पूर्वोत्तर भारत में हिन्दी

भाषा का कोई रंग, रूप, जाति या आकार नहीं होता है। इसे तो सिर्फ सुनकर महसूस किया जाता है। हमारी  हिन्दी का तो कुछ कहना ही नहीं इसकी शब्दों में इतनी मिठास है कि विश्व का हर व्यक्ति इसे सीखना और बोलना चाहता है। कुछ लोग तो हिन्दी सीखकर अपने आपको गौरवान्वित महसूस करते हैं। भारत में अनेक राज्य हैं और सभी राज्यों की अपनी-अपनी अलग भाषा है। इस प्रकार भारत एक बहुभाषीय राष्ट्र है लेकिन अन्य कई देशों की तरह भारत की भी अपनी एक राष्ट्रभाषा है जिसका नाम है “हिन्दी”। भारतवर्ष की प्रमुख विशेषता है- ‘विविधता में एकता’। हमारे देश में लगभग 170 भाषाएँ और तकरीबन 500 बोलियाँ हैं। भारत की अनेक भाषाओँ में केवल हिन्दी ही एक ऐसी भाषा है जिसे अपने क्षेत्र से बाहर विकसित होने का अवसर मिला है। वर्तमान में हिन्दी विश्व की तीसरी सबसे बड़ी भाषा है। उतर- पूर्व की भाषाओँ का अन्य भारतीय भाषाओँ के साथ गहरा संबंध है। आमतौर पर पूर्वोतर राज्यों की गिनती गैर- हिन्दी प्रदेशों में की जाती है लेकिन पूर्वोतर के लोग जब भी अपने किसी पड़ोसी राज्य के लोगों से मिलते हैं, तो उनकी सपर्क भाषा हिन्दी ही होती है। क्योंकि हिन्दी विचारों के आदान-प्रदान का सबसे आसान माध्यम है। सबसे पहले जोरहाट के पुलिस सुपरीटेंडेंट श्री यज्ञराम खारधरीया फुकन ने यह महसूस किया कि असम की उन्नति के लिए असम वासियों को बंगला की जगह ‘हिन्दी’ सीखना अधिक उपयोगी होगा। हिन्दी शिक्षण को ध्यान में रखकर उन्होंने एक उपयुक्त ग्रंथ रचने का संकल्प किया था- इस योजना को उन्होंने सनˎ 1832 के 79 भट्टे वाले “समाचार दर्पण” में प्रकाशित किया था। इसका नाम रखा गया था। “हिन्दी व्याकरण और अभिधान” लेकिन दुर्भाग्य वश यज्ञराम खारधरीया फुकन जी की आकस्मिक मृत्यु के कारण यह ग्रंथ अधूरा ही रह गया। सनˎ 1885 के बाद जब स्वतंत्रता आन्दोलन ने जोर पकड़ लिया था, तब राष्ट्रीय आंदोलन के साथ राष्ट्रीय एकता के लिए राष्ट्र भाषा हिन्दी की आवश्यकता लोगों को महसूस होने लगी। तब भी असम में हिन्दी का संस्थागत प्रयास नही था। सनˎ 1926 में पहली बार विद्यालयों में हिन्दी को शिक्षण विषय के रूप में जगह मिला। इसका श्रेय शिवसागर के पॉलिटेकनिक इंस्टीट्यूट के प्रतिष्ठाता भुवन चन्द्र गगै को जाता है। उन्ही के अथक परिश्रम और परेशानियों के फलस्वरूप आज पूर्वोतर में हिन्दी तीसरी कक्षा से आठवीं कक्षा तक अनिवार्य विषय और आगे दसवीं तक ऐच्छिक विषय के रूप में पढाई जाती है।

पूर्वोतर भारत में हिन्दी का वास्तविक रूप तब आया जब 1934 में ‘अखिल भारतीय हरिजन सेवा संघ’ की स्थापना के लिए महात्मा गाँधी असम आये थे। उन्होंने हर जगह अपने संबोधन में असम के लोगों को हिन्दी सिखने की बात कही थी। गाँधी जी के बातों से प्रभावित होकर श्री पीतांबर देव गोस्वामी ने बताया की यहाँ हिन्दी सिखाने वालों की कमी है, यदि इसकी व्यवस्था हो जाए तो, हम हिन्दी शिक्षण- प्रशिक्षण के कार्यक्रम को