जन्म – 1844 ई. प्रयागराज में और निधन- 1914 ई. में हुआ।
पिता – बेणी प्रसाद और माता – पार्वती देवी थीं।
विशेष तथ्य-
- डॉ. लक्ष्मीसागर वार्ष्णेय ने इनको हिंदी का प्रथम निबंधकार माना है।
- नलिन विलोचन शर्मा ने इनको ‘हिंदी का मोनतेन’ कहा है।
- आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने इन्हें हिंदी का ‘प्रथम आलोचक’ माना है।
- इन्होंने हिंदी में ‘पुस्तकीय समीक्षा’ का श्री गणेश किया।
- ये हिंदी में ‘मनोविकारात्मक’ निबंधों के ‘जनक’ हैं।
- आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इनको ‘हिंदी का स्टील’ कहा है।
- इन्होंने 1876 ई. में प्रयाग में ‘हिंदी वर्द्धिनी सभा’ की स्थापना की।
- इन्होंने 1877 ई. में प्रयाग से ‘हिंदी प्रदीप’ (मासिक) पत्र का प्रकाशन एवं संपादन किया। इन्होंने जीवन पर्यंत ‘हिंदी प्रदीप’ का संपादन किया।
नोट- डॉ. बच्चन सिंह ‘हिंदी प्रदीप’ का प्रकाशन 1872 ई. से मानते है।
- इन्होंने ‘प्रेमपुंज’ पत्रिका का संपादन (1879-1881) इलाहबाद से किया।
- बालकृष्ण भट्ट का प्रथम निबंध ‘कलिराज की सभा’ है, जो ‘कविवचन सुधा’ में प्रकाशित हुआ था।
- डॉ. श्रीकृष्णलाल ने भी ‘बालकृष्ण भट्ट’ को हिंदी का प्रथम निबंधकार माना है।
- ये भारतेंदु मंडल के रचनाकारों में अवस्था के आधार पर सबसे वरिष्ठ रचनाकार थे।
- बालकृष्ण भट्ट ने 1881 ई. में ‘वेदों’ की तथा 1886 ई में ‘संयोगिता स्वयंवर’ की समीक्षा लिखी।
- हजारी प्रसाद द्विवेदी जी ने इनकी भाषा को तीखी व झनझना देनेवाली कहा है।
महत्वपूर्ण रचनाएँ- निबंध
1. शैली प्रधान निबंध- ‘हिंदी प्रदीप’ में प्रकाशित
1. ईश्वर भी ठठोल है (मार्च, 1893)
2. क्या करे हमारा बस न चला (मार्च, 1893)
3. देवताओं से हमारी बातचीत (ऑकटूबर, 1893)
4. खटका (मई, 1896)
5. नए तरह का जूनून (दिसंबर, 1896)
6. मेला ठेला (जुलाई, 1896)
7. नहीं (जुलाई, 1898)
8. चली सो चली (जनवरी, 1898)
9. होनहार (अप्रैल, 1899)
10. एक अनोखा स्वप्न (अप्रैल, 1899)
11. ‘जी’ (दिसंबर, 1900)
12. मंत्र कलाप (अप्रैल, 1901)
13. नई वस्तु की खोज (मई, 1901)
14. पत्नीस्तव (अप्रैल, 1903)
15. घुन (फरवरी, 1903)
16. लौ लगी रहे (सितंबर, 1903)
17. ढ़ोल के भीतर पोल (जनवरी, 1903) .
