लुप्त विराशत (भारत के प्राचीन विश्वविद्यालय)

वैदिक काल से ही भारतवर्ष में शिक्षा एवं शिक्षण को बहुत अधिक महत्व दिया गया है। मनुष्य के सर्वांगीन विकास के लिए शिक्षा अति आवश्यक है। भारतवर्ष में गुरु का महत्व माता-पिता से भी बढ़कर माना गया है- इसलिए भारत को विश्व गुरु का दर्जा भी दिया जाता है। जिस काल में विश्व के सभी देश अज्ञानता के अंधकार में थे उस समय भारत ज्ञानरुपी सागर में नहा रहा था। इसी महान देश में सबसे पहले विश्वविद्यालय की संकल्पना का उदय हुआ। भारत में प्राचीन काल से ही शिक्षा के कई केन्द्र खोले जाने लगे थे। वैदिक काल के बाद जैसे-जैसे समय आगे बढ़ता गया वैसे-वैसे भारत की शिक्षा पद्धति और भी अधिक फलती-फूलती गई। यह गुरुकुलों, आश्रमों और पाठशालाओं से शुरू होता हुआ विद्यालय और विश्वविद्यालय के रूप में बदलता गया। प्राचीन समय में भी पूरे भारतवर्ष में 13 बड़े-बड़े विश्वविद्यालयों की स्थापना हुई थी। 8वीं शताब्दी से लेकर 12वीं शताब्दी के मध्य भारत पूरे विश्व में शिक्षा का सबसे बड़ा और प्रसिद्ध केन्द्र था। यहाँ गणित, भूगोल, चिकित्सा विज्ञान, ज्योतिष विज्ञान के साथ-साथ अन्य विषयों को भी पढ़ाया जाता था।

आज के समय में अधिकतर लोग सिर्फ दो या तीन ही प्राचीन विश्वविद्यालयों के बारे में जानते है। ‘नालंदा विश्वविद्यालय’ और ‘तक्षशिला विश्वविद्यालय’। ये दोनों बहुत ही प्रसिद्ध थे। इसलिए लोग आज भी इसके बारे में जानते हैं लेकिन इसके अलवा भारतवर्ष में ग्यारह और भी विश्वविद्यालय थे जिनके विषय में अधिक जानकारी प्राप्त नहीं है। यहाँ उन्हीं विश्वविद्यालयों से जुड़ी हुई कुछ महत्वपूर्ण जानकारियों को एकत्रित करने का प्रयास किया है

  1. नालंदा विश्वविद्यालय – यह प्राचीन भारत का सबसे उच्च, महत्वपूर्ण और विश्वविख्यात शिक्षा का केन्द्र था। यह विश्वविद्यालय वर्तमान बिहार के पटना शहर से 88.5 किलोमीटर दक्षिणपूर्व और राजगीर से 11.5 किलोमीटर में स्थित था।
  2. तक्षशिला विश्वविद्यालय – तक्षशिला विश्वविद्यालय की स्थापना 2700 वर्ष पहले हुई थी। यह स्थान आधुनिक पाकिस्तान (जो भारत वर्ष का ही अंग था) में पड़ता है।
  3. विक्रमशिला विश्वविद्यालय – विक्रमशिला विश्वविद्यालय की स्थापना पाल वंश के राजा धर्मपाल ने करवाया था। यह विश्वविद्यालय बिहार के भागलपुर में था।
  4. वल्लभी विश्वविद्यालय – यह विश्वविद्यालय सौराष्ट्र (गुजरात) में स्थित था। 6वीं शताब्दी से लेकर 12वीं शताब्दी तक इसकी प्रसिद्धी अपनी चरम पर थी।
  5. उदांत पुरी विश्वविद्यालय – यह विश्वविद्यालय मगध अर्थात आज के बिहार में स्थापित था। इसकी भी स्थापना पालवंश के राजाओं ने करवाया था।
  6. सोमपुरा विश्वविद्यालय – इस विश्वविद्यालय की स्थापना भी पालवंश के राजाओं ने करवाया था। यह विश्वविद्यालय आज के बांग्लादेश के नवगांव जिले की बादलगाछी के पहाड़पुर में स्थित था। यह 8वीं शताब्दी से 12वीं शताब्दी के बीच में कार्यरत था।
  7. पुष्पगिरी विश्वविद्यालय – पुष्पगिरी विश्वविद्यालय वर्तमान भारत के उड़ीसा प्रान्त में स्थित था। इस विश्वविद्यालय की स्थापना तीसरी शताब्दी में कलिंग के राजाओं ने की थी।
  8. जगदला विश्वविद्यालय – यह पश्चिम बंगाल में था इसे भी पाल वंश के राजाओं ने ही बनवाया था।
  9. नागार्जुनकोंडा विश्वविद्यालय – यह आंध्रप्रदेश में था।
  10.  शारदा पीठ– यह विश्वविधालय कश्मीर में था।
  11.  कांचीपुरम विश्वविद्यालय – यह तमिलनाडु में था।
  12.  मणिखेत विश्वविद्यालय – यह कर्नाटक में था।
  13.  वाराणसी विश्वविद्यालय – उतर प्रदेश में ( 8वीं से आधुनिक काल तक )
  1. नालंदा विश्वविद्यालय

नालंदा विश्वविद्यालय बिहार की राजधानी पटना से करीब 120 किलोमीटर दक्षिण-उतर में राजगीर में स्थित था। बिहार के नालंदा जिले का यह विश्वविद्यालय दुनिया का सबसे प्राचीन विश्वविद्यालय था। इसकी स्थापना 450-470 ई० के बीच में हुई थी। संस्कृत में ‘नालंदा’ का अर्थ होता है ‘कमल का फूल’ कमल के फूल के डंठल को ज्ञान का प्रतीक माना जाता है अथार्त जहाँ ज्ञान प्रदान करने का अंत नहीं हो उसे ‘नालंदा’ कहते हैं।

जैन ग्रंथों के अनुसार– नालंदा राजगीर के उतर पश्चिम में एक उपनगर था। कहते हैं कि महावीर स्वामी नालंदा के निकट राजगीर में 14 वर्षों तक रहे थे। दिगम्बर जैन मत के अनुसार- नालंदा से केवल दो किलोमीटर दूर पर ही कुंडलपुर में भगवान महावीर स्वामी का जन्म हुआ था।

बौद्ध साहित्य के अनुसार– भगवान बुद्ध अक्सर यहाँ विश्वविद्यालय में आते-जाते रहते थे। इसकी स्थापना गुप्त वंश के शासक कुमारगुप्त ने करवाया था। गुप्त वंश के पतन के बाद भी आने वाले सभी शासक वंशों ने इसकी समृधि में अपना योगदान दिया। इसे महान शासक हर्षवर्धन और पाल शासकों का भी संरक्षण मिला। नालंदा विश्वविद्यालय को स्थानीय शासकों और भारत के कई दूसरे अन्य रियासतों के साथ ही विदेशी शासकों से भी अनुदान मिलता था। यह भारत की पहली आवासीय विश्वविद्यालय थी। उस समय इस विश्वविद्यालय में विधार्थियों की संख्या 10,000 और शिक्षकों की संख्या 2000 थी। ‘ह्वेनसांग’ जब सातवीं शताब्दी में यहाँ आया था उस समय 10,000 विधार्थी और 1510 आचार्य नालंदा विश्वविद्यालय में रहते थे। इस विश्वविद्यालय को 9वीं शताब्दी से 12वीं शताब्दी तक अंतर्राष्टीय ख्याति प्राप्त थी। उस समय भारत से ही नहीं बल्कि कई देशों जैसे- कोरिया, जापान, चीन, तिब्बत, इंडोनेशिया, तुर्की, फारस आदि देशों से भी विद्यार्थी यहाँ शिक्षा ग्रहण के लिए आते थे। इस विश्वविद्यालय के मठों का निर्माण प्राचीन कुषाण वास्तु शैली से हुआ था। यह विश्वविद्यालय स्थापत्य कला का बड़ा अद्भुत नमूना था। सम्राट अशोक और हषवर्धन ने यहाँ सबसे अधिक मठों, विहारों तथा मंदिरों का निर्माण करवाया था। यह विश्वविद्यालय बारहवीं शताब्दी तक सफलता पूर्वक संचालित रहा। तुर्कों के आक्रमण से तबाह होने के बाद दोबारा इस विश्वविद्यालय को पुनः स्थापित नहीं किया जा सका।

