ब्रह्म बाबा (बुजुर्ग बरगद)

हमारे गाँव में सड़क के किनारे एक विशाल बरगद का पेड़ है। यह विशालकाय बरगद चारों तरफ से लगभग 2 एकड़ में फैला हुआ है। इसकी लम्बी-लम्बी सुन्दर जटाएं, उभरी हुई जड़ें और तने देखकर मन खुश हो जाता है। गाँव के सब लोग कहते हैं कि यह बरगद का पेड़ बहुत ही पुराना है। इतना पुराना है कि सभी कहते है कि हमने जब से होश सम्भाला है तब से इसे ऐसे ही देखा है। हमने अपने जितने बुजुर्गों से इसके बारे में पूछा और सुना है वे सब भी यही कहते हैं कि यह बहुत पुराना पेड़ है?

शादी के बाद मैं जब इस गाँव में आई थी तब मेरी उम्र लगभग सोलह वर्ष की थी। अब शादी के चलीस साल हो गये हैं और आज भी यह बुजुर्ग बरगद वैसा ही खड़ा है जैसा हमने चालीस वर्ष पहले देखा था। यह बरगद का पेड़ एकमा और मांझी के बीच ‘मांझी बरौली रोड’ पर   धर्मपुरा गाँव (सारण, बिहार) में सड़क के किनारे, गाँव की समृधि और खुशहाली के शुभचिंतक की भांति खड़ा है। इस बुजुर्ग बरगद के नीचे एक सरकारी स्कूल है। जिसमें आठवीं तक की पढ़ाई होती है। एक छोटी सी चाय की दुकान और एक पान का दुकान है जिसमे दुकान वाला बच्चों के खाने का समान जैसे चाकलेट, चटपटा, बिस्कुट आदि भी रखता है। पेड़ के नीचे एक सुन्दर ब्रह्म बाबा तथा शिवजी का मंदिर है। जिसके पास ही एक धर्मशाला है जहाँ साधुओं का जमावड़ा लगा रहता है। लोगों की चहल-पहल, आना-जाना, और उसकी घनी छाँव में बैठकर कुछ क्षण विश्राम करने वाले राहगीरों की हमेशा भीड़ लगी रहती है।

एक दिन की बात है कि हम सब वहाँ से गाड़ी पकड़ने के लिए उस बरगद के छाँव में खड़े थे। वही पर एक बुजुर्ग व्यक्ति भी बैठे हुए थे। मुझसे रहा नहीं गया मैं उनसे पूछ बैठी कि  बाबा आप इस बरगद के पेड़ को कब से देख रहें हैं। उन्होंने कहा बेटा मेरा उम्र अस्सी वर्ष हो गया है और मैं बचपन से आज तक इसको ज्यों का त्यों ही देख रहा हूँ। बाबा एक बात और बताइए ये पेड़ ऐसे झुका हुआ क्यों है? उन्होंने कहा बेटा! यह बरगद का पेड़ ऐसा नहीं था। यह तो इस क्षेत्र का सबसे ऊँचा पेड़ था। इसपर लोग चढ़ कर के मांझी के पुल को देख सकते थे जो यहाँ से लगभग 8 किलोमीटर दूर है। असल में बहुत पहले एक बार जोर से आँधी, तूफान और बारिस हुई थी। उसी तूफान में यह बरगद का पेड़ उखड़ कर गिर गया।  तूफ़ान के बाद पेड़ जैसे गिरा वैसे ही झुका हुआ रह गया। इस कारण अब इसकी ऊँचाई कम हो गई है। इस प्रकार हमने जिससे भी बात किया उन सबका एक ही जबाब था। पता नहीं मैं तो बचपन से ही इसे ऐसे ही देख रहा हूँ।

