशेष्य’ कहते हैं।

उपमेय- जिस व्यक्ति या वस्तु की उपमा दी जाती है, उसे उपमेय कहते है।

उपमान- जिस व्यक्ति या वस्तु की उपमा दी जा रही है। जैसे- चंद्रमुख अथार्त चंद्रमा रूपी मुख  यहाँ ‘मुख’ उपमेय और ‘चंद्रमा’ उपमान है।

नोट: कर्मधारय समास तत्पुरुष समास का ही भेद है। अतः इसका उत्तर पद प्रधान होता है।

कर्मधारय समास के दो भेद हैं-

1. विशेषता वाचक कर्मधारय 2. उपमान वाचक कर्मधारय

1. विशेषता वाचक कर्मधारय- जिस समास में विशेष्य-विशेषण का भाव सूचित होता है उसे ‘विशेषता वाचक कर्मधारय समास’ कहते हैं।

विशेषता वाचक कर्मधारय के सात भेद हैं-

1. विशेषणपूर्व पद

2. विशेषणोत्तर पद

3. विशेषणोंभय पद

4. विशेष्यपूर्व पद

5. अव्ययपूर्व पद

6. संख्यापूर्व पद  

7. मध्यपद लोपी

2. उपमान वाचक कर्मधारय- जिस समास में उपमान वाचक भाव का बोध होता है, उसे ‘उपमान वाचक कर्मधारय समास’ कहते हैं।