इस विश्वविद्यालय के आचार्य तीन श्रेणियों में थे। यहाँ के प्रसिद्ध आचार्यो में शीलभद्र, धर्मपाल, चंद्रपाल. गुणमति और स्थिरमति प्रमुख थे। ह्वेनसांग के समय इस विश्वविद्यालय के प्रमुख ‘शीलभद्र’ थे। प्रसिद्ध भारतीय गणितज्ञ ‘आर्यभट्ट’ भी इस विश्वविद्यालय के प्रमुख रहे थे। यहाँ प्रवेश के लिए कठिन परीक्षा देनी पड़ती थी। इसके लिए उन्हें तीन कठिन परीक्षा स्तरों से गुजरना पड़ता था। आचार्य छात्रों को मौखिक व्याख्यान द्वारा शिक्षा देते थे। शास्त्रार्थ होता रहता था। दिन के सभी पहर में शंका समाधान चलता रहता था। यहाँ महायान के प्रवर्तक ‘नागार्जुन’, ‘वसुबन्धु’, ‘असंग’ तथा ‘धर्मकीर्ति’ की रचनाओं का सविस्तार अध्यन होता था। वेद, वेदांत और सांख्यकी की भी यहाँ पढ़ाई होती थी। व्याकरण, दर्शन. शल्यविधा, ज्योतिष, योगशास्त्र तथा चिकित्साशास्त्र भी पाठ्यक्रम में शामिल था। यहाँ खगोलशास्त्र के अध्ययन के लिए एक विशेष विभाग था। नालंदा विश्वविद्यालय में सहस्त्रों विद्यार्थियों और आचार्यों के अध्ययन के लिए नौ ताल का एक विराट पुस्तकालय था। इस पुस्तकालय में तीन लाख से अधिक पुस्तकों का संग्रह था। इस पुस्तकालय में सभी विषयों से सम्बंधित पुस्तकें होती थी। यह पुस्तकालय तीन भवनों में स्थित था जिसके नाम इस प्रकार थे- ‘रत्नरंजक’, ‘रत्नोदधि’ और ‘रत्नसागर’। इस विश्वविद्यालय के इमारतों का निर्माण लाल पत्थर से किया गया था। इसका पूरा अहाता (क्षेत्र) बड़ी और ऊँची दीवारों से घिरा हुआ था। जिसमें आने-जाने के लिए एक मुख्य दरवाजा था। उत्तर से दक्षिण के तरफ मठों का कतार था और उन मठों के सामने ही अनेक बिहार और मंदिर थे। मंदिरों में भगवान की मूर्तियाँ थीं। विश्वविद्यालय के बीच में सात बड़े और 300 छोटे कमरे थे, जिनमें व्याख्यान हुआ करते थे। मठ एक से अधिक मंजिल के थे। हर मठ के आँगन में कुआं बना हुआ था। यहाँ 8 बड़ी इमारतें, 10 मंदिर, कई प्रार्थना सभा और अध्ययन कक्ष बना हुआ था। कक्ष में सोने के लिए पत्थर के चबूतरे बने हुए थे। दीपक और पुस्तक आदि रखने के लिए आले बने हुए थे। इसके अलावा कैम्पस में सुन्दर बाग-बगीचे तथा झीलें आदि भी थी। आज भी इस विश्वविद्यालय की हम दो मंजिला ईमारत को अपनी आँखों से देख सकते हैं। सम्पूर्ण विश्वविद्यालय के प्रबंधन का कार्य कुलपति या प्रमुख आचार्य के निगरानी में होता था। प्रमुख आचार्य भिक्षुओं द्वारा निर्वाचित होते थे। इसमें कुलपति, दो परामर्शदात्री समीतियों के परामर्श से प्रबंधन का सभी कार्य करते थे। पहली समिति शिक्षा तथा पाठ्यक्रम संबंधी कार्यो का देख-रेख करती थी और दूसरी समिति पुरे विश्वविद्यालय की आर्थिक और प्रशासनिक व्यवस्था की देख-भाल करती थी। इस विश्वविद्यालय को 200 गांव दान में मिले थे। इन्हीं दो सौ गांवों  से प्राप्त उपज और आय से सभी सहस्त्रों विद्यार्थियों के भोजन, कपड़े तथा रहने की व्यवस्था होती थी।

नालंदा की खुदाई में मिले अनेक काँसे की मूर्तियों के आधार पर कुछ विद्वानों का मत है कि शायद धातु की मूर्तियाँ बनाने के विज्ञान का अध्ययन भी यहाँ होता था। मुस्लिम इतिहासकार ‘मिनहाज’ और तिब्बती इतिहासकार ‘तारानाथ’ के वृतांतों से पता चलता है कि इस विश्वविद्यालय को तुर्कों के आक्रमणों से बहुत ही क्षति पहुंची थी। तारानाथ के अनुसार तीर्थंकरों  और भिक्षुओं के आपसी झगड़ों से भी विश्वविद्यालय की गरिमा को भारी नुकसान पहुँचा था।

2. तक्षशिला विश्वविद्यालय

तक्षशिला प्राचीन भारत में गांधार देश की राजधानी थी और शिक्षा का प्रमुख केन्द्र था। तक्षशिला वर्तमान पाकिस्तान के रावलपिंडी से 18 मील उतर की ओर स्थित था। गांधार की चर्चा वैसे तो ऋग्वेद में भी मिलती है किन्तु तक्षशिला के विषय में जानकारी सबसे पहले वाल्मीकि रामायण में मिलती है। कहा जाता है कि श्री राम के छोटे भाई भरत ने अपने नाना कैकेयराज अश्वपति के आमंत्रण पर उनकी ही सहायता से गन्धर्वो के देश गांधार को जीता था और अपने दोनों पुत्रों को वहाँ का शासक नियुक्त किया था। गंधर्व देश सिन्धु नदी के दोनों किनारे पर स्थित था। भरत के दोनों पुत्र ‘तक्ष’ और ‘पुष्पक’ ने तक्षशिला और पुष्करावती नामक अपनी-अपनी राजधानियाँ बसा लिया था। भरत के पुत्र ‘तक्ष’ ने तक्षशिला की स्थापना किया था।

महाभारत में तक्षशिला का वर्णन परीक्षित के पुत्र ‘जनमेजय’ द्वारा जीता हुआ नगरी के रूप में हुआ है। यहीं जन्मेजय ने सर्पयज्ञ करवाया था।