18. क्या होगा (अप्रैल, 1904)
19. विशाल वाटिका (नवंबर, 1905)
20. कालचक्र का चक्कर (नवंबर, 1905)
21. नाम में नई कल्पना (ऑकटूबर, 1905)
22. वधूस्तव (दिसंबर, 1905)
23. होता आया है (दिसंबर, 1905)
24. ‘द’ (दिसंबर, 1905), ‘द’ प्रतापनारायण मिश्र का भी निबंध है।
25. रोटी तो किसी भाँति कमा खाय मछंदर (दिसंबर, 1907)
2. मनोवैज्ञानिक निबंध (हिंदी प्रदीप में प्रकाशित)
1. मनोविज्ञान (जनवरी, 1880)
2. अभिलाषा (जनवरी 1884)
3. पसंद (मई, 1885)
4. आशा (जनवरी, 1886)
5. मन की दृढ़ता (दिसंबर, 1886)
6. धैर्य (जून, 1887)
7. मन और नेत्र (अप्रैल, 1890)
8. नासमझी (जून, 1893)
9. चरित्र पालन (ऑकटूबर,1894)
10. मन और प्राण (अगस्त, 1897)
11. सुख क्या है (अगस्त, 1896)
12. बोध मनोयोग और मुक्ति (अगस्त, 1896)
13. कौतुक (दिसंबर, 1896)
14. नई बातों की चाह लोगों में क्यों होती है (दिसंबर, 1896)
15. हमारे मन की मधुप वृत्ति (जून, 1896)
16. भक्ति (जुलाई, 1899)
17. महत्त्व (सितंबर, 1899)
18. मनुष्य की बाहरी आकृति मन की एक प्रतिकृति है (दिसंबर, 1899)
19. इंग्लिश पढ़े तो बाबू होय (दिसंबर, 1899)
20. सुख-दुःख का अलग विवेचन (दिसंबर, 1900)
21. लोकैषण (दिसंबर, 1900)
22. दृढ़ संकल्प या अध्यवसाय (दिसंबर, 1901)
23. ज्ञान और भक्ति (मार्च, 1903)
24. विश्वास (अप्रैल, 1904)
25. कर्तव्य परायणता (मई, 1904)
26. दृढ़ और पवित्र मन (मई, 1906)
27. मुक्ति और भक्ति (जून, 1907)
28. भक्ति की भावना (जून, 1907)
29. कौलीन्य (मार्च, 1908)
3. शास्त्रीय निबंध (हिंदी प्रदीप में प्रकाशित)
1. शब्दों की यातना (मार्च, 1877)
2. हिंदी (ऑकटूबर, 1877)
3. सभ्यता और साहित्य (मई, 1878)
4. साहित्य जन समूह के ह्रदय का विकास है (जनवरी, 1881)
5. हमारी भाषा क्या है (अप्रैल, 1882)
6. उपन्यास (जनवरी, 1882)
7. खड़ी और पड़ी बोली का विचार (दिसंबर, 1882)
8. संस्कृति की वर्तमान अवस्था (ऑकटूबर, 1884)
9. भाषा कैसी होनी चाहिए (जुलाई, 1885)
10. भारतवर्ष की जातीय भाषा (फरवरी,1886)
11. अनूठी उपमा (दिसंबर, 1886)
12. खड़ी बोली का पद्य (दिसंबर, 1888)
13. हिंदी का अपमान (अगस्त, 1888)
14. शब्द की आकर्षण शक्ति (अगस्त, 1888)
15. उपमा (अगस्त, 1889)
16. रसाभास (दिसंबर, 1889)
17. उपयुक्त विशेषण (जनवरी, 1892)
18. उपयुक्त उपमा (जनवरी, 1892)
19. उपयुक्त क्रिया (फरवरी, 1892)
20. वाक्यालंकार (ऑकटूबर, 1894)
21. शब्दों की बनावट (1900)
22. रूपक (अप्रैल, 1901)
23. पारसी थियेटर (दिसंबर, 1903)
24. हिंदी की वर्तमान दशा (अप्रैल, 1904)
25. हमारी मातृभाषा (जून, 1906)
26. प्रतिभा (ऑकटूबर, 1906)
27. गुण आगरी नागरी (नवंबर, 1907)
28. देशी भाषा और देशी अक्षर (अगस्त, 1908)
4. विषय प्रधान निबंध (‘हिंदी प्रदीप’ में प्रकाशित)
1. बाल्य विवाह (दिसंबर, 1880)
2. होली (मार्च, 1882)
3. स्त्रियाँ और उनकी शिक्षा (फरवरी, 1885)
4. जातपाँत (अप्रैल, 1886)
5. प्रकाश- (जून, 1888)
6. हमारी भारत ललनाएँ (जुलाई, 1891)
7. भारत की एकान्न भोजन की कुप्रथा (1891)
8. आधुनिक वैज्ञानिकों से प्राचीन आर्यों का सहमत (जून,1893)
