‘वृद्धाश्रम’ इस नाम को सुनकर अब ना तो बुरा लगता है, और ना ही कोई आश्चर्य होता है, अब तो आदत सी पड़ गई है। फौजी महेश्वर सिंह और उनकी पत्नी लक्ष्मी के दो बच्चे थे। एक बेटा और एक बेटी भगवान ने उनकी दोनों मनोकामना पूरी कर दी थी। दोनों बहुत खुश थे। जहाँ-जहाँ उनका तबादला होता था, वहाँ-वहाँ वे अपने परिवार के साथ रहते थे। दोनों बच्चे उच्च शिक्षा प्राप्त कर अपने-अपने काम में व्यस्थ हो गए थे। बेटा-बेटी दोनों अच्छी नौकरी करने लगे थे। महेश्वर सिंह ने बंगलुरु में ही एक फ्लैट ले लिया था। दोनों बच्चे वहीं कम्पनी में कार्यरत थे। इसी बीच उन्होंने अपनी बेटी सुमन की शादी कर दी। दामाद के साथ बेटी ससुराल चली गई। लक्ष्मी चाहती थी कि बेटे का भी ब्याह कर दे। बेटा मनोज ब्याह के लिए अभी राजी नहीं था। उसके कई दोस्तों की शादी हो गई थी। शादी के बाद वे सब खुश नहीं थे। अपने दोस्तों की बातों को सुनकर वह ब्याह के लिए मन नहीं बना पा रहा था। इसी बीच महेश्वर सिंह के रिटायरमेंट का समय आ गया। उन्होंने मनोज से कहा, तुम अपने मन से ब्याह करना चाहते हो कि हम तुम्हारे लिए लड़की देखें। मनोज ने कहा, आप लोग ही देखिए। पिता ने कहा, अगले वर्ष मैं रिटायर हो जाऊँगा। मैं चाहता हूँ कि रिटायरमेंट से पहले तुम्हारी भी शादी हो जाए। मनोज ने भी हामी भर दिया। मनोज के लिए कई रिश्ते आए। उनमें से एक रिश्ता सब लोगों को पसंद आ गया। मनोज का ब्याह बहुत धूम-धाम से हो गया। महेश्वर सिंह भी रिटायर हो गए। वे दोनों पति-पत्नी अपने बहु बेटे के साथ ही रहते थे। सब कुछ अच्छा चल रहा था। बहु के स्वभाव को देखकर सभी खुश थे। एक दिन अचानक महेश्वर सिंह चल बसे। उनके जाने के बाद लक्ष्मी बहुत उदास रहने लगी। महेश्वर सिंह के जाने के बाद पत्नी का घर में अकेले मन नहीं लग रहा था, लेकिन वह जाए तो कहाँ जाए। बेटी ससुराल चली गई थी। पहले से गाँव भी आना-जाना उनलोगों ने छोड़ दिया था। महेश्वर सिंह के माता-पिता स्वर्ग सिधार चूके थे। लक्ष्मी को कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था। बहुत सोचने समझने के बाद एक दिन लक्ष्मी अपने बेटे से बोली, मनोज तुम मुझे किसी वृधाश्रम में छोड़ दो। मेरा मन यहाँ नहीं लगता है। माँ की बात सुनकर मनोज बोला, माँ आपको पता है, आप क्या कह रही है? माँ ने कहा, हाँ बेटा मुझे पता है, मैं क्या कह रही हूँ? मनोज ने कहा, मुझे और आपकी बहु ममता को लोग क्या कहेंगे कि बाप के मरते ही बहु-बेटा माँ को वृधाश्रम में भेज दिया। असल में बहू और बेटा दोनों अपने काम से बाहर चले जाते थे। लक्ष्मी दिन भर अकेले घर में रहती थी। लक्ष्मी का सेहत दिन पर दिन गिरता जा रहा था। अपनी सास की सेहत को देखकर ममता भी बहुत दुखी और परेशान होने लगी थी। ममता ने मनोज से कहा, माँ जी ठिक कहती हैं। हम उन्हें वृद्धाश्रम में रख देते हैं। मनोज बोला, ममता हम कहीं भी मुँह दिखाने लायक नहीं रहेंगे। दुनियाँ मुझसे ज्यादा तुम्हें दोषी मानेगी; जबकि मुझे पता है कि तुम मुझसे भी अधिक माँ से प्यार करती हो। ममता बोली, मैं माँजी के लिए सब कुछ सहने और सुनने के लिए तैयार हूँ। दुनिया चाहे जो कहे, मैं माँ जी को खुश देखना चाहती हूँ। ऑफिस से आने के बाद ममता और मनोज दोनों माँ से बोले, माँ हमने आपके लिए वृद्धाश्रम वालों से बात कर लिया है। एक दिन हम आपको वहाँ दिखाने के लिए लेकर चलेंगे। अगर आपको वहाँ का माहौल पसंद आ जाएगा तो हम रहने के लिए बातें भी कर लेंगे। बहु की बात सुनकर लक्ष्मी खुश हो गई। आपको हम रविवार के दिन वहाँ लेकर चलेंगे। अब तो आप खुश हैं। लक्ष्मी बोली, हाँ बेटा! बात खुशी और दु:ख की नहीं है। मुझे यहाँ अकेले अच्छा नहीं लगता है। वहाँ कुछ लोगों के साथ रहूँगी तो मेरा मन लग जाएगा। ममता बोली, ठिक है माँ जी आप की खुशी में ही हमारी खुशी है। अगले दिन रविवार था। ममता अपने पति के साथ सास को लेकर वृद्धाश्रम ले जाने वाली थी। लक्ष्मी को वृद्धाश्रम दिखाने के लिए कल रविवार को जाना था। बेटा और बहु दोनों दिल से बहुत दु:खी थे। क्योंकि कल ही रविवार है। रविवार के सुबह की बात है। ममता और मनोज दोनों चाय लेकर माँ के कमरे में गए। माँ गहरी नींद में सो रही थी। टेबल पर चाय का प्याला रखकर बहु-बेटा दोनों लक्ष्मी के नजदीक जाकर बोले, माँ उठिए चाय पी लीजिये। आज हमें आपको वृद्धाश्रम लेकर जाना है। यह बोलते हुए ममता ने अपनी सास के शरीर को छूकर हिलाया। वह डर गई और जोर से चिल्लाते हुए बोली, मनोज देखो! माँ जी को कुछ हो गया है। वह हिल भी नहीं रही हैं। मनोज ने जैसे ही माँ को छुआ वह समझ गया। मनोज भी जोर से माँ, माँ चिल्लाया और बोला, ममता अब माँ नहीं रही। मनोज और ममता दोनों माँ को पकड़कर रोने लगे। मनोज और ममता को रोते सुनकर उनके कुछ पडोसी आ गए। पड़ोसियों को पता था कि मनोज की माँ वृद्धाश्रम जाने की जिद्द कर रही थी। आज वो वृद्धाश्रम जाने वाली थी। लेकिन उनका वृद्धाश्रम तो कहीं और था। कुछ दिनों के बाद ममता को पता चला कि वो माँ बनने वाली है। वह इस शुभ समाचार से खुश थी और दुखी भी। खुशी माँ बनने की थी और दुःख सास के स्वर्गवास होने की। वह यह सोचकर दुखी थी की मेरे बच्चे को दादा-दादी का प्यार नहीं मिलेगा। क्योंकि ममता के भी दादा-दादी नहीं थे। ममता भी दादा-दादी के प्यार के सुख को नहीं जान पाई थी। ममता माँ बनी, उसे सुन्दर बेटी हुई। मनोज और ममता दोनों अपनी बच्ची से बहुत प्यार करते थे। उसने अपनी बेटी का नाम बुलबुल रखा। ममता की सास ने कहा था, ममता अगर तुम्हें पहले बेटी हुई तो उसका नाम बुलबुल रखना। यह नाम दादी का दिया हुआ था।