प्रतापनारायण मिश्र संपूर्ण परिचय

रचनाकार – प्रतापनारायण मिश्र (1856 – 1894 ई.)

जन्म – 1856 ई. बैजेगाँव, उन्नाव (म.प्र.)

निधन- 1894 ई. में हुआ।

पिता- संकटाप्रसाद मिश्र

प्रतापनारायण मिश्र जी के उपनाम-

1. आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी ने इन्हें ‘हिंदी का एडिसन’ कहा।

2. भारतेंदु जैसी रचना शैली, विषयवस्तु और भाषागत के कारण प्रतापनारायण मिश्र को ‘प्रति-भारतेंदु’ या ‘द्वितीय भारतेंदु’ भी कहा जाता था।

3. बारहमन (इस नाम से वे उर्दू में रचनाएँ लिखते थे)

विशेष तथ्य:

1. 1883 ई. से 1894 ई. तक इन्होंने ‘ब्राह्मण’ पत्रिका का संपादन किया।

2. प्रतापनारायण मिश्र ‘भारतेंदु मंडल’ के हास्य व्यंग्यकार कवि थे।

3. प्रतापनारायण मिश्र ‘ब्राह्मण’ पत्रिका के संपादक थे। जब ग्राहकों ने काफी समय तक पैसा नहीं दिए तब इन्होंने प्रति के प्रथम पेज पर छापी थी-

“आठ मास बीते जजमान। अब तो करौ दच्छिनादान॥”

4. 1889 ई. में ‘हिन्दोस्तान’ के सहायक संपादक बने।

5. 1891 ई. में इन्होंने कानपुर में ‘रसिक समाज’ की स्थापना की।

6. इन्होंने कानपुर की प्रथम नाट्य-संस्था ‘भारत मनोरंजनी- सभा’ की स्थापना 1885 ई. में की।

7. कानपुर में ही इन्होंने ‘गोरक्षणी-सभा और ‘सनातन-धर्म सभा’ की स्थापना की।  

8. ब्रिटिश हुकूमत काल में प्रतापनारायण मिश्र ने ‘हिंदी- हिंदू- हिन्दुस्तान’ का नारा दिया था।

9. मिश्र जी का साहित्यिक जीवन का प्रारंभ बड़ा ही दिलचस्प था। उन दिनों कानपुर लावनिबाजों का केंद्र था। प्रतापनारायण मिश्र को ‘लावनी’ अत्यंत प्रिय थी। लावनीबाजों के संपर्क में आकर इन्होंने लावनियाँ और ‘ख्याल’ लिखना शुरु किया। यहीं से इनके कवि और लेखक जीवन का प्रारंभ हुआ। 

10. प्रतापनारायण मिश्र को ‘आत्मव्यंजक’ तथा बालकृष्ण  भट्ट को ‘वस्तुव्यंजक’ निबंधकार माना जाता है।

11. ‘जनकीमंगल’ नाटक के मंचन में अभिनय हेतु इन्हें अपने पिता से मूँछ मुंडवाने की आज्ञा लेनी पड़ी थी। प्रतापनारायण मिश्र की काव्य रचनाएँ (मौलिक)

1. युवराजकुमार स्वागतन्ते (1881) राजकुमार विक्टर के भारत आगमन पर रचित यह स्वागत   गीत हैं।

2. ब्रैडला का स्वागत (1881) इंग्लैंड के प्रसिद्ध राजनीतिज्ञ चार्ल्स ब्रैडला के भारत आगमन पर रचित यह स्वागत गीत है। ‘फ्रेडरिक पिनकाट’ ने 1890 ई. में इसका अंग्रेजी में अनुवाद कर ‘इंडिया’ पत्र में प्रकाशन करवाया।

3. प्रेमपुष्पावाली (1883) यह प्रतापनारायण मिश्र की प्रथम काव्य रचना है। इसमें देशप्रेम से संबंधित 50 गीत हैं। इसका प्रकाशन ‘शुभचिंतक मंत्रालय, शाहजहांपुर’ से हुआ।

4. प्रार्थना शतक (1884) इस रचना में देवी-देवताओं एवं महापुरुषों की स्तुति से संबंधित 100 पद है।

5. मन की लहर (1885) यह 1885 ई. में भारतजीवन प्रेस, बनारस से प्रकाशित हुआ ईश्वर भक्ति एवं देश प्रेम से संबंधित इसमें 25 लावनी छंद है।