शुरू कर सकते है। गोस्वामी जी के बातों से संतुष्ट होकर गाँधी जी बाबा राघवदास को हिन्दी प्रचारक के रूप में नियुक्त करके असम भेज दिए। राघवदास असम आए और उन्होंने कुछ हिन्दी भाषी लोगों को हिन्दी शिक्षण के लिए नियुक्त किया। जिसमे जोरहाट से- अम्बिका प्रसाद त्रिपाठी, डिब्रूगढ़ से- शिव सिंहासन मिश्र, शिवसागर से- सूर्यवंसी मिश्र, नगाँव से- देवेन्द्र दत्त शर्मा, गुवाहाटी से- धनेश्वर शर्मा और गोलाघाट से- बैकुंठ नाथ सिंह मुख्य थे। ये सभी प्रशिक्षित  अध्यापक तो नहीं थे लेकिन इनमे मुख्य बात यह थी कि ये सभी असमिया भाषा जानते थे और व्याकरण अनुवाद पद्धति उनका माध्यम था। इसी बीच कुछ असमिया युवक- युवतियाँ काशी विधापीठ जैसे राष्ट्रीय संस्थान में अध्ययन के लिए गए। उनमे नवीनचंद्र कलिता, खर्गेश्वर मजुमदार का नाम उल्लेखनीय है। बाबा राघवदास के आश्रम में रजनीकान्त चक्रवर्ती और हेमकांत भट्टाचार्य जी हिन्दी सीख रहे थे। बाद में नवीनचन्द्र जी भी आ गए। फिर इन तीनों को राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा द्वारा संचालित ‘हिन्दी अध्यापन मंदिर’ में प्रशिक्षण के लिए भेज दिया गया। असल में ये तीनों ही असम में हिन्दी शिक्षण के पुरोधा थे। प्रशिक्षण समाप्त कर, श्री नवीन चंद्र कलिता जी को- गुवाहाटी, श्री रजनी कान्त चक्रवर्ती जी को- शिवसागर में और स्व. हेमकांत भटटाचार्य जी को- नगाँव के प्रचारक के रूप में नियुक्त किया गया। इन महानुभावों के उत्साह और प्रेरणा के प्रताप का ही फल है कि आज पूर्वोतर भारत के विधालयों में हिन्दी भाषा की नींव पड़ी। यही समिति आगे चलकर ‘असम राष्ट्र भाषा प्रचार समिति’ बनी। जो आज भारत के श्रेष्ठ हिन्दी स्वैच्छिक संस्थानों में से एक है।

असम राष्ट्रभाषा प्रचार समिति की स्थापना का प्रमुख उद्देश्य हिन्दी भाषा को आम लोगों तक पहुँचाना था। कहते हैं कि जिन भाषाओं की लिपि देवनागरी होती है, वह भाषा हिन्दी नहीं होते हुए भी देवनागरी लिपि के माध्यम से ‘हिन्दी’ के प्रचार-प्रसार में सहायक होती है। उदहारण के रूप में- अरुणाचल प्रदेश की भाषा ‘मोनपा’, ‘मिजि’ और ‘अका’, असम में- ‘मिरि’, ‘मिसमि’ और ‘बोड़ो’ है, नागालैंड में- ‘अडागी’, ‘सेमा’, ‘लोथा’, ‘रेग्मा’, ‘चाखे तांग फोम’ तथा ‘नेपाली’ है, सिक्किम में- ‘नेपाली’, ‘लेपचा’, ‘भडपाली’, ‘लिम्बू’ आदि भाषाओं की लिपि देवनागरी है।  देवनागरी लिपि अधिकांश भारतीय लिपियों की जननी है। अतः इसके प्रचार-प्रसार से पूर्वोतर राज्यों में हिन्दी सीखना-सिखाना बहुत आसान हो गया। असम में भी बोड़ो भाषा के लिए ‘देवनागरी लिपि’ का प्रयोग हो रहा है। असम का स्थानीय नाम ‘अहोम’ है, थाईलैंड की ‘अहोम’ जाति कभी यहाँ ‘राज’ किया करती थी। 1947 में जब भारत आजाद हुआ तब पूर्वोतर में तीन ही राज्य थे, ‘मणिपुर’, ‘त्रिपुरा’, और ‘असम’ जिसकी राजधानी ‘शिलोंग’ थी, जो आज मेघालय की राजधानी है। बाद में इन्हीं राज्यों से चार और राज्य बने। 