भारतेंदु हरिश्चन्द्र समग्र परिचय

भारतेंदु जन्म- 9 सितंबर, 1850 ई. काशी

निधन- 6 जनवरी, 1885 ई. काशी

पिता- गोपालचंद्र (ये गिरिधरदास उपनाम से रचनाएँ लिखते थे।

 नाटक ‘नहुष’ (1843 ई.)

माता- मणि देवी (मन्नी देवी)

गुरु- राजा शिवप्रसाद ‘सितार-ए-हिंद’, इनसे इन्होंने अंग्रेजी की शिक्षा ग्रहण की।

पंडित ईश्वरदत्त से- हिंदी की शिक्षा ग्रहण की। 

मौलवी ताजअली से- उर्दू की शिक्षा ग्रहण की। उर्दू में ‘रसा’ उपनाम से ये रचनाएँ लिखते थे।

इनका मूलनाम- हरिश्चंद्र था।

प्रमुख तथ्य:

1. अंग्रेजों ने 1878 ई. में राजा शिवप्रसाद को ‘सितार-ए-हिंद’ की उपाधि प्रदान की।

2. इसके विरोध में उस समय के तत्कालीन साहित्यकार और पत्रकारों ने हरिश्चंद्र को 1880 ई. में ‘भारतेंदु’ की उपाधि दी थी।

3. इन्होंने 1870 ई. में ‘कविता संवर्धिनी सभा’ की स्थापना की।

4. 1873 ई. में ‘तदीय समाज’ की स्थापना की।

5. 1873 ई. में ‘पेनिंग रीडिंग क्लब’ की स्थापना की।

6. 1872 ई. में इन्होंने ‘चौखंभा स्कूल’ की स्थापना की जो बाद में ‘हरिश्चन्द्र डिग्री कॉलेज’ के रूप में स्थापित हुआ।

7. कविवचन सुधा- (1868 ई.) में पहले मासिक- पाक्षिक- सप्ताहिक (काशी/ बनारस)

8. हरिश्चंद्र मैगजीन- (1873 ई.), 1874 ई. के ‘नवम’ अंक से इसका नाम बदलकर ‘हरिश्चन्द्र चंद्रिका’ कर दिया गया।

9. बाला-बोधिनी- (1874 ई.) स्त्री शिक्षा के लिए पहली पत्रिका आरम्भ किया था। चार वर्षों तक प्रकाशित होने के बाद यह पत्रिका बंद हो गई।

10. नागरी प्रचारिणी सभा, काशी इनके रचनाओं की संख्या 175 मानता है।

11. डॉ. नगेंद्र इनकी रचनाओं की संख्या- 175 मानते हैं।

12. राधाकृष्ण इनकी रचनाओं की संख्या- 238 मानते हैं।

13. वर्तमान शोध के अनुसार इनकी रचनाओं की संख्या- 400 लगभग है। भारतेंदु हरिश्चन्द्र के कुल 17 नाटक हैं। इन नाटकों को

दो भागों में बाँटा गया है-

1. मौलिक नाटक और  2. अनुदित नाटक

भारतेंदु हरिश्चंद के मौलिक नाटकों की संख्या- 9 हैं-

1. वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति- 1873 ई. यह प्रहसन शैली का नाटक है। इसमें पशु बलि प्रथा पर व्यंग्य है।

2. सत्य हरिश्चन्द्र- 1875 ई. इस नाटक में असत्य पर सत्य की विजय का वर्णन है।

3. प्रेमजोगिनी- 1875 ई. यह लघु नाटिका है। इसमें तीर्थ स्थानों पर होने वाले दुराचार का चित्रण है।

4. ‘श्रीचंद्रवली’ नाटिका– 1876 ई. इस नाटक में प्रेम और भक्ति को चित्रित किया गया है।

5. विषस्य विषमौषधम- 1876 ई. यह भाण श्रेणी का नाटक है। इसमें देशी राजाओं के दुर्दशा का वर्णन है।

6. भारत-दुर्दशा- 1880 ई. यह नाट्य रासक है। इसमें अंग्रेजों के शासन में भारत की दयनीय स्थिति का वर्णन है। 

7. नीलदेवी- 1881 ई. यह गीति रूपक/ नाट्य रूपक है। इसमें पंजाब के हिंदू शासक पर मुसलमानों की चढ़ाई का वर्णन है।

8. अंधेर-नगरी- 1881 ई. यह प्रहसन श्रेणी का नाटक है। इसमें 6 दृश्य है। इस नाटक में भ्रष्ट शासन तंत्र पर व्यंग्य है।

9. सतीप्रताप- (यह नाटक अधूरा है) इस नाटक को बाद में राधाकृष्ण दास ने 1886 ई. में पूरा किया। राधाकृष्ण दास भारतेंदु हरिश्चन्द्र के ममेरा भाई थे।

