‘समास’ शब्द की उत्पति ‘सम्’ (उपसर्ग) + ‘आस’ (प्रत्यय) के मिलने से हुआ है। ‘सम’ का अर्थ होता है ‘पूर्णरूप’ से और ‘आस’ का अर्थ है ‘नजदीक आना’ अथार्त दो या दो से अधिक पदों का पूर्ण रूप से मिलना या नजदीक आना ‘समास’ कहलाता है। इसका शाब्दिक अर्थ ‘संक्षेपण’ होता है।
परिभाषा- दो या दो से अधिक पदों के मेल से जिनके बीच के संयोजक शब्दों अथवा कारक चिह्नों का लोप हो जाए उसे समास कहते है। जैसे-
राधा और कृष्ण = राधाकृष्ण (राधाकृष्ण शब्द में ‘संयोयक’ चिह्न का लोप हो गया है)
राजा की माता = राजमाता (राजमाता शब्द में ‘कारक’ चिह्न का लोप हो गया)
- ‘समास’ का विलोम ‘व्यास’ होता है, और ‘व्यास’ का शाब्दिक अर्थ ‘विस्तार’ है। अतः दो या दो से अधिक पदों को मिलाकर एक ही पद बनाने की क्रिया ‘समास’ है।
- दो या दो से अधिक पदों के मेल से बना एक ही पद ‘समपद’ या ‘सामासिक’ पद कहलाता है।
- ध्यान देने योग्य बातें-
1. ‘समास’ में पदों का मेल होता है।
2. ‘संधि’ में ध्वनियों और वर्णों का मेल होता है।
3. ‘संयोजक’ में सीधे-सीधे जुड़ जाते है।
समास विग्रह-
समस्त पदों को खंडित कर, पदों को अलग-अलग करने की क्रिया ‘समास विग्रह’ कहलाता है। जैसे- सूर्यपुत्र = समस्त पद का विग्रह होगा, ‘सूर्य का पुत्र’
माता-पिता = समस्त पद का विग्रह होगा, ‘माता और पिता’ समास रचना में दो शब्द (पद) होते हैं। पहला पद पूर्वपद तथा दूसरा पद (शब्द) उत्तर पद कहलाता है।
पूर्वपद + उत्तर पद + समास
राजा + (का) पुत्र + राजपुत्र
यश + (को) प्राप्त + यशप्राप्त
देश + (का) भक्त + देशभक्त
समास की उपयोगिता:
1. कम शब्दों में अधिक से अधिक बातें कहने के लिए समास का प्रयोग किया जाता है।
2. समास के लिए कम से कम दो पद होने चाहिए पहले पद को पूर्वपद तथा दूसरे पद को उत्तर पद कहते हैं।
3. समास प्रक्रिया में बीच की विभक्तियों का लोप हो जाता है।
4. द्वंद्व समास और संबंध तत्पुरुष समास में दो शब्दों के मध्य योजक-चिह्न लगाया जाता है या उसे फिर एक शब्द की तरह मिलाकर लिखा जाता है।
समास प्रक्रिया से शब्द बनना-
हिंदी में मुख्य रूप से तीन ही प्रकार के सामासिक-शब्द प्रयोग में आते हैं-
1. तत्सम (राजपुत्र)
2. तद्भव (बैलगाड़ी)
3. विदेशी (जेब-खर्च)
नीचे दिए गए उदाहरणों द्वारा समझा जा सकता है-
| समस्त पद | पूर्वपद + उत्तरपद | समास विग्रह |
| गुरु दक्षिणा | गुरु + दक्षिणा | गुरु के लिए दक्षिणा |
| युद्ध भूमि | युद्ध + भूमि | युद्ध के लिए भूमि |
| दिन-रात | दिन + रात | दिन और रात |
| हवन-सामग्री | हवन + सामग्री | हवन के लिए सामग्री |
समास और संधि में अंतर:
| संधि | समास |
| 1. संधि में दो वर्णों का मेल होता है। | 1. समास में दो शब्दों का मेल होता है। |
| 2.संधि अधिकांशतः तत्सम शब्दों में ही होती है। | 2. समास संस्कृत, तत्सम, तद्भव, उर्दू हर प्रकार के शब्दों में होती है। |
| 3. संधि में एकमात्र स्वर या व्यंजन का लोप होता है। | 3. समास में विभक्ति या शब्दों का लोप होता है। |
