उपाध्याय पं. बद्रीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’
जन्म- 1 सितंबर 1855 ई. उत्तर प्रदेश में मिर्जापुर के दत्तापुर ग्राम के एक संपन्न ब्राह्मण परिवार में हुआ था।
निधन- 12 मार्च 1922 ई.
उपनाम- ‘प्रेमघन’
बद्रीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’ द्वारा संपादित पत्रिकाएँ-
1. आनंदकादंबिनी- 1881 ई. (मिर्जापुर)
2. नागरी नीरद- 1893 ई. ये उर्दू में ‘अब्र’ (तखल्लुस) उपनाम नाम से रचनाएँ लिखते थे।
बद्रीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’ की महत्वपूर्ण काव्य रचनाएँ-
1. जीर्ण जनपद/ दत्तपुर दुर्दशा
2. मयंक महिमा (प्रकृति वर्णन से संबंधित है)
3. लालित्य लहरी (वन्दना संबंधी दोहों का प्रयोग है)
4. आनंद अरुणोदय
5. प्रेम पियूष वर्षा
6. सूर्य स्त्रोत
7. भारत बधाई
8. पितर प्रताप
9. हार्दिक हर्षादर्श
10. अलौकिक लीला
11. बृजचंद पंचक (इसमें भक्ति भावना व्यक्त हुई है)
12. स्वागत सभा
13. मन की मौज
14. आर्याभिनंदन
15. हास्य बिंदु
16. युगल स्त्रोत
17. मंगलाशा
18. होली की नकल
19. वर्षा बिंदु
20. प्रेम सर्वस्व- इस काव्य रचना में 127 कविताएँ है। 3 लंबी कविताएँ है 1944 ई. में यह नागरी प्रचारिणी सभा, काशी द्वारा प्रकाशित करवाया गया।
बद्रीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’ के ‘नाटक’
1. भारत सौभाग्य
2. वीरांगना रहस्य
3. प्रयाग रामगमन
बद्रीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’ महत्वपूर्ण ‘निबंध’
1. ये हिंदी में विचारात्मक निबंधों के ‘जनक’ थे।
2. शुक्ल जी ने इन्हें ‘विलक्षण शैली’ का निबंधकार माना है।
3. इन्होंने लगभग 250 निबंध लीखे हैं।
वैयक्तिक निबंध-
1. बनारस का बुढ़वा मंगल
2. समय
3. दिल्ली दरबार में मित्र मंडली के यार
विचारात्मक निबंध-
1. नवीन वर्षारंभ
2. हिंदी भाषा का विकास
3. जन्मभूमि
भावात्मक निबंध- 1. उत्साह आलंबन 2. मनोभाव आनंद
वर्णनात्मक निबंध- 1. परिपूर्ण पावस
आलोचनात्मक निबंध- 1. नेशनल कॉंग्रेस की दुर्दशा
बद्रीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’ विशेष तथ्य:
1.‘आनंद अरुणोदय’ व ‘मयंक महिमा’ ये दोनों खड़ीबोली की काव्य रचनाएँ। शेष रचनाएँ इनकी ब्रजभाषा में है।
2. जीर्णजनपद / दत्तपुर दुर्दशा– इस रचना में इन्होंने अपने गाँव दत्तपुर की दयनीय स्थिति का वर्णन किया है। तथा भारतीय गाँव के दुर्दशा के लिए अंग्रेजों को उत्तरदायी ठहराया है।
3. ‘प्रेमघन सर्वस्व-’ निबंध में कजली, गजलें, चैती व लोकगीतों का संग्रह है।
4. ये कजली, गज़लें, लोकगीत, चैती आदि को‘आनंदकादंबिनी’ में भी प्रकाशित किया करते थे।
5. लंदन में दादाभाई नौरोजी को काला कहे जाने पर ‘प्रेमघन, ने निम्नलिखित क्षोभ पूर्ण कविता लिखी थी। कविता का नाम था। ‘कारे व गोरे’
“अचरज होत तुमहूँ सम गोरे बाजत कारे;
तासों कारे ‘कारे’ शब्दहू पर हैं वारे !