उपमान वाचक कर्मधारय के चार भेद हैं-

1. उपमानपूर्व पद

2. उपमानोत्तर पद

3. अवधारणापूर्व पदी

4. अवधारणोत्तर पद

यहाँ विशेषतावाचक कर्मधारय समास के सात भेद का वर्णन इस प्रकार हैं-

1. विशेषणपूर्व पद- इसमें पहला पद विशेषण होता है। जैसे-

समास समास विग्रह
अल्पायुअल्प है जो आयु
अंधविश्वासअंध है जो विश्वास
अल्पसंख्यकअल्प है संख्या जो
अल्पबचतअल्प है जो बचत
अल्पजीवीअल्प है जो जीवी
अरुणाचलअरुण है जो अचल
अंधभक्तिअंध है जो भक्ति
अंधश्रद्धाअंध है जो श्रद्धा
अल्पेक्षाअल्प है जो इच्छा
अधमराआधा है जो मरा हुआ
उत्तरार्द्धउत्तर वाला आधा
उदयाचलउदय होता है जिस अचल (पहाड़) से
उड़नखटोलाउड़ता है जो खटोला
उड़नतस्तरीउड़ती है जो तस्तरी
उच्चायोगउच्च है जो आयोग
कृष्णांगीकृष्ण है जिसका अंग वह
कृष्णसर्पकाला है जो सर्प
कृष्णपक्षकृष्ण है जो पक्ष 
कालीमिर्चकाली है जो मिर्च
कृतार्थपूर्ण हो गया अर्थ जो
कुमार्गकुत्सित है जो मार्ग
कुधर्मकुत्सित है जो धर्म
कुपथकुत्सित है जो पथ
कुकृत्यकुत्सित है जो कृत्य
कुलक्षणकुत्सित है जो लक्षण
कुमतिकुत्सित है जो मति
कुपुत्रकु (बुरा) है जो पुत्र
कोमलांगीकोमल हैं जिसके अंग
कुमारगंधर्वकुमार है जो गंधर्व
खड़ी बोलीखड़ी है जो बोली
खुशबूखुश है जो बू (गंध)
गतांकगत है जो अंक
गतायुगत है जिसकी आयु
चरमसीमाचरम तक पहुँचती है जिसकी सीमा
छुटभैया  छोटा है जो भैया
ज्वालामुखीज्वाला के समान मुख है जो
टटपूंजियाटाट की है पूँजी जो
तीव्रबुद्धितीव्र है जिसकी बुद्धि
तीव्रदृष्टितीव्र है जिसकी दृष्टि
तलघरतल में है जो घर     
दीर्घावधिदीर्घ है जो अवधि
दीर्घजीवीदीर्घ है जीवन जो
दीर्घायुदीर्घ है जिसकी आयु
नवोढ़ानव है जो ऊढ़ा
नवागंतुकनव है जो आगंतुक
नवयुवकनव है जो युवक
नवांकुरनव है जो अंकुर
न्यूनार्थकन्यून है जिसका अर्थ
नीलाकाशनीला है जो आकाश
नीलगगननीला है जो गगन
नीलकंठनीला है जो कंठ
नीलोत्पलनीला है जो उत्पल (नीला कमल)
नीलकमलनीला है जो कमल
नीलगायनीली है जो गाय
पीतांबरपीला है जो अंबर/वस्त्र
प्राणप्रियप्राणों के समान प्रिय
परमआयुपरम है जो आयु
परमाणुपरम है जो अणु
परमात्मापरम है जो आत्मा
परमानंदपरम है जो आनंद
परमेश्वरपरम है जो ईश्वर
पनघटपानी भरा जाने वाला घाट
प्रियजनप्रिय है जो जन
पूर्वकालपूर्व है जो काल
पुच्छलतारापूँछ है जिस तारे के/पूँछ वाला तारा 
पूर्णांकपूर्ण है जो अंक
बहुसंख्यकबहुत है संख्या जो
बहुमूल्यबहुत है मूल्य जो
बहुरंगीबहुत है रंग जो
बहुरुपियाबहुत है रूप जो
भ्रष्टाचारभ्रष्ट है जिसका आचार
महावीरमहान है जो वीर
महात्मामहान है जो आत्मा
महासागरमहान है जो सागर
महाभोजमहान है जो भोज
महादेवी  महान है जो देवी
महर्षिमहान है जो ऋषि
मीनाक्षीमछली के सामान है जो आँख
रक्तकमलरक्त जैसा है जो कमल
राजीवनयनकमल के समान है जो नेत्र
लघूत्तरलघु है जो उत्तर
लालकुर्तीलाल है जो कुर्ती
विशालबाहुविशाल है जिसकी बाहुएँ
विशालकायविशाल है जो काय (शरीर)
श्वेतांबरश्वेत है जो अंबर
शुक्लपक्षशुक्ल है जो पक्ष
सद्गुणसत् है जो गुण
सद्बुद्धिसत् है जो बुद्धि
सद्भावनासत् है जो भावना
सुदर्शनअच्छे है जिसके दर्शन
सुपुत्रअच्छा है जो पुत्र
सुपाच्यसुष्ठ (अच्छा) है जो पचने में
सुलोचनासुन्दर है लोचन जिसके
सुपथअच्छा है जो पथ
सुरम्यसुष्ठ (अधिक) है जो रम्य
सूर्यमुखीसूर्य के समान मुख
हीनार्थहीन है अर्थ जो
हताशाहत है जिसकी आशा

2. विशेषणोत्तर पद- इस कर्मधारय समास में दूसरा पद विशेषण होता है। जैसे-

जन्मांतरजन्म है जो अन्य
नराधमअधम है जो नरों में
प्रभुदयालदयाल है जो प्रभु
पुरुषोत्तमउत्तम है जो पुरुषों में
रामदीनदीन है जो राम
शिवदीनदीन है जो शिव
शिवदयालदयाल है जो शिव
मुनिवरवर (श्रेष्ठ) है जो मुनियों में
रामदयालदयालु है जो राम
रामकृपालकृपालु है जो राम

3. विशेषणोभय पद- इस समास में दोनों पद विशेषण होते हैं। जैसे-

ऊँच-नीचऊँचा है जो नीचा है
कृताकृतकिया-बेकिया या (अधूरा छोड़ दिया) 
कालास्याहजो काला है जो स्याह (काला) है
खटामीठाजो खट्टा है जो मीठा है
देवर्षिजो देव है जो ऋषि है
दो-चारदो हैं जो चार हैं जो
बड़ा-छोटाजो बड़ा है जो छोटा है
मोटा-ताजाजो मोटा है जो ताजा है
लाल-पीलाजो लाल है जो पीला है
श्यामसुन्दर जो श्याम है जो सुन्दर है
शुद्धाशुद्धअत्यंत शुद्ध

4. विशेष्यपूर्व पद- इसमें पूर्वपद (प्रथम पद) विशेष्य होता है। इस प्रकार के सामासिक पद अधिकतर संस्कृत में मिलते है। जैसे-