| 4. संधि में समास का होना आवश्यक है। | 4. समस्त पद में संधि हो सकती है, जैसे- दशानन में समास और दीर्घसंधि दोनों है। |
समास के भेद:
पं. कामता प्रसाद गुरु के अनुसार- ‘समास के मुख्य चार भेद हैं।’ समस्त पदों के पदों की प्रधानता के आधार पर ही समास के चार मुख्य भेद माने गए है, अथार्त् समस्त पदों में कभी प्रथम पद (पूर्वपद) प्रधान होता है, कभी उत्तर पद (दूसरा पद), कभी दोनों पद, तो कभी दोनों को छोड़कर कोई अन्य पद प्रधान होता है।
समास के प्रकार:
1. अव्ययीभाव समास- प्रथम पद (पूर्वपद) प्रधान हो
2. तत्पुरुष समास- जिसका उत्तर पद प्रधान हो
3. द्वंद्व समास- जिसका एक नहीं अपितु दोनों पद प्रधान हो
4. बहुब्रीहि समास- जिसका अन्य पद प्रधान हो
अव्ययीभाव + प्रथम पद प्रधान + उत्तर पद गौण
तत्पुरुष + उत्तर पद प्रधान + प्रथम पद गौण
द्वंद्व + दोनों पद प्रधान
बहुव्रीहि + कोई पद प्रधान नहीं + अन्य पद प्रधान
पं. कामता प्रसाद गुरु के अनुसार- जिस समास में पहला पद प्रधान होता है और समूचा शब्द क्रिया-विशेषण अव्यय होता है, उसे ‘अव्ययीभाव समास’ कहते है। जैसे- प्रतिदिन, आमरण।
1. अव्ययीभाव समास- (Adverbil Compound)
जिस समास में पूर्वपद की प्रधानता हो और सामासिक या समास पद अव्यय हो। अव्ययीभाव समास में केवल पूर्वपद ही नहीं, अपितु ‘समस्तपद’ भी एक अव्यय के सामान प्रयुक्त होता है। जैसे- प्रतिदिन, बीचोंबीच, भरपेट आदि।
2. अव्ययीभाव समास का पहला पद प्रायः अव्यय ही होता है, किंतु कभी-कभी अपवाद स्वरुप पहला पद संज्ञा या विशेषण भी हो सकता है। ऐसा हिंदी समासों में ही होता है, संस्कृत के समासों में नहीं होता है।
हिंदी के शब्द- भरपेट, हाथों-हाथ, दिनों-दिन, घर-घर, हर-घड़ी। इनके प्रथम शब्द क्रमशः भर (अव्यय) हाथ, दिन, घर तथा हर विशेषण हैं।
संस्कृत शब्द- यथाशक्ति, प्रतिदिन, आमरण, यावज्जीवन, व्यर्थ शब्द हैं। इनके प्रथम शब्द क्रमशः यथा, प्रति, आ, यावत, तथा वि शब्द अव्यय है। यथा, प्रति, भर तथा या जिन शब्दों के पहले होते हैं वे सभी अव्ययीभाव समास कहलाते हैं।
द्विरुक्त शब्द बहुधा अव्ययीभाव होते हैं।
जैसे- घर-घर, क्षण-क्षण, पल-पल, घड़ी-घड़ी, गली-गली।
द्विरुक्त शब्दों के बीच में ‘ही’ अथवा ‘आ’ के आने पर भी अव्ययीभाव ही होता है। जैसे- साथ-ही-साथ, मन-ही-मन, आप-ही-आप, सरासर, एकाएक, धड़ाधड़।
इन समासों के अंतर को इस प्रकार समझा जा सकता-
अव्ययीभाव समास-
प्रथम पद अव्यय- ये संस्कृत शब्दों में होते हैं।
| समस्त पद | विग्रह |
| यथाशक्ति | शक्ति के अनुसार |
| प्रतिशत | प्रत्येक शत (सैंकड़ा) |
| प्रत्यक्ष | अक्षि (आँख के सामान) |
| आजीवन | जीवन भर |
| निधड़क | बिना धड़क के |
| आकंठ | कंठ तक |
पहला पद नाम पद (संज्ञा या विशेषण)
ये हिंदी में शब्द होते हैं।
| समस्त पद | विग्रह |
| साफ़-साफ़ | साफ़ के बाद साफ़ |
| बीचों-बीच | बीच के भी बीच में |
| दिनों-दिन | दिन के बाद दिन |
| एक-एक | एक के बाद एक |
| हाथों-हाथ | हाथ ही हाथ में |
| घर-घर | घर के बाद घर |
| धीरे-धीरे | धीरे और उसके बाद और धीरे |