सड़क के इस पार यह बरगद का पेड़ और दूसरी तरफ एक बड़ा और गहरा पोखरा भी है जो पानी से हमेशा लबालब भरा रहता था। अब उसमे पानी नहीं है जिससे उसकी सुन्दरता नष्ट हो चुकी है। बदलते वक्त के साथ-साथ जलाशय सूखते जा रहे हैं। खेती में प्रयोग आने वाले पम्पसेट ने जमीन के अन्दर के पानी को शोख लिया है, जिसके कारण जमीन के अन्दर पानी का स्तर नीचे होता चला गया जिससे ये जलाशय सुख गये और इन जलाशयों का सौन्दर्य नष्ट हो गया। एक समय ऐसा भी था कि इस पोखरे में स्नान करने वालों की भीड़ लगी रहती थी। इसमें हाथी के भी तैरने लायक पानी होता था। कई बार पास के गाँव के पालतू हाथी को इसमें स्नान करते और तैरते हुए हमने देखा है। मोटर वाहनों के प्रचलन से कई दिनों की यात्रा घंटों में पूरी होने लगी है जिसके कारण कालान्तर में पथिकों को राह में विश्राम करने के सुख की आवश्यकता ही समाप्त हो गई है। इसके साथ ही उससे जुड़ी हुई कई बातें भी अब सिर्फ याद बनकर रह गई हैं। कार्तिक पूर्णिमा के समय यहाँ मेला लगता है जो 30-40 वर्ष पूर्व तक 4-5 दिनों तक चलता था। पैदल यात्री और बैलगाड़ियाँ कार्तिक पूर्णिमा के दो-तीन दिन पहले से ही गौतम स्थान मेला की यात्रा शुरू कर देते थे। बहुत दूर-दूर से आने वाले इन यात्रियों को विश्राम के लिए 10-15 किलोमीटर तक की इस यात्रा में, इतनी सुन्दर जगह अन्यत्र कहीं नहीं था। इसलिए यहाँ पूर्णिमा के तीन दिन पहले से लेकर दो दिन बाद तक बहुत भीड़ लगती थी। बरगद का यह फैला हुआ छायादार पेड़, इसके नीचे सुन्दर मन्दिर, पास में ही सरकारी विद्यालय और साफ तथा शीतल जल से भरा पोखरा, इस स्थान को रमणीय बना देता था। लम्बी पैदल यात्रा के दौरान लोगों के विश्राम और आस-पास के सम्बन्धियों को बुलाकर यहीं मिलने का आनन्द उन्हें तो सकुन देता ही था। ब्रह्म बाबा और इस मेले के सौन्दर्य में चार चाँद लगा देता था। दशहरा में दस दिनों तक चलने वाले दुर्गापूजा में लोग इसी पोखरा में स्नान करके बरगद के नीचे मन्दिर में पूजा करते थे। ये मेले तो अब भी यहाँ लगते हैं लेकिन पोखरा के सुख जाने और पैदल यात्रा के स्थान को मोटर वाहनों के ले लेने के कारण 4-5 दिनों का कार्तिक पूर्णिमा का मेला अब एक दो दिनों में सिमट गया है। चैती छठ और कार्तिक महिने के छठ पूजा में भी  यहाँ बहुत रौनक रहता है। पोखरे में स्नान कर के छठ घाट तक परवईतिनों की भीड़ और साथ में उल्लास से भरे पूरे परिवार के लोगों से भरा महौल देखते ही बनता है। इस ब्रह्म बाबा (बुजुर्ग बरगद) के स्थान की रमणीयता के महत्व को इस बात से भी समझा जा सकता है कि यहाँ कई भोजपुरी फिल्मों की सूटिंग भी की गई है।

इस बुजुर्ग बरगद बाबा ने अपनी छाँव में एक भरा-पूरा बड़ा परिवार ही नहीं मोहल्ला या कहें की एक गाँव ही बसा लिया है। इनकी डालियों पर कई पंक्षियों का बसेरा है। इस की छाया में विभिन्न प्रकार के जानवरों को आश्रय मिला है तो कई तरह के प्राणियों और कीड़े-मकोड़ों को पनाह भी मिला है। इतनी लंबी-चौड़ी जगह में शीतल छाँव को देखकर मनुष्य अपने-आपको रोक नहीं पाता है। बच्चों के लिए तो इसकी जटाएँ ‘टारजन’ बनने की प्रैक्टिस करने के लिए मजबूर कर देती है। बच्चे इसकी जटाओं को पकड़कर खूब झुला-झुलते है। इसकी जड़े उपर की तरफ ऐसे दिखती है जैसे लम्बी-लम्बी कुर्सियों का कतार हो। इसके अलावा इसकी छाँव में चौपालें लगती है, कुछ लोग तो दोपहर के समय में यहाँ रूककर झपकियाँ भी ले लेते है। लोगों और गाडियों का आना-जाना तो यहाँ चौबीसों घंटे लगा रहता है। हमारे बुजुर्ग बरगद दादाजी के इस   शानदार आंगन के छत्र-छाया में बैठकर लोग सुख-शांति का भरपूर आनन्द उठाते हैं। हमारे बुजुर्ग ददु का यह बड़ा आंगन कभी भी खाली नहीं रहता है। यहाँ के रौनक को देखकर बरगद भी खुश और हरा-भरा दिखता है।