9. माँस भक्षण (जून, 1894)
10. राजा (अगस्त, 1894)
11. हिंदू जाति का स्वाभाविक गुण (दिसंबर, 1894)
12. सुगृहिणी (अगस्त, 1895)
13. विजय लक्ष्मी (ऑकटूबर, 1897)
14. कृषि की कर्षित दशा (मार्च, 1897)
15. महिला स्वातंत्र्य (अगस्त, 1900)
16. मनुष्य तथा वनस्पतियों में समानता (जुलाई, 1901)
17. ग्राम्य जीवन (दिसंबर, 1901)
18. देश सेवा का महत्त्व (दिसंबर, 1903)
19. सूदखोरी (दिसंबर, 1904)
20. हिन्दुस्तान में तालीम का नफा नुक्सान (जुलाई, 1904)
21. हमारे नये सुशिक्षितों में परिवर्तन (दिसंबर, 1904)
22. हिन्दुस्तान के रईस (दिसंबर, 1904)
23. अंग्रेजी शिक्षा और प्रकाश (अप्रैल, 1906)
24. स्वतंत्र वाणिज्य (जुलाई, 1907)
25. शिक्षा का प्रकाश (जुलाई, 1907)
26. राजा और प्रजा (जनवरी, 1908)
27. हमारा दास्य भाव (जनवरी, 1908)
बालकृष्ण भट्ट जी के निबंध संग्रह–
1. भट्ट निबंधावली- (दो भाग), इसमें 64 निबंध हैं।
2. भट्ट निबंधमाला (दो भाग), इसमें 71 निबंध हैं।
3. साहित्य सुमन- इसमें 25 निबंध हैं।
बालकृष्ण भट्ट के महत्वपूर्ण उपन्यास-
बालकृष्ण भट्ट के पूर्ण उपन्यास–
‘नूतन ब्रह्मचारी’ और ‘सौ अजान एक सुजान’
1. नूतन ब्रह्मचारी (1886)
यह समाजिक उपन्यास है। यह बच्चों में चरित्र निर्माण के लिए लिखा गया है।
प्रमुख पात्र- विट्ठलराव, राधाबाई, विनायकराव
2. सौ अजान एक सुजान (1892)
यह समाजिक उपन्यास है। इसमें कुसंगति के परिणाम का चित्रण है।
प्रमुख पात्र- हीराचंद, रूपचंद, ऋद्धिनाथ, निधिनाथ, चंद्रशेखर, नंददास, बुद्धदास, बसंता, पंचानन।
बालकृष्ण भट्ट के अपूर्ण उपन्यास-
रहस्य कथा, गुप्त बैरी, रसातल यात्रा, उचित दक्षिणा, हमारी घड़ी, सद्भाव का अभाव
1. रहस्य कथा (अपूर्ण उपन्यास)
यह समाजिक उपन्यास है।
यह नवंबर, 1879 ई. में ‘हिंदी प्रदीप’ में प्रकाशित होना आरंभ हुआ था।
इसमें जमींदारों के जीवन और व्यापार का चित्रण है।
प्रमुख पात्र- सोहन सिंह, वृषभान सिंह, भानुसिंह, धनुषधारी, तिलकधारी, गुनवंती, केसरी सिंह।
2. गुप्त बैरी (अपूर्ण उपन्यास)
इसके कुछ अंश 1882 ई. में ‘हिंदी प्रदीप’ में प्रकाशित हुए थे।
इसमें गोसाइयों के पाखंड एवं धूर्तता का चित्रण हैं।
प्रमुख पात्र– शिवशरण सिंह, योगनाथ, नाहर सिंह, इरम्मदा।
बालकृष्ण भट्ट के प्रमुख नाटक
1. शिक्षादान या जैसा काम वैसा परिणाम- 1877 ई.
2. सीता वनवास- 1882 ई.
3. नयी रोशनी का विष- 1884 ई.
4. चंद्रसेन- 1884 ई.
5. पतित पंचम- 1888 ई.
6. नल-दमयंती या दमयंती स्वयंवर- 1897 ई.
7. आचार विडंबना- 1899 ई.
नोट- (पाखंड विडंबना- 1872 ई. भारतेंदु का है।) (विवाह विडंबना- 1900 ई. तोताराम का है।)
8. किरातार्जुनीय- 1899 ई.
9. शिशुपाल वध- 1903 ई.
10. वृहन्नला- 1907 ई.
11. कलिराज की सभा- 1907 ई.
12. रेल का विकट खेल- 1907 ई.
13. बाल विवाह- 1907 ई.
14. वेनुसंहार- 1909 ई.
महत्वपूर्ण नाटक: वर्ण्य विषय एवं पात्र
1. नल-दमयंती या दमयंती स्वयंवर- (1897 ई.) यह पौराणिक नाटक है। इसमें कुल- 10 अंक हैं। इस नाटक में सतीत्व की महिमा का चित्रण है।
प्रमुख पात्र- नल, दमयंती और कलीदेव हैं।
2. वेनुसंहार या पृथुचरित (1909 ई.)