पाणिनी ने भी अपनी ‘अष्टध्यायी, काव्य में तक्षशिला का वर्णन किया है। यह ऐतिहासिक नगरी बौद्धकाल में अपनी आर्थिक गतिविधियों के लिए काफी प्रसिद्ध था। आज के समय में तक्षशिला पाकिस्तान के पंजाब प्रान्त के रावलपिंडी में है। पाकिस्तान पुरातत्व विभाग के अनुसार तक्षशिला का स्थान एशिया के बारह प्रमुख पुरातात्विक स्थलों में गिना जाता है।  

तक्षशिला विश्व का प्रथम विश्वविद्यालय था जिसकी स्थापना 700 ई० पूर्व में की गई थी। तक्षशिला विश्वविद्यालय में पुरे विश्व के 10,500 से अधिक छात्र अध्ययन करते थे। यहाँ 60 से भी अधिक विषयों की पढाई होती थी। 326 ई० पूर्व विदेशी आक्रमणकारी सिकंदर के  आक्रमण के समय यह संसार का सबसे प्रसिद्ध विश्वविद्यालय ही नहीं बल्कि उस समय में   चिकित्सा शास्त्र का एकमात्र केन्द्र भी था। 500 ई० पूर्व जब संसार में चिकित्सा शास्त्र की परम्परा भी नहीं थी तब तक्षशिला आर्युविज्ञान का सबसे बड़ा केन्द्र था। तक्षशिला विश्वविद्यालय का विकाश कई रूपों में हुआ था। यह विस्तृत भू-भाग पर फैला हुआ था। यहाँ के  महत्वपूर्ण पाठ्यक्रमों में- वेद-वेदांत, दर्शन, व्याकरण, अर्थशास्त्र, राजनीति, अष्टादश-विधाएं, युद्धविद्या, शस्त्र-संचालन, ज्योतिष, खगोल, गणित, चिकित्सा, ललितकला, हस्तविद्या, अश्व-विधा, मन्त्र-विधा, संगीत, नृत्य, चित्रकला, सर्प-विधा, योग-विधा, कृषि, भूविज्ञान, तंत्रशास्त्र आदि शामिल थे।

प्राचीन भारतीय साहित्य के अनुसार- संस्कृत साहित्य के सर्वश्रेष्ठ वैयाकरण पाणिनी गांधार स्थित शलातुर के निवासी थे। उन्होंने तक्षशिला में ही शिक्षा प्राप्त किया था। कौटिल्य (चाणक्य) वहीं से स्नातक और अध्यापक थे। उनके शिष्यों में सर्वाधिक प्रसिद्ध ‘चन्द्रगुप्त मौर्य’ हुए जिसने अपने गुरु के साथ मिलकर मौर्य साम्राज्य की स्थापना किया। ‘जीवक कौमारभच्च’ भारत के प्रसिद्ध अर्युवेदाचार्य थे। वे महात्मा बुद्ध के निजी वैध थे। चन्द्रगुप्त, कौशलराज आदि महापुरुषों ने इसी तक्षशिला विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त किया था। गौतम बुद्ध के समकालीन कुछ प्रसिद्ध व्यक्ति भी तक्षशिला विश्वविद्यालय के विधार्थी रह चुके थे जिनमे मुख्य थे- कोसलराज प्रसेनजित, मल्ल सरदार बंधुल एवं लिच्छवि महालि आदि। प्रमुख वैध ‘जीवक’ तथा लुटेरा ‘अंगुलिमाल’ भी इस विश्वविद्यालय के छात्र थे। इस विश्वविद्यालय के शिक्षक वेतन भोगी नहीं थे और न ही यहाँ कोई निर्दिष्ट पाठ्यक्रम था। शिष्यों की योग्यता और रूचि के अनुसार आचार्य उनके लिए अध्ययन का समय स्वयं निश्चित करते थे। चिकित्सा के क्षेत्र में कुछ पाठ्यक्रम सात वर्ष के थे तथा इसकी पढाई पूरी हो जाने के बाद प्रत्येक छात्र को छह महीनों का शोध कार्य करना आवश्यक होता था। इस शोध कार्य के लिए विधार्थी को किसी भी एक औषधि के जड़ी बूटी का पता लगाना पड़ता था तब उस विधार्थी को डिग्री मिलती थी।

अनेक शोधों से यह अनुमान लगाया गया था कि यहाँ बारह वर्ष तक अध्ययन करने के पश्चात् ही दीक्षा मिलती थी। 500 ई० पू० जब संसार में चिकित्साशास्त्र की परम्परा नहीं थी तब तक्षशिला में आर्युवेद विज्ञान का सबसे बड़ा केन्द्र था। जातक कथाओं एवं विदेशी पर्यटकों के कई लेखों से पता चलता है कि इस विश्वविद्यालय के स्नातक, मस्तिष्क के भीतर तथा अंतड़ियों का शल्य चिकित्सा (ऑपरेशान) बड़ी ही सुगमता से कर देते थे। अनेक असाध्य रोगों का उपचार सरल एवं सुलभ जड़ी-बूटियों से करते थे। इसके अतिरिक्त शिष्यों को अनेक दुर्लभ जड़ी-बूटियों का भी ज्ञान था। शिष्य आचार्य के साथ आश्रम में ही रहकर अध्ययन करते थे। एक आचार्य के पास अनेकों विधार्थी रहते थे। कई बार तो विधार्थियों की संख्या 100 से 500 तक भी हो जाती थी। क्रियात्मक कार्य को अधिक महत्व दिया जाता था। विधार्थियों को देशाटन के लिए भी ले जाया जाता था। तक्षशिला विश्वविद्यालय से स्नातक करना उस समय बहुत ही गौरव की बात होती थी। इस विश्वविद्यालय में अमीर तथा निर्धन दोनों तरह के छात्रों के अध्ययन की व्यवस्था थी। अमीर छात्र आचार्य के भोजन, निवास और अध्ययन का शुल्क देते थे और निर्धन छात्र अध्ययन करते हुए आश्रम के कार्य को करते थे। शिक्षा पूरी हो जाने के पश्चात् निर्धन छात्र शुल्क देने की प्रतिज्ञा करते थे।

प्राचीन तक्षशिला के खंडहरों को खोजने का प्रयत्न सबसे पहले जनरल कनिंघम ने शुरू किया था। किन्तु ठोस कार्य 1912 ई० के बाद ही भारतीय पुरातत्व विभाग की ओर से सर जॉन मार्शल के नेतृत्व में शुरू हुआ और अब कई स्थानों से उसके बिखरे हुए अवशेष खोद कर के निकाले गए हैं।     

3. विक्रमशिला विश्वविद्यालय

प्राचीन विक्रमशिला विश्वविद्यालय या महाविहार (ज्ञान का मंदिर) जो आज खंडहरों में परिवार्तित, गुमशुम, गुंगा, बेसहारा और बेजान खड़ा है। जिसे देखने के लिए दुनिया भर से हजारों लोग आते हैं। इस ज्ञान के मंदिर को छुकर इतिहास को याद कर महसूस करते हैं और अफसोस करते हुए चले जाते हैं।

विक्रमशिला विश्वविद्यालय के नामकरण के विषय में यह कहा जाता है कि ‘विक्रम का अर्थ – पराक्रम, वीरता, शक्तिशाली होता है तथा ‘शील’ का अर्थ चरित्र, सद्वृति, स्वभाव से सम्बंधित है। तात्पर्य यह है कि इस विश्वविद्यालय का नाम ‘विक्रमशिला’ इसलिए रखा गया कि यहाँ से जो भी विधार्थी, विद्या ग्रहण करके निकले वह बहुत ही ‘वीर’ और ‘दृढ़चरित्र’ वाला विद्वान बन कर निकले।

