1. प्रायः जिस प्रकार का शब्द होता है, उसी प्रकार का उपसर्ग उस शब्द के साथ लगाया जाता है; अथार्त तत्सम शब्द के साथ तत्सम उपसर्ग, तद्भव शब्द के साथ तद्भव उपसर्ग तथा विदेशी शब्द के साथ विदेशी उपसर्ग। जैसे- ‘सु’ तत्सम उपसर्ग है, यहा तत्सम शब्द ‘पुत्र’ के साथ लगकर ‘सुपुत्र’ शब्द बनता है पर ‘पूत’ (तद्भव) के साथ ‘सुपूत’ नहीं होगा।
2. उपसर्ग, प्रत्यय और समास की विधि से नये शब्द बनाए जाते हैं।
3. वाक्य में प्रयुक्त शब्द ‘पद’ कहलाते हैं।
4. वे शब्दांश जो शब्द के आरंभ में लगकर नये शब्द बनाते हैं, उसे ‘उपसर्ग’ कहते हैं।
5. ‘उपसर्ग’ शब्दांश होते हैं।
6. ‘उपसर्ग’ शब्द के आरंभ में लगते हैं।
7. ‘उपसर्ग’ का वाक्य में स्वतंत्र प्रयोग नहीं होता है।
8. उपसर्गों का प्रयोग संस्कृत में सर्वाधिक होता है; किंतु हिंदी की प्रकृति उपसर्ग प्रिय नहीं हैं। अतः हिंदी में उपसर्ग कम ही हैं।
9. हिंदी में उपसर्ग संस्कृत, उर्दू-फ़ारसी, अंग्रेजी से आए है तथा हिंदी के अपने उपसर्ग भी है।
10. हिंदी के जो अपने उपसर्ग है वे संस्कृत के ही प्रायः विकृत रूप हैं।
11. मूल शब्द संज्ञा में विशेषण लगने से विशेषण बन जाता है। यदि मूल शब्द विशेषण है तो उपसर्ग लगने पर वह संज्ञा या क्रिया-विशेषण बन जाता है।
12. संस्कृत में मूल 22 (बाईस) उपसर्ग हैं।
13. एक ही शब्द के साथ-साथ कभी-कभी एक से अधिक उपसर्ग भी लगाए जाते हैं।
14. एक ही उपसर्ग भिन्न-भिन्न शब्दों के साथ भिन्न-भिन्न अर्थ प्रकट करता है।
15. उपसर्ग में ‘उप’ का अर्थ है- ‘समीप’ होता है अथार्त जो शब्दांश किसी शब्द के समीप आकर नया शब्द बनाए, उसे उपसर्ग कहते हैं।
16. ‘उपसर्ग’ उस शब्दांश या अव्यय को कहते हैं, जो किसी शब्द के पहले आकर उसका विशेष अर्थ प्रकट करता है। यह दो शब्दों (उप+सर्ग) के योग से बनता है। उप का अर्थ ‘समीप’ ‘निकट’ या ‘पास में’ है। ‘सर्ग’ का अर्थ सृष्टि करना। अतः उपसर्ग का अर्थ है पास में बैठकर दूसरा नया अर्थवाला शब्द बनाना। जैसे- ‘हार’ के पहले ‘प्र’ उपसर्ग लगा दिया जाए तो एक नया शब्द ‘प्रहार’ बन जाएगा।
17. ‘उपसर्ग’ सहायक शब्दों में नहीं जुड़ते है।
18. ‘प्रत्यय’ का कोई स्वतंत्र अर्थ नही होता है।
19. ‘प्रत्यय’ का स्वतंत्र रूप से प्रयोग नहीं होता है।
20. परिभाषा- शब्दों के बाद जो अक्षर या अक्षरसमूह लगाया जाता है उसे ‘प्रत्यय’ कहते हैं।
प्रत्यय दो शब्दों से बना है- प्रति + अय। प्रति का अर्थ ‘साथ में पर बाद में’ और ‘अय’ का अर्थ चलनेवाला होता है। अतएव, ‘प्रत्यय’ का अर्थ है ‘शब्दों के साथ’, पर बाद में चलनेवाला या लगनेवाला। जैसे- ‘भला’ शब्द में ‘आई’ प्रत्यय लगाने से ‘भलाई’ शब्द बनता है। यहाँ प्रत्यय ‘आई’ है।
21. संरचना की दृष्टि से प्रत्यय के दो भेद हैं-
1. कृत प्रत्यय 2. तद्धित प्रत्यय।
1. कृत प्रत्यय- धातुओं के अंत में लगकर संज्ञा, विशेषण तथा अव्यय बनाने वाले प्रत्यय को ‘कृत प्रत्यय’ कहते हैं। इनके योग से बने शब्दों को कृदंत (कृत+अंत) कहते हैं।
22. प्रत्यय की निम्न विशेषताएँ हैं-
1. प्रत्यय शब्दांश होते है।
2. प्रत्यय शब्दों के अंत में लगते हैं।
3. प्रत्यय शब्द के अर्थ को प्रभावित करते हैं।
23. क्रिया के मूल रूप को धातु कहते हैं।
24. धातुओं के अंत में लगकर विशेषण तथा अव्यय बनाने वाले प्रत्यय को ‘कृत प्रत्यय’ कहते हैं।
25. कृत प्रत्यय के योग से बने शब्दों को ‘कृदंत’ कहते हैं।
26. ‘कृत’ प्रत्यय के मुख्यतः पाँच भेद होते हैं-
1. कर्तृवाचक प्रत्यय
2. कर्मवाचक प्रत्यय
3. करणवाचक प्रत्यय
4. भाववाचक प्रत्यय
5. क्रिया बोधक या क्रिया वाचक प्रत्यय
27. संज्ञा, सर्वनाम अथवा विशेषण के अंत में लगने वाले प्रत्यय को ‘तद्धित प्रत्यय’ कहते है।
28. तद्धित प्रत्यय से बने शब्दों को ‘तद्धितांत’ शब्द कहते हैं।
29. कुछ प्रत्ययों के प्रयोग से लिंग परिवर्तन होता है तो कुछ प्रत्यय विभक्ति रूप में प्रयुक्त होते हैं।
30. तद्धित प्रत्यय के निम्नलिखित भेद किए जाते हैं-
1. कर्तृवाचक तद्धित प्रत्यय
2. भाववाचक तद्धित प्रत्यय
3. गुणवाचक तद्धित प्रत्यय
4. अपत्यावाचक (संतान वाचक) तद्धित प्रत्यय
5. ऊनवाचक (लघुता वाचक) तद्धित प्रत्यय
6. स्त्रीवाचक एक अन्य भेद
7. संबंधवाचक तद्धित प्रत्यय (व्यक्ति/वस्तु से संबंध सूचक प्रत्यय)
31. कभी-कभी एक शब्द में उपसर्ग एवं प्रत्यय दोनों का प्रयोग किया जाता है।
32. कभी-कभी एक शब्द में दो-दो प्रत्ययों का प्रयोग किया जाता है।
जय हिंद