उपर्युक्त दिए गए अव्ययीभाव के दोनों उदाहरणों से हम अच्छी तरह समझ सकते हैं, कि पहला पद अव्यय समास संस्कृत शब्दों में होता है, जबकि पहला पद नाम पद में हिंदी शब्दों का प्रयोग होता है। इसके अतिरिक्त उर्दू (फ़ारसी), अरबी शब्दों एवं मिश्रित या अन्य भाषाओं के मेल से बने हुए शब्द भी ‘अव्ययीभाव समास’ में प्रयुक्त होते है।
यहाँ ‘अव्ययीभाव समास’ के दोनों भेदों के साथ मुख्य उदाहरण इस प्रकार हैं-
| समस्त पद | विग्रह |
| अतिरिक्त | रिक्त से अलग, अलावा |
| अजानुबाहु | जानु (घुटनों) तक लंबी भुजाएँ |
| अभूतपूर्व | जो पूर्व में नहीं हुआ हो |
| अनुदान | दान की तरह का दान |
| अत्यधिक | अधिक से अधिक |
| आप-आप | आप ही आप |
| आजीवन | जीवन-पर्यंत |
| अनुरुप | रूप के योग्य |
| अजन्म | जन्म से लेकर |
| अंतर्व्यथा | मन के अंतर की व्यथा |
| ध्यानपूर्वक | ध्यान लगाकर |
| गली-गली | प्रत्येक गली |
| भरपूर | पूरा भरा हुआ |
| यथोचित | जितना उचित हो |
| रातोंरात | रात ही रात में |
| हर घड़ी | प्रत्येक घड़ी या घड़ी-घड़ी |
| दरअसल | असल में |
| दर्शनार्थ | दर्शन के लिए |
| द्वार-द्वार | हर एक द्वार |
| यथानियम | नियम के अनुसार |
| यथाविधि | विधि के अनुसार |
| यथासाध्य | साध्य के अनुसार |
| कथानुसार | कथन के अनुसार |
| कुशलतापूर्वक | कुशलता के साथ |
| कृपापूर्वक | कृपा के साथ |
| कानोंकान | कान ही कान |
| गली-गली | प्रत्येक गली |
| चेहरे-चहरे | हर चहरे |
| नालायक | जो लायक नहीं |
| निर्विवाद | बिना विवाद के |
| निर्विरोध | बिना विरोध के |
| निर्विकार | बिना विकार के |
| नियंत्रण | विशेष यंत्रण से युक्त |
| निरामिस | बिना (आमिष) माँस के |
| प्रतिफल | फल के बदले फल |
| प्रतिध्वनी | ध्वनि की ध्वनि |
| प्रतिक्रिया | क्रिया से प्रेरित क्रिया |
| प्रत्यक्ष | आँखों के सामने |
| प्रतिवर्ष | हर-वर्ष या वर्ष-वर्ष |
| फुटमफुट | फूट के बाद फूट |
| बेधड़क | बिना धड़क के |
| बीचोंबीच | बीच के भी बीच |
| बेमतलब | बिना मतलब के |
| बेखटके | बिना खटके के |
| बेरहम | बिना रहम के |
| भागमभाग | भागने के बद भागना |
| भरपेट | पेट भरके |
| भरसक | शक्ति भर |
| मंद-मंद | बहुत ही मंद |
| मरणोपरांत | मरने के उपरांत |
| मारामारी | मार के बाद मार |
| रोज-रोज | हर रोज |
| रातों रात | रात ही रात में |
| लाजवाब | जिसका जवाब न हो |
| लाभार्थ | लाभ के लिए |
| विश्वासपूर्वक | विश्वास के साथ |
| विवाहोपरांत | विवाह के उपरांत |
| श्रद्धानुसार | श्रद्धा के अनुसार |
| सरयूपार | सरयू के पार |
| सकुशल | कुशलता के साथ |
| सेवोपरांत | सेवा के उपरांत |
| सपरिवार | परिवार के साथ |
| सपत्नीक | पत्नी के साथ |
| सुनासुनी | सुनने के बाद सुनना |
| साल-ब-साल | एक साल के बाद दूसरा साल |
| हाथोंहाथ | हाथ ही हाथ में |
| हरदिन | प्रत्येक दिन |
| हितार्थ | हित के लिए |
| हरघड़ी | घड़ी-घड़ी (प्रत्येक घड़ी) |
| हरवर्ष | प्रत्येक वर्ष |
| हरपल | प्रत्येक पल |
जय हिंद