विक्रमशिला विश्वविद्यालय बिहार राज्य के भागलपुर जिले में स्थित था। इस विश्वविद्यालय की स्थापना पाल वंश के राजा धर्मपाल ने सन् 775 से 800 ई० के बीच में करवाया था। पाल वंश के राजा और शासक बौद्ध धर्म को मानते थे। पाल साम्राज्य मध्यकालीन भारत का एक महत्वपूर्ण साम्राज्य था जो सन् 750 से 1174 ई० तक चला। यह पूर्व मध्यकालीन राज्यवंश था। हर्षवर्धन के समय के बाद समस्त उतरी भारत में राजनितिक, सामाजिक और आर्थिक संकट उत्पन्न हो गया था और बिहार, बंगाल तथा उड़ीसा के सम्पूर्ण भाग में अराजकता फैला हुआ था। उसी समय बंगाल को एक स्वतंत्र राज्य घोषित कर दिया गया। जनता के द्वारा गोपाल जी को सिंहासन पर बैठा दिया गया था। गोपाल जी एक योग्य और कुशल शासक थे। उन्होंने 750 से 770 ई. तक शासन किया। इसी समय उन्होंने औदंतपुरी या उस समय का (बिहार शरीफ) में एक मठ और विश्वविद्यालय का निर्माण करवाया। पाल वंश बौद्ध धर्म को मानते थे। गोपाल को ही पाल वंश का संस्थापक माना जाता है। गोपाल के बाद उसका पुत्र धर्मपाल सिंहासन पर बैठा। धर्मपाल ने चालीस वर्षों तक शासन किया। धर्मपाल ने अपने शासनकाल में साम्राज्य का बहुत ही विस्तार किया। राजा धर्मपाल द्वारा बिहार में बहुत सारे मठों का निर्माण करवाया गया था। उसने प्रसिद्ध विश्वविद्यालय नालंदा और विक्रमशिला की भी स्थापना करवाया था। विक्रमशिला विश्वविद्यालय नालंदा के समकक्ष माना जाता है। बंगाल के पाल वंश नरेश धर्मपाल ने 8वीं शदी में इस प्रसिद्ध बौद्ध महाविद्यालय की नींव डाली थी। यह विश्वविद्यालय 100 एकड़ से भी अधिक भू-भाग पर फैला हुआ था। यहाँ पर लगभग 160 विहार थे। विश्वविद्यालय में लगभग सौ शिक्षकों के रहने की व्यवस्था थी। इस विश्वविद्यालय में अनेक विद्वानों जैसे- रक्षित, विरोचन, ज्ञानपद, बुद्ध, जेतारि, रत्नाकर, शान्ति, ज्ञानश्री, मित्र, रत्न, ब्रज, एवं अभ्यंकर के नाम प्रसिद्ध हैं। इन सभी विद्वानों की रचनाएँ बौद्ध साहित्य में महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं। इस विश्वविद्यालय में बौद्ध धर्म एवं दर्शन के अतिरिक्त न्याय, तत्व ज्ञान और व्याकरण का भी अध्ययन करवाया जाता था। इस विश्वविद्यालय में सबसे सुप्रसिद्ध विद्वान भिक्षु ‘दीपांकर श्रीज्ञान अतीश’ थे। जिन्होंने लगभग 200 ग्रंथों की रचना की थी। ये ओदंतपुरी विद्यालय के छात्र और विक्रमशिला विश्वविद्यालय के आचार्य थे। 11वीं शदी में तिब्बत के राजा के निमंत्रण पर वे तिब्बत गए थे। तिब्बत में बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार में इनका महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है। यहाँ पर विदेशों से अध्ययन के लिए छात्र आते थे। विक्रमशिला विश्वविद्यालय में तिब्बत के छात्रों की संख्या सर्वाधिक थी।

सिद्ध संप्रदाय के आचार्य सरहपाद इस महाविहार के कुलगुरु थे। यहाँ के प्रधान आचार्य को मुख्य ‘अधिष्ठाता’ कहा जाता था। विदेशों से आने वाले बौद्ध भिक्षु अपने अध्ययन काल से समय निकाल कर यहाँ की दुर्लभ व अच्छी-अच्छी पुस्तकों का अपनी-अपनी भाषा में अनुवाद करके अपने देश ले जाते थे। इस कार्य के लिए उन्हें अधिक से अधिक सुविधाएँ दी जाती थी। इस कार्य में यहाँ के विधार्थी और शिक्षकगण भी उनकी मदद करते थे। गोपाल द्वितीय के समय में यहाँ से प्राप्त की गई ‘प्रजापारमिता’ की पांडुलिपि अभी भी ब्रिटिश संग्रहालय में सुरक्षित है। तिब्बती पांडुलिपियों से यह जानकारी प्राप्त है कि विक्रमशिला महाविहार में बहुत बड़े-बड़े विद्वान आचार्य के पद पर थे। वे सभी आचार्य विद्वता के साथ-साथ अपनी लेखन कला में भी प्रवीन थे।

विक्रमशिला विश्वविधालय में शिक्षा का माध्यम संस्कृत भाषा थी। यह विश्वविधालय व्रज यान सम्प्रदाय से संबंधित साहित्य और तंत्रवाद के अध्ययन का सबसे बड़ा केन्द्र था। पाल शासकों के समय में बौद्ध धर्म के तहत तंत्रज्ञान (व्रजयान) का विकास हुआ। पाल सम्राटों ने उदंतपुरी (बिहार शरीफ), संधौन ( बेगूसराय), सोमपुर ( बांग्लादेश) और विक्रमशिला में तांत्रिकपीठ की स्थापना की थी। अनेक इतिहासकरों का विश्वास था कि विक्रमशिला सबसे बड़ा तांत्रिक केन्द्र था। विक्रमशिला में तंत्र की साधना के साथ नरबली की भी प्रथा थी। इतिहासकारों का मत है कि महाविहार में पढ़ाये जाने वाले तंत्र में सिद्धि के लिए छात्र उत्खनन-स्थल से 2 किलोमीटर दूर, शांत गंगा के किनारे बटेश्वर स्थान पर जाते थे। बटेश्वर स्थान आज भी सिद्ध-पीठ के नाम से विख्यात है।       

श्री मिश्र में अनुसार– नालंदा विश्वविधालय में एक द्वार का पता चलता है जबकि विक्रमशिला में छह द्वार थे। द्वार की संख्या छह होने का तात्पर्य है कि यहां पर छह विषयों की पढ़ाई होती थी। जिसमें ‘तंत्र विद्या’ को छोड़कर फिजिक्स, कमेस्ट्री, क्रिएटिव रिलिजन, कल्चर आदि विषय शामिल थे। विक्रमशिला विश्वविद्यालय में लगभग दस हजार विद्यार्थियों की पढाई होती थी और उनके लिए करीब एक हजार आचार्य पढ़ाने का काम करते थे। गौतम बुद्ध स्वयं यहाँ पर आए थे और यहीं से गंगा नदी पार कर के सहरसा की ओर गए थे। श्री मिश्र जी के अनुसार ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिलता है कि यहाँ नालंदा से कोई स्कॉलर आकर पढ़ाना शुरू किया था। एक बात है कि तिब्बत के राजा के अनुरोध पर दीपांकर अतीश तिब्बत गए और उन्होंने तिब्बत के बौद्ध भिक्षुओं को चीन, जापान, मलेशिया, थाईलैंड से लेकर अफगानिस्तान तक भेजकर बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार करवाया था। विक्रमशिला के विषय में सबसे पहले राहुल सांस्कृत्यायन ने इसके सुल्तानगंज के नजदीक होने का अंदेशा प्रकट किया था। इसका मुख्य कारण था कि अंग्रेजों के ज़माने में सुल्तानगंज के नजदीक एक गांव में बुद्ध की प्रतिमा मिली थी। इसके बावजूद भी अंग्रेजों ने विक्रमशिला के बारे में पता लगाने का प्रयास नहीं किया।

