पहले हम राही कहानी के कुछ महत्वपूर्ण बिन्दुओं को देखते है:
- राही कहानी इन्हीं की कहानी संग्रह ‘सीधे-साधे चित्र’ (1947) में संगृहीत है⃓
- राही कहानी में सुभद्रा जी ने गरीबों के पीड़ा का वर्णन किया है।
- इस कहानी में उन्होंने भूख के लिए चोरी करने की मज़बूरी पर प्रकाश डाला है।
- इस कहानी में उन्होंने सत्याग्रहियों में शामिल सत्ता के लोलुप व्यक्तियों पर व्यंग्य किया है।
- उन्होंने इस कहानी में गरीबों के कष्ट निवारण को ही सच्ची देश भक्ति माना है।
- सुभद्रा जी के लिए मानवता ही सबसे बड़ा धर्म था।
कहानी के पात्र : इस कहानी में दो पात्र है (राही और अनीता) राही- एक गरीब औरत है, जिसे चोरी के जुर्म में कैद किया जाता है।
अनीता- एक अमीर घर कि महिला जो स्वतंत्रता संग्राम में क्रातिकारी गतिविधियों के कारण जेल गई है।
सुभद्रा कुमारी चौहान एक राष्ट्रीय चेतना की रचनाकार थी। इस कारण उन्होंने कई दफ़ा कारागारों में भी समय बिताया है। इस कहानी में उन्होंने अपने उसी समय के अनुभवों को लिखा है। भीख मांगने वाली माँगरोरी जाति से संबंध रखने वाली राही की कहानी है, जो भूख मिटाने के लिए चोरी के आरोप में हवालात जाती है। हवालात में राही अनीता नाम की सत्याग्रही के साथ बातें करती हुई अपनी विवशता बताती है। अनीता उसकी बात सुनकर चिंतित हो जाति है। राही जैसी गरीब और भोली-भाली जनता की सेवा करने और उसके दुःख को दूर करने में ही सच्ची देश भक्ति है। जेल में ही वह सपने में माँगरोरी जाति के लोगों की सेवा करती है। जिससे गाँव वालों का सुधार हो गया है। दूसरे दिन पिता के बिमारी के कारण अनीता को जेल से रिहा कर दिया जाता है। और उसका सपना साकार हो जाता है।
‘राही’ कहानी: ‘राही’ कहानी की शुरुआत दो पात्रों ‘राही’ और ‘अनीता’ के संवाद से शुरू होती है।
अनीता- तेरा नाम क्या है?
राही- राही
अनीता- तुझे किस अपराध में सजा हुई?
राही- चोरी की थी सरकार।
अनीता- चोरी? क्या चुराया था?
राही- नाज की गठरी।
अनीता- कितना नाज था?
राही- होगा पाँच छह सेर।
अनीता- और सजा कितने दिन की है?
राही- साल भर की।
अनीता- तो तूने चोरी क्यों की? मजदूरी करती तब भी दिन भर में तीन-चार आने पैसे मिल जाते।
राही- हमें मजदूरी नहीं मिलती सरकार। हमारी जाति माँगरोरी है। हम केवल मांगते-खाते है। और भीख न मिले तो? तो फिर चोरी करते है।
उस दिन घर में खाने को नहीं था। बच्चे भूख से तड़प रहे थे। बाजार में बहुत देर तक माँगा। बोझा ढ़ोने के लिए टोकरा लेकर भी बैठी रही। पर कुछ न मिला। सामने किसी का बच्चा रो रहा था। उसे देखकर मुझे अपने भूखे बच्चे की याद आ गई। वहीं पर किसी की अनाज की गठरी रखी हुई थी। उसे लेकर अभी भाग ही रही थी कि पुलिस ने पकड़ लिया।
अनीता- अनीता ने एक ठंडी साँस ली⃓ बोली- फिर तूने कहा नहीं कि बच्चे भूखे थे, इसलिए चोरी की। संभव है इस बात से मजिस्ट्रेट कम सजा देता।
