‘लोकोक्ति’ दो शब्दों के मेल से बना है – ‘लोक+उक्ति’। लोक का अर्थ होता है ‘लोक’ और ‘उक्ति’ का अर्थ होता है ‘कथन’। अथार्त लोक में प्रचलित उक्ति या कथन। लोकोक्ति के रचनाकार का पता नहीं होता है। इसलिए अंग्रेजी में इसकी परिभाषा दी गई है– ‘A proverb is a saying without an author’।
वृहद् हिंदी कोश के अनुसार लोकोक्ति की परिभाषा-
“विभिन्न प्रकार के अनुभवों, पौराणिक तथा ऐतिहासिक व्यक्तियों एवं कथाओं, प्राकृतिक नियमों और लोक विश्वासों आदि पर आधारित चुटीली, सारगर्भित, संक्षिप्त, लोकप्रचलित ऐसी उक्तियों को लोकोक्ति कहते हैं, जिनका प्रयोग किसी बात की पुष्टि, विरोध, सीख तथा भविष्य-कथन आदि के लिए किया जाता है।”
लोकोक्ति और कहावत में अंतर होता है- लोकोक्ति ऐसा कथन या वाक्य है जिनके स्वरुप में समय के अंतराल के बाद भी कोई परिवर्तन नहीं होता है। अथार्त लिंग, वचन, काल आदि का प्रभाव लोकोक्ति पर नहीं पड़ता है। जबकि कहावतों की संरचना में परिवर्तन देखे जा सकते हैं।
लोकोक्ति के गुण-
1. लोकोक्ति जीवन में भोगे हुए यथार्थ को व्यंजित करती है; जैसे-
न रहेगा बाँस न बजेगी बाँसुरी,
डोली न कहार बीबी हुई तैयार,
जिसकी लाठी उसकी भैस आदि।
2. लोकोक्ति अपने आप में पूर्ण कथन है जैसे-
जाको राखे साइयाँ मार सके ना कोय
नेकी कर दरिया में डाल आदि।
3. लोकोक्ति संक्षिप्त रचना है। इसमें से हम एक शब्द भी इधर से
उधर नहीं कर सकते हैं। इसलिए लोकोक्ति को विद्वानों ने ‘गागर में सागर भरने’ वाली उक्ति कहा है।
4. लोकोक्ति जीवन के अनुभवों पर आधारित होती है। जीवन के वे
अनुभव जो भारतीय समाज में व्यक्तियों के होते हैं। वैसे अनुभव यूरोपीय समाज के लोगों के भी हो सकते हैं। जैसे-
‘नया नौ दिन पुराना सौ दिन’, ‘old is gold’.
5. लोकोक्ति प्रायः तर्कपूर्ण युक्तियाँ होती हैं। जैसे-
काठ की हाँडी बार-बार नही चढ़ती,
बाबा आप लबार वैसे उनका कुल परिवार।
6. कुछ लोकोक्ति तर्कशून्य भी हो सकती है। जैसे- छछून्दर के सर
में चमेली का तेल।
7. कुछ लोकोक्तियाँ अतिश्योक्ति भी बन जाती हैं
| क्र.सं. | लोकोक्तियाँ | अर्थ |
| 1. | अँधा क्या चाहे दो आँखें | बिना किसी प्रयास के इच्छित वस्तु मिल जाना |
| 2. | अंधों में काना राजा | गुणहीन लोगों में थोड़े गुण वाला व्यक्ति बहुत गुणवान माना जाता है |
| 3. | अपना हाथ जगन्नाथ | अपना काम स्वयं करना |
| 4. | अधजल गगरी छलकत जाए | अधूरी योग्यता और कम क्षमता का व्यक्ति ही अधिक इतराता है |
| 5. | अब पछताए होत क्या जब चिड़ियाँ चुग गई खेत | काम बिगड़ जाने पर पछताने से कोई लाभ नहीं |
| 6. | अपनी गली में कुत्ता भी शेर बन जाता है | अपने घर में निर्बल भी बलवान हो जाता है |
| 7. | अंधी पीसे कुत्ता खाए | काम कोई करे फल कोई और पाए |
| 8. | आधा तितर, आधा बटेर | बेमेल की स्थिति होना |
| 9. | अब पछताएँ होत क्या जब चिड़ियाँ चुग गई खेत | काम बिगड़ जाने पर पछताने से कोई लाभ नहीं |
| 10. | अपनी-अपनी डफली अपना- अपना राग | सबका विचार, कार्य शैली अलग-अलग होना |