सन् 1202 ई० में जब मुसलमानों ने बिहार पर आक्रमण किया, तब नालंदा की तरह विक्रमशिला विश्वविद्यालय को भी पूर्णरूप से नष्ट कर दिया गया। बख्तियार खिलजी ने 1202-1203 ई० में विक्रमशिला महाविहार को नष्ट कर यहाँ के विशाल पुस्तकालय को आग लगा दिया था। हजारों की संख्या में बौद्ध भिक्षुओं की हत्या कर दिया था। तबाकत-ए-नासीरी में विक्रमशिला विश्वविद्यालय के विध्वंस का विस्तृत वर्णन है। लामा तारानाथ ने लिखा है कि तुर्क  आक्रमणकारियों ने इस महाविहार को सुनियोजित तरीके से नष्ट किया था। सम्पूर्ण महाविहार में आग लगा दी गई थी। मूर्तियों को टुकड़ों-टुकड़ों में तोड़ दिया गया था। तुर्क आक्रमणकारियों ने इस महाविहार को विध्वंस करके इसके नजदीक ही इसी महाविहार के ईंटों और पत्थरों से एक किले का निर्माण किया और उस किले में वे कुछ समय तक रुके रहे। विक्रमशिला के उत्खनन से प्राप्त भग्नावशेष को देखने से ज्ञात होता है कि इस ज्ञान के मंदिर को अत्यंत ही बर्बरतापूर्ण तरीकों से ध्वस्त किया गया होगा।

मुख्य स्तूप तथा संघाराम के मेहराबदार कमरे तथा मुख्य स्थल के बाहर के मंदिरों के विस्तृत खुदाई का श्रेय डा. वर्मा को जाता है। डा. वर्मा ने यहाँ 1972 से 1982 ई० तक विश्वविद्यालय स्थल में छुपे पुरातात्विक वस्तुओं का उत्खनन करवाया। जिसमे तिब्बती धर्मशाला के अवशेष मिले हैं।       

4. वल्लभी विश्वविद्यालय-

वल्लभीपुर भारत के प्राचीन नगरों में से था। यह 5वीं से 8वीं शताब्दी तक ‘मैत्रक वंश’ की राजधानी रहा। इसके संस्थापक सेनापति भट्टारक थे। वल्लभीपुर गुजरात में जैन धर्म के प्रमुख तीर्थ स्थलों में गिना जाता था। 770 ई० के पहले यह नगर भारत में बहुत ही प्रसिद्ध था। प्राचीन समय में यहाँ वल्लभी विश्वविद्यालय था। वल्लभी विश्वविद्यालय ज्ञान का महत्त्वपूर्ण केन्द्र था। यहाँ कई पाठशालाएँ और बौद्ध मठ भी थे। वल्लभी विश्वविद्यालय,  तक्षशिला विश्वविद्यालय तथा नालन्दा विश्वविद्यालय की परम्परा में ही विकसित हुआ था। वल्लभीपुर या वलभि से यहाँ के शासकों के उत्तरगुप्तकालीन अनेक अभिलेख प्राप्त हुए हैं। बुंदेलों के परम्परागत इतिहास से सूचित होता है कि वल्लभीपुर की स्थापना उनके पूर्वपुरुष कनकसेन ने की थी जो श्री रामचन्द्र के पुत्र ‘लव’ के वंशज थे। जैन अनुश्रुति के अनुसार जैन धर्म की तीसरी परिषद् वल्लभीपुर में हुई थी, जिसके अध्यक्ष देवर्धिगणि नामक आचार्य थे। इस परिषद् के द्वारा प्राचीन जैन आगमों का सम्पादन किया गया था। जो संग्रह सम्पादित हुआ उसकी अनेक प्रतियाँ बनाकर भारत के बड़े-बड़े नगरों में सुरक्षित कर दी गई थी। जैन ग्रन्थ ‘विविध तीर्थ कल्प’ के अनुसार वलभि गुजरात की परम वैभवशाली नगरी थी। वलभि नरेश शिलादित्य ने ‘रंकज नाम’ के एक धनी व्यापारी का बड़ा अपमान किया था। इसी अपमान का बदला लेने के लिए उसने अफगानिस्तान के अमीर को शिलादित्य के विरुद्ध भड़काकर आक्रमण करने के लिए निमंत्रित किया था। इसी युद्ध में शिलादित्य मारा गया। वल्लभी बौद्धधर्म के हीनयान शाखा का महत्वपूर्ण शिक्षा केन्द्र था। इस विश्वविधालय के संरक्षण के लिये ‘मैत्रक’ राजाओं ने बहुत अधिक धन व्यय किया था। 7वीं शताब्दी में वल्लभी नालंदा विश्वविधालय की तरह ही प्रसिद्ध और समृद्ध था। यहाँ 7वीं शदी के मध्य काल में चीनी यात्री ‘ह्वेनसांग’ और 7वीं शदी के अंत में ‘इत्सिंग’ आया था। जिन्होंने इसकी तुलना बिहार के नालंदा विश्वविधालय से किया। ‘ह्वेनसांग’ ने यहाँ के 100 विहारों और 6,000 भिक्षुओं का उल्लेख किया था। महात्मा बुद्ध ने भी इस जगह का भ्रमण किया था। इत्सिंग के अनुसार- वल्लभी विश्वविद्यालय की पहचान अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर थी। यहाँ विदेशों से भी छात्र अध्ययन के लिए आते थे। यहाँ एक विशाल पुस्तकालय था। जिसका अनुरक्षण राजकोष से किया जाता था। राजा गणेश के अभिलेख से इसकी पुष्टि होती है। नालंदा से आए हुए यहाँ दो प्रसिद्ध विद्वान ‘गुनमति’ और ‘स्थिरमति’ को इस विश्वविधालय का संस्थापक माना जाता है। इसीलिए वल्लभी विश्वविधालय की अधिकांश गतिविधियाँ नालंदा विश्वविधालय की परम्परा जैसी ही थी। गंगा की तलहटी से अनेक ब्राह्मण अपने पुत्रों को शिक्षा प्राप्त करने के लिए यहाँ भेजते थे। इतिहासवेता अल्तेकर महोदय ने भी अपने अध्ययन में वल्लभी विश्वविधालय को ‘देव संस्कृति का कीर्ति स्तम्भ’ कहा है। वल्लभी विश्वविधालय को यहाँ के अनेक राजाओं से दान  प्राप्त होता था। इस प्रकार वल्लभी विश्वविधालय की प्रसिद्धी 475 ई० से 1200 ई० तक रही। 12वीं शदी के अंत में जब मुसलमानों के आक्रमण होने लगे तब अन्य विश्वविधालयों की तरह वल्लभी विश्वाविधालय भी नष्ट होकर इतिहास के पन्नों में ही रह गया।