विंध्यपर्वतविंध्य नामक पर्वत
कुमारी श्रमणाकुमारी (क्वाँरी लड़की)
कुमार श्रमणाश्रमणा (संन्यास ग्रहण की हुई)
मदन मनोहरमदन जो मनोहर है
श्याम सुंदरश्याम जो सुंदर है

5. अव्ययपूर्व पद- जिस समास के समस्त पद में पूर्व पद अव्यय हो लेकिन उत्तर पद प्रधान हो वहाँ अव्ययपूर्व पद कर्मधारय समास होता है। जैसे-

निराशाआशा से रहित 
दुर्वचनबुरे वचन
कुवेशबुरा है जो वेश
सुयोगअच्छा योग
अधमराआधा है जो मारा हुआ
दुकालबुरा काल

6. संख्यापूर्व पद (द्विगु समास)

‘द्विगु’ शब्द का शाब्दिक अर्थ है। ‘दो गायों का समूह’ अतः द्विगु शब्द में द्विगु समास ही है।

परिभाषा वह समास जिसका पहला पद यानी पूर्व पद कोई संख्यावाची शब्द तथा उत्तर पद संज्ञा शब्द हो तथा सम्पूर्ण सामासिक पद का कोई अन्य अर्थ अभिव्यक्त नहीं हो उसे द्विगु समास कहते है। जैसे

चौराहा = चार राहों का समाहार (यहाँ चौराहा का कोई अन्य अर्थ नहीं निकल रहा है। अतः यह ‘द्विगु’ समास है।

‘द्विगु समास’ तत्पुरुष समास का ही एक भेद है। अतः इसका उत्तर पद प्रधान होता है।

पं. कामता प्रसाद गुरु के शब्दों में – “जिस कर्मधारय समास में पहले पद संख्यावाचक होता है और जिससे समुदाय (समाहार) का बोध होता है, उसे संख्या पूर्वपद कर्मधारय समास कहते हैं। इसी समास को संस्कृत व्याकरण में द्विगु समास कहते हैं।”

7. मध्यपद लोपी- जिस समस्त पद के पूर्व पद और उत्तर पद के मध्य में आने वाले कारक चिह्न परसर्ग या अन्य कोई पद के लुप्त होने पर बनने वाला समास मध्य पद लोपी समास कहलाता है। जैसे, उदाहरण के रूप में – 

कीर्तिमंदिरकीर्ति से बना मंदिर
कन्यादानकन्या का वैदिक मन्त्रों के साथ दान
गीदड़भभकीगीदड़ जैसी भभकी
गुरुभाईएक ही गुरु से पढ़ा हुआ
गोबर-गणेशगोबर का बना गणेश
घोड़ागाड़ीघोड़े से चलने वाली गाड़ी
जलमुर्गीजल में रहने वाली मुर्गी
जलकुम्भी उत्पन्न होनेजल में उत्पन्न होने वाली कुम्भी
जलकौआजल में रहने वाला कौआ
जलपोतजल में रहने वाला पोत
जलयानजल पर चलने वाला यान
जटाशंकरजटा युक्त शंकर
डाकगाड़ीडाक लेकर जाने वाली गाड़ी  
तिलचावलतिल मिश्रित चावल
दहीबड़ादही में डूबा हुआ बड़ा
पकौड़ीपकी हुई बड़ी
पनचक्कीपानी से चलने वाली चक्की
पनडुब्बीपानी में डूबकर चलने वाली पोत
पनबिजलीपानी से बनने वाली बिजली
बैलगाड़ीबैलों से चलने वाली गाड़ी
पर्णशालापर्ण निर्मित शाला
रेलगाड़ीरेल (पटरी) पर चलने वाली गाड़ी
वनमानुषवन में रहने वाला मानुष
वायुयानवायु से चलने वाला यान
स्वर्णहारस्वर्ण निर्मित हार
शक़रपाराशक्कर से बना पारा
हाथघड़ीहाथ में लगाई जाने वाली घड़ी

दिए गए उपर्युक्त उदाहरणों में पदों के मध्य योजक शब्दों का लोप हुआ है।

2. उपमान वाचक कर्मधारय – उपमान वाचक कर्मधारय के चार भेद हैं-

1. उपमानपूर्व पद

2. उपमानोत्तर पद

3. अवधारणापूर्व पदी

4. अवधारणोत्तर पद

1. उपमान पूर्व पद- जिस वस्तु की उपमा दिया जाता है उसका वाचक शब्द जिस समास से आरंभ होता है उसे उपमानपूर्व पद समास कहते हैं। जैसे-

