बेटा बचाओ, देश बचाओ

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री मोदी जी ने राजस्थान के झुंझुनू से एक योजना को पुरे देश में लागू किए थे । जिसका नाम था ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’। यह योजना आज पूरे भारत में एक आन्दोलन की तरह फैल गया है। सभी लोग, मीडिया, सिनेमा, टीवी चैनल वाले सभी पूरे जोश के साथ इस योजना पर काम करने लगे हैं। ये बहुत खुशी की बात है कि हमारे प्रधानमंत्री जी बेटियों के बारे में इतना सोचते हैं। जब हमारी बेटियां पढ़ेगी तभी तो हमारा परिवार, समाज और देश आगे बढ़ेगा और आने वाली पीढ़ी सर्वगुण संपन्न होगी। खुशी की बात है कि अधिकतर लोग समझते हैं कि हमारी बेटियों को पढ़ाना और बचाना दोनों जरुरी है। इसके बिना हमारी दुनिया अधूरी रह जाएगी।

यह बात बहुत लोगों को अजीब लगेगी कि हमारे समाज में कई सामाजिक कुरीतियों के कारण समाज का सर्वांगीन विकास नहीं हो पाता है। आज के समाज में सिर्फ बेटियों को ही क्यों बेटों को भी बचाना आवश्यक हो गया है। पुरुषों में भी आत्महत्या करने के मामले में वृद्धि हुई है। इसके कई कारण हो सकते हैं जिसमे विवाह से सम्बन्धित कारण बहुत बढ़ गये हैं। आज जिस तरह कि रोज-रोज की घटनाएँ हो रही हैं उन घटनाओं को देखते हुए हमें लगता है कि बेटियों के साथ-साथ बेटों को भी सुरक्षा प्रदान करना अति आवश्यक है। बेमेल विवाह बन्धनों के कारण पारिवारिक कलह शुरू हो जाती है। व्यक्तिगत आत्म केन्द्रित पारिवारिक जिन्दगी में कहीं न कहीं संतुलित पारिवारिक जीवन के सामंजस्य का आभाव होता है। बाल विवाह को अपराध मानते हुए उसके रोक थाम के अनेकों उपाय किये गये हैं लेकिन बढ़ते उम्र में देर से विवाह होने के कारण भी कई तरह के पारिवारिक और सामाजिक अपराध बढ़े हैं। इस विषय पर गहन शोध की आवश्यकता से इनकार नहीं किया जा सकता है। इसके लिए सामाजिक संस्थाओं को आगे आना चाहिए। एक समय तक शादी विवाह को टालने की कोशिश की जाती है और जब लगता है कि अब देर हो रही है अब तो शादी हो जानी चहिए तब जिस तरह के भी परिवार मिले एक सम्बन्ध में बंध जाते हैं फिर शुरू होती है बेमेल सम्बन्धों के कारण पारिवारिक कलह और इसका बिगड़ता स्वरूप किसी न किसी की हत्या या आत्महत्या तक पहुंच जाती है। ये बहुत ही हृदय विदारक स्थिति है। इस तरह की दुर्घटनाओं को यदि समय रहते देखा जाय तो उसे रोकी जा सकती है।