| 11. | अपनी करनी पार उतरनी | मनुष्य को अपने कर्मो का ही फल मिलता है |
| 12. | अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता | अकेला आदमी कुछ नहीं कर सकता है |
| 13. | अंत भले का भला | अच्छे काम का फल अच्छा होना |
| 14. | अंधों में काना राजा | मूर्खो के बीच पढ़ा-लिखा व्यक्ति |
| 15. | आ बैल मुझे मार | स्वयं के लिए मुसीबत खड़ी करना |
| 16. | आँख का अँधा नाम नैनसुख | गुण के विरुद्ध नाम होना |
| 17. | अस्सी की आमद, चौरासी खर्च | आमदनी से अधिक खर्चा करना |
| 18. | आम के आम गुठलियों के दाम | दोहरा लाभ होना |
| 19. | अकेली मछली सारे तालाब को गंदा करती है | एक दुष्ट आदमी सभी को बिगाड़ देता है |
| 20. | अशर्फिया लूटें कोयला पर छापा/मोहर | एक तरफ फिजूल खर्ची दूसरे तरफ पैसे-पैसे पर रोक |
| 21. | आदमी का दवा आदमी है | मनुष्य ही मनुष्य की सहायता करता है |
| 22. | अपनी डफली अपनी राग | कोई भी कार्य नियम से नहीं करना |
| 23. | आगे नाथ न पीछे पगहा | किसी तरह की कोई जिम्मेदारी नहीं होना |
| 24. | आगे कुआँ पीछे खाई | सभी ओर विपत्ति होना |
| 25. | आई मौज फकीर को, दिया झोपड़ा फूँक | वैरागी लोग मनमौजी होते हैं |
| 26. | आये थे हरि भजन को, ओटन लगे कपास | आवश्यक कार्य को छोड़कर अनावश्यक कार्य करना। |
| 27. | अधजल गगरी छलकत जाए | अयोग्य व्यक्ति अधिक इतराता है |
| 28. | आधी छोड़ सारी को धावै, आधि मिले न सारी पावै | अधिक लालची व्यक्ति को कुछ भी नहीं मिलता |
| 29. | इन तीलों में तेल नहीं | यहाँ आशा पूरी नहीं होना |
| 30. | इस हाथ दे उस हाथ ले | लेने का देना |
| 31. | इधर कुआँ तो उधर खाई | दोनों ओर संकट होना |
| 32. | ईश्वर की माया कही धूप कहीं छाया | भाग्य की विचित्रता |
| 33. | उल्टा चोर कोतवाल को डांटे | दोष अपना धमकाए निर्दोष को |
| 34. | ऊधो का लेना न माधो को देना | किसी से लेना देना नहीं करना |
| 35. | ऊँची दूकान फीकी पकवान | प्रदर्शन अधिक वास्तविकता कम |
| 36. | एक अनार सौ बीमार | वस्तु एक ग्राहक अनेक |
| 37. | एक पंथ दो कार्य | काम एक लाभ दो |
| 38. | एक करेला दूजे नीम चढ़ा | एक दोष के साथ दूसरा दोष लगना |
| 39. | एक मछली सारे पानी को गंदा करती है | एक खराब आदमी सबकों बिगाड़ देता है |
| 40. | एक हाथ से ताली नहीं बजती | झगड़ा एक तरफ से नहीं होता है |
| 41. | एक मायान में दो तलवारे नहीं समा सकती | एक वस्तु के दो सामान अधिकारी नहीं हो सकते |
| 42. | एक अकेला दो ग्यारह | संगठन में शक्ति होती है |
| 43. | ओखली में सिर दिया तो मूसलों से क्या डर | काम आरंभ करने पर मुसीबतों से नहीं घबराना |
| 44. | ओछे से प्रीति बालू की भीति | दुष्ट व्यक्ति का प्रेम अस्थिर होता है। |
| 45. | चलती का नाम गाड़ी | हस्ती समाप्त होने के बाद भी धाक जमी रहना। |
| 46. | कड़ी मजूरी, चोखा काम | पूरा पैसा देने से काम अच्छा और पूरा होता है |
