हत्यारिन राजनीति (कविता)

हे! मानव तुमने ये क्या कर दिया?
मैं क्या थी और तुमने मुझे क्या बना दिया?
खुद को संवारने के लिए मुझे दाग-दाग कर दिया।
मैं तो रानी थी राजाओं के नीतियों की
तुमने मुझे हत्यारिन बना दिया।
मुझे तो मेरे पूर्वजों ने इजज्त और सम्मान दिया
लेकिन तुमने मुझे कलंकित कर दिया।
थी मैं राजाओं की नीति
लेकिन तुने मुझे हत्यारिन बना दिया।
कुर्सी के खातीर स्वाधीन देश में भी मुझे कातिल बना दिया।
पहले साजिश कर विमान क्रैश में बोष को मरवा दिया।
दूसरी साजिश हुए शास्त्री जी जिन्हें रूस में जहर दे दिया।
कश्मीर के जेल के साजिश में श्यामा प्रसाद की कर दी विदाई।
और उपाध्याय जी का कर दिया रेलगाड़ी में काम तमाम।
इतना से भी शांति न मिली तो
पी.पी. कुमारमंगल का पता भी नहीं चलने दिया।
और किस-किस का नाम लिखूं, दिल में दर्द सा होता है
कानून देश का अंधा और बहरा है
और आयोगों ने सारे गुनाह कर दिए माफ।
डायलिसिस की सूली पर जे.पी के गुर्दे चढ़ गये।
आपात काल के अग्नि ने कई निर्दोषों को जला दिया।
ललितनारायण, संजय, इंदिरा और राजीव आदि के नाम लिखते हाथ कांप गए।
तू हिन्दू-मुस्लिम और जाती-पाती के बीच लडवाकर कुर्सी ले लिया।
हिन्द की भोली जनता तेरे चक्कर में पड़ जाती है
ऐ हत्यारिन ‘राजनीति’
अब तू क्या करवाएगी, बस ख़त्म कर तू अपनी कहानी
जीने दे इंसानों को सुकून की अपनी जिन्दगी।

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