संत कबीर

माटी  का  एक  नाग  बनाके, पुजे  लोग लुगाई!

जिंदा नाग जब घर में निकले, ले लाठी धमकाई”!!

संत कबीर दास जी कवि और समाज-सुधारक थे। कबीर दास जी सिकंदर लोदी के समकालीन थे। ‘कबीर’ का अर्थ अरबी भाषा में ‘महान’ होता है। कबीर भारतीय हिन्दी साहित्य के भक्ति कालीन काव्य परम्परा के महानतम कवियों में से एक थे। धर्म, भाषा या संस्कृति किसी की भी चर्चा बिना कबीर के अधूरी है। कबीर पंथी, एक धार्मिक समुदाय है, जो कबीर के सिद्धांतों और शिक्षाओं को अपने जीवन शैली का आधार मानता है। काशी के इस अक्खड़, निडर एवं संत कवि का जन्म लहरतारा के पास सन् 1440 ई. में ज्येष्ठ पूर्णिमा को हुआ था। कबीर दास जी का पालन-पोषण जुलाहा परिवार में हुआ था। कबीर दास संत रामानन्द जी के शिष्य बने और अलख जगाने लगे। कबीर दास सधुक्करी भाषा में किसी भी सम्प्रदाय और रूढ़ियों की परवाह किये बिना खरी बात करते थे।

कबीर ने हिन्दू और मुसलमान समाज में व्याप्त सभी रुढ़िवादी तथा कट्टरपंथ का खुलकर विरोध किया। कबीर की वाणी एवं उनके मुखर उपदेश उनकी साखी, रमैनी बावन-अक्षरी, उलटवासी में देखे जा सकते हैं। गुरु ग्रंथ साहिब में उनके 200 पद्द और 250 सखियाँ हैं। काशी में प्रचलित मान्यता के अनुसार यहाँ जो भी मरता है, उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। कबीर दास जी रुढ़िवाद का विरोध करते थे और उन्हें इस तरह की रूढ़िवादिता मंजूर नहीं थी। इस कारण वे काशी छोड़कर मगहर चले गए। उनकी मान्यता थी कि ‘जो कविरहा काशी मुइहै रामे कौन निहोरा’ अर्थात यदि सिर्फ काशी में मरने मात्र से स्वर्ग मिलता हो तो जिन्दगी भर के राम भजन का क्या प्रयोजन रह जायेगा? अंत में सन् 1518 ई. के आस पास उन्होंने मगहर में ही देह त्याग दिया। आज भी मगहर में कबीर दास जी की समाधि है जिसे हिन्दू और मुसलमान दोनों ही पूजते हैं।

कबीर दास जी के दोहे सर्वाधिक प्रसिद्ध व लोकप्रिय हैं। उन्होंने अपने गुरु रामानंद के अंधविश्वास के भ्रम को भी दूर कर दिया था। एक दिन गुरु रामानंद जी ने कबीर से कहा- आज श्राद्ध का दिन है। मुझे अपने पिता जी के लिए खीर बनानी है। कबीर तुम जाकर दूध लेकर आओ। उस समय कबीरदास जी की उम्र नौ वर्ष थी। कबीर दूध का बर्तन लेकर दूध लाने चले गए। रास्ते में उन्होंने एक मरी गाय देखा। वे वहीं पर रुक कर कुछ सोचने लगे। दूध का बर्तन वहीँ पर रख कर कबीर गाय के पास थोड़ा घास लाकर डाल दिए और वहीं बैठे रहे। काफी देर तक जब कबीर नहीं लौटे तब गुरु रामानंद जी बहुत चिंतित होने लगे। पितरों को खिलाने का समय हो रहा था। गुरु रामानंद सोचने लगे- कबीर अभी तक क्यों नहीं आया? यह सोचकर गुरु रामानंद खुद दूध के लिए निकल पड़े। उन्होंने देखा कि कबीर एक मरी हुई गाय के पास दूध का बर्तन लेकर बैठा है। तभी गुरु रामानंद बोले कबीर तू दूध लाने नहीं गया? कबीर बोले स्वामी ये गाय पहले घास खायेगी तभी तो दूध देगी—-! कबीर की बातों को सुनकर गुरु रामानंद बोले अरे बेटा ये गाय तो मरी हुई है, ये घास कैसे खा सकती है? कबीर दास जी बोले गुरु जी ये गाय तो आज मरी है, जब आज मरी हुई गाय घास नहीं खा सकती है तो आपके सौ वर्ष पूर्व मरे हुए पितर खीर कैसे खा सकते हैं? कबीर की बात को सुनकर गुरु रामानंद मौन हो गए। उन्हें अपनी भूल का एहसास हुआ। अथार्त अपने जीवित माता-पिता की सेवा करना आवश्यक है। वही सच्ची सेवा और श्राद्ध है। कबीर के शब्दों में-

जिन्दा  बाप कोई न पुजे, मरे बाप पुजवाया।

मुट्ठी भर चावल ले के, कौंवे को बाप बनाया।।

कविरदास की दोहे और सखियों में उनके जिन्दगी के प्रति व्यवहारिक सोंच की स्पष्ट अभिव्यक्ति साफ दिखाई देती है। उन्होंने जहाँ हिन्दू धर्म में व्याप्त रूढ़ मान्यताओं का विरोध किया वहीं मुसलमानों द्वारा धर्म के नाम पर किए जा रहे अन्धविश्वास का भी खुल कर विरोध किया

पाहन पूजे हरी मिले तो मैं पूजूँ पहार

ताते वो चक्की भली पिस खाये संसार 

कांकड  पाथर  जोरि  के मस्जिद लई चुनाय ।

ता उपर मुल्ला बांग दे क्या बहरा हुआ खुदाय।।

उन्होंने धर्म के नाम पर समाज में फैले अन्धविश्वास को दूर करके मनुष्य और मानव धर्म को सबसे उपर और सबसे बड़ा बताया

हिन्दू  कहें  मोहि राम पियारा, तुर्क कहें रहमाना ।

आपस में दोउ लड़ी-लड़ी मुए, मरम न कोउ जाना ।। अर्थ : कबीर कहते हैं कि हिन्दू राम के भक्त हैं और तुर्क (मुस्लिम) को रहमान प्यारा है. इसी बात पर दोनों लड़-लड़ कर मौत के मुंह में जा पहुंचे, तब भी दोनों में से कोई सच को न जान पाया। सैकड़ो वर्ष पूर्व कबीर के दिए गये उपदेश से आज भी समाज को बहुत कुछ सिखने की जरुरत है।

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