राही- हम गरीबों की कोई नहीं सुनता ,सरकार! बच्चे आये थे। कचहरी में मैंने सब कुछ कहा, पर किसी ने नहीं सुना। राही ने कहा⃓
अनीता- “अब तेरे बच्चे किसके पास है? उसका बाप है?” अनीता ने पूछा⃓
राही की आंखों में आँसू आ गए⃓ वह बोली, “उसका बाप मर गया सरकार!” जेल में उसे मारा था। और वही अस्पताल में वह मर गया। अब बच्चों का कोई नहीं है।
तो तेरे बच्चों का बाप भी जेल में ही मरा। वह क्यों जेल आया था? अनीता ने प्रश्न किया⃓
राही- उसे तो बिना कसूर के ही पकड़ लिया था। सरकार, राही ने कहा- ताड़ी पीने को गया था। दो चार दोस्त उसके साथ थे। मेरे घरवाले का एक वक्त पुलिसवाले से साथ झगड़ा हो गया था। उसी का उसने बदला लिया। 109 में उसका चलान करके साल भर की सजा दिला दी⃓ वहीं मर गया।
अनीता ने एक दीर्घ निःश्वास के साथ कहा अच्छा जा, अपना काम कर⃓राही चली गई⃓
अनीता सत्याग्रह करके जेल में आई थी। पाहिले उसे ‘बी’ क्लास दिया गया था। फिर उसके घरवालों ने लिखा-पढ़ी करके उसे ‘ए’ क्लास में दिलवा दिया।
अनीता के सामने एक प्रश्न था? वह सोच रही थी, देश की दरिद्रता और इन निरीह गरीबों के कष्टों को दूर करने का कोई उपाय नहीं है? हम सभी पमात्मा की संतान हैं। एक ही देश के निवासी⃓ कम से कम हम सबको खाने-पहनने का सामान अधिकार तो है ही? फिर यह क्या बात है कि कुछ लोग तो बहुत आराम से रहते है और कुछ लोग पेट के अन्न के लिए चोरी करते हैं? उसके बाद विचारक के अदूरदर्शिता के कारण या सरकारी वकील के चातुर्यपूर्ण ज़िरह के कारण छोटे-छोटे बच्चों की माताएँ जेल भेज दी जाती हैं। उनके बच्चे भूखों मरने के लिए छोड़ दिए जाते हैं। एक ओर तो यह कैदी है, जो जेल आकर सचमुच जेल जीवन के कष्ट उठाती है, और दूसरी ओर हम लोग जो अपनी देशभक्ति का ढिंढोरा पिटते हुए जेल आते हैं। हमें आमतौर से दूसरे कैदियों के मुकाबले अच्छा वर्ताव किया जाता है, फिर भी हमें संतोष नहीं होता। हम जेल आकर ‘ए’ और ‘बी’ क्लास के लिए झगड़ते हैं। जेल आकर ही हम कौन सा बड़ा त्याग कर देते हैं? जेल में हमें कौन सा कष्ट रहता है? सिवा इसके कि हमारे माथे पर नेतृत्व का सील लग जाता है। हम बड़े अभिमान के साथ कहते हैं, यह हमारी चौथी जेल यात्रा है। यह हमारी पांचवी जेल यात्रा है। और अपनी जेल यात्रा के किस्से बार-बार सुना-सुनाकर आत्मगौरव अनुभव करते हैं; तात्पर्य यह है कि हम जितने बार जेल जा चुके होते है, उतनी ही सीढ़ी हम देशभक्ति और त्याग से दूसरों से ऊपर उठ जाते हैं। इसके बल पर जेल से छूटने के बाद, कॉग्रेस को राजकीय सत्ता मिलते ही, हम मिनिस्टर, स्थानीय संस्थाओं के मेंबर और क्या-क्या हो जाते हैं।
अनीता सोच रही थी- कल तक तो खद्दर भी नहीं पहनते थे, बात-बात पर काँग्रेस का मजाक उड़ाते थे, काँग्रेस के हाथों में थोड़ी शक्ति आते ही वे काँग्रेस भक्त बन गए। खद्दर पहनने लगे, यहाँ तक कि जेल में भी दिखाई पड़ने लगे। वास्तव में यह देश भक्ति है या सत्ताभक्ति!