1963 में नागालैंड, उसके बाद 1972 में मिज़ोरम यूनियन टेरिटरी बना और अंत में 1987 में ‘अरुणाचल प्रदेश’। इसके साथ पूर्वोतर में सात राज्य हो गए। जिसे ‘सात बहनों’ के नाम से भी जाना जाता है। त्रिपुरा के पत्रकार ज्योति प्रसाद सैकिया ने पहली बार अपनी किताब में पूर्वोतर के इन सात राज्यों को ‘सात बहनों’ के नाम से सुशोभित किया था । पूर्वोतर भारत या यों कहें ‘सात बहनों’ की सतरंगी संसार। पूर्वोतर में तो प्रकृति ने इन ‘सात बहनों’ को अपनी सभी खजानों में से दिल खोलकर दिया है। जैसे- सूरज की पहली किरण से लेकर ‘इन्द्रधनुष’ के सातो रंगों का समावेश भी इन्हीं सात राज्यों में है। ये सातो बहनें (राज्य) पूरी दुनियाभर में अपनी प्राकृतिक सौंदर्य और सांस्कृतिक वैभव के लिए मसहूर हैं। इन राज्यों में विभिन्न प्रकार के ‘कुलों’ की अनगिनत भाषाएँ, अनगिनत लोग, अनगिनत संस्कृतियाँ ऐसी बहुरंगी रचनाएँ रचतीं है, जिसे देखने वालों का मन झंकृत हो उठता है। यहाँ की एक और खासियत है, एक बार अगर हम सैर के लिए निकल जाए तो पूरी पूर्वोतर की सैर कर सकते हैं। संविधान सभा ने संविधान बनाते समय भारत के दक्षिण और पूर्वोतर राज्यों को भाषाई आधार पर गैर हिन्दी मानते हुए इन्हे ‘ग’ श्रेणी में रखा था, किन्तु व्यावहारिक तौर पर वैसी बात नहीं है । यहाँ के लोगों के लिए हिन्दी ही विचारों के आदान-प्रदान का सबसे आसान माध्यम है। आज भी यहां असमिया या बांग्ला भाषा एक-दुसरे के लिए संपर्क की ‘कड़ी’ नहीं बन सकी है लेकिन हिन्दी लोगों के लिए ‘सेतु’ का काम करती है। असम के दो पहाड़ी जिलों (कार्बी आंग्लांग व डिमा हसाऊ) के लोग जब गुवाहाटी, तिनसुकिया, तेजपुर राज्य के किसी भी हिस्से में होते है तो उनकी भी सम्पर्क भाषा हिन्दी ही होती है। कार्बी आंग्लांग जिले के रहने वाले राम शरण चौहान का कहना है कि डिमा हसाऊ जिले के मुख्य शहर ‘हाफलांग’ के ट्राइबल अपनी मिट्टी से रची-बसी हिन्दी बोलते हैं, जिसे ‘हाफलंगी’ हिन्दी कहाँ जाता है।

कांग्रेस समिति के प्रवक्ता रमण झा जी का कहना है कि असम और हिन्दी बाहुल्य राज्यों में गहरा संबंध रहा है। देश आजाद होने के पहले से ही पूर्वोतर में कई राज्यों से लोग जैसे- बिहार, राजस्थान, उतर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब आदि से यहाँ पर आते-जाते रहते थे। यहाँ के लोगों का अन्य राज्यों के लोगों के साथ कई प्रकार के संबंध रहें हैं जैसे- धार्मिक, सांस्कृतिक, विवाह सम्बन्ध आदि भी स्थापित हुए हैं। रामायण काल में मर्यादा पुरुषोतम राम के गुरु वशिष्ठ असम के ही रहने वाले थे। परिणामस्वरूप अभी भी गुवाहाटी में वशिष्ठ आश्रम है। कहा जाता है कि महाभारत के समय भीम भी यहाँ आए थे। उसी समय उन्होंने मणिपुर की ‘हिडिम्बा’ से विवाह की थी। जिसे उन्हें ‘घटोत्कच’ नामक पुत्र की प्राप्ति हुई जिसका पराक्रम महाभारत में वर्णित है। हलांकि हिमाचल के मनाली को भी हिडिम्बा और घटोत्कच से जोड़ा जाता है। श्री मंत शंकर देव जिन्हें असमिया जाती, सभ्यता, व