5. उदन्तपुरी विश्वविद्यालय / ओदंतपुरी विश्वविद्यालय

उदन्तपुरी विश्वविद्यालय भी नालंदा और विक्रमशिला विश्वविद्यालय की तरह विख्यात था। यह बिहार के नालंदा से 10 किलोमीटर की दुरी पर स्थित था। कहा जाता है कि पाल नरेश धर्मपाल ने यहाँ भव्य विहार का निर्माण करवाया था। तिब्बती परम्परा के अनुसार उदन्तपुरी विहार की रचना प्रथम पाल नरेश गोपाल ने करवाया था। धर्मपाल के ओदंतपुरी विहार की रचना की कथा देवपाल द्वारा बनवाया गया विहार की कथा से मिलता-जुलता है। संभवतः यही ओदंतपुरी विहार था। परन्तु उदन्तपुरी विश्वविद्यालय का उत्खनन का कार्य नहीं होने के कारण यह विश्वविद्यालय आज भी माँ धरती के गर्भ में दबा हुआ है। जिसके कारण बहुत ही कम लोग इस विश्वविद्यालय के इतिहास से परिचित हैं। अरब के लेखकों ने इसकी चर्चा ‘अदबंद’ नाम से किया है। ‘लामा तारानाथ’ ने इस उदंतपुरी को ‘ओडयंतपुरी महाविद्यालय’ कहा है। ऐसा भी कहा जाता था कि जिस समय नालंदा विश्वविद्यालय अपने पतन की ओर बढ़ रहा था, उसी समय इस विश्वविद्यालय की स्थापना की गई थी। इसकी स्थापना प्रथम पाल नरेश गोपाल ने 7वीं शताब्दी में करवाया था। खिलजी के आक्रमण और तिब्बती पांडुलिपियों से ज्ञात होता है कि इस महाविहार के संचालन का भार ‘भिक्षुसंघ’ के हाथ में था। किसी राजा के हाथ में नहीं था। उदंतपुरी की ख्याति नालंदा और विक्रमशिला से अधिक बढ़ गई थी। तिब्बती इतिहासकारों के अनुसार-ओदंतपुरी विश्वविधालय में 12,000 छात्र थे। यह विश्वविधालय वज्रयान संप्रदाय तथा तंत्र विधा, प्रतिभाशाली विद्वानों और प्रतिभाशाली विधार्थियों का केन्द्र था। विक्रमशिला के आचार्य श्री गंग इस विश्वविधालय के छात्र रह चुके थे। इस विश्वविधालय में ‘धर्मरक्षित’, ‘चन्द्रकीर्ति’ और ‘शिलरक्षित’ नाम के प्रसिद्ध विद्वान थे। यहाँ के भिक्षुओं द्वारा सबसे अधिक साहित्यिक कृतियों की रचना किया गया था। ओदंतपुरी के भिक्षुओं ने तिब्बत में बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण कार्य किया था। रचना की दृष्टि से यह विश्वविधालय इतना उत्कृष्ट था कि विदेशियों ने भी इसका अनुसरण किया। तिब्बत में 749 ई० में ‘अचिन्त्य विहार’ का निर्माण इसी ओदंतपुरी विश्वविधालय से प्रेरणा लेकर किया गया था। इस की बढ़ती ख्याति के कारण सन् 1197 ई० में मुहम्‍मद बिन बख़्तियार ख़िलजी का ध्‍यान इस महाविहार की ओर गया और उसने सर्वप्रथम इसी को अपने आक्रमण का पहला निशाना बनाया। उसने इस विश्‍वविद्यालय को चारों ओर से घेर लिया, जिससे भिक्षुगण काफ़ी क्षुब्‍ध हुए और कोई उपाय न देखकर वे स्‍वयं ही संघर्ष के लिए आगे आ गए, जिसमें अधिकांश तो मौत के घाट उतार दिए गए, तो कुछ ‘भिक्षु’ बंगाल तथा उड़ीसा की ओर भाग गए। अंत में बख्तियार खीलजी ने इस विहार में आग लगवा दिया। इस तरह विद्या का यह मंदिर सदा-सदा के लिए समाप्‍त हो गया।

6. सोमपुरा विश्वविद्यालय

सोमपुरा विश्वविद्यालय की स्थापना भी पाल वंश के राजाओं ने ही किया था। इसे ‘सोमपुरा महाविहार’ के नाम से भी जाता था। यह विश्वविद्यालय वर्तमान बांग्लादेश के नवगांव जिले में स्थित था। इसे 1985 ई० में यूनेस्को विश्व विरासत स्थल का दर्जा मिल चुका था। सोमपुरा महाविहार, नालंदा विश्वविधालय की परम्परा पर आधारित था। दोनों विश्वविद्यालय के स्थापत्य में भी समानता थी। 8वीं शताब्दी से 12वीं शताब्दी के बीच 400 साल तक यह विश्वविद्यालय बहुत प्रसिद्ध था। यह भव्य विश्वविद्यालय लगभग 27 एकड़ में फैला था। उस समय पूरे विश्व में बौद्ध धर्म की शिक्षा प्रदान करने वाला यह सबसे विशाल शिक्षा केंद्र था। प्राचीन “सोमपुरा बौद्ध विश्वविद्यालय” छठे नंबर का था। तिब्बती सूत्रों के अनुसार- “सोमपुरा बौद्ध विश्वविद्यालय” धर्माकयाविधिंद (Buddha moral values)- मध्यमका (Mass communication )- रत्नाप्रदिपा (wisdom) तर्क (Logic), कानून (law), इंजीनियरिंग (Engineering), चिकित्सा विज्ञान (medical sciences) इन विषयों में प्रभुत्व था । ‘तारानाथ’ के बौद्ध इतिहास के रचनाओं में “पग-सैम-जॉन झांग” का तिब्बती अनुवाद साहित्य के रचना का स्रोत “सोमपुरा बौद्ध विश्विद्याल” था। इस विश्वविद्यालय में बौद्ध शिक्षा के निति मुल्यों के आधार पर मानवजातिका के विकास के साथ विद्यामुल्क विज्ञान के विषय नि:शुल्क पढाये जाते थे। लगभग 8,500 छात्रों के लिये सभी प्रकार की सुविधाएँ उपलब्ध थी। बौद्धकालीन युग में प्रमुख बौद्ध विश्वविद्यालय के साथ सोमपुरा बौद्ध विश्वविद्यालय का पाल राजाओं द्वारा नेटवर्क का गठन किया गया था। ताकि राज्य पर्यवेक्षण के अंतर्गत ‘सोमपुरा बौद्ध विश्वविद्यालय” को सभी सुविधाएँ प्राप्त हो सके और समन्वय के प्रणाली के अंतर्गत इसको “अस्तित्व में” लाया जा सके। इसका श्रेय पाल राजाओं को दिया जाता है। सभी प्राचीन बौद्ध विश्वविद्यालय आपस में संस्थाओं का समूह था, यह इसलिए की सभी राज्यों में समन्वय स्थापित हो सके। एक प्रकार से “International relations” नेटवर्क स्थापित करने का श्रेय प्राचीन बौद्ध विश्वविद्यालय को दिया जाता है।