| 47. | काठ की हांडी बार-बार नहीं चढती | चालाकी से एक बार काम निकलता है बार-बार नहीं |
| 48. | कोयला की दलाली में मुँह काला | बूरे के साथ रहने से बुराई मिलती है |
| 49. | कंगाली में आटा गीला | मुसीबत में और भी मुसीबत |
| 50. | कहाँ राजा भोज कहाँ गंगू तेली | दो व्यक्तियों की स्थिति में अंतर |
| 51. | काला अक्षर भैंस बराबर | बिलकुल अनपढ़ होना |
| 52. | का बरसा जब कृषि सुखाने | समय बीतने पर सहायत करना व्यर्थ है |
| 53. | कमाई अठन्नी खर्चा रुपईया | आमदनी से अधिक खर्चा करना |
| 54. | खेत खाए गदहा मार खाए जोलहा | गलती करे कोई, सजा किसी और को |
| 55. | खग ही जाने खग की भाषा | चालाक ही चालाक की भाषा समझता है |
| 56. | खरबूजा को देखकर खरबूजा रंग बदलता है | संगति का प्रभाव अवश्य पड़ता है |
| 57. | खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे | अपनी खीझ निकालना |
| 58. | खरी मजूरी, चोखा काम | बिना कठिनाई के अच्छी काम होना |
| 59. | खोदा पहाड़ निकली चुहिया | परिश्रम अधिक, फल कम |
| 60. | गंगा गए तो गंगा राम, जमना गए तो जमनाराम | सिद्धांतहीन मनुष्य, अवसरवादी |
| 61. | गुरु गुड़ रहे, चेले चीनी हो गए | चेला गुरु से आगे |
| 62. | घर का भेदी लंका ढाहे | आपस की फुट से सर्वनाश |
| 63. | घर का जोगी जोगना, आन गाँव का सिद्ध | अपने स्थान पर योग्य व्यक्ति की प्रशंसा नहीं होती |
| 64. | घर की मुर्गी दाल बराबर | घर की चीज का आदर नहीं |
| 65. | चोर के पैर नहीं होते | पाप करनेवाला डरता रहता है |
| 66. | चाँद पर थूका मुँह पर गिरा | सज्जन पुरुष की बुराई से अपना अपमान होता है |
| 67. | चमड़ी जाए पर दमड़ी न जाए | महाकृपण/कंजूस होना |
| 68. | चोर की दाढ़ी में तिनका | दोषी स्वयं डरता है |
| 69. | चार दिन की चाँदनी फिर अँधेरी रात | थोड़े दिन का सुख, फिर वही कष्ट |
| 70. | छछूंदर के सर में चमेली का तेल | अयोग्य व्यक्ति को अच्छी चीज मिल जाना |
| 71. | छोटा मुँह बड़ी बात | अपनी योग्यता से बढ़कर बात करना |
| 72. | जिसकी लाठी उसकी भैंस | बलवान की जीत होती है |
| 73. | जाके पैर न फाटी बिवाई, सो क्या जाने पीर पराई | जिसे खुद कष्ट नहीं हुआ हो उसे दूसरे की पीड़ा का अनुभव नहीं होता |
| 74. | जो गरजते हैं वो बरसते नहीं | जो डींग हाँकते हैं,वे काम नहीं कर सकते |
| 75. | जिये ना माने पितृ और मुए करें श्राद्ध | कुपात्र संतान होना |
| 76. | जाको राखै साइयाँ मार सकै ना कोय | जिसका रक्षक ईश्वर है, उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता |
| 77. | जल में रहकर मगर से बैर | जिसके सहारे, उसी से दुश्मनी |
| 78. | जैसी करनी वैसी भरनी | जो जैसा करता है, उसे उसके अनुसार फल भोगना पड़ता है |
| 79. | जैसा देश वैसा भेष | जहाँ रहें वहाँ के स्थानीय रिवाज के अनुसार रहें |
| 80. | जैसा नागनाथ वैसे साँपनाथ | दोनों एक सामान दुष्ट प्रवृत्ति के होना |
| 81. | डूबते को तिनके का सहारा | आफत के समय, थोड़ी सहायता बहुत है |