6. लोकोक्ति शतक (1885) यह रचना कहावतों पर आधारित सौ कविताओं का संकलन है। 1884 ई. में 61 कविताओं तक इसका प्रकाशन ‘ब्राह्मण’ पत्रिका में हुआ था। यह उपदेश प्रधान रचना है। परोपकार, सामाजिक कुरीतियों, अंग्रेजों के शोषण एवं देशभक्ति का चित्रण है। 

7. कानपुर महात्म्य (1885 ई.) ब्राह्मण प्रेस, कानपुर से प्रकाशित यह आल्हा छंद में रचित है। इसमें तीन सर्ग हैं, जिन्हें ‘ओहारी’ कहा गया है। इसकी भाषा अवधी है। इसमें देवी-देवताओं की स्तुति, कानपुर के आसपास के स्थानों, महापुरुषों का चित्रण हैं।

8. शोकाश्रु बिंदु (1885) मार्च, 1885 ई. में ‘ब्राह्मण’ पत्रिका में प्रकाशित यह शोकगीत है। यह गीत भारतेंदु हरिश्चन्द्र के निधन पर लिखा गया था। इसमें कूल 23 छंद हैं।  

9. तारापात पचीशी (1885) इस रचना में देवी-देवताओं की स्तुति एवं प्रकृति सौंदर्य से संबंधित 25 दोहे हैं।

10. प्रेम पुराण (1885) यह आख्यान काव्य है। इसमें दो अध्याय हैं। इस रचना में 8 चौपाइयों के बाद एक दोहा छंद रखा गया है। इसमें प्रेम की महिमा का चित्रण है।

11. दंगल खंड (1887) यह रचना आल्हा एवं कुंडलिनी छंदों में रचित है। व्यायाम के महत्त्व एवं कानपुर में हुए 1887 ई. के दंगल का चित्रण है।

12. तृप्यंताम् (1891) यह रचना धारावाहिक रूप में ‘ब्राह्मण’ पत्रिका में ऑक्टूबर, 1890 से फरवरी, 1891 ई. तक प्रकाशित हुआ था। पुस्तकाकार रूप में इसका प्रकाशन 1891 ई. में ‘खड्कविलास’ प्रेस, बाँकीपुर से हुआ। इसमें कूल 90 छंद हैं। इसमें देश की तत्कालीन दशा के प्रति क्षोभ भावना व्यक्त हुई है।  

13. फाल्गुन महातम्य (1891) यह होली के अवसर पर गाये जाने वाले कवित्तों का संकलन है।

14. होली है (1891) इसका प्रकाशन 1913 ई. में ‘माधुरी एंड कंपनी’ कानपुर से हुआ। इसमें होली से संबंधित 8 कविताएँ और एक निबंध है।

प्रतापनारायण मिश्र की अपूर्ण रचनाएँ-

1. श्रृंगार विलास 2. नूतन भक्तमाल 3. दीवाने बरहमन

प्रतापनारायण मिश्र की स्फुट कविताएँ

1. बेगारी विलाप (1883 ई.)

2. कसीदा (1883 ई.)

3. जन्म सुफल कब होय (1883 ई.)

4. भारत रोदन (1884 ई.)

5. गाना समझो चाहे रोना (1885 ई.)

6. कलियुग ककहरा (1885 ई.)

7. इतना दे करतार अधिक नहीं बोलना (1885 ई.)

8. प्रेम प्रमाद (1886 ई.)

9. पशु प्रार्थना (1887 ई.)

10. नवरात्र के पद (1887 ई.)

11. ककाराष्टक (1888 ई.)

12. महापर्व (1888 ई.)

13. नया सम्वत् (1890 ई.)

प्रतापनारायण मिश्र के ‘नाटक’

1. कलि कौतुक, (रूपक) 1885 ई. में यह भारतीय प्रेस, काशी से प्रकाशित हुआ था। यह सामाजिक रूपक है। इसमें नगरवासियों के वास्तविक चरित्र का चित्रण है। इसमें कुल 04 दृश्य है।

प्रमुख पात्र- इसमें कुल 15 पुरुष और 3 स्त्री पात्र हैं श्यामा (नायिका), चंपा, रसिक बिहारी, किशोरीदास, पदमचंद आदि हैं।

2. हठी हम्मीर (1886 ई.) यह ऐतिहासिक नाटक है। इसमें कुल अंक-06 और दृश्य-08 हैं। प्रमुख पात्र- मरहट्ठी बेगम (अलाउद्दीन की पत्नी), अलाउद्दीन, हम्मीर, मीर मुहम्मद आदि है।