भारतेंदु हरिश्चंद के अनुदित नाटकों की संख्या- 8 हैं-

1. विद्या सुन्दर (1868 ई.) यह नाटक संस्कृत के ‘चौर पंचाशिका’ नाटक के बांगला संस्करण  का हिंदी रूपांतरण है।  

2. रत्नावाली (1868 ई.) यह नाटक संस्कृत के ‘रत्नावली’ नाटक का हिंदी अनुवाद है।

3. पाखंड-विडंबना (1872 ई.) यह नाटक संस्कृत के रचनाकार कृष्ण मिश्र कवि द्वारा रचित ‘प्रबोध चंद्रोदय’ नाटक के तीसरे अंक का हिंदी अनुवाद है।

4. धनंजय विजय (1873 ई.) यह नाटक संस्कृत के कांचन कवि द्वारा रचित ‘धनंजय विजय’ का हिंदी अनुवाद है।

5. कर्पुर मंजरी (1875 ई.) यह सट्टक श्रेणी का नाटक है। संस्कृत के कांचन कवि द्वारा रचित ‘कर्पूर मंजरी’ का हिंदी रूपांतर है।

6. भारत जननी (1877 ई.) यह गीति नाट्य है। यह संस्कृत के ‘भारत जननी’ नाटक का हिंदी अनुवाद है।

7. मुद्राराक्षस (1878 ई.) यह नाटक संस्कृत के विशाखदत्त द्वारा रचित ‘मुद्राराक्षस’ का हिंदी अनुवाद है।

8. दुर्लभ बंधू (1880 ई.) यह नाटक शेक्सपियर के ‘मर्चेंट ऑफ वेनिश’ का हिंदी अनुवाद है।

भारतेंदु हरिश्चंद्र की काव्य रचनाएँ (सभी रचनाएँ ब्रजभाषा में)

1. भक्तसर्वस्व – 1870 ई.

2. प्रेममालिका – 1871 ई. यह भारतेंदु की प्रथम काव्य संकलन है। यह 33 कविताओं का संकलन है। यह प्रेम   यौवन सौंदर्य पर है। (महावीरप्रसाद द्विवेदी ने इसकी कटु निंदा की है)

3. विजय विल्लरी – 1871 ई.

4. प्रेम माधुरी – 1875 ई.

5. प्रेम-तरंग – 1877 ई.

6. प्रेम पलाप – 1877 ई.

7. विनय प्रेम पचास – 1880 ई.

8. वर्षा विनोद- 1880 ई.

9. वेणु गीति -1884 ई.

10. विजयिनी विजय वैजयंती- 1884 ई. (यह मिश्र में भारतीय सेना की विजय पर रचित भारतीय सेना के गुणगान के साथ-साथ अंग्रेजों पर भी व्यंग्य है।

11. प्रेम फुलवारी- निधन के बाद 1888 ई. में यह प्रकाशित हुआ था।

12. ‘दशरथ विलास’ और ‘फूलों का गुच्छ’ (ये दोनों खड़ीबोली में रचित रचनाएँ है)

13. उर्दू स्यापा

14. राग छद्म लीला

15. देवी छद्म लीला

16. रानी छद्म लीला

17. बंदर सभा

18. भारत भिक्षा

20. उत्तरार्द्ध भक्तमाल- 1876-77

21. रिपनाष्टक- यह लॉर्ड रिपन की प्रशंसा में लिखा गया।

22. मुँह दिखावनी

23. कार्तिक स्थान

24. वैशाख महात्म्य

25. बकरी विलाप

26. निवेदक पंचक

27. प्रेमाश्रु वर्णन

भारतेंदु हरिश्चन्द्र के प्रमुख निबंध:

1. कार्तिक कर्म विधि, माघ स्नान विधि, पाँचवा पैगम्बर, वैष्णव और भारतवर्ष- उपर्युक्त सभी धार्मिक निबंध हैं।

2. अथ अंगरेज स्त्रोत लिख्येत- व्यंग्यात्मक निबंध

3. स्वर्ग विचार सभा का अधिवेशन

4. उदय पुरोदय- यह निबंध और निबंध संग्रह दोनों है।

5. कालचक्र- यह निबंध और निबंध संग्रह दोनों है।

6. लीलावती- यह निबंध और निबंध संग्रह दोनों है।

7. बादशाह दर्पण- यह निबंध और निबंध संग्रह दोनों है।

8. सुलोचना- यह निबंध और निबंध संग्रह दोनों है।

9. ईश्वर बड़ा विलक्षण हैं

10. एक अद्भूत अपूर्व स्वप्न

11. लेवी प्राण लेवी, कंकड़ स्त्रोत

12. जाति विवेचनी सभा

13. सूर्योदय

14. भ्रूणहत्या

15. नाटक

16. रामायण का समय

17. मणिकर्णिका

18. संगीत सार

19. वैद्यनाथ की यात्रा

20. नाटकों का इतिहास

21. नाटक अथवा दृश्य काव्य।   

निबंध संग्रह:

