राधाचरण गोस्वामी समग्र परिचय

जन्म 25 फरवरी, 1859, वृन्दावन  

निधन 12 दिसंबर, 1925 

पिता- गल्लूजी महाराज/ गुणमंजरी दास जी एक भक्त कवि थे।

प्रमुख तथ्य-

1. राधाचरण गोस्वामी जी के साहित्यिक जीवन का आरम्भ 1877 ई. में हुआ था। इसी वर्ष उनकी पुस्तक ‘शिक्षामृत’  का प्रकाशन हुआ था। यह उनकी प्रथम पुस्तकाकार रचना थी।

2. उनकी साहित्यिक उपलब्धियों की अनेक दिशाएँ हैं। वे कवि थे, उन्होंने हिंदी गद्य की विभिन्न विधाओं की श्रीवृद्धि भी की। उन्होंने राधा-कृष्ण की लीलाओं, प्रकृति-सौंदर्य और ब्रज की संस्कृति के विभिन्न पक्षों पर काव्य-रचना की। कविता में उनका उपनाम ‘मंजु’ था।

3. गोस्वामी जी खड़ीबोली पद्य के विरोधी थे। उन्हें आशंका थी कि खड़ीबोली के बहाने उर्दू का प्रचार हो जाएगा। गोस्वामी जी का कथन था कि- “यदि खड़ी बोली में कविता की चेष्टा की जाएगी तो खड़ी बोली के स्थान पर थोड़े ही दिनों में उर्दू की कविता का प्रचार हो जाएगा।” (हिन्दोस्तान, 11 अप्रैल, 1888)

4. खड़ी बोली आन्दोलन- अयोध्या प्रसाद खत्री ने चलाया था।

5. गोस्वामी जी श्रेष्ठ समालोचक भी थे। उनकी प्रतिज्ञा थी कि-   “किसी पुस्तक की समालोचना लिखो तो सत्य-सत्य लिखों।”

6. प्रेमचन्द्र से पहले ही गोस्वामी जी ने ‘समस्यामूलक’ उपन्यास लिखकर हिंदी में नई धारा का प्रवर्त्तन किया।

7. गोस्वामी जी विधवा विवाह के कट्टर समर्थक थे। उन्होंने अनेक असहाय बाल विधवाओं के पुनर्विवाह स्वयं पिता बनकर करवाया था। विधवा विवाह के पक्ष में उन्होंने ‘विधवा विपत्ति’ और ‘बाल विधवा’ शीर्षक नाम से दो उपन्यास भी लिखे थे।

8. गोस्वामी जी साहित्यकार ही नहीं पत्रकार भी थे। उन्होंने वृंदावन  से ‘भारतेंदु’ मासिक पत्र का संपादन-प्रकाशन किया था। इसका प्रकाशन 3 वर्ष 5 माह तक हुआ। व्यय अधिक होने के कारण इसे बंद करना पड़ा।

8. 1910 ई. 1920 ई. तक वृन्दावन से ही ‘श्रीकृष्ण चैतन्य चंद्रिका, नाम से एक धार्मिक मासिक पत्रिका का संपादन-प्रकाशन किया।

9. राधारचरण गोस्वामी जी सर्वधर्म समान भाव सिद्धांत के प्रतीक थे। वे श्रीराधारमण जी के अनन्य उपासक और ब्रह्म माध्व गौड़ीय संप्रदाय के मुख्य आचार्य होने के बावजूद भी उनमें किसी अन्य धर्म अथवा धार्मिक संप्रदाय के प्रति दुराग्रह नहीं था। उन्होंने अपने जीवन चरित के नौवें पृष्ठ पर स्वयं लिखा है- “मैं एक कट्टर वैष्णव हिंदू हूँ। अन्य धर्म अथवा समाज के लोगों से विरोध करना उचित नहीं समझता। बहुत से आर्यसमाजी, ब्रह्मसमाजी, मुसलमान, ईसाई मेरे सच्चे मित्र हैं और बहुधा इनके समाजों में जाता भी हूँ।”