जिस प्रकार हमारे जीवन में भोजन का महत्व होता है, ठीक उसी प्रकार हमारे जीवन में पेड़-पौधों का भी महत्व है। प्रकृति और मनुष्य का एक दूसरे के बीच घनिष्ट सम्बंध है। सभी प्राणी प्रकृति से ही उत्पन्न होते है, प्रकृति के तत्वों से ही हमारा भरण-पोषण होता है और हम फिर प्रकृति में ही विलीन हो जाते हैं। यह सत्य है कि प्रकृति के संरक्षण में मनुष्य का सबसे अधिक हाथ होता है लेकिन यह भी सत्य है कि प्रकृति को सबसे अधिक नुकसान मनुष्य ही पहुँचाता है और अपने साथ-साथ दूसरे जीवों के लिए भी खतरा पैदा करता है।   

बरगद का वृक्ष एक दीर्घजीवी विशाल वृक्ष है। हिन्दू परंपरा में इसे पूज्य माना जाता है। अलग-अलग देवों से अलग-अलग वृक्ष उत्पन्न हुए। ऐसा मानते हैं कि यक्षों के राजा मणिभद्र से वटवृक्ष उत्पन्न हुए थे। ज्येष्ठ महिना के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को ‘वट पूर्णिमा’ कहते हैं। इस दिन बरगद की पूजा की जाती है। ‘वट सावित्री’ के दिन महिलाएँ अपनी पति की लम्बी आयु के लिए वट वृक्ष की पूजा करती हैं। कहते है वट सावित्री के दिन वट वृक्ष में ब्रह्मा, विष्णु और महेश के अलावा ‘सावित्री’ और ‘यम’ का भी वास होता है। संयोग यह है कि ‘वट सावित्री’ के दिन ही ‘शनि’ भगवान का भी जन्म हुआ था। इसी दिन सावित्री ने यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण की रक्षा की थी। इस दिन वट वृक्ष की पूजा करने और इसकी जड़ में जल देने से पुण्य की प्राप्ति होती है और जीवन में आने वाला संकट दूर हो जाता है। बरगद का वृक्ष ‘त्रिमूर्ति’ का प्रतीक है। इसकी छाल में विष्णु भगवान, जड़ में ब्रह्मा जी और शाखाओं में शिव जी का वास माना जाता है। जिस प्रकार पीपल को विष्णु जी का प्रतीक माना जाता है उसी प्रकार बरगद को शिव जी का प्रतीक माना जाता है। यह प्रकृति के सृजन का प्रतीक है। इसलिए संतान के इच्छित लोग इसकी विशेष पूजा करते हैं। यह बहुत लम्बे समय तक जीवित रहता है। अतः इसे “अक्षयवट” भी कहा जाता है।

बरगद के पेड़ से जुड़ी इतिहास में कई घटनायें हैं जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। कहा जाता है कि जब सिकंदर भारत पर आक्रमण किया था तब सिकंदर की सात हजार सैनिकों की सेना थी। सेना को जब एक बार घनघोर बारिश से बचने की जरूरत पड़ी, तो पूरी की पूरी सेना एक बरगद के नीचे ही शरण ले ली थी। उन विदेशी सैनिकों को यह जानकर घोर आश्चर्य हुआ कि वे जहाँ खड़े हैं, वह कोई जंगल नहीं बल्कि एक ही पेड़ का घेरा है।

क्या आप जानते हैं कि देश का सबसे पुराना शेयर बाजार यानी ‘बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज’ भी ‘बरगद की छाँव’ में ही शुरू हुआ था? 1851 में मुंबई के शेयर दलाल एक बरगद के नीचे शेयरों का कारोबार करने लगे। जब सड़क बनाने के लिए वह बरगद काट दिया गया तो वे एक अन्य बरगद के नीचे अपना काम करने लगे। मुंबई के तेजी से होते ‘कांक्रीटीकरण’ के कारण उन्हें जल्द ही इस बरगद की छाँव से भी वंचित होना पड़ा। तब जाकर उन्होंने 1874 में दलाल स्ट्रीट में अपना भवन स्थापित किया, जो आधुनिक रूप में आज भी खड़ा है।

‘इंडोनेशिया’ में बरगद को वृक्ष साम्राज्य का बड़ा-बुजुर्ग माना जाता है। इन्हें बड़ी श्रद्धा से देखा जाता है। रास्ते में कोई बरगद दिख जाए तो वाहन सवार उसका अभिवादन करने के लिए हॉर्न बजाकर निकलते हैं! मानो ओटले पर बैठे किसी बुजुर्ग से आप कह रहे हों, ‘राम-राम दद्दू’। चीन में तो करीब हजार साल पहले फुझू नामक शहर के महापौर को बरगद इतना रास आ गया था कि उन्होंने नागरिकों को फरमान जारी कर दिया कि वे हर कहीं बरगद बोएँ!