‘चंद्रमुख’ चंद्रमा के सामान मुख। यहाँ ‘मुख’ उपमेय तथा ‘चंद्रमा’ उपमान है। अतः इस समास के अनुसार ‘चंद्रमुख’ समस्त पद है। क्योंकि उपमान पहले और उपमेय बाद में आया है। यहाँ ‘चंद्रमा’ उपमान तथा ‘मुख’ उपमेय है। इसके अन्य उदाहरण निम्नलिखित हैं-

कमलनयनकमल के समान नयन
कुसुम ह्रदयकुसुम के समान हृदय
कोकिल वयनीकोयल के समान बोली
घनश्यामघन की तहर श्याम
चन्द्रवदनचंद्रमा के समान वदन (मुँह)
चंद्रमुखचंद्रमा के समान मुख
ज्वालामुखीज्वाला के समान मुख
तुषारधवलतुषार (बर्फ) के समान धवल
नीरज नयननीरज (कमल) के समान नयन
प्राणप्रियप्राणों के समान प्रिय
पाषणहृदयपाषाण के समान ह्रदय
भीष्मवतभीष्म के समान
मीनाक्षीमीन (मछली) के समान अक्षी (आँखें)
मृगनयनीमृग के नयन के समान नयन वाली
राजीवलोचनराजीव (कमल) के समान लोचन

2. उपमानोत्तर पद – इस समास के प्रथम पद में उपमेय तथा उत्तर पद में उपमान होता है। जहाँ उपमेय और उपमान मिलकर एक हो जाएँ वहाँ रूपक अलंकार होता है। जैसे-

कर-कमलकमल रूपी कर
कर-किसलयकिसलय (कोमल पत्ता) रूपी कमल
कीर्तिलतालता रूपी कीर्ति
चरण-कमलकमल रूपी चरण
चरणाविंदचरण रूपी अरविंद
देवर्षिऋषि रूपी देव
नर केसरीकेसरी (शेर) रूपी नर
नरशार्दूलशार्दूल (बाघ) रूपी नर
नेत्र-कमलकमल रूपी नेत्र
पाणि-पल्लवपल्लव के समान पाणि (हाथ)
भवसागरसागर रूपी संसार
मुख कमलकमल रूपी मुख
मुखारविंदअरविंद रूपी मुख
विद्याधनधन रूपी विद्या
विरह सागरसागर रूपी विरह
वदन सुधाकरसुधाकर रूपी वदन
संसार-सागरसागर रुपी संसार

3. अवधारणापूर्व पदी- जिस समास के पूर्वपद के अर्थ पर उत्तर पद का अर्थ अवलंबित होता है, उसे अवधारणापूर्व पदी कर्मधारय समास कहते है। जैसे-

कर्मबंधकर्म ही बंधन अथवा कर्म रूपी बंधन
मुखचंद्रमुख ही चंद्र अथवा मुख रूपी चंद्र
पुरुषरत्नपुरुष ही रत्न अथवा पुरुष रूपी रत्न
पुत्ररत्नपुत्र ही रत्न अथवा पुत्र रूपी रत्न
स्त्रीरत्नस्त्री ही रत्न अथवा स्त्री रूपी रत्न
बुद्धिबलबुद्धि ही बल अथवा बुद्धि रूपी बल
विद्यारत्नविद्या ही रत्न अथवा विद्या रूपी रत्न
गुरुदेवगुरु ही देव अथवा गुरु रूपी देव

4. अवधारणोत्तर पद-

पं. कामता प्रसाद गुरु के अनुसार– “जिस समास के दूसरे पद के अर्थ पर पहले पद का अर्थ अवलंबित/आश्रित रहता है, उसे ‘अवाधरणोत्तर पद’ कहते है।

जैसे- साधु समाज प्रयाग (साधुसमाज- रूपी प्रयाग) इस उदाहरण में दूसरे शब्द ‘प्रयाग’ के अर्थ पर प्रथम पद साधुसमाज का अर्थ अवलंबित/आश्रित है।”

जय हिंद

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