यह पौराणिक नाटक है। इसमें अत्याचारी शासक वर्ग पर प्रहार है। इसमें ऋषियों के शाप से वेणु की मृत्यु का चित्रण है।
प्रमुख पात्र- वेणु, अंग, भृगु, अत्रि।
3. वृहन्नला (1907 ई.)
यह पौराणिक नाटक है। इस नाटक में वीरता के भावों का चित्रण है।
प्रमुख पात्र- वृहन्नला (अर्जुन), त्रिगर्तधिव, उत्तर, कर्ण, भीष्म।
4. चंद्रसेन- (1884 ई.)
यह ऐतिहासिक नाटक है। इसमें कुल 03 अंक हैं।
प्रमुख पात्र- चंद्रसेन, विजय वर्मा, मदन लतिका, इंद्रमणि, कलानाथ और अलाउद्दीन हैं।
5. किरातार्जुनीय- (1899 ई.)
यह पौराणिक नाटक है। इसमें अर्जुन एवं शिव के मध्य हुए युद्ध का वर्णन है।
प्रमुख पात्र- शिव, अर्जुन, भीम, द्रौपदी।
6. सीता वनवास- (1882 ई.)
यह पौराणिक नाटक है। इसमें कूल- 03 अंक है।
प्रमुख पात्र- राम, सीता, लव, कुश
7. अचार विडंबना- (1899 ई.), प्रहसन
इस नाटक में पाखंडी पंडितों पर प्रहार किया गया है।
प्रमुख पात्र- राम प्रपन्न मिश्र और माधवाचार्य
8. पतित पंचम- (1888 ई.), प्रहसन
इसमें राजा शिवप्रसाद और सैयद अहमद खां के कॉंग्रेस विरोध पर व्यंग्य है।
प्रमुख पात्र- कुतर्क वागीश भट्टाचार्य, मुहम्मद फाजिल, मुंशी माजरि।
9. नयी रोशनी का विष- (1884 ई.)
यह सामाजिक नाटक है। इसमें कुल अंक 05 हैं। इस नाटक में अंग्रेजी सभ्यता एवं शिक्षा-व्यवस्था पर प्रहार किया गया है।
प्रमुख पात्र- सत्यानंद, भानुदत्त, ताराचंद, प्रमदा, सरला।
बालकृष्ण भट्ट के संबंध में आलोचकों के मत–
आचर्य रामचन्द्र शुक्ल के शब्दों में- “पंडित प्रतापनारायण मिश्र और बालकृष्ण भट्ट ने हिंदी गद्य साहित्य में वही काम किया है जो अंग्रेजी गद्य साहित्य में ‘एडीसन’ व ‘स्टील’ ने किया।”
रामविलास शर्मा के शब्दों में- “उनकी वास्तविक प्रतिभा एक अध्ययनशील विद्वान और तीक्ष्ण बुद्धि आलोचक की है। उन्हें आधुनिक हिंदी समालोचना का जन्मदाता कहना अनुचित न होगा।”
रामविलास शर्मा के शब्दों में- “जहाँ तक भाषा शैली का प्रश्न है, भारतेंदु के समर्थ निबंधकार भट्ट जी की भाषा जन साधारण के व्यवहार की भाषा है। ठेठ बोलचाल के शब्द प्रयोग ज्यादा हैं। अंग्रेजी फ़ारसी तथा संस्कृत के शब्द भी उनके गद्य में आये हैं, व्यंग्य-विनोद की प्रचुरता है।”
डॉ. बच्चन सिंह के शब्दों में- “गद्य काव्य के आदि आचार्य वे ही हैं उनके चंद्रोदय निबंध से ही गद्य काव्य का समारंभ होता है।”
डॉ. बच्चन सिंह के शब्दों में- “उनके निबंधों में विषय वस्तु और शैली दोनों का वैविध्य मिलता है। वे एक ओर व्यंग्य विनोदपूर्ण निबंध लिखते थे तो दूसरी ओर विचार प्रधान मनोवैज्ञानिक निबंध।”
डॉ. बच्चन सिंह के शब्दों में- “उनकी भाषा पूर्वीपन से मुक्त नहीं है, मुहावरों का यथास्थान प्रयोग उनकी भाषा को अत्यंत सजीव और प्रसन्न बना देता है।”
जय हिंद