3. कलि प्रवेश नीति (रूपक) इसके अभिनय की सूचना 1887 ई. के ब्राह्मण के अंक में मिलती है। वर्तमान में यह उपलब्ध नही है।

4. भारत दुर्दशा- रूपक (1885 ई.) इसका प्रकाशन 1902 ई. में ‘वेंकटेश्वर मंत्रालय’ मुंबई से हुआ था। इसमें भारत के दीनहीन स्थिति का चित्रण है। इसमें कुल अंक- 03 और दृश्य- 04 है। प्रमुख पात्र- भारत (नायक), कलियुग, चौपट सिंह, लाज, कुमत, रोगराज है।

5. संगीत शाकुंतल इसका प्रकाशन 1891 ई. में ‘खड्गविलास’ प्रेस, बाँकीपुर से हुआ था। यह कालिदास के ‘अभिज्ञान शाकुंतलम्’ का अनुवाद है। इसमें कुल अंक- 07 और कुल दृश्य- 19 है।

6. जुआरी-खुआरी (प्रहसन) इसका प्रथम अंक नवंबर, 1883 ई. में ‘ब्रह्मण’ पत्रिका में प्रकाशित हुआ था। यह रचना अपूर्ण है। प्रमुख पात्र- पचकौड़ीवाला, धनदास, कुबेरचंद, गप्पूमल।

7. दूध का दूध पानी का पानी (भाण) इस रचना के कुछ अंक 1883 ई. में ‘ब्राह्मण’ पत्रिका में प्रकाशित हुए थे। ये रचना भी अपूर्ण है। प्रमुख पात्र- ठाकुर विजय सिंह, बालकृष्ण, टेकचंद।

8. गो संकट- यह रचना उपलब्ध नहीं है। यह ब्राह्मण पत्रिका के दिसंबर, 1887 ई. के अंक में इसके अभिनय की सूचना मिली थी। नोट- ‘गो संकट’ अंबिकादत्त व्यास द्वारा रचित नाटक भी है।

प्रतापनारायण मिश्र के संकलित / संग्रह

1. रहिमन शतक-

इसका प्रकाशन फरवरी, 1881 ई. में ब्राह्मण पत्रिका में आरंभ हुआ था। इसमें रहीम के 101 दोहे संकलित हैं। कुछ दोहों का कुंडलिनी छंद में भाव-विस्तार किया गया है।

2. मानस विनोद-

प्रकाशन वर्ष- 1886 ई. है। इसमें रामचरितमानस के महत्वपूर्ण पदों का संकलन है।  

3. रसखान शतक-

प्रकाशन वर्ष- 1891 ई. है। इसमें रसखान के 72 पड़ संकलित हैं।

प्रतापनारायण मिश्र के निबंधों का कई भागों में वर्गीकरण किया जा सकता है-

  1. विचारात्मक निबंध
  2. भावात्मक  निबंध
  3. वर्णनात्मक निबंध
  4. हास्य-व्यंग्यपरक निबंध

विचारात्मक निबंध- प्रश्नोत्तर, उर्दू बीबी की पूँजी, हिम्मत राखो एक दिन, ईश्वर का वचन, मुनीनां मति च भ्रमः, नास्तिक, समझ की बलिहारी, बलि पर विश्वास, पौराणिक गूढ़ार्थ, अब बातों का काम नहीं,सोशियल कान्फ्रेस, पुलिस की निंदा क्यों की जाती है, झगड़ालू पंथ, रसिक समाज, नवपंथी और सनातनचारी, शिवालय, विश्वास।

भावात्मक निबंध- देशदशा, भारतेंदु, शोक प्रकाश, रक्ताश्रु, मस्ती, ममता, धोखा,द, ट, दयापात्र जीव, आप, त, भौं, दांत, पक्ष।

वर्णनात्मक- जरा अब तो आँखें खोलिए, भारत पर भगवान् की अधिक ममता है, देवमंदिरों के प्रति हमारा कर्तव्य, प्रहलाद चरित्र, वाजिद अलीशाह, गोरक्षा, गंगाजी, कचहरी के मालिक रामजी, दशावतार, भेड़ियाधसान, अपभ्रंश, एक सलाह।

हास्य–व्यंग्यपरक निबंध- प्रयत्न, मार मार कहै जाओ नामर्द तो खुदा ने ही बनाया है।

प्रतापनारायण मिश्र के निबंध संग्रह:

प्रतापनारायण मिश्र के निबंधों का संग्रह ‘प्रतापनारायण ग्रंथावली’ शीर्षक नाम से प्रकाशित है, इसमें 191 निबंध हैं। इसके तीन भाग है।

  1. निबंध नवनीत 2. प्रताप पीयूस 3. प्रताप समीक्षा

प्रतापनारायण मिश्र की अन्य रचनाएँ-

1. प्रताप चरित-

यह प्रतापनारायण मिश्र की ‘आत्मकथा’ है जो अपूर्ण है। इसके कुछ अंश 1885 ई. में ब्राह्मण पत्रिका में प्रकाशित हुए थे।

2. शैव सर्वस्व-

यह गद्य रचना है। इसमें शैवमत की विवेचना है। इसका प्रकाशन 1890 ई. में ‘खड्गविलास’ प्रेस बाँकीपुर से हुआ था।

3. नूतन भक्तमाल-

यह अपूर्ण रचना है। इसके कुछ अंश 1885 ई. में ‘ब्राह्मण’ पत्रिका में प्रकाशित हुए थे।

विशेष नोट-  भक्तमाल नाम से अन्य रचनाकारों के ग्रन्थ:

1. भक्तमाल- (1585) नाभादास

2. भक्तमाल- (1660) राघोदास

3. उत्तरार्द्ध भक्तमाल- (1877) भारतेंदु

4. नव भक्तमाल- राधाचरण गोस्वामी

5. नूतन भक्तमाल- प्रतापनारायण मिश्र

4. सुचाल शिक्षा-

यह गद्य रचना है। इसका प्रकाशन 1891 ई. में ‘खड्कविलास’ प्रेस, बाँकीपुर से हुआ था। इसमें नवयुवकों को चरित्र निर्माण की शिक्षा दी गई हैं।

विशेष तथ्य:

ये आधुनिक हिंदी निर्माताओं की वृहत् त्रयी में शामिल रचनाकार हैं। आधुनिक हिंदी निर्माताओं की वृहत् त्रयी में शामिल रचनाकार हैं-

1. भारतेंदु हरिश्चन्द्र 2. बालकृष्ण भट्ट 3. प्रतापनारायण मिश्र

प्रातापनारायण मिश्र की चर्चित पंक्तियाँ-

1. रटो निरंतर एक जबान। हिंदी हिंदू हिन्दुस्तान॥

2. कौन करेजो नहीं कसकत सुनि विपत्ति बाल विधवन की।

3. सब धन लिए जात अंगरेज। हम केवल लेक्चर के तेज॥

5.यह बयारी तब बदलेगी कछु पपीहा जब पूछिहै पीव कहाँ  (प्रसिद्ध समस्या पूर्ति)

प्रतापनारायण मिश्र के संबंध में आलोचकों के मत-

आचार्य रामचंद शुक्ल के शब्दों में- “पंडित प्रतापनारायण मिश्र और पंडित बालकृष्ण भट्ट ने हिदी गद्य साहित्य में वही किया है जो अंग्रेजी गद्य साहित्य में ‘एडिसन’ और ‘स्टील’ ने किया।”

रामचंद्र तिवारी के शब्दों में- “हिंदी साहित्य के इतिहास में निबंधकार मिस्र जी अपनी स्वच्छंदता, आत्म व्यंजकता, हास्य प्रियता, व्यग्यं-वक्रता, सजीवता, चपलता, लोकोन्मुखता, मुहावारेदानी, लोकोक्तियों एवं सूक्तियों की बहुलता के लिए स्मरण किये जाते हैं। इस क्षेत्र में उनके एक ही प्रतिद्वंदी बालकृष्ण भट्ट हैं।” 

रामविलास शर्मा के शब्दों में- “मनोरंजक निबंध रचना को प्रतापनारायण मिश्र ने चरम सीमा तक पहुँचा दिया। उनके निबंधों में मनोरंजन का बाहुल्य है और शैली में सामाजिक गद्य के गुण और दुर्गुण बहुमात्र में विद्यमान हैं।”

आचार्य विश्वनाथ मिश्र के शब्दों में- “अंग्रेजी राज्य में प्रजा हितैसी रूप पर जैसा व्यंग्य प्रतापनारायण मिश्र ने किया है, अन्यत्र दुर्लभ है।”

रामविलास शर्मा के शब्दों में- “पाठकों का मनोरंजन करना उनका ध्येय अवश्य है परंतु सामयिक समस्याओं के प्रति उन्हें सचेत करना भी वे नहीं भूले।”

जय हिंद

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