7. पुष्पगिरि विश्वविद्यालय

पुष्पगिरी विश्वविद्यालय वर्तमान भारत के उड़ीसा राज्य के कटक के पास जाजपुर जिला में स्थित था। चीनी यात्री ‘ह्वेनसांग’ ने 639 ई० ने इस विश्वविधालय को देखा और इसे पुष्पगिरि महाविहार के नाम से वर्णित किया था। मध्यकाल के तिब्बती लेखों में भी इसका उल्लेख मिलता है। नागार्जुनकोंडा के अभिलेख में भी इस महाबिहार का उल्लेख है। इसकी स्थापना 3री शताब्दी में कलिंग राजाओं ने करवाया था। 800 साल तक यानी 11वीं शताब्दी तक इस विश्वविद्यालय का विकास अपने चरम पर था। इस विश्वविद्यालय का परिसर तीन पहाड़ों ‘ललित गिरि’ ‘रत्न गिरि’ और ‘उदयगिरि’ पर फैला हुआ था। इन तीन पहाडियों के उत्खनन से बने पेगोडा के अवशेष, नक्काशीदार पत्थर के प्रवेश द्वार तथा रहस्यमयी बौद्ध प्रतिमाएँ मिली है। इन पहाड़ियों में सबसे महत्वपूर्ण रत्नागिरी है, जिसे तत्कालीन समय का उल्लेखनीय बौद्ध केन्द्र माना गया है। रत्नागिरी पहाड़ी कलुआ नदी के तट पर स्थित है। यहाँ पर किये गये उत्खनन में तीन मठ, आठ मंदिर, और कई स्तूप मिले हैं जो अधिकांश गुप्त काल की है।   

8. जगदला विश्वविद्यालय

कई वर्षों तक जगदला महाविहार के मूल स्थान का पता नहीं लगाया जा सका था। सबसे पहले ए.के.एम. जकारिया ने पांच संभावित स्थानों का निरीक्षण किया था जो जगदल या उसके मिलते-जुलते नाम से प्रसिद्ध जगह थे। इन पाचों स्थान में से ऐतिहासिक महत्व प्राचीन खंडहर केवल नौगांव जिले में मिले थे। यह स्थान पहाड़पुर के नजदीक वर्तमान बांग्लादेश में स्थित था। पिछले एक दशक में यूनेस्को के तत्वावधान में किये गये उत्खनन से यह सिद्ध हो गया था कि इस स्थान पर एक महाबौद्धविहार स्थापित था।

पाल वंश के शासन काल में चार शताब्दियों के दौरान उत्तर-पूर्वी भारत में प्राचीन बंगाल से लेकर मगध के बीच बड़ी संख्या में मठ या विहार स्थापित किए गए थे। कहा जाता है कि धर्मपाल ने स्वयं 50 विहारों की स्थापना करवाया था। जिसमें विक्रमशिला भी शामिल था, जो उस समय का प्रमुख विश्वविद्यालय था। जगदला महाविहार पाल शासकों द्वारा बनवाया गया सबसे बड़ा निर्माण कार्य था। तिब्बती स्रोतों के अनुसार- पांच बौद्ध बिहार सबसे अधिक प्रसिद्ध थे नालंदा, विक्रमशिला, ओदंतपुरी, सोमपुरी और जगदला। ये पांचो महाविहार राजकीय संरक्षण के अंतर्गत थे और आपसी समन्वय से चलाये जाते थे। जगदला महाविहार वज्रयान बौद्ध धर्म के लिए विशेष था। जगदला बौद्ध धर्म भी तंत्र विधा का केन्द्र था। यह विधापीठ अवलोकितेश्वर को समर्पित था। यह विश्वविधालय भी नालंदा की परम्परा पर आधारित था। प्रसिद्ध कश्मीरी विद्वान शाक्य श्रीभद्र जो नालंदा विश्वविधालय के अंतिम विद्वान थे उन्होंने नालंदा, विक्रमशिला और ओदंतपुरी विश्वविधालय के ध्वस्त होने के बाद यहाँ प्रवेश लिया था। यह संभावना है कि संस्कृत श्लोक की सबसे प्राचीन तिथि, सुब्रततरनकोटा, विद्याकर द्वारा जगद्गला में 11वीं शताब्दी के अंत में या 12वीं शताब्दी के शुरुआत में संकलित की गई थी।

एक कश्मीरी विद्वान, शाक्य भद्र जो नालंदा महाविहार के अंतिम महाधीश थे और बौद्ध धर्म को तिब्बत में स्थानांतरित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाये थे, कहा जाता है कि सन् 1204 में जगदला से तिब्बत भाग गए थे। इतिहासकार सुकुमार दत्त ने जगदला के अंतिम विनाश को अस्थायी रूप से 1207ई० में माना है। समग्र दृष्टि में देखें तो ऐसा लगता है कि यह आखिरी महाविहार था। 1999 में जगदला को यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थलों की सूची में शामिल करने के लिए अस्थायी स्थल के रूप में प्रस्तुत किया गया था। 

9. नागार्जुनकोंडा विश्वविद्यालय-  

नागार्जुनकोंडा आंध्र प्रदेश राज्य के नलगोंडा ज़िले में स्थित यह एक ऐतिहासिक नगर है। हैदराबाद से 100 मील दक्षिण-पूर्व की ओर स्थित नागार्जुनकोंडा एक प्राचीन स्थान है। यह स्थान बौद्ध महायान के प्रसिद्ध आचार्य नागार्जुन (द्वितीय शताब्दी) के नाम से  प्रसिद्ध है। प्रथम शताब्दी में यहाँ सातवाहन नरेशों का राज्य था। ‘हाल’ नामक सातवाहन राजा ने नागार्जुन के लिए श्री पर्वत शिखर पर एक विहार बनवाया था। यह स्थान बौद्ध धर्म की महायान शाखा का भी काफ़ी समय तक प्रचार केन्द्र रहा। सातवाहनों के पश्चात इक्ष्वाकु नरेशों ने यहाँ राज्य किया। नागार्जुनकोंडा इक्ष्वाकु राजाओं के समय एक सुन्दर नगर था। कृष्णा नदी के तट पर स्थित तथा चतुर्दिक पर्वत मालाओं से परिवृत्त यह नगर प्राकृतिक सौन्दर्य से समंवित होने के साथ ही दुर्भेद्य दुर्ग की भाँति सुरक्षित भी था। यहाँ से नौ बौद्ध स्तूपों के अवशेष लगभग 50 वर्ष पूर्व उत्खनित किये गये थे। ये इस नगर के प्राचीन गौरव एवं ऐश्वर्य के साक्षी हैं। उत्खनन में प्राप्त यहाँ के अवशेषों में एक स्तूप, दो चैत्य और एक विहार है। स्तूप के निकट बुद्ध के जीवन के दृश्यों को व्यक्त करने वाले चूने के पत्थर के टुकड़े मिले हैं। हिन्दू धर्म के पुनरुत्थान से नागार्गुनकोंडा का महत्त्व घटने लगा। नागार्जुनकोंडा से प्राप्त अभिलेखों से यह ज्ञात होता है कि पहली शताब्दी ई० में भारत का चीन, यूनानी जगत तथा लंका से सम्बन्ध स्थापित था। नागार्जुनकोंडा के एक अभिलेख से स्थविरों के संघों का ज्ञान होता है, जिन्होंने कश्मीर, गांधार, चीन, किरात, तोसलि, यवन, ताम्रपर्णी द्वीपों में बौद्ध धर्म फैलाया था।