अनीता के विचारों का ताँता लगा हुआ था⃓ वह दार्शनिक हो रही थी⃓ उसे अनुभव हुआ जैसे कोई भीतर-ही-भीतर उसे काट रहा हो⃓ अनीता की विचारावालि अनीता को ही खाए जा रही थी⃓ उसे बार-बार यह लग रहा था कि उसी देश्भाती सच्ची देश भक्ति नहीं वरण मजाक है⃓ उसे आत्मग्लानि हुई और साथ ही साथ आत्मानुभूति भी⃓
अनीता की आत्मा बोल उठी- वास्तव में सच्ची देश भक्ति तो इन गरीबों के कष्ट निवारण में है। ये कोई दूसरे नहीं हैं, हमारी ही भारत माता की संतानें है। इन हजारों लाखों भूखे-नंगे भाई-बहनों की यदि हम कुछ भी सेवा कर सके, थोड़ा भी कष्ट निवारण कर से तो सचमुच हमने अपने देश की सेवा की है। हमारा वास्तविक देश तो देहातों में ही है। किसानों की दुर्दशा से हम सभी थोड़े-बहुत परिचित हैं, पर इन गरीबों के पास न घर है न द्वार। अशिक्षा और अज्ञानता का इतना गहरा पर्दा इनकी आँखों पर है कि होश सँभालते ही माता पुत्री को और सास बहू को चोरी की शिक्षा देती है। और उनका यह विश्वास है कि चोरी करना और भीख मांगना ही उनका काम है। इससे अच्छा जीवन बिताने की वह कल्पना ही नहीं कर सकते। आज यहाँ डेरा डाले तो कल कहीं और चोरी की। बचे तो बचे, नहीं तो फिर साल दो साल के लिए जेल। क्या मानव जीवन का यही लक्ष्य है? लक्ष्य है भी अथवा नहीं? यदि नहीं है तो विचारादर्श की उच्च सतह पर टिके हुए हमारे जन-नायकों और युग-पुरुषों की हमें क्या आवश्यकता? इतिहास धर्म-दर्शन, ज्ञान-विज्ञान का कोई अर्थ नहीं होता? पर जीवन का लक्ष्य है, अवश्य है। संसार की मृग मरीचिका में हम लक्ष्य को भूल जाते हैं। सतह के ऊपर तक पहुँच पानेवाली कुछेक महान आत्माओं को छोड़कर सारा जन-समुदाय संसार में अपने को खोया हुआ पाता है, कर्तव्याकर्तव्य का उसे ध्यान नहीं, सत्यासत्य की समझ नहीं, अन्यथा मानवीयता से बढ़कर कौन-सा मानव धर्म है? पतित मानवता को जीवन-दान देने की अपेक्षा भी कोई महत्तर पूण्य है? राही जैसी कोई भोली-भाली किन्तु गुमराह आत्माओं के कल्याण की साधना जीवन की साधना होनी चाहिए। सत्याग्रही की यही प्रथम प्रतिज्ञा क्यों न हो? देशभक्ति का यही मापदंड क्यों न बने? अनीता दिन भर इन्हीं विचारों में डूबी रही। शाम को वह इसी प्रकार कुछ सोचते-सोचते सो गई।
रात में उसने सपना देखा कि जेल से छुटकर वह इन्हीं माँगरोरी लोगों के गाँव में पहुँच गई है। वहाँ उसने एक छोटा सा आश्रम खोल दिया है। उसी आश्रम में एक तरफ छोटे-छोटे बच्चे पढ़ते हैं और स्त्रियाँ सूत काटती हैं। दूसरी तरफ मर्द कपड़ा बुनते हैं और रुई धुनते हैं। शाम को रोज उन्हें धार्मिक पुस्तकें पढ़कर सुनाई जाती है और देश में कहाँ क्या हो रहा है, यह सब सरल भाषा में समझाया जाता है। वही भीख मांगने और चोरी करने वाले लोग अब आदर्श ग्रामवासी हो रहे हैं। रहने के लिए उन्होंने छोटे-छोटे अपना घर बना लिए हैं। राही के अनाथ बच्चों को अनीता अपने साथ रखने लगी है। अनीता यही सुख स्वप्न देख रही थी। रात में वह देर से सोई थी⃓ सुबह सात बजे तक उसकी नींद नहीं खुली। अचानक एक स्त्री जेलर ने उसे आकर जगा दिया और बोली- आप घरजाने के लिए तैयार हो जाइए⃓ आपके पिता बीमार हैं। आप बिना शर्त छोड़ी जा रही हैं। अनीता अपने स्वप्न को सच्चाई में परिवर्तित करने की एक मधुर कल्पना ले घर चली गई।
(समाप्त)
इस कहानी के माध्यम से सुभद्रा कुमारी चौहान यह सन्देश देती हैं कि गरीबों के कल्याण के बिना सत्याग्रहियों का देशभक्ति सत्ताभक्ति ही कहालाएगी। वास्तव में सच्ची देश भक्ति तो गरीबों के कष्ट निवारण में है। गुमराह लोगों को सही रास्ते पर लाने का प्रयास है। मानवीयता ही हमारा सबसे बड़ा धर्म है।
जय हिन्द