संस्कृति का प्राणतत्व माना जाता है। उनके भी पूर्वज उतर प्रदेश के कन्नौज से आकार असम में बसे थे। असमिया फ़िल्म के पितामह ज्योति प्रसाद अग्रवाल के पूर्वज भी राजस्थान के ‘केड’ से आए थे। पूर्व राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद के पूर्वज भी उतर प्रदेश से आकार चाय बगान चलाते थे। मुगलकाल और अंग्रेजों के ज़माने में भी देश के अनेक भागों से हिन्दी भाषी लोगों का आना- जाना लगा रहता था। अंग्रेजों ने जब चाय बगान के विस्तार का काम शुरू किया तब उस समय भी बिहार, उड़ीसा, मध्य प्रदेश और उतर-प्रदेश से लोगों को लाकर बसाया गया । जिसे लोग आज चाय समुदाय के नाम से जानते हैं। उनमे से अधिकतर लोग मूल रूप से हिन्दी भाषी थे। आज समय के साथ उनलोगों ने स्थानीय सभ्यता और संस्कृति को अपना लिया और वे वही के होकर रह गए। वे सभी लोग सार्वजनिक तौर पर असमिया, बांग्ला, संथाली, उड़िया भाषा बोलते हैं। परन्तु उनकी जातीय पहचान और संस्कृति आज भी हिन्दी भाषा बोलने वालों की तरह ही है। वे अपने उपनाम में मुंडा, मांझी, कुर्मी, मल्लाह, तेली, सिंह शब्द आदि लगाते  है। सबसे खास बात तो यह है कि वे सभी आज भी अपने-अपने घरों में अपनी ही लोक भाषाओं का प्रयोग करते हैं और अपनी जड़ो से जुड़े हुए हैं। दलित नेता दीनानाथ बासफोर का कहना है कि हमारे पूर्वज बहुत पहले बिहार के गोपालगंज जिले से असम आ गए थे। आज हमारे यहाँ के बहुत सारे लोग सफाई कर्मचारी के रूप में काम करते हैं। अब तो असमिया भाषा, संस्कृति, सभ्यता ही हमारी पहचान बन गई है। आज पूर्वोतर में हिन्दी का बोलबाला है, हर जगह जैसे- हाट-बाजार, बस अड्डा, रेलवे स्टेशन दुकानों आदि जगहों पर हिन्दी में ही बातें सुनाई पड़ती हैं । इन राज्यों के विकाश के लिए 1971 में केन्द्रिय संस्था के रूप में पूर्वोतर परिषद् के गठन के बाद से भारत सरकार ने इन क्षेत्रों में हिन्दी की प्रगति के लिए प्रभावी योजना बनाना शुरू कर दिया। जिससे पूर्वोतर भारत के ज्यादा से ज्यादा लोग हिन्दी सीख सकें। इस क्षेत्र में ‘केन्द्रीय  हिन्दी संस्थान’ का योगदान भी उल्लेखनीय है। इस संस्थान के तीन केंद्र हैं। ये तीनो केन्द्र अपने-अपने राज्यों में हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए विशेष रूप से कार्यक्रम चलाते हैं। हिन्दी साहित्य सम्मेलन की ओर से 1928 से मणिपुर में हिन्दी प्रचार-प्रसार शुरू हो गया था। कुछ वर्षो के बाद यहाँ ‘राष्ट्रभाषा प्रचार समीति’ वर्धा ने अपनी शाखा खोल दी। यहाँ इम्फाल में हिन्दी प्रेमियों ने मिलकर 07 जून 1953 को ‘मणिपुर हिन्दी परिषद्’ की स्थापना की। मणिपुर की दूसरी संस्था का नाम ‘मणिपुर राष्ट्रभाषा प्रचार समीति’ है। मणिपुर के प्रमुख हिन्दी प्रचारक और हिन्दी सेवी – लाइयुम ललित माधव शर्मा, टी.