10. शारदा पीठ विश्वविद्यालय

जम्मू कश्मीर के प्रोफ़ेसर अयाज रसूल नाजली वर्ष 2007 में शारदा पीठ गए थे वे पहले भारतीय थे जिन्होंने इस श्राईन को देखा था। यह पीओके में मुजफ्फराबाद से 160 किलोमीटर दूर है। शारदा पीठ को वहाँ के लोग शारदा पीठम भी कहते है। यह नीलम घाटी में स्थित शारदा विश्वविधालय के सामने ही है। शारदा पीठ सिर्फ हिंदुओंके लिए ही नहीं बल्कि बौद्ध धर्म के लिए भी अहम् है। यहाँ से ही ‘कल्हण’ और ‘आदिशंकर’ जैन दार्शनिक निकले थे। नाजली ने अपने पुस्तक ‘इन सर्च ऑफ रूट्स’ में लिखा है कि कनिष्क के शासन काल के समय शारदा सेन्ट्रल एशिया में सबसे बड़ी शैक्षिक संस्थान था। इस संस्थान में बौद्ध धर्म के अलावा इतिहाश, भूगोल, संरचना विज्ञान, तर्क और दर्शनशास्त्र की शिक्षा दी जाती थी। उन्होंने बताया कि इस विश्वविधालय में अपनी खुद की एक लिपि भी विकशित की थी जिसे शारदा के नाम से जानते थे। उस समय यहाँ पर 500 छात्र पढ़ते थे। इस विश्वविधालय में दुनिया की सबसे बड़ी पुस्तकालय भी थी। कश्मीर के स्थानीय गाँव वाले आज भी इसे शारदा विश्वविद्यालय के तौर पर  ही देखते हैं। 

11. कांचीपुरम विश्वविद्यालय

यह तमिलनाडु में था। इतिहास में इसके सम्बन्ध में बहुत जानकारियाँ उपलब्ध नहीं है। सम्भवत: नालंदा तक्षशिला और विक्रमशिला के उल्लेख के आगे कांचीपुरम तथा मनिखेत के प्राचीन शिक्षण संस्थाओं को इतिहासकारों और साहित्यकारों ने उतना महत्व नहीं दिया इसीलिए इसके सम्बन्ध में विशेष जानकारियाँ उपलब्ध नहीं है लेकिन ऐतिहासिक, इमारती खण्डहरों और मूर्तियों के प्राप्त अंश को देखकर इस ऐतिहासिक धरोहर के महत्व को अनदेखा नहीं किया जा सकता है।

12. मणिखेत विश्वविद्यालय

यह कर्नाटक में था। बौद्ध धर्म के उदय के साथ ही देश के विभिन्न भागों में मठों, विहारों और विश्वविधालयों का निर्माण हुआ। इस प्रकार आधुनिक विश्वविधालय की संकल्पना को जन्म देने का श्रेय बौद्ध धर्म को दिया जा सकता है।

13. वाराणसी विश्वविद्यालय

उतर प्रदेश में ( 8वीं से आधुनिक काल तक)। ब्रह्मज्ञानी राजा अजातशत्रु के समय में वाराणसी औपनिषदिक ज्ञान के लिए सुविख्यात था। फिर भी शिक्षा केन्द्र के रूप में तक्षशिला ही अग्रणी रहा। काशी के भी राजकुमार तथा ब्राह्मण युवक उच्च शिक्षा के लिए तक्षशिला ही जाया करते थे। वस्तुतः काशी के अधिकांश सुप्रसिद्ध शिक्षक तक्षशिला के ही विद्यार्थी होते थे। तक्षशिला की भांति काशी में भी वेदों के अतिरिक्त 18 शिल्पों की शिक्षा दी जाने लगी थी। महात्मा बुद्ध के समय में काशी पूर्वी भारत का निस्संदेह सबसे बड़ा सांस्कृतिक केंद्र था। संभवत इसलिए भी बुद्ध ने सारनाथ में ही सर्वप्रथम अपने मत का प्रचार आरम्भ किया। तब से सारनाथ बौद्धधर्म तथा बौद्ध शिक्षा का एक प्रमुख केंद्र रहा। अशोक ने सारनाथ को समृद्ध बनाने की पूरी चेष्टा की। अनुमानतः 12वीं शती ईसवी तक सारनाथ बौद्ध शिक्षा केन्द्र के रूप मे क्रियाशील रहा। नालंदा के समान काशी में कोई सुव्यवस्थित शिक्षा संस्था विकसित न हो सकी। सुयोग्य शिक्षक ही व्यक्तिगत रूप में अपना अपना विद्यालय चला रहे थे। 11वीं शताब्दी ईसवी में मुस्लिम आतंक के कारण पंजाब से  बहुत से पंडित उत्तर तथा पूर्व की ओर चले गए। सन् 1200 ई० में बनारस मुस्लिम साम्राज्य में सम्मिलित कर दी गयी। काशी की शिक्षा पर भी इसका बहुत ही बुरा प्रभाव पड़ा। फिर भी बनारस शिक्षा केन्द्र के रूप में अपना अस्तित्व किसी न किसी प्रकार बनाये रहा।

उपरोक्‍त विवरण के आधार पर हम कह सकते हैं कि भारत प्राचीनकाल से ही शिक्षा एवं पठन-पाठन कार्य के लिए प्रसिद्ध था। यहॉं प्राचीनकाल से ही गुरुकुल परम्‍परा चली आ रही थी। बौद्ध धर्म के उदय एवं विकास के साथ ही देश के विभिन्‍न भागों में मठों एवं विहारों का निर्माण हुआ जिनमें से अनेक महाविहार और कालान्‍तर में महाविश्‍वविद्यालय विकसित हुए। इस प्रकार आधुनिक विश्‍वविद्यालय की संकल्‍पना को जन्‍म देने का श्रेय बौद्ध धर्म को दिया जा सकता है। पालवंश के राजाओं ने इन शिक्षण संस्थाओं को संरक्षित और पोषित किया। सम्राट अशोक और गुप्तकालीन शाशकों ने भी इसको समृद्ध बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मुस्लिम आक्रमणकारियों के लगातार आक्रमणों ने इन विश्‍वविद्यालयों के अस्तिव को समाप्त ही कर दिया जिसमें सर्वाधिक विनाशकारी बख्तियार खिलजी था जिसने इस्लाम के आगे हिन्दू तथा बौद्ध धर्म के साथ साथ सुनियोजित योजनाबद्ध तरीकों से इन शिक्षण संस्थाओं को बर्बाद कर दिया। आज इनकी गौरव गाथा के प्रमाण स्‍वरूप इनके भग्‍नावशेष ही रह गये हैं।

अफशोश सिर्फ इस बात की नहीं है कि तुर्क आक्रमणकारियों ने हमारी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहरों को बर्बाद कर दिया, अफशोश इस बात की भी है कि आजादी के बाद भी स्वतंत्र भारत में अपनी इस खोई हुई अस्मिता की तलाश के लिए कोई सार्थक कदम नहीं उठाया गया। इन ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहरों को ढूँढने और संयोजन के कार्य में भी राजनितिक भेद भाव की गई। यदि अजन्ता और एलोरा जैसे प्राचीन कलाकृतियों को संरक्षित किया जा सकता है तो यकिनन बौधकालिन और गुप्तकालीन इस ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहरों को भी संरक्षित किया जा सकता है। देश के उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम तक ऐसी बहुत सारी प्राचीन सभ्यता और संस्कृति की अवशेष बिखरी पड़ी हैं जो स्थनीय निवासियों के स्वार्थ और अतिक्रमण से लुप्त होने की स्थिति में पहुँच गई है। अब समय आ गया है कि इन ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहरों को स्थानीय अतिक्रमण से मुक्त करके एक ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर के रूप में संरक्षित किया जाये तथा इसे एक नेटवर्क के अंतर्गत संरक्षित किया जाए जिससे हमारे देश में पर्यटन और रोजगार को तो बढ़ावा मिलेगा ही ये निशानियाँ हमारे आने वाली पीढ़ी के लिए भी बची रहेगी।

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