1. काश्मीर कुसुम- 1878- ई. (इसमें 44 निबंध हैं)

2. बादशाह दर्पण- 1880- ई. (इसमें 76 निबंध हैं)

3. सबै जाती गोपाल की- 1876 ई. (इसमें 33 निबंध हैं) भारतेंदु हरिश्चन्द्र के समस्त निबंधों का संग्रह नागरी प्रचारिणी सभा, काशी से ‘हरिश्चंद्र कथा’ के नाम से 4 भागों में प्रकाशित हो चुका है। इसमें कुल निबंधों की संख्या- 187 हैं

‘भारतेंदु ग्रंथावली’ नाम से (तीन भाग में) डॉ. केशरी नारायण शुक्ल ने कुल 88 निबंध प्रकाशित किया है।  

आत्मकथा- ‘कुछ आप बीती कुछ जग बीती’ (अधूरी रचना)

भारतेंदु हरिश्चन्द्र के बारें में आलोचकों के कथन:

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के शब्दों में– “भारतेंदु हिंदी में ‘गद्य साहित्य’ के जन्मदाता है।”

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के शब्दों में- “भारतेंदु हरिश्चन्द्र हिंदी में ‘पुनर्जागरण के अग्रदूत’ है। जिन्होंने तीव्र व्यंग्य के माध्यम से भारतीयों को अपने प्राचीन गौरव व तत्कालीन दयनीय स्थिति से परिचित करवाया।”

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के शब्दों में– “रामचन्द्र शुक्ल ने इन्हें ‘नरप्रकृति’ का कवि कहा है।”

हजारीप्रसाद द्विवेदी के शब्दों में- “हिंदी में व्यंग्य के वास्तविक जन्मदाता भारतेंदु ही है।”

रामविलास शर्मा के शब्दों में- “भारतेंदु युग का साहित्य जनवादी इस अर्थ में है कि वह भारतीय समाज के पुराने ढाँचे से संतुष्ट न रहकर उसमें सुधार भी चाहता है।”

भारतेंदु हरिश्चन्द्र के महत्वपूर्ण तथ्य-

1. भारतेंदु हरिश्चंद्र ‘पुष्टिमार्ग’ में दीक्षित थे

2. शिवदान सिंह चौहान ने ‘भारतेंदु’ को हिंदी का प्रथम निबंधकार माना है

3. भारतेंदु हरिश्चंद्र ने शीतला प्रसाद त्रिपाठी द्वारा रचित  ‘जानकी मंगल’ में लक्षमण की भूमिका निभाई थी।  ‘जानकी मगल’ हिंदी का पहला अभिनीत नाटक है।

4. रामविलास शर्मा ने राजा शिवप्रसाद सितारे-ए-हिंद की भाषा को ‘टकसाली’ तथा भारतेंदु की भाषा को ‘लोकोपयोगी’ कहा है।

5. भारतेंदु ने अमीर खुसरो की तरह ‘पहेलिया’ और ‘मुकरियाँ’ भी लिखी।

6. भारतेंदु ने अपनी कृति में ‘भारत दुर्दशा’ में देशी राजाओं को रासभ (गधा) कहा है।

7. भारतेंदु के व्यक्तित्व में भक्तियुगीन चेतना, रीतीयुगीन श्रृंगारिकता एवं सामयिक यथार्थबोध का अद्भुत समन्वय है।

8. उर्दू में ‘इंदरसभा’ एक प्रकार का नाटक है, जिसके अनुकरण पर भारतेंदु ने ‘बंदरसभा’ की रचना की। इसमें नायक ‘बंदर’ और नायिका ‘शुतुरमुर्ग परी’ है।

9. ‘देवी छंद लीला’ भारतेंदु की कथा काव्य है। इसकी विशेषता है कि इसकी रचना पदों में होने पर भी इसकी कथा न कहीं खंडित हुई है और न ही एक पद की बात दूसरे पद में दोहराई गई है।

9. भारतेंदु कृत ‘दशरथ विलाप’ कविता खड़ी बोली में है।

10. भारतेंदु ने अपनी ‘प्रबोधिनी’ कविता में विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार की प्रत्यक्ष प्रेरणा दी है।

भारतेंदु हरिश्चन्द्र की महत्वपूर्ण पंक्तियाँ:

1.“भीतर-भीतर सबरस चूसै, हँसी-हँसी के तन-मन-धन मूसै। जाहिर बातन में अति तेज, क्यों सखी साजन नहीं अंग्रेज॥

2. “मेरे साधन एक ही है जग, नंदलाल वृषभानु दुलारी।”

3. “पिय प्यारे, तिहारे निहारे बिना, अँखियाँ दुखिया नहीं मानती हैं।”

4. “हिंदी नई चाल में ढाली।”

5. “पै धन विदेश चली जात यहै अति ख्वारी।”

6. “नव जल धार हर हीरक सो सोहत।” (इस पंक्ति में गंगा की महिमा का वर्णन है।)

जय हिंद

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