वी. शास्त्री, हेमाम नीलमणि सिंह आदि हिन्दी की सेवा में तहे दिल से कार्यरत हैं । नागालैंड में अनेक जन भाषाएँ बोली जाती है लेकिन यहाँ के लोग भी हिन्दी से बहुत प्रभावित होते हैं। हिन्दी प्रचार के लिए नागालैंड में भी ‘नागालैंड राष्ट्रभाषा प्रचार समिति’ कार्यरत है। यहाँ हिन्दी के मेल जोल से तैयार समन्वित भाषा का चलन बढ़ रहा है जिसे नागालैंड के लोग ‘तेअदिए’ नाम से पुकारते हैं और अंग्रेजी के ग्रंथो की देखा- देखी ‘नागामीज’ कहा जाता है। इसमें मौसम, प्रार्थना, अंग आदि अनेक हिन्दी शब्दों का प्रयोग होता है। ‘केन्द्रीय हिन्दी संस्थान’ ने नागालैंड के हिन्दी अध्यापकों के लिए विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया है, जिसमे बीस से तीस अध्यापक प्रतिवर्ष विशेष प्रशिक्षण के लिए आगरा जाते हैं तथा प्रशिक्षण के बाद ये नागालैंड में ‘हिन्दी के राजदूत’ बनकर लौटते हैं। मिज़ोरम की डा. इंजीनियरी जेनी हिन्दी संस्थान की प्रोफेसर हैं। इन्होने पूर्वांचल हिन्दी साहित्य पर शोध कार्य किया है तथा इनका ‘हिन्दी-मिज़ो शब्द कोष’ प्रकाशित हो चुका है। इस हिन्दी संस्था का नाम ‘मिज़ोरम हिन्दी प्रचार सभा, आइजोल’ है। आर. एल. थनमोया एवं ललथलमुआनो हिन्दी परियोजना पर काम कर रहे हैं। मेघालय ने सनˎ 1976 में अपना शिलांग केन्द्र खोला लेकिन यहाँ के लोग अपनी भाषा का प्रयोग अधिक करते हैं। पूर्वोतर हिन्दी साहित्य अकेडमी, मेघालय में प्रमुख रूप से हिन्दी प्रसार की कमान संभाले हुए है। त्रिपुरा में हिन्दी के प्रचारकों में कुमार पाल का नाम उल्लेखनीय है। वर्तमान में पूर्वांचल में सौ से भी ज्यादा हिन्दी विधालयों का संचालन हो रहा है। बहुत से छात्र-छात्राएं हिन्दी में अपनी पढ़ाई पूरी कर रोजगार भी प्राप्त कर रहे हैं। कई पत्रिकाएँ ऐसे प्रदेशों से प्रकाशित हो रही हैं जिसमे पूर्वोतर राज्यों के लेखकों ने अपने- अपने राज्यों में प्रचलित लोक कथाओं, लोक गीतों आदि का हिन्दी में अनुवाद प्रकाशित किया है। जिससे पूर्वोतर के कला-संस्कृति, रीति-रिवाज को समझना दुसरे राज्यों के लिए आसान हो गया है। अतः हम यहाँ कह सकते हैं कि पूर्वोतर की भाषाओं के विकाश में हिन्दी की अहम भूमिका है। आज पूर्वोत्तर भारत में कई संस्थाएँ है जो हिन्दी के प्रचार – प्रसार में कार्य कर रहीं हैं। जैसे- असम राष्ट्रभाषा समिति, गुवाहाटी। केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, गुवाहाटी। असम राज्य राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, जोरहाट। राजकीय हिन्दी शिक्षक प्रशिक्षण महाविधालय, गुवाहाटी। राजकीय हिन्दी शिक्षक प्रशिक्षण संस्थान, आइज़ोल, मिज़ोरम सरकार। राजकीय हिन्दी शिक्षक प्रशिक्षण संस्थान – नॉर्थ गुवाहाटी, असम सरकार। राजकीय हिन्दी शिक्षक प्रशिक्षण संस्थान, इंफाल महाविधालय, मणिपुर यूनिवर्सिटी। राजभाषा विभाग, गृहमंत्रालय, असम सरकार।

पूर्वोत्तर भारत की सुन्दरता को प्रकृति ने अपने हाथो से सजाया और संवारा है। इस धरती को प्रकृति ने कुछ ऐसी चीजें दीं हैं जो और राज्यों के पास नहीं है। यहाँ उसका वर्णन अन्यथा नहीं होगा :-