कारे कृष्ण, राम, जलधर जल-बरसावन वारे
कारे लागत ताहीं सों कारण कौ प्यारे
याते नीको है तुम ‘कारे’ जाहू पुकारे,
यहै असीस देत तुमको मिलि हम सब कारे
सफल होहिं मन के सब ही सकल्प तुम्हारे।
6. “बेसुरी तान” शीर्षक लेख में इन्होंने भारतेंदु की आलोचना करने में भी चूक नहीं की।
7. ‘प्रेमघन’ के कृतियों का संकलन इनके पौत्र दिनेशनारायण उपाध्याय ने किया है, जिसका “प्रेमघन सर्वस्व” नाम से हिंदी साहित्य सम्मेलन ने दो भागों में प्रकाशन किया है।
8. ‘प्रेमघन’ हिंदी साहित्य सम्मेलन के तृतीय कलकत्ता अधिवेशन में सभापति (सं. 1912) मनोनीत हुए थे।
9. ‘प्रेमघन’ जी की पं. इंद्रनारायण सांगलू से मैत्री हुई। सांगलू जी शायरी करते थे और अपने मित्रों को शायरी करने के लिए प्रेरित भी करते।
10. सांगलू के माध्यम से ‘प्रेमघन’ जी का भारतेंदु बाबू, हरिश्चंद्रजी से मैत्री का सूत्रपात हुआ। धीरे-धीरे यह मैत्री इतनी प्रगाढ़ हुई कि भारतेंदु जी के रंग में ‘प्रेमघन’ जी पूर्णतया पग गए, यहाँ तक कि भारतेंदु-मंडल के कवियों में ‘प्रेमघन’ जी का प्रमुख स्थान है।
11. वि.सं. 1930 में प्रेमघन जी ने “सद्धर्म सभा” तथा वि.सं. 1931 “रसिक समाज” की मीरजापुर में स्थापना की।
12. प्रेमघन जी के साथ आचार्य रामचंद्र शुक्ल का पारिवारिक संबंध था। शुक्ल जी शहर के रमईपट्टी मुहल्ले में रहते थे और लंडन मिशन स्कूल में ड्राइंग मास्टर थे। ‘आनंद कादंबिनी’ प्रेस में छपाई भी देख लेते थे।
13. आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी इनके बारे में बताते हुए लिखते हैं- 16 वर्ष की अवस्था तक पहुँचते-पहुँचते तो समवयस्क हिन्दी-प्रेमियों की एक खासी मंडली मुझे मिल गई।
14. जो बातें इनके मुँह से निकलती थी, उनमें एक विलक्षण वक्रता रहती थी। इनकी बात-चीत का ढंग इनके लेखों के ढंग से एकदम निराला होता था। नौकरों तक के साथ इनका ‘संवाद’ सुनने-लायक होता था। अगर किसी नौकर के हाथ से कभी कोई गिलास वगैरह गिरा, तो इनके मुँह से यही निकलता कि ‘कारे बचा त नाहीं।’
15. ‘प्रेमधन’ जी आधुनिक हिंदी के आविर्भाव काल में उत्पन्न हुए थे। इनके अनेक समसामयिक थे, जिन्होंने हिंदी को हिंदी का रूप देने में संपूर्ण योगदान किया।
16. ये कवि ही नहीं उच्च कोटि के गद्यलेखक और नाटककार भी थे। गद्य में निबंध, आलोचना, नाटक, प्रहसन, लिखकर अपनी साहित्यिक प्रतिभा का बड़ी पटुता से निर्वाह किया है।
17. प्रेमघन जी की गद्यशैली की समीक्षा से यह स्पष्ट हो जाता है कि खड़ीबोली गद्य के वे प्रथम आचार्य थे। समालोच्य पुस्तक के विषयों का अच्छी तरह विवेचन करके उसके विस्तृत निरूपण की चाल इन्होंने चलाई। (रामचंद्र शुक्ल)।
18. ‘प्रेमघन’ जी का स्मरण हिंदी साहित्य के प्रथम उत्थान का स्मरण है।
19. आचार्य रामचंद्र शुक्ल के शब्दों में- “हिंदी में सच्ची समालोचना का सूत्रपात सही अर्थों में बालकृष्ण भट्ट व बद्रीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’ से ही हुआ।”
20. इनकी काव्य रचनाओं में छंद भंग, यति भंग दोष मिलता है। ‘प्रेमघन की छाया स्मृति’ नामक निबंध में शुक्ल जी ने इन्हें अपना साहित्यिक गुरु माना है।
नोट- ऊपर काव्य में ‘स्त्रोत’ शब्द आया है। कहीं-कहीं ‘स्रोत’ भी आता है। दोनों शब्द का अर्थ भिन्न है।
‘स्त्रोत’ का अर्थ- श्लोक होता है और
‘स्रोत’ का अर्थ- माध्यम, साधन होता है।
जय हिंद