10. गोस्वामी जी द्वारा संपादित मासिक पत्र ‘भारतेंदु’ का पुनर्प्रकाशन 1 ऑकटूबर 1890 ई. से हुआ था। ‘भारतेंदु’ 1 ऑकटूबर 1890 ई. (पुस्तक 5 अंक 1) में पृष्ठ संख्या 2 पर ‘भारतेंदु का प्रेमालाप’ शीर्षक संपादकीय में संपादक राधाचरण गोस्वामी ने कहा था- “भाषा कविता पर बड़ी विपत्ति आनेवाली है। कुछ महाशय खड़ी हिंदी का मुहम्मदी झण्डा लेकर खड़े हो गए हैं और कविता देवी का गला घोटकर अकाल वध करना चाहते हैं, जिससे कवि नाम ही उड़ जाए…” अथार्त खड़ी बोली कविता का विरोध करने के लिए उन्होंने ‘भारतेंदु’ का पुनर्प्रकाशन किया था। किंतु पुनर्प्रकाशन के बावजूद यह अल्पजीवी ही सिद्ध हुआ।

11. गोस्वामी राधाचरणदास जी ने ‘मेरा संक्षिप्त जीवन परिचय’ 1895 ई. शीर्षक नाम से अपनी संक्षिप्त आत्मकथा में लिखा था- ‘लिखने के समय किसी ग्रन्थ की छाया लेकर लिखना मुझे पसंद नहीं। जो कुछ अपने मन का विचार हो वही लिखता हूँ।’

राधाचरण गोस्वामी की काव्य रचनाएँ-

1. नवभक्त माल

2. दामिनी दूतिका (खंडकाव्य)

3. शिशिर सुषमा

4. इश्क चमन (‘इश्क चमन’ नाम से मिलता जुलता अन्य रचनाकार की रचनाएँ भी हैं) जैसे-

घनानंद की – इश्क्लता

बोधा की – इश्कनामा

आलम हसन की -उजाड़ इश्क

वियोगी हरि की – इश्क दुर्दशा 

5. भ्रमरगीत (भ्रमरगीत नाम से मिलता जुलता अन्य रचनाकार की रचनाएँ भी हैं) जैसे-

सूरदास – भ्रमरगीत (शुक्ल ने भ्रमरगीत सार नाम से संपादन किया था)

नंददास – भँवरगीत

सत्यनारायण कविरत्न – भ्रमरदूत

डॉ. अनूपशर्मा- भ्रमर दूतिका

6. बारहमासी

7. निपटनादान

8. विधवा विलाप

9. प्रेम बगीची

10. भारत संगीत

11. भूमाहरण प्रार्थना

राधाचरण गोस्वामी जी के नाट्य रचनाएँ-

1. सुदामा चरित नाटक

2. सती चंद्रावली

3. अमर सिंह राठौर

4. तन मन धन सब गोसाई जी के अर्पण राधाचरण गोस्वामी जी ने समस्या प्रधान मौलिक उपन्यास लिखे-

1. बाल विधवा- (1883-84 ई.)

2. सर्वनाश- (1883-84 ई.)

3. अलकचन्द (अपूर्ण 1884-85 ई.)

4. विधवा विपत्ति (1888 ई.)

5. वीरबाला’ (1883-84 ई.) यह ऐतिहासिक उपन्यास है।

उन्होंने ‘बिरजा’, ‘जावित्री’ और ‘मृण्मयी’ नामक उपन्यासों के अनुवाद बंगभाषा में किये है। लघु उपन्यासों को वे ‘नवन्यास’ कहते थे। ‘कल्पलता’ (1884-85 ई.) और ‘सौदामिनी’ (1890-91 ई.) उनके मौलिक सामाजिक ‘नवन्यास’ हैं। प्रेमचन्द के पूर्व ही गोस्वामी जी ने ‘समस्यामूलक’ उपन्यास लिखकर हिन्दी में नई धारा का प्रवर्त्तन किया था।

पंडित ‘बालकृष्ण भट्ट’ और ‘हिंदी प्रदीप’ ने पंडित राधाचरण गोस्वामी को हिंदी के साढ़े तीन लेखकों में से एक माना था। उन्होंने ‘हिंदी प्रदीप’ के जनवरी-फरवरी और मार्च 1894 ई. (जिल्द 17 संख्या 5, 6 और 7) में कहा था कि हिंदी के साढ़े तीन सुलेखक थे- बाबू हरिश्चंद्र, ब्रह्मण मासिक पत्र के संपादक प्रतापनारायण मिश्र और राधाचरण गोस्वामी, आधा पीयूस प्रवाह के संपादक अंबिकादत्त व्यास।

विचारों की उग्रता और प्रगतिशीलता में वे अपने युग के अन्य सभी लेखकों से बहुत आगे था। वे प्रखर क्रांतिकारी साहित्यकार थे, प्रखर राष्ट्र-चिन्तक, साहित्य और समय की धारा को मोड़ देनेवाले युगद्रष्टा कथाकार थे।

जय हिंद

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