तेलंगाना के महबूब नगर जिले के पिल्लियामरी में (कहते हैं कि) दुनिया का सबसे पुराना बरगद का पेड़ है। इस पेड़ में दीमक और कीड़े लग गये हैं इस पेड़ का आधा हिस्सा लगभग मर चुका है, कुछ भाग गिर भी गए हैं। पेड़ को बचाने के लिए कई प्रकार के प्रयास किए जा रहे हैं। यह पेड़ पर्यटकों के लिए आकर्षण का केन्द्र था। बरगद के इस पेड़ को देखने के लिए दूर-दूर से लोग आते थे। अभी 2 वर्षों से यहाँ पर्यटकों पर रोक लगा दिया गया है। इस पेड़ को जिंदा रखने के लिए इंजेक्शन लगाकर इसका उपचार किया जा रहा है। सलाइन ड्रिप चढ़ाई जा रही है। पेड़ की टहनियों से सैकड़ों बोतलें लटकाई गई हैं। ऐसा करने के पीछे वजह है कि पेड़ की जान बचाई जा सके।

हमारे गाँव के बरगद का पेड़ भी बहुत पुराना है, लेकिन अभी तक उस पेड़ में किसी भी प्रकार की कोई बीमारी वैगेरह नहीं लगा है। जबकि हमारे यहाँ गाँव में इस बुजुर्ग बरगद बाबा की कोई भी देख-रेख नहीं करता है। हाँ एक बात तो है यहाँ सालो भर भीड़ लगी रहती है। इस बरगद के नीचे कई प्रकार के पूजा-पाठ, अष्टजाम, शादी-व्याह, कार्तिक मेला, छठ पूजा आदि हमेशा कुछ न कुछ सांस्कृतिक कार्यक्रम होते रहते हैं जिसके फलस्वरूप हमारे बरगद दादा हमेशा खुश रहते हैं।

मुझे यहाँ हमारे देश के प्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉ जगदीश चंद्र बासु की याद आती है वे पहले वैज्ञानिक थे जिहोने रेडियो और सूक्ष्म तरंगों की प्रकाशिकी पर कार्य किया था। वनस्पति विज्ञान में भी उन्होंने कई खोजे किया था। डॉ बोस ने पौधों पर बदलते हुए मौसम से होने वाले असर का अध्ययन किया था। इसके साथ-साथ उन्होंने रासायनिक इन्हिबिटर्स (inhibitors ) का पौधों पर असर और बदलते हुए तापमान से होने वाले असर का भी अध्ययन किया था। अलग-अलग परिस्थितियों में सेल मेम्ब्रेन पोटेंशियल के बदलाव का विश्लेषण करके वे इस नतीजे पर पहुंचे थे कि पौधे संवेदनशील होते हैं वे “दर्द महसूस कर सकते हैं, स्नेह अनुभव कर सकते हैं इत्यादि”। मनुष्य की ही तरह पशु पक्षी और पेड़-पौधे संवेदनाओं को समझते हैं और उसपर प्रतिक्रिया भी करते हैं। यदि पेड़-पौधों के आसपास खुशनुमा वातावरण बनाकर रखी जाए तो उस संवेदनाओं के साथ उन पेड़-पौधों का भी संरक्षण और पोषण अच्छी तरह होता है। यदि बारीकी से देखी जाए तो पेड़ों को भी हँसता हुआ महसूस कर सकते हैं। बरगद के पेड़ में एक विशेष गुण होता है। उसकी डालियों से लटकने वाले जटाओं की तरह की आकृति वनस्पति विज्ञान की भाषा में जड़ का एक प्रकार होता है जिसे स्तम्भ जड़ (स्टेम रूट) कहा जाता है। यदि उसे किसी प्रकार की हानी न पहुंचे तो डालियों से लटकने वाला यह जटा, जमीन से लगकर स्तम्भ का काम करता है और आगे चलकर भारी डालियों के बोझ को सहारा देता है। यह भी सम्भव है कि वह स्तम्भ जड़ (स्टेम रूट) आगे चलकर एक स्वतंत्र पेड़ का रूप ले और मूल पेड़ से अलग हो जाने पर भी वह स्वतंत्र पेड़ के रूप में खड़ा रहे। आवश्यकता इस बात की है कि बरगद की इस छायादार वृक्ष को हम बाहरी नुकसान से बचाएँ और उसके आसपास खुशनुमा माहौल बनाये रखने की कोशिश करें तो बरगद अपने प्राकृतिक गुणों से ही सभी परिस्थियों में अपनी रक्षा स्वयं कर सकता है।

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