| 82. | डोली ना कहार, बीबी हुई तैयार | बिना बुलाए जाने की तैयारी करना |
| 83. | तू डाल-डाल मैं पात-पात | तू चतुर है, मैं तुझसे भी अधिक चतुर हूँ |
| 84. | तेते पाँव पसारिए जैती लंबी सौर | आय के अनुसार ही खर्च करना चाहिए |
| 85. | तबले की बला बंदर के सिर | दोष किसी का सजा किसी और को |
| 86. | तेली का तेल जले मसालची का दिल | एक को खर्च करते देख दूसरा परेशान |
| 87. | तसलवा तोर की मोर | एक वस्तु पर दो व्यक्तियों का दावा करना |
| 88. | थोथा चना बाजे घना | छोटा आदमी बहुत दिखावा करता है |
| 89. | धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का | अस्थिरता के कारण कहीं का न रहना |
| 90. | दूध का दूध पानी का पानी | सही न्याय |
| 91. | दूर के ढ़ोल सुहावने होते हैं | दूर की बातें अच्छी लगती है |
| 92. | देखें ऊँट किस करवट बैठता है | देखे, क्या फैसला होता है |
| 93. | दूध का जला छांछ को भी फूँक-फूँक कर पीता है | एक बार नुकसान होने के बाद सतर्क हो जाना |
| 94. | दुविधा में दोनों गए माया मिली न राम | अनिश्चय की स्थिति में काम करने पर एक में भी सफलता नहीं मिलना |
| 95. | दादा बड़ा न भैया, सबसे बड़ा रुपैया | रुपैया ही सब कुछ है |
| 96. | दुधारू गाय की लात भली | लाभकारी द्वारा दिया गया कष्ट अच्छा लगना |
| 97. | धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का | अस्थिरता के कारण कहीं का न रहना |
| 98. | न रहेगा बाँस, ना बजेगी बाँसुरी | दोष और झगड़े का कारण नष्ट कर देना |
| 99. | न नौ मन तेल होगा न राधा नाचेगी | किसी बहाने काम नहीं करना |
| 100. | नाच न जाने आँगन टेढ़ा | अपनी अकुशलता को छिपाने का बहाना करना |
| 101. | नेकी कर दरिया में डाल | किसी के साथ भलाई करके भूल जाना |
| 102. | नौ नगद न तेरह उधार | उधार से नकद दाम अच्छे, भले थोड़ा ही मिले |
| 103. | लेना एक न देना दो | बिना मतलब |
| 104. | पानी में पानी मिले, मिले कीच में कीच | जो जैसा होता है उसे वैसे ही लोग मिलते हैं |
| 105. | पानी पिलाकर जात पूछना | काम के बाद परिचय जानना |
| 106. | पर उपदेश कुशल बहुतेरे | दूसरे को उपदेश देने में सभी चतुर होते है |
| 107. | बीन मांगे मोती मिले, मांगे मिले ना भीख | मांगने से कुछ नहीं मिलता है लेकिन कई बार बिना माँगे ही आशा से भी अधिक मिल जाता है |
| 108. | बिल्ली के भाग्य से छींका टूटना | संयोग से काम हो जाना |
| 109. | बनिया दे ना, सवा सेर तौल दो | बेकार की उमीदें रखना |
| 110. | बेगार से बेकार भली | खाली बैठने से कुछ करना अच्छा |
| 111. | बोया पेड़ बाबुल का आम कहाँ ते होय | बुरे कर्मों से अच्छा फल नही मिलता |
| 112. | बकरे की माँ कब तक ख़ैर मनाएगी | अपराधी एक न एक दिन पकड़ा ही जाता है |
| 113. | भागे भूत की लंगोटी भली | जहाँ कुछ भी पाने की उम्मीद न हो, वहाँ कुछ भी हासिल हो जाना |
| 114. | भैंस के आगे बीन बजाई, भैंस खड़ी पगुराई | मूर्ख को शिक्षा देने से कोई लाभ नहीं। |