बेमेल विवाह के कारण बेटों की आत्महत्या करने की संख्या भी दिन पर दिन बढ़ते ही जा रही है। आत्महत्या का कारण शादी के बाद हो रहा है आखिर क्यों? बेटे भी माँ, परिवार, समाज और देश के ही अंग हैं। ये कैसा समाज और देश है जो बेटों के दुःख से दुखी नहीं होता है और सिर्फ बेटियों के दुःख से ही दुखी होता है। जब भी कोई बेटी आत्महत्या करती है तो देश के सभी मीडिया, सामाजिक संस्थाएँ, बहस करते हैं लेकिन जब कोई बेटा आत्महत्या करता है तो सभी के जुबान बंद हो जाती है। आखिर क्यों? दिल्ली के पश्चिम बिहार में आत्महत्या करने वाला राम गोयल इस देश का ही बेटा था? उसके आत्महत्या पर तो किसी ने कुछ नहीं कहा। मीडिया, सामाजिक संस्थाएं, टीवी चैनल सभी ने इस घटना को उतना महत्व नहीं दिया जितना आवश्यक था। कई बार तो परिवार भी इस तरह के बेमेल सम्बन्धों को नजरअंदाज करता है। इसी कारण से इसका इतना दुखद अंत होता है। औरत और मर्द की परिवार में भूमिका को देखें तो मुझे लगता है कि इस पृथ्वी पर सबसे दुखी मर्द ही है। आज के समय में बेटे शादी के नाम से डरने लगे हैं। जब तक बेटों की शादी नहीं होती है तब तक उसके घर में माँ–बाप, भाई-बहन सब ठीक रहते हैं लेकिन जैसे ही लड़के कि शादी हो जाती है वह अलग-थलग पड़ जाता है। उसके माँ- बाप, भाई- बहन, रिश्तेदार आदि सभी गलत हो जाते है । आज लडकियाँ सिर्फ अपने पति को ही अपना समझती हैं उसके परिवार को नहीं। वैसे तो इसके कई कारण हो सकते हैं लेकिन इन दोनों के बीच में देश का भविष्य और माँ का एक लाल मारा जाता है। आज खास कर हमारे देश में जितना दुःख, तकलीफ, टेंसन बेटों को है उतना बेटियों को नहीं है क्योंकि सरकार ने बेटियों की सुरक्षा के लिए बहुत सारे कानून बना रखें हैं। उसी कानून का सहारा लेकर बेटियाँ लड़कों को तथा उनके परिवार वालों को परेशान करती हैं। बेचारा बेटा इजज्त के चलते न तो माँ के तरफ से कुछ बोल पाता है और न ही पत्नी के तरफ से बोल पाता है। वह दोनों पाटों के बीच में ‘घुन’ की तरह पीसता रहता है और जब उसके बर्दास्त की शक्ति खत्म हो जाती है तो वह अपने जीवन का अंत का रास्ता चुन लेता है। इसके विपरीत लड़की के दोनों हाथ में लडडू है। अगर परिवार से अलग हो गई तो कानून का सहारा लेकर सम्पति का हिस्सा मिलेगा और अगर पति आत्महत्या कर लिया तो भी सब कुछ उसीका होगा। समाज भी उसीका साथ देता है। ये कैसा न्याय है? सोंचने वाली बात है कि मरने से पहले कई पृष्ठ का ‘सुसाइड नोट’ लिखने वाले ‘राम गोयल’ को कितनी यातनाओं से गुजरना पड़ा होगा। उसने कई मिनट का ‘सुसाइड वीडियो’ भी बनाया था। जाहिर है वह मरना नहीं चाहता था और समय रहते यदि उसकी स्थिति पर ध्यान दिया गया होता तो आज वह जिन्दा होता। इस दुखद अंत तक पहुँचने में उसे कितनी यातनाओं को सहना पड़ा होगा? सोंच कर रूह काँप जाती है।

आज लालू जी के बड़े बेटे ने जो फैसला लिया है वह काबिले तारीफ है। उसने 6 महिना में ही शादी तोड़ने का फैसला कर लिया। उसने मिडिया में कहा है कि “घुट–घुट के जीने से कोई फायदा नहीं है”। उसने अपनी पत्नी पर प्रताड़ना का एक तरफा आरोप लगाया है। रोज–रोज की यातनाएं (ड्रामा) परिवार को बहुत कम लेकिन पति को बहुत भुगतना पड़ता है। तेज प्रताप एक समर्थ परिवार का बेटा है इसलिए शायद इतना कठोर निर्णय समय से ले लिया। हमें उसकी हिम्मत की दाद देनी चाहिए आत्महत्या करने से तो अच्छा है बदनाम हो जाना। कम से कम जान तो बच गया। हमारा प्रयोजन किसी के नीजी जीवन पर टिप्पणी करना या व्यक्तिगत विषयों में हस्तक्षेप करना नहीं है लेकिन इस तरह की घटनाएँ जब जानलेवा बन रही हों तो उस पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करना समाज का कर्तव्य बनता है। यदि समय पर ध्यान दिया जाए और इसके लिए उचित सामाजिक और क़ानूनी सुरक्षा व्यवस्था की जाए तो इस तरह की जानलेवा दुर्घटना रोकी जा सकती है। जो सम्बन्ध प्रेम और सामंजस्य के साथ आगे नहीं बढ़ सकते उसे तोड़ देने में भी कोई बुराई नहीं है। तेजप्रताप यादव के स्थिति को राजनीतिक नजरिये से नहीं देखा जाना चाहिए बल्कि उसे सामाजिक समस्या समझ कर सहानुभूतिपूर्वक इस पर बिचार करनी चाहिए।

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