  1. अरुणाचल प्रदेश – यह देश का सबसे पूर्वी राज्य है, जहाँ सबसे पहले सूर्योदय होता है।
  2. पूर्वोत्तर में सबसे बड़ा नदी द्वीप असम के माजुली में है। इसे सौर उर्जा का उत्पादन और ब्रहˎमपुत्र नदी के ऊपर सबसे आकर्षक सूर्यास्त के लिए जाना जाता है ।
  3. असम के गुवाहाटी में दुनिया के सबसे छोटे बसे हुए नदी के द्वीप हैं I यहाँ ब्रहमपुत्र नदी के उमानंदा द्वीप हैं I उमानंदा नाम का एक प्रसिद्ध मंदिर ।
  4. मेघालय के शिलोंग में मवलिनोंग गाँव एशिया का सबसे स्वच्छ गाँव है ।
  5. पृथ्वी पर सबसे ज्यादा बरसात मेघालय के मौसिंराम मैं होती है ।
  6. देश का पहला तेल का कुआँ और तेल की शोधशाला असम के ‘डिगबोई’ में है ।
  7. असम भारत का एकमात्र ऐसा राज्य है जो तीन प्रकार के रेशम का उत्पादन करता है।
  8. चाय के उत्पादन में असम भारत में सबसे आगे है ।
  9. भारत के सबसे साक्षर राज्य दो हैं त्रिपुरा एवं मिज़ोराम, वैसे इस क्षेत्र को भारत के “पिछड़े” क्षेत्र में गिना जाता है। वास्तव में त्रिपुरा को 2013 में 65% के आकड़े के साथ भारत का सबसे साक्षर राज्य माना गया। हलांकि 2011 की जनगणना के अनुसार केरल को सबसे साक्षर राज्य माना गया।
  10. हम सभी जानते हैं की कश्मीर को “धरती का स्वर्ग कहा” जाता है , केरल को “भागवान का अपना घर” कहा जाता है और मेघालय को “पूर्व का स्कॉटलैंड” कहाँ जाता है। काजीरंगा नेशनल पार्क है, जो एक सींगवाले गैंडे के लिए जाना जाता है।

              एक कहावत के अनुसार- ‘भगवान जब देता है तो छप्पर फार के देता है। सच में पूर्वोतर राज्य को भागवान दिल खोल कर प्राकृतिक सम्पदा दी है। मुझे याद है जब हम पहली बार (सनˎ 1986 से 1989 तक सिलचर में) सिलचर गए उस समय भी वहाँ के लोग हिन्दी में बातें करते थे। हमें सनˎ 1989 से 1990 तक डिब्रूगढ़, सनˎ 2001 से 2004 तक जोरहाट में रहने और सनˎ 2017 में तेजपुर में जाने का अवसर मिला और मुझे कभी भी ऐसा नहीं लगा की असम के लोग हिन्दी नहीं बोलते है। पुरे भारत में सर्वाधिक बात करने और समझने वाली भाषा हिन्दी ही है। हिन्दी भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता का प्रतीक है। हिन्दी बहुत ही धनी भाषा है क्योंकि यह किसी भी भाषा के शब्द को आसानी से ग्रहण कर लेती है। सनˎ1909 में केन्द्रीय विकास राज्य मंत्री के. संगमा ने हिन्दी में शपथ ग्रहण कर इसे और भी मजबूत किया। आज उदारीकरण और वैश्वीकरण के युग में दुनिया एक गाँव की तरह हो गई है। पूर्वोतर का जनाधार बढ़ता जा रहा है। हिन्दी के विकाश में मारवाड़ी समुदाय का भी बहुत बड़ी भूमिका है। हिन्दी अखबार और पत्र-पत्रिकाओं के प्रकाशन, साहित्यिक, सांस्कृतिक और धार्मिक आयोजनों में भी इनकी अहम् भूमिका है। इस क्षेत्र में हिन्दी की पहचान को जिन्दा रखने का श्रेय मुख्यतः इस समुदाय को भी जाता है। नौजवान हमारे देश के भविष्य है। अतः उनसे हमारी अनुरोध है की वे हिन्दी की ओर लौटे।

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