| 115. | मुँह में राम, बगल में छुरी | कपटी मनुष्य |
| 116. | मन चंगा, तो कठौती में गंगा | मन शुद्ध है, तो सब कुछ सही है |
| 117. | मंगनी के बैल के दाँत नहीं देखे जाते | मुफ्त की वस्तु की बुराई नहीं देखी जाती |
| 118. | मान न मान मे तेरा मेहमान | जबरदस्ती के गले पड़ना |
| 119. | माया को माया मिले कर-कर लंबे हाथ | धनी को और धन मिलना |
| 120. | यह मुँह और मसूर की दाल | अपनी हैसियत से बढ़कर कहने वाला |
| 121. | रस्सी जल गई पर बल नहीं गया | शक्तिहीन होने पर भी घमंड नहीं जाना |
| 122. | लेना एक न देना दो | बिना मतलब |
| 123. | लुट में चरखा नफा | जहाँ कुछ भी पाने की उम्मीद न हो वहाँ कुछ भी हासिल हो जाना |
| 124. | लाग हो तो समझें लगाव, बरना धोखा खाएं क्यों? | जिससे भले की उम्मीद न हो उसपर आश लगाना व्यर्थ होता है |
| 125. | लकड़ी के बल बंदर नाचे | भय से सभी काँपते हैं |
| 126. | सावन सुखा न भादों हरा | हमेशा एक सामान रहने वाला। |
| 127. | सहज पके तो मीठा होय | धीरे-धीरे किया गया कार्य अच्चा होता है |
| 128. | साँवन हरे न भादों सूखे | सदा एक समान रहना |
| 129. | साँच को आँच नहीं | जो सच्चाई के रास्ते पर है, उन्हें डर नहीं होता |
| 130. | साँप भी मरे और लाठी भी न टूटे | बिना हानि पहुँचायें काम बन जाए |
| 131. | शौकीन बुढ़िया, चटाई का लहँगा | फूहड़ शौक होना |
| 132. | हारिल की लकड़ी, पकड़ी सो पकड़ी | हठी अपना हठ नहीं छोड़ता है |
| 133. | हाथी घूमे हजार, कुता भौंके बाजार | बड़े लोग छोटे लोगों की परवाह नहीं करते हैं |
| 134. | हलक से निकली, खलक में पड़ी | मुँह से बात निकलते ही फैल जाती है |
| 135. | हराम की कमाई हराम में गँवाई | बिना मेहनत की कमाई फिजूल में खर्च हो जाना |
| 136. | हज्जाम के आगे सर झुकाना | अपने स्वार्थ के लिए झुकना |
| 137. | हाथी के दाँत खाने के और, दिखाने के और | कहना कुछ और, करना कुछ और |
| 138. | हँसुआ के ब्याह में खुरपी का गीत | किसी भी अवसर पर गलत बात का प्रयोग |
| 139. | हँसा था सो उड़ गया, कागा हुआ दीवाना | सज्जनों का निरादर और नीच का आदर करना |
| 140. | हाथ कंगन को आरसी क्या | प्रत्यक्ष को प्रमाण की आवश्यकता नहीं |
| 141. | होनकार बिरवान के होत चिकने पात | योग्य व्यक्ति के लक्षण बचपन से ही पहचाने जाते है |
| 142. | हाथी के दाँत खाने के और दिखाने के और | बाहर से कुछ और अन्दर से कुछ और |
| 143. | भागते चोर की लंगोटी ही सही | जो मिल जाए वही काफी |
| 144. | टाट का लंगोटा, नवाब से यारी | निर्धन व्यक्ति, धनवान के साथ दोस्ती करने का प्रयास। |
| 145. | ठेस लगे, बुद्धि बढ़े | हानि होने के बाद बुद्धि बढ़ती है |
| 146. | हाथी निकल गया दुम रह गई | थोड़ा सा शेष रह जाना |
| 147. | हाथी के पाँव में सबका पाँव | बड़ा प्रयास छोटे प्रयासों के बराबर होता है |
| 148. | हींग लगे न फिटकरी रंग भी चोखा | बिना खर्च किए श्रेष्ठ काम |
जय हिंद